अब आगे… और मैं दरवाजा खोल देता हूँ। उस समय पुड़िया के सरूर में मुझ को ठीक से कुछ समझ में नही आ रहा था। हा फिर भी इतना अवश्य याद है कि शायद मैं दरवाज़ा खोल कर वापस उसी खिड़की के समीप आ कर खड़ा हो जाता हूं और अब भी वहा मौजूद उस […]

via 💥 एक सत्य। 5 (पांचवा ब्लॉग) एक सत्य अनुभव। — Author Vikrant Rajliwal Writings and Blogs

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