नंगे भ्रष्टाचारी काव्य कविता के जरिए श्री विक्रांत राजलीवाल ने उन भ्रष्टाचारी व्यक्तियों एव संगठनों पर एक प्रहार करने का प्रयत्न किया है जो आज भी हमारी मातृभूमि भारतवर्ष के उज्ज्वल इतिहास पर अपनी भ्रष्टाचारी प्रवर्ति के जरिए एक कलंक मलते हुए गरीब एवं ईमानदार व्यक्तियोँ का शोषण कर रहे है।

आशा करता हु आप सभी आदरणीयों तक मेरी यानी कि विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित इस महत्वपूर्ण काव्य कविता के भाव पहुच सकें।

जय हिंद।

विक्रांत राजलीवाल।

नंगे भ्रष्टाचारी

नगों से नंगे मिले नंगे होंगे सारे।
नगों को देख नंगे मुस्काए,
भ्रष्ट है नंगे जितने भी जो सारे।।

प्रकाश सत्य से सत्य का कर देगा नंगा, नगों को नग्न है नंगे जितने भी जो सारे।

न्याय सत्य से सत्य का कर देगा न्याय, नगों से पीड़ित है बेबस जितने भी जो सारे।।

नंगे ये नग्न है दलदली भ्रष्टाचार से शिक्षित, बेशर्म जितने भी नंगे जो सारे।

चलेगी लहर सच्चाई की तो मचेगी भगदड़ एक भयानक, खुलेगी पोल नग्नता से नगों की, नंगे है समस्त भ्रष्टाचारी जितने भी जो सारे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
21/11/2018 at 08:47 am

(Republish 8/10/2019 at 8:30pm)

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