वर्ष 2008 में, जीवन एक दम से बदल गया। अचानक ही मुझ को, जब पता चला कि इस बार जो मेरे हाथों में किताब है। वह वास्तविक रूप से सत्य है। एवं मैने परीक्षा की तैयारी, प्रारम्भ कर दी। अब मैं पूर्व की अपेक्षा, स्वयं को अधिक सन्तुष्ट, महसूस कर पा रहा था। आज लगभग 6 वर्षो के गेप के उपरांत, मेरे हाथों में एक बार पुनः सरस्वति विराजमान थी। जो मुझ से कह रही थी कि यही अवसर है पुत्र, स्वयँ के अज्ञान को दूर करते हुए। ग्रेजुएट साक्षरता को प्राप्त करने का।

उस समय मैं शायद अपनी उन भावनाओं से कुछ अनजान था। एवं आज लगभग 11 वर्षो के उपरांत दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होने के उपरांत, एवं निरन्तर सक्रिय रहते हुए मुझ को, जो साहित्यिक रचनाओँ को रचने का एक अवसर, एक वरदान स्वररूप प्राप्त हुआ है। मैं चाह कर भी, अपनी इस भावना को, शायद व्यक्त ना कर सकूँ।

मैं यानी कि आपका अपना मित्र विक्रांत राजलीवाल, माँ सरस्वती समेत आपने इष्ट देवताओं एवं आप आप सभी प्रशंशको का हार्दिक आभार व्यक्त करता हु।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

3 नवम्बर वर्ष 2019 समय प्रातः 9:27 बजे।

Advertisements

Leave a Reply