ना जिन्हें दिन को है सकूँ साँसों में; ना रातों को है आराम।

हम है वो जो रहते है हर लम्हा लेकर धधकती धड़कनों में सुलगता एक अंगार।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

Advertisements

Leave a Reply