आज किसी ने पूछा कि क्या आप शायरी के कार्यक्रम के लिए प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्पर्क के इच्छुक है तो हम आपकी भेंट करवा सकते है?

तो मैंने अत्यंत ही सरल शब्दों में उत्तर दिया कि जी शुक्रिया परन्तु साहित्य के मसले में मैं किसी किंग से कम स्वयं को नही समझता हूं। यस आई एम ए किंग ऑफ़ एक्सप्रेस मय ओं फीलिंग्स थ्रो मय पोएट्री 📝।

इससे अलग मैं चपड़ासी भी हु, क्लर्क भी हु, ग्रेजुएट हु, वन ईयर कम्प्यूटर कोर्स किया है। टाइपिंग जानता हूं। जीवन में कड़ा संघर्ष करने के उपरांत, 17 वर्ष की उम्र में पुनर्वास का कठोर दंड भुगतने के उपरांत, जीवन के प्रत्येक क्षण सत्य का सामना करते हुए। 10वी से दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक, कम्प्यूटर कोर्स, टाइपिंग सिख सका हु। हा मै एक मामूली आदमी के समान कार्य करता हु।

परन्तु यहाँ साहित्य का विषय आता है तो मै विकाऊ नही, आई एम ए किंग। मैं स्वयं के लिए लिखता हूं, गाता हु, रिकार्ड करता हु। अपनी सेल्फ पब्लिश्ड किताब प्रकाशित करवाता हु। क्यों? क्योंकि ई आम नॉट फ़ॉर सेल।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल।

Today someone asked if you are willing to contact prestigious institutions for the program of poetry, then we can meet you?

So I replied in very simple words, thank you, but in the matter of literature, I do not think of myself as less than a king. Yes I’m a King of Express May On Feelings Through My Poetry.

Apart from this, I am a peon, a clerk and a graduate, have done one year computer course. I know typing After struggling hard in life, at the age of 17, after facing the harsh punishment of rehabilitation, facing the truth every moment of life. I graduated from Delhi University from 10th, computer course, learned typing. Yes, I act like a modest man.

But here comes the subject of literature, so I am not sold, Yes, I MA King of my literature. I write for myself, sing, record. I get my self published book published. Why? Because I am not for sale.

Thank you.

Vikrant Rajliwal.

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