भूतकालीन जीवन के कर्मों पर लगा कलंक; अपने जिस्म में बहते हुए लहू के आखरी कतरो से भी जब मिटा ना सके। हर बढ़ते कदम से खुद को जब हम और भी तन्हा महसूस करते गए।। हर आँसू बेमाने और ये ज़िंदगी, ये साँसे, ये धड़कती हर धड़कने इल्जाम कोई बेहूदा सा सिद्ध होने लगे।

आज दिल और रात स्वयं को सुधार के मार्ग पर किसी प्रकार स्थिर रखते हुए। जिंदगी के प्रत्येक क्षण सत्य का सामना करते हुए। गैरो की क्या बात करू खुद अपनो से झूझते हुए। अनजान चेहरों के समक्ष, अंजान माहौल में अपने जीवन पर लगे कलंक को धोते हुए। जब हिम्मत टूट जाती है। जिन्दगी खुद जिन्दगी को ठोकर मारने पर विवश हो जाती है। तब भी स्वयं को किसी प्रकार से सम्भालते हुए।

ऐसे निर्मोही कठोर मार्ग पर सत्य को थामे हुए; साक्षरता को अपना एक मित्र, और अपनी रचनाओं को अपना जीवन मानते हुए। चले जा रहा हु; हर कदम से स्वयं के समीप और अपनो से दूर हुए जा रहा हु। आदत नही अपना दुख बयां करने की फिर भी हर इल्जाम को बेदर्द जिंदगी के ख़ामोशी से सहता जा रहा हु। हा मैं एक रचनाकार हु जो अपनी कलम से अपने जीवन के कलंक को मिटाने का एक असफल प्रत्यन करते हुए बस जीवन को जिए जा रहा हु; हा बस जिए जा रहा हु; हा बस जिए जा रहा हु।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

Advertisements

Leave a Reply