जब आपको बार बार खुद अपने आप को अपने रिश्तों का एहसास करवाना पड़े। कि वह मेरा मित्र है, वह मेरे पिता जी, वह मेरी माया जी, या अरे हा वह मेरी पत्नी और बच्चे ही है। तो समझ जाना वह ड़ोर जिसे यकीन कहते है रिश्तों पर, कहि खो सा गया है।

🕯️ टूट गई ड़ोर ए ज़िंदगानी, एहसास यह यू ही अचानक से तो नही।

खाई है हर बार शिखस्त खुद करके यकीन, एहसासों पर अपने जख्मी।।

ये हालात जो बर्बाद से मालूम होते है वो यू ही अचानक से तो नही।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

Advertisements

Leave a Reply