आज की मेरी यह पोस्ट उन मासूम बच्चों एव नवयुवकों को समर्पित है; जो आज भी किसी ना किसी हानिकारक व्यसन की चपेट में फंस कर, अपने जीवन को बर्बाद किए जा रहे है या जो अब किसी हानिकारन व्यसन का सेवन तो नही कर रहे, परन्तु उन्हें अपने जीवन मे प्रगति करने के लिए कुछ दिशा निर्देश नही प्राप्त हो रहे है।

मैं विक्रांत राजलीवाल भी अपने बच्चपन में 14 से 16 वर्ष की आयु में अज्ञानवश कई हानिकारक व्यसन का सेवन कर लिया था। एवं 16 वर्ष की आयु में मैने अपने पिताजी से सहायता मांगी और उन्हें अपनी वास्तविक मनोस्थिति से अवगत करवाया; तदोपरांत कई वेद, हकीमों, तांत्रिकों और हस्पताल के इलाज से थक हार कर अंत मे मुझ को नारकोटिक्स एनॉनिमस के कार्यक्रम से जुड़ने का एक अवसर प्राप्त हुआ। परंतु इसे किस्मत की अनहोनी कहे यह भाग्य का लेखा कि मुझ को नारकोटिक्स एनॉनिमस का कार्यक्रम एक बंधक अवस्ता में प्राप्त हुआ एवं जहाँ आप के प्रत्येक मनोभवो को आपकी चाल या वहाँ से मुक्ति हेतु कोई घिनोनी सजिक के रूप में ही देखा जाता है। जो आपके सकरात्मक एहसास को इस प्रकार से कुचल देता है कि जैसे आपका स्वयं का कोई वजूद ही ना हु। और आपको ऐसा एहसास होता है मानो सरेराह आपके मासूम व्यक्त्विक का बलात्कार किया जा रहा हु और आपकी सहायता हेतु कोई भी ईमानदार व्यक्तित्व वहाँ उपस्थित ना हु। उस समय मेरे साथ वहाँ समाज के छठे हुए अपराधि जो अपने गुनाह की सजा जेल कारावास के रूप में कठोर दंड भुगत चुके थे। के मध्य प्राप्त हुआ। जिनमे से अधिकतर मेरी ही हम उम्र के 17 से 19 वर्ष के हु थे।

मैंने वहाँ डिस्चार्ज प्राप्त किया एवं 13 महीनों तक उनके साथ जुड़ा रहा। तदोपरांत मैंने सोचा कि अब पढ़ाई करनी चाहिए। जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने मुझ को घर जाने की इजाजत रद्द कर दी। उस स्थिति में भय के मारे मैं उनके ऑफिस से भागा, और तुरन्त पकड़ा भी गया। जिसके दंड स्वरूप मुझ को पुनः एक अंदर रस्सियो से बांध कर डाल दिया गया। और भी कई प्रकार की यातना झेलने के उपरांत। जिसमे सबसे घातक थी रस्सियों के मध्य बंधक अवस्था मे एक अन्य साइको पेशेंट के जरिए बिजली की तारो से करंट लगाने का एक घिनोना प्रयास को अंजाम देना। उस अवस्था में मेरी समीप के एक मित्र में उसको पकड़ कर मेरी जान बचाई। खैर ऐसे ही बहुत यातनाओं को फेस कर के मेरा पुनः डिस्चार्ज हुआ।

अब जिस स्थिति मैं था उस स्थिति में दो मार्ग मेरे समुख थे प्रथम क्रोध वश पुनः नशा करते हुए जीवन को बर्बाद कर दु या स्वयं को साक्षर कर के स्वयं के स्वप्न IAS की परीक्षा को उतरीं करने का एक कठोर एवं जटिल मार्ग पर चलने की हिम्मत दिखा सकु। जिससे मुझ में वह समर्थ आ सके कि मैं भविष्य में कई मासूम बच्चों एव नवयुवकों की सहायता प्रदान कर सकूँ। तो मैंने द्वितीय मार्ग को चुना एवं 10वी से ग्रेजुएशन तक साक्षर होने एवं ज्ञान अर्जित करने के लिए मेने प्रयास किया। इसी दौरान मेने एक वर्षीय कम्प्यूटर कार्यक्रम के साथ ताइपिंग भी सीखी। कोचिंग करि। एवं असिस्टेंट कमंडेड से लेखक IAS तक कि परीक्षा को फेस करा। अंततः सरस्वती माँ की कृपा हुई और वर्ष 2016 में सामाजिक एवं मानवता की भवनाओं से प्रेरित अपनी प्रथम काव्य एवं कविताओं की पुस्तक प्रकाशित हुई। और वर्ष 2017 में मैने अपना प्रथम ब्लॉग बनाया और अपने ब्लॉग के साथ सोशल मीडिया पर भी लिखता रहा हु। और अब सक्रिय हु।

अंत में मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि…

🕊️ ए मासूम परिंदों देखेगा यह सम्पूर्ण संसार तुम्हारी अनन्त उड़ान को। मसल कर रख दु हर विपरीत परिस्थितियों एव हालातो को; कि दिखा सकूँ जो अकेले ही चलते चले जाने की हिम्मत तो मान जो कारवाँ हमें ना मिल सका उसे तुम अवश्य पा जाओंगे, उसे तुम अवश्य पा जाओंगे हा उसे तुम अवश्य पा जाओंगे।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक सत्य।

दिल्ली विश्विद्यालय के फेकल्टी ऑफ लॉ के वार्षिक खेल महोत्सव के दौरान काव्य पाठन करते हुए।
Advertisements

Leave a Reply