जब खाई शिखस्त हमनें, अपनो के हाथों ही खाई, नही पाए पहचान जो हाथ वो खंजर उतारा दिल मे बेदर्दी से जो गया।

हो कर बेपरवाह ज़िन्दगी से, सलूख ज़िन्दगी के हम सीखते रहे, जान हर सलूख जिंदगी के, जान जिंदगी की निकलती रही।।

दर्द हर हक़ीक़त का करते रहे जान कर भी नज़रंदाज़ हम जिनकी, सितम ये के एतबार बेवफ़ाई पर उनकी हम जो करते रहे।

धूल थी चश्मे पर फ़रेब कि उनके हमारे और हम थे नादां इस कदर की बिन बात ही आँखों को अपनी जो मलते रहे।।

हर आह को टूटी सांसो से अपने दबाए, हर ख़ुशी से हो कर अंजान, बेरूखिया जमाने की हम जो झेलते रहे।

हर अंजाम बरबादियों का लगा कर सीने से अपने, बर्बाद खामोशियों से अक्सर हम जो होते रहे।।

हर दर्द ए ज़िन्दगी को जान कर अपना, अश्क़ बहाती है आँखे, अश्क़ अक्सर नम आँखों से अपने हम जो छुपाते रहे।

बहे गए अश्क़ सरेराह फ़िर भी कई, जिन अश्को को नम आँखों मे अपनी, हम कभी जो छुपा ना सके।।

टूटे दिल की उखड़ती सांसे और दर्द तड़पती धड़कनो का वो अपने, बंद जुबां से हर दर्द को खामोशी से अक्सर हम जो दबाते रहे।

हर दर्द ए ज़िंदगी हर दर्द ए दवा को हमारे बेअसर करते रहे, और हर दर्द से एक दास्ताँ ज़िन्दगी की अपनी हम जो लिखते रहे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
28/05/2019 at5:20 pm

(पुनः प्रकाशित)

विक्रांत राजलीवाल जी के कलम से।
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