आज कल हम पत्थरों में रहते है, उजड़ा जो गुलिस्तां हमारा तो अब हम पथरो में रहते है।

करते है मुलाकाते पथरो से अक्सर, खो गया जो जलसा हमारा तो अब हम मुलाकाते पथरो से करते है।।

उम्मीद है शायद ये पत्थर कभी तो धड़केंगे, अहसास ए महोबत के अहसासों से शायद वह भी कभी तो तड़पेंगे।

दिल जो अब पत्थर हो गए, अहसास न जाने कहा खो गए, ये ख़ामोशीया है सितम उनका, हर सितम से अपने कभी तो ये पत्थर पिंघलेंगे।।

खड़ा है अब भी राह ए उम्मीदी से दीवाना, तलाश ए दरार दिख जाएगी दरार जब कोई, वॉर ए महोबत से कर देगा चूर चूर हर अहसास ए पथर को ये दीवाना।

हर दिल है ये जो पत्थर, निशां ए बेबसी से जो जख्मी, जख्म ए दिल हर अहसासों पर मरहम अपने, लगा जाएगा जल्द ही कोई ये दीवाना।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

17/03/2018 at 07:34 am
(Republish)

पुनः प्रकाशित 11 फरवरी रात्रि 12:21 बजे।

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एहसास ए पत्थर।
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