नही आती है नींद दीवाने को क्यों आज-कल।

विक्रांत राजलीवाल।

भूल गया है रंगीन हर ख़्वाब वो क्यों आज-कल।।

हो गया है खुद से ही बेगाना वो क्यों आज-कल।

रह गया है तन्हा भरे संसार में वो क्यों आज-कल।।

लेता है रुसवा बेदर्द रातो में नाम वो किसका आज-कल।

तड़पता है देख हाल ए दीवाना सा वो अपना आज-कल।।

ढूंढता है निसान ए महोबत, ए दर्द ए जुदाई इन काली श्याह रातो में वो किसके आज-कल।

पूछता है सवाल ए महोबत, मांगता है जवाब ए हक़ीक़त, आईने से टूटे वो किसके आज-कल।।

क्यों है इंतज़ार अब भी उसे, दर्द यह अवमस्या की रात,  ख्वाहिश है एक आखरी दीदार ए पूनम का वो एक चाँद।

क्यों है टूटती हर उम्मीद, अब भी उसे एक आरज़ू आखरी, यक़ीन है एक दर्द महोबत, अहसास ए धड़कन, उसकी हर एक बात।। विक्रांत राजलीवाल द्वरा लिखित।

Rachnakar Vikrant Rajliwal “Creation’s”

Source of publication
(Republish vikrantrajliwal.com)

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