शंकर मदारी। (ह्रदय को छूती हुई एक रोमांचक कहानी।)

                   

आज आपके अपने विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित दूसरा ऑनलाइन उपन्यास शंकर मदारी। (ह्रदयको छूती हुई एक रोमांचक कहानी) का पहला भाग प्रकाशित किया जा रहा है। जल्द ही आपके पढ़ने के लिए दूसरा भाग भी प्रकाशित कर कर दिया जाएगा। इसीलिए अधिक से अधिक आप सभी आपके अपने “शंकर मदारी।” episode 1 को like और share कीजिए। साथ ही YouTubeचैनल Poet Vikrant Rajliwal को सब्स्क्राइब करना ना भूलिएगा। धन्यवाद। विक्रांत राजलीवाल।

शंकर मदारी।

               (एक लघु उपन्यास)

“ह्रदय को छूती हुई एक अत्यधिक रोमांचक कहानी।”

 कहानी।

“झिलमिलाती आंखों में है अक्स यादों के दर्द कई,  हर लम्हा तड़पती है जिंदगी, देख अक्स जिंदगी का खुद जिंदगी।”

“एहसास टूट कर करते है दर्द एहसासों का बयाँ,  आज भी मुस्कुरा कर मिलती है करीब सेखुद जिंदगी से जब जिंदगी।”

“वो एक आह साथ है आज भी हमारे, वो एक दर्द जो आह से है भरा।”

झिलमिल नगर अपने समय का एक भव्य नगर था। सुना है उस भव्य नगर झिलमिल में प्रत्येक व्यक्ति धनी एवं शाही सुख सुविधा से पूर्णतः सम्पन्न था। यह कहना अत्यधिक कठिन था कि भव्य झिलमिल नगर अपने राजशाही भव्यता से अधिक भव्य था या अपने मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य से! भव्य नगर के एक ओर ऊँचे ऊँचे विशालकाय मनमोहक पर्वत थे और उनसे मध्य से झिलमिला कर गिरते हुए दुग्ध रंग के विशालकाय झरने। वही दूसरी ओर हरे भरे घनघोर वन और वन से सटे नगर के धनी साहुकारों के समृद्ध बाग बगीचे। इन सब प्राकृतिक सौन्दर्य को चार चांद लगती हुई झिलमिल नगर की कल कल छल छल करते हुए, बहती हुई,  मशहूर झिलमिल दरिया। जो ऊँचे पर्वतों से झिलमिला कर गिरते हुए दुग्ध रंग के झरनों के बहते जल से मिल कर बनी थी और जो हरे भरे वन के बीचों बीच से गुजरते हुए; भव्य झिलमिल नगर के धनी साहुकारों के उन समृद्ध बाग-बगीचों को सींचते हुए;भव्य नगर को छूते हुए दक्षिण दिशा में बहती थी। सम्पूर्ण झिलमिल नगर इसी झिलमिल दरिया के शीतल-मीठे जल से अपनी प्यास को तृप्त करता था। इसी कारण इस झिलमिल दरिया की महिमा अत्यधिक मूल्यवान हो जाती है।

वही भव्य झिलमिल नगर के धनी लोग सदियों से अपने अत्यधिक सौम्य स्वभाव के कारण दूर दूर के राज्यो तक एक विशिष्ट सम्मान के पात्र सिद्ध होते आए थे। आखिर ऐसा हो भी क्यों ना! वह दौर था भव्य झिलमिल नगर की असीम भव्यता और शान ओ शौकत का। जिसका उस दौर में हर कोई कायल था। भव्य झिलमिल नगर का वासी होना अर्थात अपने आप मे ही यह कोई विशिष्ट उपाधि से कम ना था। इतना सब कुछ होने के बाबजूद भव्य झिलमिल नगर के निवासी अपने अत्यधिक सौम्य व्यवहार के लिए जग विख्यात थे। सुना है उस दौर में भव्य झिलमिल नगर में प्रत्येक स्थानीय निवासी किसी धना सेठ से कम ना था। दूर दूर राज्यो से कई व्यपारी-सौदागर, मजदूर और कलाकार भव्य झिलमिल नगर की भव्यता के किस्से सुनकर वहाँ अपने व्यपार और कला का प्रसार करने आते और इनाम में मुह मांगा दाम और बहुमूल्य पारितोषिक पाते।

एक ओर जहा भव्य झिलमिल नगर अपनी राज शाही भव्यता और धन संपदा के लिए जग विख्यात था; वही दूसरी ओर धन संपदा से पूर्णतः परिपूर्ण होने के बाबजूद वहाँ के प्रत्येक निवासी अत्यधिक कठोर परिश्रम करते थे। शायद इसी कारण मंदी के दौर में भी राज शाही भव्य झिलमिल नगर अपनी भव्यता में दिन दूनी रात चौगनी बढ़ोतरी प्राप्त कर सम्पूर्ण संसार को हैरान किए  हुए था। अरे एक ख़ास विषय तो मैं आपको बताना ही भूल गया! जी हाँ आपने सही ही समझा वह ख़ास विषय है राज शाही भव्य झिलमिल नगर के मासूम बालक। जी हाँ बालक! बालक चाहे राज शाही भव्य झिलमिल नगर के हो या किसी दरिद्र मलिन बस्ती के; बालक तो बालक ही होते है। एक ओर कठोर परिश्रम करने वाले भव्य झिलमिल नगर के धनी निवासी तो दूसरी ओर राज शाही भव्य झिलमिल नगर के विश्व विख्यात शिक्षा गुरुकुल में उच्च कोटि की शिक्षा ग्रहण करते वहाँ के अत्यधिक सौम्य और मासूम बालक।

इसी प्रकार से नित्य प्रतिदिन की क्रिया और प्रतिक्रियाओं को दोहराते हुए, कला साहित्य से सम्बंधित दूर दराज के विद्वानों एवं कलाकरों से मनोरंजन प्राप्त कर उन्हें मुह मांगा पारितोषिक देते हुए भव्य झिलमिल नगर के राज वंशियों एवं सेठ-साहूकारों समेत वहा के निवासियों के दिन सुख शांति से गुजरते हुए व्यतीत हो रहे थे। हर कोई अपने आप मे पूर्णतः सन्तुष्ट और प्रसन दिखाई देता था। फिर एक रोज़ की बात है समय यही कोई दोपहर और सांझ के मध्य का ही रहा होगा। कि तभी सम्पूर्ण झिलमिल नगर डमरू की एक तीव्र ध्वनि से गूंज उठता है। और चारो दिशा एक स्वर गूंज उठता है कि आ गया, आ गया, देखो एक मदारी अपने दो बन्दरो के साथ आ गया। यू इस प्रकार से भव्य झिलमिल नगर में एक नए उत्साह की लहर दौड़ जाती है। क्या तो बच्चे और क्या  बूढ़े और जवान! हर कोई उस मदारी के आगमन से अत्यधिक उत्साह से भर जाता है।

आज बहुत समय के उपरांत यू अचानक से भव्य झिलमिल नगर के व्यवस्त और व्यस्त जीवन शैली में एक बहुत ही रोमांचक और मनोरंजक परिवर्तन सहज ही उतपन हो गया था। उस मदारी के उन दो नटखट बन्दरो को देख कर बच्चों का तो हँस हँस कर बुरा हाल था। वही नवयुवक तो उन बन्दरो को देख कर खुद बन्दर हुए जा रहे थे। कभी तो वह उन्हें देख कर किलकारी मारते तो कभी सीटियां। जिसके प्रतिउत्तर में वह दोनों बन्दर जिनमे से एक बन्दरिया थी बहुत ही जोरदार तरीके से अपने उन बड़े बड़े दांतो को दिखाते हुए किटकिटाने लगते थे।

अभी वह मदारी नगर के मुख्य द्वार से होते हुए मुख्य बाजार से गुज़र ही रहा था कि तभी नगर के दरोगा “हकड़ सिंह” अपने बड़े से चेहरे पर स्थित अपनी उन बड़ी बड़ी नुकीली मूछों को ताव देते हुए उस अंजान मदारी को रोकते हुए एक कड़क आवाज़ से कहता है कि “ए रुको कहा जा रहे हो।?” एकदम से नगर दरोगा हकड़ सिंह के उस विशालकाय शरीर को अपने समीप देख कर और उसकी उस रोबदार आवाज़ को सुन कर वह मदारी अत्यधिक भयभीत होते हुए जहां का तहा ही रुक जाता है।

तब नगर दरोगा हकड़ सिंह पुनः उस पर अपना रोब गाड़ते हुए कि तुमने बताया नही कि कहा जा रहे हो! और नाम क्या है तुम्हारा? तब वह मदारी अत्यधिक विन्रमता के साथ कहता है कि जी साहब मेरा नाम शंकर है। “शंकर मदारी” और मै पड़ोस के राज्य खैरात गंज से यहाँ इस भव्य नगर में अपना खेल तमाशा दिखाने के वास्ते आया हु। अभी वह मदारी ‘”शंकर” नगर दरोगा के सवालों का जबाब दे ही रहा था कि इतने ही समय में उसके इर्द गिर्द , चारों ओर एक भीड़ सी जमा हो जाती है और  उस भीड़ में शामिल हर व्यक्ति यही कह रहा था कि तमाशा दिखलाओ, तमाशा दिखाओ, तमाशा दिखलाओ।

नगर निवासियों का ऐसा उत्साह देख कर नगर दरोगा हकड़ सिंह स्थिति को बेकाबू होने से पूर्व ही, एक बार पुनः बीच मे अपना दखल देते हुए उत्साही नगर निवासियों को समझाते हुए कहता है कि कृपया आप सभी समानित नगर जन शांत हो जाए। अभी तो इस मदारी का भव्य झिलमिल नगर में आगमन हुआ ही है जल्द ही राज आज्ञा पत्र प्राप्त करने के उपरांत यह अपना खेल तमाशा भी दिखायेगा। परन्तु अभी के लिए आप इसको मुसाफिरखाने की ओर प्रस्तान करने दीजिए। भव्य झिलमिल नगर के कड़क दरोगा हकड़ सिंह की बात सुनकर वह भीड़ तीतर बितर हो जाती है।

तदोपरांत नगर दरोगा हकड़ सिंह एक कड़क आवाज़ के साथ उस मदारी से रूबरू होते हुए उससे कुछ वार्तालाप करता है कि “देखो मदारी ऐसा प्रतीत होता है कि तुम पहली बार भव्य झिलमिल नगर में अपना तमाशा दिखाने के लिए आए हो।” नगर दरोगा की ऐसी रौबदार आवाज़ और गठीला शरीर देख कर वह मदारी जिसका नाम शंकर था कुछ अधिक ही भयभीत हो जाता है। तब खुद को कुछ सम्भालते हुए वह कहता है कि जी साहब, मैंने भव्य झिलमिल नगर की भव्यता और यहाँ के चकाचोंध कर देने वाले शाही बाजारों की चर्चा को बहुत बार सुना था। यहाँ के महान राजवंश के दानी व्यक्तित्व की ख्याति तो दूर दूर तक विख्यात है। इसीलिए मैं भी अपना खेल तमाशा दिखाने के लिए बहुत दूर से चल कर यहा आया हु।

तब नगर दरोगा हकड़ सिंह अपनी रोबीली मुछो पर ताव देते हुए शंकर मदारी से कहता है कि हु ठीक है परन्तु ध्यान रहे राजदरबार से आज्ञा पत्र प्राप्त करने के उपरांत ही तुम भव्य झिलमिल नगर में अपना खेल तमाशा दिखा सकते हो। उसके बिना कदापि नही। इसके प्रतिउत्तर में शंकर मदारी बहुत ही सहज भाव के साथ कहता है कि जी हजूर। जैसी आपकी आज्ञा। शंकर मदारी के द्वारा यू आदर पूर्वक हाथ जोड़ कर ऐसे सम्मानपूर्वक वचनों को सुनकर नगर दरोगा हकड़ सिंह अत्यंत ही प्रसन्न हो जाता है और उसके उस विशालकाय भद्दे चेहरे पर एक मुस्कान की लहर चमकने लगती है। तब शकर पुनः कुछ हिम्मत जुटा कर अत्यंत ही आदर के साथ उससे कहता है कि महाराज कृपया कर के अब मुसाफिरखाने का मार्ग भी बता दीजिए। लगातार कई हफ़्तों के इस थका देने वाले सफर के उपरांत अब मेरा रोम रोम सफर की थकान के दर्द से कराह रहा है। 

शंकर के इस प्रकार अत्यधिक आदरपूर्वक पूछने पर भव्य झिलमिल नगर का वह नगर दरोगा बहुत ही सहजता के साथ मुस्कुराते हुए शकर मदारी से कहता है कि देखो मदारी यहाँ से तुम सीधे हाथ को मुड़ जाना तदोउपरांत दो चौराहों से गुरते हुए तुम बाई ओर को मुड़ जाना। उसी मार्ग पर शहर की एकमात्र मदिरालय है। इतना कह कर नगर दरोगा चुप हो जाता है तब शंकर मदारी कुछ हड़बड़ाहट पूर्वक कहता है कि परन्तु महाराज मुझ को तो मुसाफिरखाने में जाना है। तब नगर दरोगा हकड़ सिंह पुनः अपनी रोबीली मुछो पर ताव देते हुए कहता है कि हा भी हा मालूम है मैंने तुम्हें मुसाफिरखाने का ही पता बताया है। तब शंकर मदारी अत्यंत ही विन्रमता पूर्वक कुछ डरते डरते कहता है कि परन्तु महाराज आप ने तो मदिरालय का मार्ग बताया है। यह सुनते ही नगर दरोगा हकड़ सिंह जोर जोर से हंसने लगता है और उसी प्रकार से हंसते हुए कहता है कि भाई उस रंगीन मदिरालय के ठीक सामने ही तुम्हारी मंजिल है यानी कि मुसाफिरखाना। इतना कह कर नगर दरोगा उसी प्रकार से जोर जोर से हंसते हुए, शंकर मदारी को वहाँ अकेला छोड़ कर, वहाँ से चला जाता है। नगर दरोगा के ऐसे व्यवहार से पहले तो शंकर मदारी कुछ हैरान होता है फिर स्वयं भी हंसने लगता है और भव्य झिलमिल नगर के रंगीन मदिरालय मेरा मतलब “मुसाफिरखाने” की ओर परस्थान कर जाता है।

वही दूसरी ओर भव्य झिलमिल नगर एक धनी किसान बिरजमोहन के घर मे उसकी एक लौटी 8 वर्षीय पुत्री फूल कुमारी भोजन हेतु बैठी ही थी कि तभी घर के द्वार पर फूल कुमारी के मित्र मंडली के मित्र एक जोरदार दस्तक लगाते हुए उसको पुकारते है कि “फूल कुमारी” अरे फूल कुमारी क्या तुम घर पर ही हो? जिसके प्रतिउत्तर में फूल कुमारी भोजन से उठ कर तुरन्त ही घर के द्वार की ओर दौड़ पड़ती है और उसकी माता विपाशा देवी उसको आवाज लगा कर रोकने का प्रयत्न करते हुए कि फूल बेटी फूल रुक जाओ। भोजन तो कर लो। यह लडक़ी भी ना; कभी किसी की कोई बात नही सुनती। उधर घर के द्वार पर फूल कुमारी के मित्र मंडली के मित्र अत्यंत ही उत्साही दिख रहे है। उनको यू इस प्रकार से उत्साह में देख कर फूल कुमारी भी कुछ उत्साहित होते हुए उनसे कहती है कि आज तो तुम सब के सब बहुत ही उत्साह में नज़र आ रहे हो। क्या कोई भूत देख लिया है तुमने। इतना कहते हुए फूल कुमारी खिलखिलाकर हंसने लगती है। तभी उसकी मित्रमण्डली में से एक मित्र बाहु प्रताप उसी प्रकार से उत्साहित होते हुए कहता है कि नही नही “फूल” भूत नही बल्कि भूत से भी बढ़कर कुछ देख लिया है आज हम सब ने। कहो तो तुमको भी दिखला दे। इतना कह कर पुनः सब मित्र एक साथ हंसने मुस्कुराने लगते है।

तब फूल कुमारी उनसे उनके इस प्रकार के उत्साहित होने का कारण पूछती है कि ” अच्छा बाबा अब बता भी दो न की ऐसा तुमने क्या देख लिया है जो तुम यू इस प्रकार से हवा में उड़ रहे हो। तब फूल कुमारी की एक बेहद खास सखी प्रियलता अत्यधिक उत्साह के साथ कुछ कहते हुए कि फूल आज हमने वहाँ बड़े बाजार में एक मदारी को देखा और उसके साथ दो विशालकाय बन्दर भी थे। हम तो उन्हें देखकर बहुत ही डर गए थे। यदि तुम वहाँ होती ना तो देखती वह बन्दर आदमियों जितने बड़े दिखाई देते थे। प्रियलता के यह कहते ही सभी मित्रमण्डली उसकी सहमति में हामी भरते हुए अपना सिर हिला देते है।  अपने मित्रो के मुह से यह सुनते ही फूल कुमारी भी अत्यधिक उत्साहित हो जाती है और वह उसी उत्साह के साथ कहती है कि  अच्छा तो उस मदारी के बन्दर इतने विशालकाय है। चलो तो मैं भी देखती हूं कहि तुम मुझे मुर्ख तो नही बना रहे हो। तभी गटकु बहुत ही मसुमियर के साथ कुछ कहता है कि नही नही “फूल” भला हम तुमसे असत्य क्यों कहने लगे। हम सत्य कह रहे है वह बन्दर बहुत ही भयानक दिखाई देते थे। परन्तु तुम अभी उन्हें नही देख सकती हो क्यों कि उसको नगर दरोगा ने पकड़ लिया था और उसको राज शाही से आज्ञा प्राप्त करने के लिए कहा गया है उसके बाद ही वह बाजार में अपना खेल तमाशा दिखा सकता है।

अभी फूल कुमारी अपने मित्र मंडली से उस अनजाने मदारी और उसके उन भयानक विशालकाय बन्दरो के विषय मे बात कर ही रही थी कि तभी उसकी माता विपाशा देवी उनके समीप पहुच कर फूल कुमारी से कुछ कहती है कि बेटी फूल वहा भोजन की थाली ठंडी होने को है तुम अपने मित्रों के साथ फिर कभी वार्तालाप जर लेना परन्तु अभी पहले भोजन ग्रहण कर लो। भोजन से यू इस प्रकार से बीच मे नही उठते इसे अन्न देवता का अपमान समझा जाता है। तब फूल कुमारी अपने मित्रों से कल विद्यालय में सम्पूर्ण किस्सा विस्तार से बताने के लिए कहते हुए उन्हें विदा दे देती है और अपनी माता के साथ भोजन ग्रहण करने हेतु घर के भीतर प्रवेश कर कर जाती है।

उधर शंकर मदारी नगर दरोगा हकड़ सिंह के जाते ही! अपने हाथ ठेले पर अपने खेल तमाशे का समान लादे और उन पर सवार अपने उन दो हृष्ट-पुष्ट वानरों को खिंचते हुए, भव्य झिलमिल नगर के मुसाफिरखाने की ओर चल देता है। हर बढ़ते कदम से भव्य झिलमिल नगर की उस शाही भव्यता को देख कर, शंकर की आंखे चौंधिया रही थी। और वह अनुमान लगाने लगा कि यहां (भव्य झिलमिल नगर) तो भिखारी भी स्वर्ण पात्र (सोने का कटोरा) में भिक्षा लेते है। यदि मुझे राज शाही की ओर से तमाशा दिखाने की अनुमति प्राप्त हो जाती है तो मेरी चारो उंगलियां चाशनी के कढ़ाए में और सिर देशी घी से सरोबार (अच्छे से भीगा हुआ) हो जाएगा। अर्थात खेल तमाशा दिखा कर वह बहुत सा धन एकत्रित कर सकता है और ऐसा भी हो जाए तो कोई हैरत ना होगी कि कोई नगर सेठ या धनी साहूकार उसको उसके तमाशे से प्रसन्न हो कर बहुमूल्य स्वर्ण मुदिरा ही भेंट दे दे। इस प्रकार से शंकर अपने स्वप्न लोक में डुबकी लगाते हुए चले जा रहा था और इसी प्रकार से वह भव्य झिलमिल नगर की चकाचौंध कर देनी वाली शाही भव्यता को निहारते हुए; कुछ ही समय के उपरांत वह नगर के मुसाफिरखाने के ठीक सामने पहुच जाता है।

जहाँ चारो और नगर की इकलौती मदिरालय की उस मदहोश कर देने वाली रंगीन मदिरा की मदमस्त महक बिखरी हुई थी। जिसकी सुगंध से शंकर सहज ही वहाँ पहुच कर ठहर गया था और अपने स्वप्न लोक से निकल कर वह वास्तविक संसार में आ गया था। अब शंकर का ध्यान मुसाफिरखाने की और जाता है। वह एक अत्यधिक विशालकाय इमारत थी। जिसके प्रवेश द्वार पर एक ढाबे के समान ही भोजन करने हेतु एक भोजनालय भी खुला हुआ था। ढ़ाबे से आती हुई स्वादिष्ट मसालेदार भोजन की सुगंध को सूंघ कर शंकर को अत्यधिक तीव्र भूख लग आई थी। तब शंकर आसमान की ओर निहारते हुए स्वयं से ही बड़बड़ाते हुए कहता है कि वाह मेरे मालिक क्या सुयोजित व्यवस्था है। विश्राम करने हेतु विशालकाय मुसाफिरखाना! मुसाफिरखाने से सटा स्वादिष्ट मसालेदार भोजन से पूर्ण भोजनालय और भोजनालय के ठीक सामने रंगीन मदिरा का राज शाही मदिरालय। वाह मजा आ गया। अब सर्वप्रथम तो मैं इस विशालकाय मुसाफिरखाने में अपने ठहरने और विश्राम करने हेतु एक कक्ष (कमरा) भाड़े पर ले लू। तदोउपरांत इस भोजनालय के स्वदिष्ट भोजन और इस भव्य झिलमिल नगर की इस मदिरालय की मदहोश कर देने वाली रंगीन मदिरा का आनन्द लिया जाएगा।

इतना विचार करते ही शंकर अपने हाथ ठेले को मुसाफिरखाने के बाड़े में, जहाँ मुसाफिरखाने के मुसाफिरों के अश्व आदि को बांधने की व्यवस्था थी; वहाँ पर खड़ा कर के मुसाफिरखाने के भीतर प्रवेश कर जाता है। मुसाफिरखाने के भीतर का दृश्य देख कर शंकर के होश उड़ जाते है। अंदर चारो ओर दूर दराज के मुसाफ़िर अपनी अपनी रंग रँगीली वेश भूषा में चहल कदमी कर रहे थे। उन्हें देख कर सहज ही यह अनुमान होता था कि यह वाला मुसाफ़िर व्यपारी होगा और यह वाला कोई योद्धा। हा यह तो कोई रंगमंच का कलाकार ही हो सकता है और यह जो उसके बाजू से होकर अभी गुजरा है ना! यह तो अवश्य ही किसी सेठ का नोकर ही लगता है। इस प्रकार से शंकर एक दृष्टि से उन मुसाफिरखाने के मुसाफिरों की वेश भूषा और हाव भाव से उनके व्यवसाय का अनुमान लगाते हुए, मुसाफिरखाने के मुंशी कार्यालय के भीतर प्रवेश कर जाता है। जहाँ एक दुबला पतला सा व्यक्ति अपनी मोटी मोटी आंखों पर एक दुबला सा ऐनक लगाए बैठा था।

उसको देख कर ऐसा प्रतीत होता था कि अवश्य ही यह कोई कुटिल स्वभाव (अपने मे चालाक) का एक धूर्त व्यक्ति है। उसको देखते ही शंकर मदारी अपने दोनों हाथों को जोड़ कर नमस्कार करता है “नमस्कार मोहदय” शंकर की आवाज़ सुनते ही मुंशी जो अभी कुछ समय पूर्व तक मुसाफिरखाने के हिसाब किताब की जांच पड़ताल कर रहा था। अकस्मात ही चौक जाता है। परंतु यह अनुमान लगाना अत्यधिक दुर्लभ था कि वह शंकर की आवाज़ से अधिक चौक गया था या उसके कंधों पर बैठे हुए उसके उन दो वानरों को देख कर। एक क्षण रुक कर स्वयं को संभालने के उपरांत मुंशी कुछ चोकते हुए कहता है कि अरे अरे! यहा कहा घुसे जा रहे हो भाई। यह कोई खेल तमाशा दिखाने का स्थान कोणी है। चलो कठे ओर कहि जाकर अपना तमाशा दिखाओ। ये य य ये वानरों को दूर रखो मुझ से। तब शंकर अत्यधिक नर्मतापूर्वक कहता है कि महाराज मैं शंकर हु एक मदारी।

यह सुनते ही मुंशी उसको अपने उस मोटे से चश्में में से ऊपर से निचे तक घूर कर देखते हुए कहता है कि कौन शंकर भाया? मैं तो ना जानो किसी शंकर ने मदारी ने। कौन देश से आयो है तू? तब शंकर मुसाफिरखाने के मुंशी को बताता है कि महाराज मैं दूर देश खैरात गंज से आयो हु, मेरा मतलब है कि आया हु। यहाँ अपना खेल तमाशा दिखाना के लिए। यदि एक कक्ष मिल जाता तो मैं अपने सफर की थकान उतार लेता। शंकर की बात सुनकर मुंशी अपने चश्मे के पीछे से उसको देखते हुए बताता है कि देख भाया पहले तो मैं महाराज कोनी अठे को “मुंशी हु” और दूसरी बात यह है कि मैं तने तो कक्ष दे सकू हु परन्तु! शंकर कुछ परेशान होते हुए “परन्तु क्या महाराज़” मेरा मतलब मुंशी जी? मुंशी अब भी उसी प्रकार से “देख भाया मैं तने तो कक्ष दे सकू हु परन्तु तेरे ये वानर! ना भाया ना; मने दूसरे मुसाफिरों का भी ध्यान रखणो है अठे। यह सुनते ही शंकर कुछ हड़बड़ा सा जाता है फिर स्वयं को कुछ संभालते हुए लगभग रुआँसे से स्वरों से कहता है कि मुंशी जी आप तो बहुत ही दयालु है। हम जैसे मुसाफिरों के लिए तो आप ही राजा धी राज साक्षात महाराज हो। आप चाहे तो क्या नही हो सकता! कृपया कुछ दया कीजिए। भला मैं अपने इन दो मासूम वानरों को लेकर कहा जाऊंगा। दया करें महराज।

शेष अगले भाग में। (continue with Episode no 2)

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

प्रकाशित दिन 25 जुलाई समय 1:18 am 2020

Published by Voice Of Vikrant Rajliwal ( My Writing, My Blogs & My Voice)

💥Spiritual communicator, Motivational Speaker, Author, Writer, Poet And Thinker. विक्रांत राजलीवाल। (समाजिक कार्यकर्ता, कवि, शायर, नज़्मकार, ग़ज़लकार, गीतकार, व्यंग्यकार, लेखक एव नाटककार-कहानीकार-सँवादकार) 1) एहसास प्रकाशित पुस्तक (published Book) : अत्यधिक संवेदनशील काव्य पुस्तक एहसास, जिसका केंद्र बिंदु हम सब के असंवेदनशील होते जा रहे सभ्य समाज पर अपनी काव्य और कविताओं के द्वारा एक प्रहार का प्रयास मात्र है। Sanyog (संयोग) प्रकाशन घर शहादरा द्वारा प्रकाशित एव ए वन मुद्रक द्वरा प्रिंटिड। प्रकाशन वर्ष जनवरी 2016. प्रकाशित मूल्य 250:00₹ मात्र। 2) My Site: Vikrant Rajliwal Url address: vikrantrajliwal.com वर्ष 2016-17 से अब तक सैकड़ो दर्दभरी नज़्म, ग़ज़ल, बहुत सी काव्य-कविताए एव कुछ व्यंग्य किस्से, कुछ एक गीतों के साथ बहुत से विस्तृत समाजिक, आध्यात्मिक एव मनोवैज्ञानिक लेखों के साथ कई प्रकार के सामाजिक एव आध्यात्मिक विचार लिख कर अपनी साइट पर प्रकाशित कर चुके है। एव दिनप्रतिदिन कॉप्के प्रेमस्वरूप नित्य नई रचनाओँ का लेखन एव प्रकाशन जारी है। एवं स्वम् की कई नज़्म कविताओं एव लेखों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर चुके है। 3) Youtube channel: Vikrant Rajliwal पर मेरे द्वारा लिखित मेरी समस्त रचनाओँ जैसे प्रकाशित पुस्तक एहसास से अति संवेदनशील काव्य- कविताए, और मेरी निजी लेखनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित मेरी सैकड़ो नज़्म, ग़ज़ल और बहुत सी काव्य, कविताओँ एव्यंग्य किस्सों को मेरे स्वयं के स्वरों के साथ देखने और सुनने के लिए मेरे YouTube चैनल को अभी Subscribe कीजिए। 👉 आगामी रचनाएँ (Upcoming Creation's) : अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर सक्रिय अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ श्रृंखला "दास्ताँ" के अंतर्गत चौथी एवं अब तक लिखी गई अंतिम अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ "मासूम मोहब्ब्त" प्रकाशित करि जाएगी। जल्द ही अपनी ब्लॉग साइट vikranrajliwal.com पर अपनी कुछ लघु कहानियों का प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करूँगा। 👉 साथ ही मैं वर्ष 2016 से एक अत्यंत ही दर्दभरा जीवन के हर रंग को प्रस्तुत करती एक सामाजिक कहानी, एक नाटक पर कार्य कर रहा हु। 💥 इसके साथ ही शायद आप मे से बहुत से महानुभव इस बात से परिचित नही होंगे कि मैं आपका अपना मित्र विक्रांत राजलीवाल वर्ष 2003-04 से नशे से पीड़ित मासूम व्यक्तियों के लिए निःस्वार्थ भाव से सेवा करता आ रहा हु एव स्वम भी कई प्रकार के जटिल उतार चढ़ाव के उपरांत एक शुद्ध रिकवरी को प्राप्त कर सका हु। यदि आप मुशायरे या कवि सम्मेलन के आयोजक है और आप मेरी सैकड़ो दर्दभरी नज़्म ग़ज़ल शायरी या काव्य कविताओं के द्वारा मेरे कार्यक्रम को बुक करते है तो यकीन मानिए इस प्रकार से आप अपना एक अनमोल योगदान उन मासूमो के लिए सहज ही प्रदान कर सकते है। क्योंकि मेरी कला के कार्यक्रम से होने वाली 100% कमाई नशे से पीड़ित उन गरीब एव बेबस मासूमो के इलाज लिए समर्पित होगी। जिन्होंने अपना जीवन जीने से पूर्व ही नशे के आदि बन कर बर्बाद करना शुरू कर दिया है या बर्बाद कर चुके है। 😇 समाज सेवा: स्वमसेवी नशामुक्ति कार्यक्रम के तहत नशे की गिरफ्त में फंसे नवयुवको एवं व्यक्तियों को एक स्वास्थ्य जीवन को जीने के लिए प्रेरित करता आ रहा हु। स्वमसेवी संस्थाओं एवं स्वयम से जन सम्पर्को के माध्यम द्वारा निशुल्क सेवा भाव से वर्ष 2003 से अब तक। विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित। मेरासंपर्क सूत्र नीचे अंकित है। My Whatsapp no: 91+9354948135 (Translated) One service and one collaboration Hello Friends, Many of you may not be familiar with the greatness that I have been serving my self-indigenous friends Vikrant Rajliwal with selfless service for innocent people who have been suffering from intoxicants since 2003-04. After a complex fluctuation of type, I could get a pure recovery. And if you are the organizer of mushere or poet conference or you can book my program with my hundreds of painful najm ghazal shayari or poetic poems and also in your program, believe that in this way you have a valuable contribution They can easily provide for those innocent people. Because 100% earnings from my program will be dedicated to the treatment of those poor and unemployed innocent people who have started wasting or wasted by becoming addicted to drugs before living their lives. Name: Vikrant Rajliwal Published book: एहसास (a highly sensitive poetic book inspired by social and humanitarian values) published by Sanyog publication house shahdara. Which was also showcased at the Delhi World Book Fair in the same year 2016. 🎤 Upcoming creations: The story of my fourth and last nazam tales written so far. And a play, a painful story presenting every run of life. 😇 Social service: Swamsevy has been promoting the life of the youth and all the people trapped under the influence of intoxicants as a drug addiction program. Free service charges through Swamsevy institutions from 2003 till now. Thank you Vikrant Rajliwal Hometown: Delhi. The contact form is displayed below. My Whatsapp no: 91 + 9354948135 प्रिय पाठकों एव मित्रजनों, यह है अब तक का मेरे द्वारा सम्पन्न एव आगामी लेखन कार्य, जो आप सभी प्रियजनों के प्रेम एव आशीर्वाद से शीघ्र अति शीघ्र ही सम्म्प्न हो अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हो जाएगा। आप सभी प्रियजन अपना प्रेम एव आशीर्वाद अपने रचनाकार मित्र विक्रांत राजलीवाल पर ऐसे ही बनाए रखे। धन्यवाद। विक्रांत राजलीवाल।

Leave a Reply