💦 अश्क़।

FB_IMG_1530110354775.jpgये मासूम चेहरा, उस पर दर्द महोबत का अश्क़ ये चेहरे
पर जो कमसिन,
हाल ए दिल सुनाते है उसका ये सुनहरे निसान।

कर दिया कत्ल दीवाने का, ये दर्द नही असां, अब पोछ भी लो, अश्क़ ए महोबत के चेहरे से मासूम अपने,
बेदर्द ये सुनहरे निसान।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish)

ये दिल।

दिल के हर भाव से व्यथा कोई अधूरी, एक पीड़ा असहनीय सी अब भी झलकती है क्यों।

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हर व्यथा ख़ामोश सी, पीड़ित हर भावना से अपनी अब भी जूझती सी है क्यों।।

विक्रांत राजलीवाल।
18/11/2018 at 17:58 pm

🕊 एहसास (एक संग्रह)

💦 IMG_20181021_075138_776.jpg राह ए ज़िंदगानी।

ज़िन्दगी है एक संघर्ष का नाम।
कभी है काफिला तो कभी तन्हाई का नाम।।

छूट जाते है सफ़र ए ज़िंदगानी में साथी कई।
मिल जाते है अंजाने फिर मुसाफ़िर नए कई।।

राह ए महोबत है उस खुदाई का नाम।
बन जाते है बिगड़े जहाँ अधूरे कई काम।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  एक यकीं।

कुचल दो हर एक बाधा विरोधी, विरोधी हर एक साए को।
बढ़ाओ कदम यकीं से आगे, कुचल दो मलिन हर मर्यादा को।।

जी सके तो जी लेगा तुम ज़िन्दगी, मर न जाना, टूट न जाना बीच रास्ते।
हा देख रही उमंग ए ज़िन्दगी, राह तेरी, सरेराह बाह अपनी जो पसारे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 आईना ए हक़ीक़त।

रास्तो पर इस दुनिया के क्यों है परेशान।
भूल गया है स्वम् को क्या आज का मतलबी इंसान।।

देख कर मोड़ घुमावदार, बदल देता है क्यों रास्ता मंज़िलो का अपनी ए नासमझ इंसान।
देख रहा आईना वक़्त भी हक़ीक़त जिसमे अपनी, मिट गए क्या तेरे सब रूहानी एहसास।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  सद्विचार।

जला कर खुद को भी करता है रौशन जहां ये सारा।
भांति ज्वलित सूर्य के कर डाले दहन कुविचार सारे।।

जागृत हर मनुष्य ने करने को स्थापित, उज्जवल एक प्रकाश।
जागृत आत्मा से अपने करने को रौशन जहां ये सारा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  कशमकश।

उलझ कर कशमकश ए ज़िन्दगी कांटो से नफरतों के न होना कभी लहूलुहान।
खिल उठेगा चमन ए महोबत, ए ज़िन्दगी हाथ ज़िन्दगी का ले अब थाम।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  सत्य कर्म।

दिया गुरु ने रण-क्षेत्र से एक ज्ञान संदेश प्यारा।
कर्म भूमि में कर्म करो, यही हैं सत्य का नारा।।

राम कहो या कहो रहीम, दिखलाई जो राह सत्य की , लेकर हाथो में अपने उन्होंने जो ज्ञान जोत।
करना पड़े को कर देना हा निसंकोच ही असत्य पर एक तुम गम्भीर चोट।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  अंजाने रास्ते।

उठते ही अक्सर हाथ मेरे, उस रब की दुआओ के वास्ते।
चलता हूं राह अंजान पर, राह ए नसीब एक अपना लिए हुए।।

दिखलाते है डर कोई अंजाना सा, ये साए जो जिंदगी के जो अंजाने।
दर्द ये सितम है जो, ये पथरीली से ये कटीली से ये अनजाने से ये जिंदगी के जो रास्ते।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  एक विद्यार्थी।

जीवन की धारा बहती है जो निर्मल सी,
विद्यार्थी हु मैं उस पाठशाला का।

दिखलाती है जो दर्पण सच्चाई का,
सब को नजदीक से।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  एक दर्द।

जल रहा समाज, झुलस रही भावना।
घायल पड़ा विशवास भी, झेल रहा वेदना।।

मायूस खड़ा जो देख रहा, राह विकास से अंजान।
पड़ गए है छाले पैरों तले, जीने की रही न अब चाह।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  उड़ान।

उड़ गया जो परिंदा अब वो आज़ाद है।
हर गम ए ज़िंदगानी से अब वो आज़ाद है।।

नापने को फिर कोई आसमां, अब वो आज़ाद है।
नई वादियां नया गुलशन अब है उसके, अब वो आज़ाद है।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  प्रतिदिन प्राथना।

सुबह सवेरे प्रतिदिन ईष्वर का हम आओ ध्यान करे।
दिया है वरदान ये जीवन, खुशहाली की आओ उससे प्राथना करे।।

हर चिंता और वासना का कर त्याग, चलो अब उसका ध्यान करें।
जीवन है अनमोल ये हमारा, शांति से शांति की अब हम प्रार्थना करे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  आपसी सहयोग।

जरूरत है हर सांस को एक नई सांस की।
जरूरत है हर धड़कन को एक नए अहसास की।।

मुसाफ़िर है एक ही किश्ती के ए मेरे मांझी दोनों ही हम।
ये दरिया है जिंदगी नही कोई आग, जिसमे कि दुब जाएंगे हम या जल जाएंगे हम।।

करना है सफर साथ साथ, सफर है ये जो ज़िंदगानी।
आ जाओ साथ हमारे, तन्हा है बहुत ये जो ज़िंदगानी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  कर्म।

यह रात भी बित जाएगी, यह अंधकार भी छट जाएगा।
दिखेगा जल्द ही नया सवेरा, नया उजाला छा जाएगा।।

आवश्यकता ये दिप ज्ञान अब बुझने न पाए।
जोत उमंग श्वासों से अपने कम न अब होने पाए।।

रण छेत्र ये कर्म भूमि है हमारी, धरा ये ब्रह्मांड तमाम।
न कोई संगी न कोई साथी, कर्म से कर्म का है ये संज्ञान।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 एक राह-एक उम्मीद।

एक उम्मीद ही थी पर्याप्त, तिनको कि डूबते को सहारे के लिए।
हालात ये सबक ए मुसाफ़िर, तिनका भी न मिले जब सहारे के लिए।।

आ जाओ के नही वीरान है आबाद ये राह ए हक़ीक़त कि जो।
हम भी है दर्द ए ज़िंदगानी ए मुसाफ़िर दर्द साथ अपने लिए जो।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  इंद्रधनुषी रंग।

अजब गजब है ये दुनिया सारी, रंगीन इसके नज़ारे है।
जितना देखोंगे तुम इनको, उतने जगमगाते यहाँ सितारे है।।

हो जाए जो हैरानी तुम को, तो दिल अपना यह थाम लेना।
इंद्रधनुषी रंग है इसके, लगते जो सबको प्यारे है।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  मजबूर।

देखता हूं आज उठाकर नज़रे जब चारो ओर अपने।
देता है दिखाई साया, झूठ का बेईमानी का हर ओर अपने।।

मजबूर है हर कोई इंसां यहाँ, आती नही नज़र कोई नेक राह।
कर के कत्ल ए जमीर इंसानियत का अपने, जी रहा है हर कोई आज यहाँ।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  एक आह।

उम्मीद है जल्द ही होगा उदय एक सूर्य नया, इस ब्रह्मांड में फिर से कहि।
जला देगा हर अंधकार करने को स्थापित एक प्रकाश नया, इस धरातल पर फिर से कहि।।

देख रहा है वक़्त भी खड़ा जो खामोशी से इंतज़ार में ओट ए धड़कनो की सच्चाई से अपनी कहि।
ना उम्मीदी हर एक आह है जो दिल की बेबस, जला न दे जुल्मी को किसी मज़लूम की कहि।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  एक विचार।

विष वृक्ष का जड़ों में जो अपने, कर दे नष्ट फ्लो को खुद जो अपने,
वृक्ष बेचारा फिर क्या करे।

भर दिया विष फ्लो में जो अपने, भूख प्यास ए वृक्ष राही की अब अपने,
तृष्णा जीवन की फिर कैसे मिटे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  आत्म चेतना।

लेता हूं हर युग मे अवतार, साथ धर्म का निभाने को।
आता हूं चिर हर बार अंधकार, साथ प्रकाश फैलाने को।।

अब भी हु मैं (ईष्वर-अलाह) बीच तुम्हारे, ज्ञान दिप जलाने को।
ढूंढो न बाहर तुम नश्वर जग-संसार में मुझ को, ह्र्दय बीच ही पाओंगे तुम अपने मुझ को।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  एक एहसास।

यू ही उठाई जो कलम के सोचा उतार दु कुछ एहसास ए हक़ीक़त, कोरे ये कागज़ रह न जाए कोरे ही कहि ये जो ज़िंदगानी के।

हुई जो आहत खुद एहसासों से जो अपने, धड़का ये दिल, छूट न जाए हाथो से कलम, रह न जाए कहि एहसास ये अधूरे एहसासों के।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  एक संकल्प। /A resolution.

उगता है सूर्य, एक प्रकाश के साथ।
लाता है उजाला हर दिवस,
एक नई उम्मीद के साथ।।

हर एक नई किरण, जीवन की आशा,
उत्तपन है श्वास देह से, एक पवित्र संकल्प
के साथ।
चेतना चरित्र की जागृत है जीवन,
यात्रा जीवन के अब भी जो
अपने साथ।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 A resolution.

The sun rises, with a light.
Brings light every day, with a new hope..

Every new ray of hope, life’s hope, is the breath of breath, with a holy resolution.
Consciousness is the hope of the character, life is still of life which is with her..

Written by Author Vikrant Rajliwal.

👉  भोर।

उड़ जा री रात कालिमा, भोर भए मन हरषाए।
महक मिले मन के मोहे, उपवन भी इतराए।।

पंछी चले है उड़ गगन को, पंख अपने फैलाए।
उड़ जा री रात कालिमा, दिप जले ह्र्दय हरषाए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  राह ए ज़िंदगानी।

ज़िन्दगी कि राह पर बिछुड़ते है साथी कई।
हो जाते है जुदा खुद से, खो जाते है साए कई।।

इंसाफ कि पुकार से, सत्य की जमीं पर,
दिखते है बहरूपिये यहाँ मुखोटे कई।

जुल्म ओ सितम के निशान से, सिसकती यहाँ जिंदगी,
छुपाए है हर मुखोटे से यहाँ राज जुल्म के कई।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

पुनः प्रकाशित एव संग्रह के रूप में प्रथम बार।
18/11/2018 at 17:10 pm

💥 Has a right.

IMG_20181102_081045_576This is the right of every child born in this world.
He also got education initiation and knowledge of sanskars and a right of his development ..

The above verse written by Vikrant Rajliwal (by myself) is an authentic experience, a feeling of change, a realization of Vikrant Rajliwal (Swamy), which is certified and motivated by his private life struggle, how a disorganized child (Mr. Vikrant Rajliwal ) In his raw age (2004, 18 years), by struggling with drug addiction, he was defeated by the blessings of his master, Faced with the perseverance of the complex and complex situations, not only the drugs became addicted to drugs but by transforming their illiterate life with their satyakarma, they passed 12th class from the year 2009 and graduated from Delhi University in the year 2013.

Taking inspiration from your education, taking inspiration from your education and civilized literature, in the year 2016, in January 2016, his first poetic book * Realization *, whose center point was a humiliating feeling from the civil society of all of us, to humanity, the harsh feeling of socialism and humanity. The effort is simply written and published. And now using online technology, you are constantly trying for more positive social change while sharing your hearted feelings with all your loved ones.

It seems as simple as all this is actually never really that simple. In this life, the common people also face the most complex type of confrontation while struggling for an opportunity, and a drug addiction, whether it is due to their ignorance at the age of 15 to 16 years, using drugs to get rid of drug addiction. Or who has not only consumed this addiction during that raw age with the knowledge of a particular age, but once it is rehabilitated Endra (addiction that is reached in the center), his life changes. In short, you can say this in the way that the opportunity (education and sports jumping) available only ever saved, it seems like a war, like a bitter truth, a feeling of being in front of him, Do it.

At any given time in this life, no one can get any opportunity for the development of a discharged child or person from a rehabilitation center for its development. And every opportunity is an unknowable tale of pain in itself, behind which there are hidden behind it, and only if it is helpless and suffering from the exploitation of a cruel person, her tears filled with sing of tears, a Nissan.

I hope all the dear readers can reach the real reason of writing this article.

Thank you.

Written by Vikrant Rajliwal

(Translation by Vikrant Rajliwal)

18/11/2018 at 15:35 pm

*After the error correction in republished typing. The last time was marked as 10th in place of 12th.*

💥 अधिकार है।

IMG_20181102_081045_576इस समस्त संसार मे हर शिशु का है जन्म सिद्ध यह अधिकार।
शिक्षा दीक्षा ज्ञान संस्कार मिले उसको भी विकास का अपने अधिकार।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा (स्वम् के द्वारा) लिखित उपरोक्त काव्य पन्ति विक्रांत राजलीवाल ( स्वम् के) जी का एक सत्य अनुभव, एक एहसास, एक बदलाव का प्रयास है जो उनके निजी जीवन संघर्ष से प्रमाणित एव प्रेरित है कि कैसे एक अबोध बालक (श्री विक्रांत राजलीवाल) अपनी कच्ची उम्र (2004, 18 वर्ष) में ड्रग्स के नशे से संघर्ष कर के उसे अपनी इच्छाशक्ति से अपने गुरुजनो के आशीर्वाद से पराजित करते हुए अनेक प्रकार की विकट एव जटिल परिस्थितियों का दृढ़ता के साथ सामना करते हुए न केवल ड्रग्स के नशे से मुक्त हुए अपितु अपने एक अनपढ़ जीवन को अपने सत्यकर्मो से परिवर्तित करते हुए वर्ष 2009 से 12वी कक्षा एव वर्ष 2013 में दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट भी हुए।

एव अपने जीवन संघर्ष एव सभ्य साहित्य अपनी शिक्षा से प्रेरणा लेते हुए वर्ष 2016 जनवरी में अपनी प्रथम काव्य पुस्तक *एहसास* जिसका केंद्र बिंदु हम सब के सभ्य समाज से मानवता के लिए समाजिकता एव मानवता की कठोर होती भाव भावना पर एक प्रहार की कोशिश मात्र है लिखी एव प्रकाशित करि। एव अब ऑनलाइन तकनीकी का प्रयोग करते हुए आप सभी प्रियजनों के समक्ष अपने ह्रदय भावो को निरंतर साँझा करते हुए एक और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन के प्रयास हेतु पर्यसम्य है।

यह सब जितना सरल अब प्रतीत होता है वास्तव में यह उतना सरल कभी भी नही रहा। इस जीवन मे सामान्य जनो को भी एक अवसर हेतु संघर्ष करते हुए अत्यंत जटिल प्रकार की विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है एव एक ड्रग एडिक्ट चाहे उसे 15 से 16 वर्ष की कच्ची उम्र में उसकी अज्ञानता के कारण धोखे से ड्रग्स के नशे का सेवन करवा दिया गया हूं या जिसने केवल उस कच्ची उम्र में एक आध बार ही उस नशे का सेवन किसी व्यवस्क जानने वाले के साथ ही क्यों न किया हो परन्तु एक बार वह पुनर्वासकेन्द्र (नशा मुक्ति केंद्र) में पहुच जाता है तो उसका जीवन ही परिवर्तित हो जाता है। संक्षेप में इसको इस प्रकार से कह सकते है कि जो अवसर (शिक्षा एव खेल कूद) कभी सहेज ही उपलब्ध थे वह अब एक युद्ध के समान प्रतीत होते हुए एक कटु सत्य के समान उसके समक्ष अपने होने का एक एहसास उसे उसकी हर एक रुकती श्वास से करवाते है।

इस जीवन मे सही समय पर अपने विकास हेतु कभी भी कोई भी एक अवसर एक पुनर्वासकेन्द्र से डिसचार्ज बालक या व्यक्ति को सहेज से प्राप्त नही हो पाता। एव हर एक अवसर अपने आप मे दर्द की एक अनकही वह दास्तां होती है जिसके पीछे छुपे हुए होते है तो सिर्फ और सिर्फ उसकी बेबसी एव किसी क्रूर के शोषण से पीड़ित उसके दर्द से भरे हुए अश्रु निसान।

आशा करता हु इस लेख के लिखने के वास्तविक कारण तक आप सभी प्रिय पाठक पहुच सके।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

18/11/2018 at 15:20 pm
(पुनः प्रकाशित तंकन त्रुटि में सुधार उपरांत पिछली बार 12वी के स्थान पर 10वी अंकित हो गया था।)

❤ ह्रदय से। (एक संग्रह)

🔥कर्राहता है दर्द भी, हो जाता है जब अत्याचार।

बेबसी है आज भी, नही झुकता हैं जब गुनहगार।।

भूल जाता है जमाना भी एक जमाने के बाद।

निकलती है हर दुखी दिल से फिर एक आह…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

🔥 It hurts even when it gets tortured

Helplessness, even today, does not bend when the criminal

Forgets the world after a time

An unhappy heart reappears again…

Written by Vikrant Rajliwal(translated)

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👉  चेतना।

राख हु श्मशान की भस्म होकर भी जल जाऊंगा।
चेतन है अंतरात्मा जो मेरी , मिट कर भी मिट न मैं पाऊंगा।।

विक्रांत राजलीवाल द्व लिखित।

👉  मसीहा है महोबत का ज्ञान का अवतार।
कृष्ण कहो, कन्हिया कहो या कहो राम तुम उसको रहीम,

गिरते हुए को थाम कर ले जाता है अपने वो द्वार।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 लिखता हूं एहसास दिल के कलम से जो अपने,
आ जाए पसन्द जो आपको, ख़ुशनसीबी अपनी समझता हूं इसे मैं…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  सुन कर आवाज़ आत्मा कि अपने,
रुक पाना IMG_20181020_111138_072आसान नही।

राह सच्चाई मंज़िल वो अपनी,
पीछे अब हट पाना आसान नही।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 न देख मुड़ कर दोबारा ए वक़्त मिट चुकी जो लकीरें राह कदमों से तेरी।

उठा कदम छूने को ये आसमान, ये हवाए ये फिजाएं अब है तेरी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 न बेचना ए वक़्त नसीब अपना कभी किसी गैर के हाथ।
चला जाएगा मार के ठोकर, पड़ा है कदमो में जो नसीब, किसी गैर के पास।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 कहते है ज्ञान पुराने, लगती है ठोकर जब इंसान को सम्भलता जरूर है।
गिरता है नज़रो में जब अपनी, तो उठता जरूर है।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 अच्छा पढ़े दिल से पढ़े और अपने लिए पढ़े क्योंकि शुद्ध और सच्चे विचार कर देते है दूर सब मनोविकार।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 समझना ख़ुद को बड़ा सबसे, गई अक्ल है मेरी।
छोटे बड़े सबका हो सम्मान, यही ज्ञान भाव कि हे फुलवारी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 हर माहौल ए जिंदगी, संघर्ष ए हिम्मत अब छूटने न पाए।
छूट जाए हर चाहत, हर सांस चाहे आखरी, राह ए मंज़िल ये साथ सांसो से धड़कनों का अपने अब छूटने न पाए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 मेरा है वतन ये हिंदुस्तान, मिट्टी भारतवर्ष की ये मेरी है ज़िंदगानी।
सांसों में है खुशबू इसकी, हर कण में लहू के देश भक्ति की रवानी।

महोबत है वतन से वतन से ये मेरी ज़िंदगानी।
बालक हु माटी का मैं, निछावर है जिस पर ये मेरी ज़िंदगानी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 अपने जीवन से प्यार और उसका ईमानदारी से अपने व्यक्त्वि का निखार।
सद्भावना मार्ग सच्चाई से दूसरों से प्यार और ईमानदारी से उनके व्यक्त्वि का भी निखार।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 देखता हूं आज उठाकर नज़रे चारो ओर जब अपने,
देता है दिखाई साया झूठ का, बेईमानी का,
मजबूर है हर कोई इंसां, आती नही नज़र कोई राह,
कर के क़त्ल ज़मीर का अपने, जी रहा है आज हर कोई यहाँ…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉  दिल से निकले जो पुकार ए टूटे दिल ईष्वर अलाह सुनता है जरूर।
बढ़ा कर हाथ, झुक कर आगे, गिरे हुए इंसां को सहारा प्रेम से देता है जरूर।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 जाती न पूछिए ज्ञान की, कर्म से सबका संज्ञान।
लड़वा दे भाई को भाई से जो, होता है कोरा वो अज्ञान।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉 हर माहौल ए ज़िन्दगी, संघर्ष ए हिम्मत छूटने न पाए।

छूट जाए, हर चाहत, हर सांस चाहें आखरी,

राह ए मंज़िल, ये साथ गुरु का अपने अब छूटने न पाए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

पुनः प्रकाशित एव संग्रह के रूप में प्रथम बार।

18/11/2018 at 11:25am

❤ दर्द ए दिल। (एक संग्रह)

💦

आज रात कयामत बरसेगी या तो मिल जाएगा रूठा वो महबूब मुझ को या ये जान मेरी अब जाएगी।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

👉
कर गया रुख़सत जमाने को वो आखरी,
दीदार ए सनम एक आरज़ू के साथ।

उठा था चौखट से तेरी, बेगानो कि जो तरह,
ए महोबत वो जनाजा था मेरा एक बेदर्दी के साथ।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
👉
दर्द ए ज़िन्दगी से हो कर के खफ़ा, जा रहा है जो,
ए महोबत वो है मुकदर मेरा।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
👉
पी लेते है तन्हाई में आती है जब जब याद तेरी।
नही है तू पास मेरे ए सितमगर ए सनम,
जी लेता है फिर भी दीवाना, देख कर अधूरी तस्वीर तेरी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
👉
मिटा दी वो सुर्ख लकीरे अश्को से अपने ए बेवफ़ा झूठी महोबत कि तेरे।

खिंची थी बड़ी शिदत से धड़कनों पर बेदर्दी से जो वक़्त ने मेरे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
👉
नही सोचा था ए वक़्त इम्तेहां ए ज़िन्दगी ज़िन्दगी में ऐसा भी आएगा।
ठुकरा कर ख़ुद को ये दिल धड़कनों को अपने अक्स ए महबूब को चाहेगा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

पुनः प्रकाशित एव संग्रह के रूप में प्रथम बार
18/11/2018 at 10:35 am

❤ दर्द ए दिल। (एक संग्रह)

💦

नज़रो में तेरी एक दर्द, तन्हा कोई अहसास, नज़र अक्स कोई अपना मुझ को आता है।

मासूम है चेहरा तेरा, धुंधलाता अक्स,अधूरा कोई ख़्वाब नज़र क्यों मुझ को आता है।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
👉
जशन है फिज़ाओ में और दिल ये मेरा उदास,
ढूंढता है अब भी कदमो के बेगाना, अपने मिटते जो निसान।

हालात ए ज़िंदगानी ये ख़ामोशीया है क्यों,
भूल गया लम्हा, जीना ये ज़िन्दगी, वो मैं नही।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
👉
ज़ख्म भर जाते है दिल के ए वक़्त तमाम।
निसान दिख जाते है फिर भी, हर ज़ख्म जो नासूर के तमाम।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
👉
आंख से आँसू रुकते नही, तड़प इस दिल कि कुछ कम तो नही।
लव्ज़ है मासूम से उसके, सुर्ख लबो से ये नज़रे क्यों हटती नही।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(पुनः प्रकाशित एव संग्रह के रूप में प्रथम बार प्रकाशित।)
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💧 यू ही ह्रदय से।

1542512231578🕊💦 राम चन्द्र कह गए सिया सु अइसन कलयुग आयगो हंस चुगेगो दाने तिनको और कौउआ मोती खाएगो।

जिस किसी भी महानुभव ने जब भी कभी यह पन्ति रची होएगी तो शायद उनको इस बात को तनिक भर भी कोनऊ एहसास न रहे हो कि वास्तव में एक दिन ऐसो भी अजाएगो कि हंस चुगेगो दाने तिनको और कौउओ मोती…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित भर्ष्टाचार से पीड़ित हर एक बर्बाद व्यवस्था पर एक व्यंग्य प्रयास।