💥 रिकवरी आपका जन्म-सिद्ध अधिकार।

रिकवरी जिसके की आप वास्तव मे अधिकारी है। रिकवरी अपने सकरात्मक कर्मो एव पवित्र प्रार्थनाओं के द्वारा उन भाव-व्यवहारों की, उन अधिकारों की, उन मान सम्मान एव वस्तुओँ की, जिसे आपके व्यसनों *एडिक्शन* ने आपको भृमित कर आपसे कोसो दूर करते हुए आपको एक अनन्तकालीं दरिद्रता में धकेल दिया था।

दरिद्रता नेक भाव-व्यवहारो की, दरिद्रता अपने व्यसनों से दूर एक स्वतंत्र एव उन्मुक्त जीवन को जीने की, दरिद्रता स्वम् को स्वीकार न कर सकने की। इन सभी प्रकार की दरिद्रता को मिटाते हुए स्वम् के वास्तविक व्यक्तिव को स्वीकारते हुए। प्रतिदिन नेक भाव-व्यवहारों से पूर्व जीवन व्यतीत करते हुए एव अपने इष्ट से अपने एव उन सभी भृमित व्यसनियों के लिए जो आज भी किसी न किसी प्रकार के व्यसन की गिरफ्त में अपना अनमोल जीवन बर्बाद करते हुए किसी प्रकार से सिर्फ व्यतीत किए जा रहे है। अपनी एव उनकी आत्मशांति के लिए अपने ह्रदय स्वरूप अपनी अंतरात्मा से प्रार्थना करते हुए आप अपने जीवन स्वरूप अपनी एक अनन्तकालीं रिकवरी को प्रतिदिन जीते हुए प्राप्त कर सकते है।
इसके लिए आपको एक उचित मार्गदर्शन एव वास्तविक अनुभवशाली एक ऐसे व्यवक्त्वि की आवश्यकता होती है जो आपको अपने वास्तविक अनुभव एव ज्ञान के द्वारा आपको आपके हर एक बढ़ते कदम से एक उचित सकारात्मक वातावरण प्रदान करने की एक क्षमता सहेज ही उपलब्ध करवा सके।

शेष अगले क्रम से…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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एक एहसास! सत्य से प्रेरित है जो।

अक्सर कई बार कई परिचित एव अलग अलग व्यक्तित्व के व्यक्ति अक्सर मुझ से पूछते है कि विक्रांत राजलीवाल जी आप अभी कुछ समय पूर्व तक अनपढ़ 2008 तक(10th pass) की श्रेणी में थे। और आपको 2004 मार्च या
2003 मे लगभग 19 महीने तक पुनर्वासकेन्द्र(नशामुक्तिकेंद्र)में रहना पड़ा था! यहाँ वर्ष की वास्तविक स्थिति का मुझे आज भी पूर्णतः ज्ञात नही है क्योंकि आज भी आपको नशे के कारण जिन मानसिक स्थितियों से सामना करना पड़ा था उसकी वजह से आज भी आपको कुछ कुछ विषय पूर्णता स्मरण नहो हो पाते। यहाँ तक मुझ को ज्ञात या स्मरण है वह वर्ष 2004 है परंतु मेरे गुरुजन मुझ को आज भी वर्ष 2003 का स्मरण दिलाने की बात करते है। खैर जो भी हो…

आपको 2004 से 2005 तक मानसिक चिकित्सालय शाहदरा भी ले जाया जाता था। विचारविमर्श करने को। इसी दौरान आपने एक साल के कम्प्यूटर कोर्स के साथ ही एक तंकन का कोर्स। एव आप के अनुसार आप आगे शिक्षा प्राप्त करने का अवसर भी प्राप्त करने की कोशिश में सक्रिय थे। ऐसे में दिसम्बर 2007 में आपका विवाह भी सम्पन कर दिया गया।

इन सब के बाबजूद जब आपको आगे शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया गया या प्राप्त हुआ वो भी शादी के उपरांत तो आप देखते ही देखते पढ़ लिख गए 2009 में 12th इंदिरागांधी ओपन यूनिवर्सिटी से और 2013 में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक पास कर के डिग्री प्राप्त करि।

अपने एक अति संवेदनशील समाजिक मुदो पर अपने प्रथम प्रयास से अपनी समाजिक एव मानवता की भावनाओ से पूर्ण कविताओं के द्वारा जो समाजिक कुरीतियों पर जो प्रहार किया वो भी बेहद सराहनीय एव गर्व का विषय है।
जहाँ 2016 जुलाई तक आप मोबाइल तक का इस्तमाल या उपयोग करना पसंद नही करते थे वही आज आप कई ब्लॉग वेबसाइट पर सक्रिय है एव अपने शुरुआती 6 से 7 महीने में ही 270 + नज़्म काव्य कविताएं एव कुछ की दर्जन समाजिक एव मानवता की भगवन से प्रेरित लेख भी लिखे दिए। जिनकी संख्या अब दिन प्रतिदिन बढ़ते हुए और ही अधिक हो गईं है।

आप कि एक और आगामी पुस्तक जो कि नज़्म शायरी के रूप में विस्तृत दर्द भरे किस्से है लगभग प्रकाशन के लिए अब पूर्णता तैयार है एव इसके साथ ही आप एक विस्तृत नाटक जिसका केंद्र बिंदु पारिवारिक उतार चढ़ाव एव अति संविदनशील प्रेम प्रसंगों से प्रेरित है अब समापन की ओर अग्रसर है।

💖 और सबसे अहम बात यह है कि आज आप अपने परिवार के सदस्यों के साथ एक सम्पन और शान्ति से परिपूर्ण जिंदगी व्यतीत कर रहे है। यह सब देखते ही देखते आप ने कैसे कर दिखाया

क्या यह कोई चमत्कार है या कोई जादू टोना है?

👉 तो मै उन सभी महानुभवों से यही कहना चाहूंगा कि जो कार्य आपको अकस्मात ही घटित हो गया हूं के जैसा प्रतीत हो रहा है या जिस कार्य की अवधि आपको अति पल भर की या चन्द वर्षो की प्रतीत हो रही है!

मित्रों यह पल भर या चन्द वर्षो की अवधि का कार्य सम्पन्न करने के लिए मुझ को लगभग 14 से 15 वर्ष का समय लगा है। यह सब इतना सरल नही था जितना कि आपको प्रतीत हो रहा है।

वर्ष 2004 में जब मुझको ज्ञान की प्राप्ति या ज्ञान का एहसास हुआ था पुनर्वासकेन्द्र में दर्द ए जिंदगी की हकीकत से झूझते हुए, जीवन के हर एहसास को महसूस करते हुए उन्हें बेहद समीप से समझते हुए!

अंत मे हुआ एक साक्षात्कार स्वम् से स्वम् का, अपने असली अस्तित्व का मेरे मित्रो।उस समय से निरन्तर चलते हुए जलते हुए आज मै यह तक पहुच पाया हु और अब भी मैं निरन्तर ही जलता/चलता जा रहा हु। वर्ष 2008 में इंद्रा गांधीयूनिवर्सिटी से 12 कक्षा का फार्म भरा और वर्ष 2013 में दिल्ली विश्विद्यालय से स्नातक की डिग्री उत्तीर्ण करि।अवसर की कमी के बाबजूद अपने कर्मो पर एक विशवास रखते हुए आपने स्नातक की शिक्षा के उपरांत 2013 में संघ लोक सेवा आयोग की कोचीन ली एव तैयारी करि।

एक आध स्नातक स्तरीय सरकारी परीक्षा का लिखित परीक्षा भी पास किया। 2016 में अपने शोषित समाज के मासूम व्यक्तिओ को कुछ राहत पहुचने की लिए अपनी अति संवेदनशील कविताओ की पुस्तक प्रकाशित करवाई।जिसका नाम एहसास है संजोग प्रकाशन शहादरा द्वारा प्रकाशित जनवरी 2016 दिल्ली विश्व पुस्तकमेला।

2016 जुलाई में प्रथम मोबाइल के साथ कम्प्यूटर पर कार्य करना आरम्भ किया। मई 2017 में ब्लॉग बनाए और 3 से 4 महीने में ही 200 +विषय लिखे यह सिलसिला चलता रहा आज लगभग 350 + नज़्म, जिसमे 90 +विस्तृत (बड़ी है) एव बहुत सी कविताए जिसमे से 30+ विस्तृत काव्य कविताए है दर्ज़नो विस्तृत लेख एवबहुतसे लघु लेख एव एक आध गीत एव व्यंग्य किस्सा। ऑनलाइन ब्लॉग पर लिख चुका हूं। 💖 एव हस्तलेख के रूप में ऑडिट भी कर चुका हूं जो जल्द ही अपनी रचनाओ के संग्रह के रूप में अपनी एक ओर आगामी पुस्तक के जरिए प्रकाशित करवा दूँगा।

👉 यह सब कैसे सम्पन हो पाया मित्रो इसके पीछे एक महान भावना छुपी है और वह है मेरे माता और पिता का असीम प्रेम और अनुशाशन।

💖 इस कार्य के पीछे छुपी है एक महान भावना और वह है ईष्वर की असीम कृपया एव आप सब मित्रो और गुरुजनों का असीम प्रेम एव आशीर्वाद।

अंत मे मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि…

🌻 यह जो चन्द पलो का सफर है न जो, किया है तय कई वर्षों में।

जलना पड़ा था जलना पड़ेगा, जलता ही जा रहा हु मैं।।

हर दर्द एक सबक बन जाता है न जो, सीखा देता है मुस्कुराना हर दर्द ओ सितम में।

बहती है जो धारा ये जीवन की, देता है सुनाई एक संगीत फिर उस मे।।

टूट जाते है छुप जाते है जब सहारे उम्मीद के सब।

निकलता है सूर्य पुकार एक सत्य से तब।।

यह जो चन्द पलो का सफर है न जो, किया है तय कई वर्षो में।

जलना पड़ा था जलना पड़ेगा जलता ही जा रहा हु मैं।।

💥 रचनाकार एव स्वतन्त्र लेखक विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित उनके जीवन से सम्बंधित एक सत्य अनुभव।🖋

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💥 सत्य एक सांस्कृतिक विशवास।

अक्सर मैं प्राचीन वैदिककालीन इतिहास के सम्बंध में पढ़ता हूं कि आर्य जो हिन्दू धर्म से सम्बंधित एक महत्वपूर्ण वर्ग है यूरोप से आए थे?

परन्तु मैं अपने भारतवर्ष के अपने हिन्दू धर्म एव देवी देवताओँ, पुराणों, वेदों एव संस्कृति पर विश्वाश रखते हुए यह मानता हूं कि हा हो सकता है कि आर्य यूरोप में भी निवास करते है या आर्य वहा की एक प्राचीन शाशक वर्ग हो।

परन्तु इसका तदपि यह तातपर्य नही निकलता की आर्य यूरोप से भारतवर्ष में आए थे इस तथ्य की संभावना अति शुष्म होते हुए न के बराबर प्रतीत होती है। इसके विपरीत आर्य भारत वर्ष से यूरोप की ओर गए थे इस तथ्य की संभावनाएं अत्यधिक है। यह बात मैं यू ही नही कह रहा मित्रों इसके पीछे भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है जब सम्पूर्ण यूरोप पाषाण युग मे एक आदिम जनजाति के समान जीवन व्यतीत कर रहा था उस समय भारत अपने स्वर्णिम युग के एक स्वर्णिम दौर से गुजर रहा था।

एव यह भी हो सकता है कि जिस समय जिसने भी यह तथ्य दिए उस समय भारतवर्ष गुलामी की जंजीरों से जकड़ा हुआ एक बेबस देश था एव उन तथ्य के जरिए भारतवर्ष की सांस्कृतिक मान्यताओ एव विश्वाश को तोड़ते हुए भारतवर्ष की संस्कृति को मिटाने की एक साजिश या नकारात्मक कोशिश भी हो सकती है!

उपरोक्त विचार मेरे स्वम् के निजी विचार है जो मेरे हिन्दू धर्म एव भारतवर्ष की पुराणिक सांस्कृतिक मान्यताओं से प्रेरित है।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
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💥 वास्तविक अनुभव।

हमेशा अपने चित्त को शांत रखते हुए अपने ईष्वर की कृपा पर विश्वाश रखते हुए।

अपने आप को हर प्रकार के व्यसनों से बचाते हुए, किसी अनुभवशाली व्यक्तित्व के समक्ष आत्मसमर्पण करते हुए।

आप प्राप्त कर सकते है अपनी खोई हुई आत्मशांति एव जीवन उन्नति का एक सुनिचित अवसर।

क्या आप तैयार है स्वम् के वास्तविक व्यक्तिव को स्वीकार करते हुए, एक ऐसे सुनहरे स्वप्न को साकार करने के लिए, जो आपको आपकी वास्तविक आत्मशांति का एक अनन्तकालीं अनुभव प्राप्त करवा सके? जिसके आप वास्तव में हकदार है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
3/12/2018 at 00:32am20181123_164911

नेक राह।

इस संसार मै जब कुछ अपने ही आपकी छोटी छोटी परन्तु अति महवपूर्ण विजय से एक ईर्ष्या का भाव रखते हुए आपके जीवन मे अपने तुच्छ विचारो एव व्यवहारों के द्वारा विष घोलने का प्रयत्न करें?

आप उन समस्त व्यक्तियो से एक उचित दूरी बनाते हुए। अपने नेक कार्यो के द्वारा अपने विजय रथ को सावधानीपूर्वक आगे की ओर बढ़ाते हुए, अपनी अनन्त कालीन विजय के एक कदम और समीप पहुचने का एक प्रयत्न कर सकते है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

27/11/2018 at 22:15 pm

💥 Way of improvement and attraction. (Reblog)

On the path of reform we face every moment of our weak or distraught feeling or devious mindset, weighing a lot of weird thoughts and reaching one step closer to victory or we can change our path to reciprocate our inconsistent and non-social addiction. .

From here we are known to have two passages and both start with the same, but the direction of both is never the same.

On this path of improvement, it is sure to face the path of every improvement from this crossroads. And this crossroads start with a charm.

First of all, we are attracted to the non-social adjective that we were consumed while consuming, and because of that attraction, some of the people on whom God takes a tremendous blessing of your high power, adopts it. And to reach the path and to face the destructive attraction of truth with true power and true thought, one step of victory is reached.

And secondly, those who are not blessed with God’s grace or who are ungrateful, by submitting to their devious mentality, bowing before their weak self-esteem, they make a compromise and because of their weak mentality and creepy thinking, Ignorance takes control.

Here we go about two paths and two types of traveler whose origin place comes out of the same direction and that direction is attraction and dedication. But you should know that there are two types of consequences of both these ways, as if ..

The first is the one on whom the grace of God leads to the grace of their good deeds, the one who faces the power of his Satyakarma, by his every kind of addiction, is a buzzing attraction;

1) The first is the path of victory which is easily gained from proper practical knowledge and proper congruence and ensures their victory by moving them one step further towards the path of improvement.

2) And secondly, due to the lack of due diligence, due to the lack of proper persistence in each and every circumstance, believing on the power of his Satyakarma and the power of his God, accepting his weak mindset, a proper conjunction and a genuine winner, through his guidance, Keeping one of the steps of victory going forward, avoiding the overwhelming attraction.

👉 In contrast to this, it is the second type of person who does not want to go on the path of improvement, even if he does not want to attract all kinds of Asocial addiction, due to lack of proper persistence, he does not want his wrong move. Again, they come in the way of their inconsistent and non-social addiction, as a result, they do not appreciate the power of their God and they are again trapped in a trap where they meet them. And only pain, relationships broken by broken feelings, pain of an unknown fear, pain which they get due to one of their wrong steps, which they could survive only and only the proper practical knowledge and the unifying knowledge obtained from a consistent connotation And from the experiment, he could have escaped from a proper step resulting from a proper guidance obtained from a proper concordance.

👉 From here, they also have two groups

1) The first, who, after getting them rectified properly from Satyakarma, leads them towards Satyakarma, and trains them towards the path of reform. One while eliminating their pain, giving them a step and win, gives us a sense of peace .

2) And second is that step which, by the absence of a proper congruence, increases itself to one of our inconsistent and non-social addictions, one step further, introduces our pain to an eternal and unexpected period. Where there is sadness, Poverty, disease, and psychological difficulties, not only their own but also ruins the life of their loved ones, making them even worse than hell.

That is why the attainment of proper perception and proper knowledge and higher experience on the path of improvement are very important, because the path of victory (path of peace) is further strengthened by proper fidelity, and it gets proper fidelity, we get decent and honorable before the knowledgeable people. From the meeting with them, acquiring knowledge from their experiences in a proper and lithe atmosphere, acquiring an eternal experience of peace While doing good and proper guidance at the right time, giving us protection from the ridiculous but dangerous toxic charm of our every kind of incompatible and anti-social addiction, one step of victory and near Delivering.

Thank you.

Writer, writer, and ideas written by Vikrant Rajaliwal, (Recovery Addict at Life)

(Republish by Vikrant Rajliwal after some amendments.)

💥 सत्य है।

अक्सर कुछ अज्ञानी व्यक्ति नशे से सम्बंधित अति आवश्यक काउंसिल से गुजरते हुए एक बीमार व्यक्ति को मानसिक रोगी समझने की भूल कर बैठते है।

इस कारण से उस व्यक्ति को अनेक प्रकार की अन्य समस्याओं से सामना करते हुए अपने पहले से कठिन जीवन को और भी कठिनता से जीना पड़ सकता है।

विक्रांत राजलीवाल
24/11/2018 at 11:53am20181124_114034

💥 एहसास

जब आप किसी महत्वपूर्ण परिस्थिति के हालात एव जिमेवारी को बिना किसी पूर्व सूचना के निभाने को मजबूर हो जाते है।
परिस्थिति भी ऐसी जो आपके जीवन की एक अत्यंत गम्भीर समस्या एव बीमारी हुआ करती थी तो आप पुनः उस समस्या एव बीमारी की चपेट में आ सकते है।

ऐसा ही एक वास्तविक अनुभव मेरे लास्ट रेलेप्स का था। जब अचानक से एक पारिवारिक समारोह के दौरान मुझ पर *बार* मदिरा स्टाल व्यवस्था की जिम्मेवारी आ गई थी बिना किसी सूचना एव जानकारी के।

आज मुझे अपने उस रिलेप्स के उपरांत ईष्वर अपनी उच्च शक्ति की प्रार्थना करते हुए। एव आप सभी परिजनों के समक्ष लगातार रचनाए लिखते हुए एक वर्ष 18 दिन पूरे हो गए है।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल।

24/11/2018 at 11:24am20181124_105338

💥 सत्य मार्ग।

IMG_20181012_195141_292एक वास्तविक सफलता सत्य से सत्य मार्ग पर चलते हुए ही प्राप्त हो सकती है।

एव अपनी खोखली सफलता के लिए जो मनुष्य सत्य का साथ, अपने ईष्वर का एव धर्म का मार्ग त्याग दे।

अंत काल मे उसके समक्ष होता है तो केवल और केवल एक ज्वलन्त पच्यताप।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
21/11/2018 at 07:37am

💥 सत्य है।

कभी कभी इस संसार के लोग आपके मोन को आपकी कमजोरी या मानसिक बीमारी समझने की भूल करते हुए अपने तरीके से आपका इलाज शुरू कर देते है तदुपरांत जिन्होंने वास्तविक ज्ञान और परिस्थितियों को शुष्म रूप से समझा है वह और भी शून्य में जाते हुए मौन की एक और उच्च अवस्था को प्राप्त कर जाते है। एव हर प्रकार की यातनाओं को सहते हुए, एक उचित समय आने पर इस संसार को यह सिद्ध कर देते है कि उनकी वास्तविक बुद्धि एव ज्ञान का स्तर क्या है।

एव जिन्होंने केवल कोई नकाब धारण किया होता है उनका उन महानुभवों के उस प्रयास से उस इलाज से नकाब उतर जाता है एव वह टूट कर एक सामान्य जन के भांति अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत कर अंत काल मे इस संसार से विदा हो जाते है।

यहाँ सार इतना ही है कि आपने अपने जीवन के शुरुआती काल शिशु काल से अब तक क्या अनुभव एव ज्ञान अर्जित किया है। एव आपने अपने उन अनुभवों एव ज्ञान का किस प्रकार से एक सद्पयोग किया है।

अगर आपको अपने हर सकारात्मक व्यवहारों एव उच्च विचारो पर पूर्णता विशवास है तो एक न एक दिन आपके उन व्यवहारों एव विचारो की शक्ति से यह सम्पूर्ण संसार प्रकाशमान हो जाएगा।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

20/11/2018 at 22:17pmIMG_20181115_124938_619