❤ दिल से। (विक्रांत राजलीवाल शायरी)

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चल रहे है राही राह अंजान पर जिंदगी के हर ओर, सांसो में अपनी एक विशवास सा लिए।

हर ठोकर को कर नज़रअंदाज़ धड़कते दिल के अपने एक धड़कती धड़कन सी लिए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
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रात कि तन्हाइयो में अब भी है कॉयम, टूटे दिल कि टूटती धड़कने वो यादे तेरी अब भी कही।

तेरे चेहरे कि मासूमियत वॉर फरेबी निगाहों से ज़ख्म जो ताजा टूटे दिल मे है अब भी कही।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
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इंतज़ार है हर लम्हा किसी के इकरार का।
किसी अपने का उसके एक इज़्हार का।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
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मैं हु एक मुसाफ़िर रास्ता ये अंजाना है।
हर मोड़ ज़िन्दगी ये वक़्त सदियों से है तन्हा,
ये दिल दीवाना है।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
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ये खेल ज़िन्दगी, बेदर्द एक अहसास, नही खेल है कोई।
हर अहसास, एक तरंग ज़िन्दगी, सांसोCollageMaker_20181029_122904945.jpg से है मेरे टकराई।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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महोबत में तेरी,

यह दिल खो गया।

धड़कने है तन्हा मेरी

सितम हो गया।

पहेलु में यार के

नशा हो गया।

देख कर चेहरा-हसीन

यह दिल खो गया…

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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करते है राज दिलों पर दिलवाले अक्सर,
हम तो पता ही भूल बैठे है दिल का अपने यारो।

दिख जाएगा राह ए महोबत एक निसान जो अक्सर।
दिल ये दीवाने का आता है नज़र टूटा सा जो अक्सर।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
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जिंदगी।

घुट घुट पी ली जो हवा, हर घुट से अहसास धड़कने।
तरंग एक दर्द, हर घुट से आरज़ू, ये धड़कती धड़कने।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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लिखने वाले ने लिख दी दास्तां ए महोबत।
सुनाने वाले ने सुना दी दास्तां ए महोबत।।

क़त्ल हो गया!!! चढ़ गए सूली पर हर एक आशिक़, पढ़ने और सुनने वाले…दास्तां ए महोबत।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

पुनः प्रकाशित एक संग्रह के रूप में परतम बात 08/12/2018 at 13:35 pm

एक एहसास! सत्य से प्रेरित है जो।

अक्सर कई बार कई परिचित एव अलग अलग व्यक्तित्व के व्यक्ति अक्सर मुझ से पूछते है कि विक्रांत राजलीवाल जी आप अभी कुछ समय पूर्व तक अनपढ़ 2008 तक(10th pass) की श्रेणी में थे। और आपको 2004 मार्च या
2003 मे लगभग 19 महीने तक पुनर्वासकेन्द्र(नशामुक्तिकेंद्र)में रहना पड़ा था! यहाँ वर्ष की वास्तविक स्थिति का मुझे आज भी पूर्णतः ज्ञात नही है क्योंकि आज भी आपको नशे के कारण जिन मानसिक स्थितियों से सामना करना पड़ा था उसकी वजह से आज भी आपको कुछ कुछ विषय पूर्णता स्मरण नहो हो पाते। यहाँ तक मुझ को ज्ञात या स्मरण है वह वर्ष 2004 है परंतु मेरे गुरुजन मुझ को आज भी वर्ष 2003 का स्मरण दिलाने की बात करते है। खैर जो भी हो…

आपको 2004 से 2005 तक मानसिक चिकित्सालय शाहदरा भी ले जाया जाता था। विचारविमर्श करने को। इसी दौरान आपने एक साल के कम्प्यूटर कोर्स के साथ ही एक तंकन का कोर्स। एव आप के अनुसार आप आगे शिक्षा प्राप्त करने का अवसर भी प्राप्त करने की कोशिश में सक्रिय थे। ऐसे में दिसम्बर 2007 में आपका विवाह भी सम्पन कर दिया गया।

इन सब के बाबजूद जब आपको आगे शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया गया या प्राप्त हुआ वो भी शादी के उपरांत तो आप देखते ही देखते पढ़ लिख गए 2009 में 12th इंदिरागांधी ओपन यूनिवर्सिटी से और 2013 में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक पास कर के डिग्री प्राप्त करि।

अपने एक अति संवेदनशील समाजिक मुदो पर अपने प्रथम प्रयास से अपनी समाजिक एव मानवता की भावनाओ से पूर्ण कविताओं के द्वारा जो समाजिक कुरीतियों पर जो प्रहार किया वो भी बेहद सराहनीय एव गर्व का विषय है।
जहाँ 2016 जुलाई तक आप मोबाइल तक का इस्तमाल या उपयोग करना पसंद नही करते थे वही आज आप कई ब्लॉग वेबसाइट पर सक्रिय है एव अपने शुरुआती 6 से 7 महीने में ही 270 + नज़्म काव्य कविताएं एव कुछ की दर्जन समाजिक एव मानवता की भगवन से प्रेरित लेख भी लिखे दिए। जिनकी संख्या अब दिन प्रतिदिन बढ़ते हुए और ही अधिक हो गईं है।

आप कि एक और आगामी पुस्तक जो कि नज़्म शायरी के रूप में विस्तृत दर्द भरे किस्से है लगभग प्रकाशन के लिए अब पूर्णता तैयार है एव इसके साथ ही आप एक विस्तृत नाटक जिसका केंद्र बिंदु पारिवारिक उतार चढ़ाव एव अति संविदनशील प्रेम प्रसंगों से प्रेरित है अब समापन की ओर अग्रसर है।

💖 और सबसे अहम बात यह है कि आज आप अपने परिवार के सदस्यों के साथ एक सम्पन और शान्ति से परिपूर्ण जिंदगी व्यतीत कर रहे है। यह सब देखते ही देखते आप ने कैसे कर दिखाया

क्या यह कोई चमत्कार है या कोई जादू टोना है?

👉 तो मै उन सभी महानुभवों से यही कहना चाहूंगा कि जो कार्य आपको अकस्मात ही घटित हो गया हूं के जैसा प्रतीत हो रहा है या जिस कार्य की अवधि आपको अति पल भर की या चन्द वर्षो की प्रतीत हो रही है!

मित्रों यह पल भर या चन्द वर्षो की अवधि का कार्य सम्पन्न करने के लिए मुझ को लगभग 14 से 15 वर्ष का समय लगा है। यह सब इतना सरल नही था जितना कि आपको प्रतीत हो रहा है।

वर्ष 2004 में जब मुझको ज्ञान की प्राप्ति या ज्ञान का एहसास हुआ था पुनर्वासकेन्द्र में दर्द ए जिंदगी की हकीकत से झूझते हुए, जीवन के हर एहसास को महसूस करते हुए उन्हें बेहद समीप से समझते हुए!

अंत मे हुआ एक साक्षात्कार स्वम् से स्वम् का, अपने असली अस्तित्व का मेरे मित्रो।उस समय से निरन्तर चलते हुए जलते हुए आज मै यह तक पहुच पाया हु और अब भी मैं निरन्तर ही जलता/चलता जा रहा हु। वर्ष 2008 में इंद्रा गांधीयूनिवर्सिटी से 12 कक्षा का फार्म भरा और वर्ष 2013 में दिल्ली विश्विद्यालय से स्नातक की डिग्री उत्तीर्ण करि।अवसर की कमी के बाबजूद अपने कर्मो पर एक विशवास रखते हुए आपने स्नातक की शिक्षा के उपरांत 2013 में संघ लोक सेवा आयोग की कोचीन ली एव तैयारी करि।

एक आध स्नातक स्तरीय सरकारी परीक्षा का लिखित परीक्षा भी पास किया। 2016 में अपने शोषित समाज के मासूम व्यक्तिओ को कुछ राहत पहुचने की लिए अपनी अति संवेदनशील कविताओ की पुस्तक प्रकाशित करवाई।जिसका नाम एहसास है संजोग प्रकाशन शहादरा द्वारा प्रकाशित जनवरी 2016 दिल्ली विश्व पुस्तकमेला।

2016 जुलाई में प्रथम मोबाइल के साथ कम्प्यूटर पर कार्य करना आरम्भ किया। मई 2017 में ब्लॉग बनाए और 3 से 4 महीने में ही 200 +विषय लिखे यह सिलसिला चलता रहा आज लगभग 350 + नज़्म, जिसमे 90 +विस्तृत (बड़ी है) एव बहुत सी कविताए जिसमे से 30+ विस्तृत काव्य कविताए है दर्ज़नो विस्तृत लेख एवबहुतसे लघु लेख एव एक आध गीत एव व्यंग्य किस्सा। ऑनलाइन ब्लॉग पर लिख चुका हूं। 💖 एव हस्तलेख के रूप में ऑडिट भी कर चुका हूं जो जल्द ही अपनी रचनाओ के संग्रह के रूप में अपनी एक ओर आगामी पुस्तक के जरिए प्रकाशित करवा दूँगा।

👉 यह सब कैसे सम्पन हो पाया मित्रो इसके पीछे एक महान भावना छुपी है और वह है मेरे माता और पिता का असीम प्रेम और अनुशाशन।

💖 इस कार्य के पीछे छुपी है एक महान भावना और वह है ईष्वर की असीम कृपया एव आप सब मित्रो और गुरुजनों का असीम प्रेम एव आशीर्वाद।

अंत मे मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि…

🌻 यह जो चन्द पलो का सफर है न जो, किया है तय कई वर्षों में।

जलना पड़ा था जलना पड़ेगा, जलता ही जा रहा हु मैं।।

हर दर्द एक सबक बन जाता है न जो, सीखा देता है मुस्कुराना हर दर्द ओ सितम में।

बहती है जो धारा ये जीवन की, देता है सुनाई एक संगीत फिर उस मे।।

टूट जाते है छुप जाते है जब सहारे उम्मीद के सब।

निकलता है सूर्य पुकार एक सत्य से तब।।

यह जो चन्द पलो का सफर है न जो, किया है तय कई वर्षो में।

जलना पड़ा था जलना पड़ेगा जलता ही जा रहा हु मैं।।

💥 रचनाकार एव स्वतन्त्र लेखक विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित उनके जीवन से सम्बंधित एक सत्य अनुभव।🖋

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👺 बेदर्द ज़माना।

20181124_120423चले जाते है यार मेरे अक्सर बीच मझदार छोड़ कर।

देखता हूं राह मैं उनकी फिर काम सारे छोड़ कर।।

आते नही दुबारा से वो, फिर दिखते नही दोबारा से वो।

खड़ा हूँ अब भी राह पर वही, देख रहा हु रास्ता उनका, मगर दिखते नही फिर कहि वो।।

क्या ये ही जिंदगी है एक ख्वाब मेरा टूटा एतबार जो पुराना,
देख रहा हु जो एक ज़माने से वही पर अब भी मैं जो।।।

सितमगर हज़ारो मिले बेदर्द इस ज़माने में।

तोड़ा है दिल ए दीवाना यहाँ हर किसी ने।।

लगते है तन्हाई में इल्जाम कई संगीन, हो जाता है मजबूर दीवाना।

दिखता नही तड़पते साए से अपने, जब भी कोई खोया साथी पुराना।।

दिख तो जाते है चेहरे वही, पर दिखता नही उनमे वो उनका अक्स पुराना।।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(06/12/2018 at 21:05pm)

(पुनः प्रकाशित)

🕯 एक सफ़र-ज़िन्दगी।

IMG_20181026_073844_067ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में मित्र साथी वो बच्चपन के दिन न जाने कहाँ खो गए।

दर्द तकलीफ़ एक घुटन सी जिंदगी, हर क्षण उदासी सी कोई साथ हमारे हो गए।।

मुस्कान ये चेहरे की बनावट, जो मुखोटा सा कोई, छल है हर क्षण साथ सांसो के जहर ये जो ज़िन्दगी।

सफर ये जलते शोले, राह ए शूल मंजिलो के मिटते निशान, ख़ामोश है राही हर लम्हा, ज़ख्म ये नासूर जो जिंदगी।।

न कोई दवा है न कोई दुआ, हर ज़ख्म बन गया जो एक बद्दुआ, तड़प सासों की तड़पती है अब धड़कने हर लम्हा।

जुल्म न सितम कोई अब बाकी रहा, बढ़ते हर कदमो से बढ़ते फासले, सफर अधूरा सा है अब भी ज़िन्दगी हर लम्हा।।

स्वतन्त्र लेखक विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
21/04/2018 at 23:00pm

(पुनः प्रकाशित।)

लक्ष्य। ✒

FB_IMG_1535948190951.jpgखुशनसीब होते है वो राह ए मुसाफ़िर, सफर ए ज़िंदगानी में साथ संघर्ष हर कदम है जिनके ए साथी।

हर एक सवेरा लाता है एक नई रौशनी, लिपटी अहसासों से चिंगारी कोई बेदर्द जो साथ अपने ए साथी।।

चक्रव्यूह नही अभिमन्यू सा, तोड़ न सके जिसे कोई, समाया विशवास सांसो में तेरे ए साथी।

तीर है अर्जुन सा भेद लक्ष्य निकल जाएगा, साथ न हो कोई चाहे तेरे, तन्हा तू चल ए साथी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
(पुनः प्रकाशित)

सोचता हूं अक्सर तन्हा अंधेरी रातो में कि…💦

1536088001590-539524510.jpgयाद हैं अब भी गुजरा वो ज़माना, देखा था खोया अक्श नज़रो में उनकी अपना जब वो वर्षो पुराना।

रात थी वो चाँद की, आशिक था महोबत से उनकी
यह सारा ज़माना।।

रहता था उफ़ान धड़कनो में जब मेरे।

बजता हो साज कोई, जैसे साँसों से मेरे।।

उनकी वो हर एक अदा अब भी हैं याद मुझ को।

वख्त बे वख्त वो इतराना, तीर शराबी निगाहों से चलाना,
अब तक हैं याद मुझ को।।

वो मौसम, वो सर्द रात, वो थी मेरी तन्हाई की बात।

साया था पीपल का एक साथ मेरे, वो थी उनसे मेरी जुदाई की रात।।

अब तक हैं याद मुझ को…

देखी थी जब राह ए सनम, धड़कती तो कभी टूटती अपनी हर धड़कन के साथ।

वो आये नही थे देने को जब दीवाने का अपने, जो अब भी धड़कनो में कहि मेरे मेरा साथ।।

निकलती थी एक आह, गुजरते हर लम्हे के साथ।

आलम था बेदर्द बेहिंतिया, आया था जो एक बेबसी के साथ।।

खड़ा था दीवाना जो राह ए सनम, साए से अपने लिपट कर,
खो गयी राह ए मन्ज़िल, एक दर्द, वो महबूबा किसी गैर के साथ।

वख्त गुजरा, समा गुजरा, गुजर गया वो जमाना, चली गयी थाम के हाथ,
देखता रह गया जो तन्हा दीवाना, वो किसी गैर के साथ।।

अब तक हैं याद मुझ को…

खड़ा हैं अब भी वही उसका दीवाना, साए से उसी पीपल के साथ।

देख रहा हैं राह सुनी, अब भी न जाने किसकी वो, उसके चले जाने के बाद।।

अब तक हैं याद मुझ को…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(पुनः प्रकाशित कुछ तंकन त्रुटि सुधारूपरांत तारीख़ 02/11/2018 at 20:43pm)

नसीब।

होती है हर पहचान मुसाफ़िर, वक़्त नसीब से ज़िन्दगी में अपने।

हर कदम है मंज़िल, सफर सदियो से तन्हा, साथ अब भी जो अपने।।

जिद है जनून ए ज़िन्दगी, ये दौड़ता लहू, फड़कती हर रगों में जो अपने।

हर बून्द है श्याही, बगावत ये लहू, साथ अब भी फड़कती हर रगों में जो अपने।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish after some edit collections by Vikrant Rajliwal)20181124_120423

👹 नंगे भृष्टाचारी।

IMG_20181116_220616_766.jpgनगों से नंगे मिले नंगे होंगे सारे।
नगों को देख नंगे मुस्काए,
भृष्ट है नंगे जितने भी जो सारे।।

प्रकाश सत्य से सत्य का कर देगा नंगा, नगों को नग्न है नंगे जितने भी जो सारे।
न्याय सत्य से सत्य का कर देगा न्याय, नगों से पीड़ित है बेबस जितने भी जो सारे।।

नंगे ये नग्न है दलदली भर्ष्टाचार से शिक्षित, बेशर्म जितने भी नंगे जो सारे।
चलेगी लहर सच्चाई की तो मचेगी भगदड़ एक भयानक, खुलेगी पोल नग्नता से नगों की नंगे है समस्त भृष्टाचारी जितने भी जो सारे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
21/11/2018 at 08:47 am

💥 कर्म।

गुरु ज्ञान से छुटी एक वाणी जो अमनोल कि कर्मभूमि में कर्म करो।
त्याग प्रतिफल की इच्छा तुम अपनी स्वार्थहीन प्रत्येक बस कर्म करो।।
20180905_121737.jpg
विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

20/11/2018 at 15:35 pm

💦 अहसास।

❤ अहसास दिल के दिल से जब भी कहो,
कोई पास दिल से सुनने वाला भी होना चाहिए।

रूठ जाओ जो तुम कभी, IMG_20181115_131830_340.jpgयू ही अफ़साने से किसी,
थाम कर हाथ हक से, साथ कोई खड़ा भी होना चाहिए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(पुनः प्रकाशित)