🌹 एक इंतज़ार…मोहब्ब्त। (दर्दभरी मोहब्ब्त की एक दास्ताँ।) #FacebookLive video.

आज रात्रि अपने फेसबुक पृष्ठ Voice Of Vikrant Rajliwal पर Live आ कर के अपनी एक दर्दभरी मोहब्ब्त की दास्ताँ *एक इंतज़ार… मोहब्ब्त। को प्रस्तुत किया।

लिंक नीचे अंकित कर रहा हु। जिससे आप भी मेरी फेसबुक live वीडियो का आनन्द प्राप्त कर सके।

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1522177451271047&id=204032090116708?sfnsn=wiwspmo&extid=KHgMOzjrkobZJ8sV&d=n&vh=e

धन्यवाद।

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💥 एक सत्य। (सत्य अनुभवों से प्रेरित एक सत्य।) *ब्लॉग सँग्रह।*

एक 17 वर्षीय अबोध युवक जब रिएबीटेशन सेंटर में भर्ती हो जाता है। एव हर गुजरते लम्हों के साथ उसे उसके जीवन के वह प्रत्येक वाक्य एक एक करके स्मरण होने लगते है। जिनके प्रभाव से उसके जीवन मे एक अचूक परिवर्तन सहज ही आ गए। जिनमे से कुछ परिवर्तन सकरात्मक हो सकते है एव उनमें से कुछ परिवर्तन नकरात्मक भी हो सकते है। क्या आप जानते है कि वह 17 वर्षीय अबोध युवक जिसने अपने जीवन की कच्ची उम्र में जीवन की अत्यधिक जटिल परिस्थितियों का ना केवल दृढ़ता से सामना किया अपितु उन पर विजय प्राप्त करते हुए अपने जीवन को एक सकरात्मक दिशा भी प्रदान करि, कौन है? जी हाँ आपने सही पहचाना वह कोई और नही अपितु आपका परम् मित्र साहित्यकार विक्रांत राजलीवाल ही है।

आज भी मुझको अपने जीवन के वह क्षण अत्यधिक समीप से स्मरण हो जाते है जिन्हें मैं चाहकर भी विस्मृत नही कर सका हु। आज मैं जो जीवन जी रहा हु यह कभी एक स्वप्न के सम्मान प्रतीत होता था। एक ऐसा स्वप्न जिसे मेने रिएबीटेशन में कदम रखते ही जान लिया था या यह कहना अधिक उचित होगा कि जब मुझ को इस बात का एहसास हुआ कि मैं अब रिएबीटेशन में अपने जीवन के एक अनन्त सुधारात्मक मार्ग पर आ खड़ा हुआ हूं। आज भी वह दिन मेरी स्मृति में ज्यूँ का त्युं बना हुआ है। उस दिन ने भी और दिनों के सम्मान ही मेरे जीवन मे अपने आगमन की एक दस्तक दी थी। और उस दिन भी मैं और दिनों के सम्मान ही अत्यधिक ऊर्जा का एहसास कर रहा था। परन्तु वह दिन वास्तविकता में और दिनों से पूर्णतः विपरीत सिद्ध होते हुए मेरे जीवन को हमेशा के लिए परिवर्तित करने वाला था।

उस दिन को स्मरण करते हुए यहाँ मैं अपनी कुछ पनतियो को अंकित करना चाहूंगा जिन्हें मेने कल ट्विटर एव अन्य सोशल मीडिया पर पर लिखा था कि… ये दिल है कि आज भी जो खुद से ही खुद की एक बग़ावत की चाहत रखता है।
और हम है कि जो आज भी हर बग़ावत को इस दिल से मिटा देना चाहते है।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

07/06/2019

Even today, this heart keeps a desire for a rebellion of itself.
And we still want to erase every rebellion with this heart.

Written by Vikrant Rajliwal
07/06/2019
Soponser by vikrantrajliwal.com

सत्य है मित्रो आज भी कई बार मेरे ह्रदय में यह विचार आ जाता है कि बस! अब बहुत हो चुका अब और नही। हा अब और नही सह सकता। मगर मेरे जीवन के स्वम के संघर्ष के अनुभव एव उन अनुभवों से प्राप्त ज्ञान मुझे आज भी इस गुस्ताखी की कोई भी एक अनुमति प्रदान नही करते है। यही तो जीवन है

कि हम कैसे अपने गुरुजनों से प्राप्त मार्गदर्शन एव अपने स्वयं की जीवन की जटिल परिस्थितियों पर प्राप्त विजय को अपने अज्ञान के कारण यू ही नही मिटा सकते या अपने जीवन के अत्यधित जटिल संघर्ष को तुच्छ साबित करते हुए उन्हें अपने जीवन से विस्मृत नही कर सकते है। खैर मैं आपको बता रहा था कि कैसे किसी दिन आपका जीवन बिना किसी खास चेतावनी के आपके जीवन को पूर्णतः परिवर्तित कर सकता है। ऐसा ही एक दिन मेरे जीवन मे भी आया था जब मेरा साधारण सा जीवन एकदम से बदल गया।

याद ह जब…

अक्सर मुझ से जब भी कोई पूछता है कि आपके जीवन में आप कि अब तक की सबसे अहम उपलब्धि कौन सी है? तो मैं उन से सिर्फ इतना ही कहता हूं कि आज भी मैं जिंदा हु और मेरा दिल एक स्वास्थ्य रूप से निष्पाप भाव से धड़क रहा है ना जो, यही है मेरे जीवन की अब तक कि सबसे अहम उपलब्धि।

आप सोच रहे होंगे यह कैसे? तो मैं आपको बता दु कि यह आपके लिए सहज हो सकता है परन्तु मेरे लिए यह कभी भी इतना सहज नही रहा। एक अबोध बालक (17 वर्षीय) जब सुधार के मार्ग को स्वम् अपनी इच्छा से चुनता है एव उस मार्ग पर अनेक प्रकार की जटिल परिस्थितियों से जब उसका सामना होता है तो सच कहता हु मित्रों एक बार को धड़कता दिल भी अपनी धड़कनो को भूल जाता है। सुधार के मार्ग पर मानव जीवन के सद्व्यवहार एव दुर्व्यवहार के बीच के अति महिम अंतर को समझते हुए स्वम् के व्यवहारों से हर प्रकार के दुर्व्यवहारों को अपने नेक विचारो एव दृढ़ जीवन संघर्ष के द्वारा सद्व्यवहार में परिवर्तित करने का एक प्रयास करना।

यद्यपि आपको ज्ञात है कि वर्तमान में हर चिर परिचित व्यक्ति चाहे वह आपके परिवार के सदस्य हु या जिन गुरुजनों से अपने सुधार के मार्ग को जाना या समझा है आपको आपके भूतकालीन व्यवहारों से जांचते हुए आपके वर्तमान कालीन सुधारात्मक कार्य को नकारते हुए आपके व्यक्तित्व को एक शंका कि दृष्टि से सहज ही देखेंगे। ऐसे जटिल परिस्थितियों का सामना करते हुए सुधार के मार्ग पर संघर्षमय रहते हुए नितप्रति दिन कदम दर कदम स्वम् को संभालते हुए जीवन के सहज मार्गो पर भी जटिलता का सामना करते हुए जीवन के प्रति प्रगतिशील बने रहना सच मे मित्रों इतना सहज कभी भी नही रहा।

याद है… वह सुबह भी उतनी ही परिचित और ऊर्जावान थी जितनी कि अन्य किसी दिन की सुबह होती थी। उस दिवस भी सुबह उठते ही सर्वप्रथम जो एक एहसास हुआ था वही एहसास अन्य किसी भी दिन की सबुह से कदापि कुछ अगल नही था। सुबह आंख खुलते ही सर्वप्रथम जो एक एहसास हुआ वह था कि हा आज भी में बीते कुछ दिनों के समान स्वम् के अनुशाशन के विपरीत अखाड़े या स्टेडियम में जाने के लिए सुबह के 3:10 बजे ना उठते हुए सुबह के 7:00 बजे उठा हु। और अब मैं पहले के समान स्वाथ्य एव उतनी शक्ति महसूस नही कर पा रहा हु अपितु अब मैं किसी पुराने खंडर के समान कुछ कुछ जर्जर सा होता जा रहा हु। आज भी सुबह उठते ही मैं आत्ममंथन कर रहा था कि जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा और मैं पुनः सुबह 3:10 बजे उठ कर पुनः अपने जीवन मे एक अनुशाशन स्थापित करते हुए अखाड़े जाना आरम्भ कर दूँगा। हा आज का यह विचार कई मायनों में कुछ अगल था क्योंकि अभी कुछ दिन पूर्व ही मेरी मुलाकात अक्समात ही अपने गुरुजी (कोच) जी से हुई थी और उन्होंने मुझको पुनः अखाड़े में आने के लिए प्रेरित भी किया था। इस किस्से की दास्तां भी सही समय पर आपसे अवश्य बताऊंगा कि जो मेरे जीवन का पहला सकरात्मक सत्य एव सकरात्मक परिवर्तन था, है और हमेशा ही रहेगा।

खैर जो भी हो प्रकृति को शायद आज कुछ और ही मंजूर था। उपरोक्त एहसासों का मंथन करते हुए मैने अपने बिस्तर को त्याग कर अपने दैनिक दिनचर्या की शुरुआत करि। सर्वप्रथम उस दिन मैने अपनी जेब की तलाशी करि कि कुछ रुपए ही मिल जाए। परन्तु फिर अक्समात ही ध्यान आया कि बीते कुछ महीनों से मैने एक रुपया भी तो अपने परिजनों से नही लिया। फिर आज क्यों मुझमें इतनी बैचेनी उतपन हो गई थी। इस बात का स्वम् मुझ को भी कोई एहसास नही था। तुरन्त ही मैंने अपने पिताजी की जेब से कुछ सो रुपए यानी कि 100 रुपए निकाल लिए। जी हां अपने सही ही समझा मैने अपने पिताजी की अनुमति के बिना ही उनकी जेब से सो रुपए यानी कि 100 रुपए निकल कर अपनी जेब मे रख लिए और उनके एव अपनी माताजी जी जो कि दिल्ली पुलिस में दरोगा है के दफ्तर जाने कि प्रतीक्षा करने लगा। और कुछ समय के उपरांत वह अपने अपने दफ्तर के किए रवाना भी हो गए। तदुपरांत मैने भी स्नानादि कर के अपने जूते के फीते कस लिए और बिना कुछ सोचे समझे अपने सरकारी पुलिसया क्वाटर से बाहर की ओर प्रस्थान कर लिया।

आज मुझे शायद कुछ अधिक ही बैचेनी महसूस हो रही थी और बारम्बार ही कुछ दिन पूर्व की अपने अखाड़े के गुरु सी हुई वार्तालाप का सहज ही स्मरण हुए जा रहा था। और उसी बेसुधी में मैं निरन्तर तेज़ कदमो से चले जा रहा था। जैसे कि उस मार्ग को मैं अपने सरकारी पुलिसया क्वाटर से ही तय कर के निकला हुआ हूं। और कुछ ही पलों के उपरांत में नजदीक के बस स्टॉप पर पहुच गया। फिर…

जारी है…
(3)
फिर…कुछ ही क्षणों के उपरांत मैं नज़दीक के बस स्टॉप पर पहुच जाता हूं। वहा बस स्टैंड के ठीक बाई ओर कुछ गज़ की दूरी पर वह पवित्र अखाड़ा था जहाँ में कुछ समय पूर्व तक प्रातः काल 3:35 मिनट पर एक टूटे जाल से होते हुए स्टेडियम में दाखिल हो जाता था। और आज इस समय इस प्रकार से इन अत्यन्त ही अजीबो गरीब हालातों में अपने पूज्य पिताजी के पतलून से 100₹ निकाल कर मंडी जाने के लिए बस का इंतज़ार कर रहा था। यह सब महसूस करते हुए मेरी सांसो में कुछ अजीब सी एक घुटन महसूस हो रही थी। कि तभी एक निजी बस ठीक मेरे सामने तेज़ी से हार्न बजाते हुए बस स्टॉप पर रुक गई। और मैंने बस का नम्बर देखा जो अब तो मुझ को ठीक प्रकार से ज्ञात नही परन्तु उस समय उस बस के नम्बर को देखते ही मैं जान गया था कि हा यह बस मंडी से होते हुए ही मंडी के समीप से ही गुजरेगी। बस फिर क्या था मैं तुरन्त ही एक क्षण भी गवाए सीधा बस के पिछले दरवाजे से होते हुए उस बस पर सवार हो गया। और तुरंत ही उस बस के पिछले दरवाजे से अगले दरवाजे के समीप पहुचते हुए उस बस के अगले दरवाजे के समीप एक ओर को खड़ा हो गया।

अभी मैं कुछ सोच ही रहा था कि तभी उस बस के कंडक्टर ने एक ओर से एक जोरदार आवाज लगा दी कि “टिकट” उस कड़क आवाज को सुनते ही मुझे कुछ वास्तविकता का अभ्यास हुआ और मैं आहिस्ता से चलते हुए उस बस के कंडक्टर के समीप पहुचा और उससे मंडी की टिकट काटने को कहा। कुछ ही देर में वह बस मंडी के समीप पहुचने वाली थी और मैने उस बस के कंडक्टर से अपने बकाया रुपए वसूल करें और अपने कमीज की जेब मे रख लिए। तभी वह बस भी एक जोरदार हार्न बजाते हुए मंडी के मुख्य द्वार के समीप बने बस स्टॉप पर एक झटके के साथ रुक गई। मैं उस बस के रुकने से पूर्व ही चलती बस से मंडी के मुख्य द्वार के सामने उस बस से निचे को कूद गया। बस से नीचे कूदते ही हर बार की तरह ( जितनी बार भी मैं मंडी को आया था ) मेरा ह्रदय एक बार को जोर से धड़क गया और मैने मंडी के ठीक विपरीत दिशा में एक नज़र दौड़ाई जहाँ हमारे कुछ रक्त सम्बंधिक्त नज़दीकी रिश्तेदार रहते है। फिर बिना एक क्षण भी गवाए मैं सीधा मंडी के मुख्य द्वार से होता हुआ मंडी के भीतर प्रवेश कर जाता हूं।

उस समय मुझ को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो वहां (मंडी) हर एक व्यक्ति को यह अच्छे से ज्ञात है कि मैं यहाँ  क्यों आया हु और कहा जा रहा हु अभी मैं अपने इन एहसासों से झूझ ही रहा था कि तभी मेरे पीछे से एक ट्रक की जोरदार हार्न की एक तीव्र ध्वनि सुनाई देती है। उस तीव्र ध्वनि को सुनते ही मुझ को एक बार पुनः यह एहसास हो गया कि मैं कहा खड़ा हूँ और कहा जा रहा हु। अपने मस्तिक्ष में ऐसे ही कई प्रकार के सवालों से जूझते हुए में उस सब्जी मंडी से गुजरते हुए मंडी के दूसरी ओर पहुच जाता हूं जहाँ समीप की झोपड़पट्टी के समीप की एक दीवार को कुछ मनचलों में तोड़ दिया था। उस टूटी दीवार से होते हुए में उस मंडी को पार कर जाता हूं और दूसरी ओर एक खुली सड़क पर आ कर खड़ा हो जाता हूं। आज मुझ को यहाँ सब कुछ अत्यंत ही अलग प्रकार का महसूस हो रहा था। कि तभी कुछ दूरी पर कुछ नौजवान और अधेड़ उम्र के चिलमची और उनके समीप गिलासियो पर सट्टा लगते हुए कुछ अन्य चिलमचियो का एक समूह मुझ को दिखाई दिया। तभी ना जाने क्यों में बिना एक क्षण गवाए उनके समीप पहुच कर खड़ा हो जाता हूं कि तभी…

शेष अगले ब्लॉग से।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
14/07/2019 at 1:55pm

एक सत्य। 4

अब तक आपने जाना कि कैसे वर्ष 2003-04 में एक कच्ची उम्र से गुजरते हुए कैसे एक दिन मेरे तुच्छ से जीवन मे एक महत्वपूर्ण परिवतर्न आया और उस दिन का प्रारम्भ कैसे और किन विचारों के साथ हुआ। एवं किस प्रकार मैं अपने पुलिसिया सरकारी क्वाटर से निकल कर मंडी (एशिया की सबसे बड़ी फल एवं सब्जी मंडी) से गुजरते हुए एक टूटी दीवार से मंडी के पार सड़क के किनारे बैठे कुछ चिलमची और उनके समीप गिलसियो पर सट्टा लगाते कुछ अन्य चिलमचियो के समीप जा कर खड़ा हो गया और तभी..

अब आगे।

और तभी एक ओर से एक आवाज़ आई कि सट्टा लगाना है क्या? यह सुनते ही मैं उनसे दूर चला जाता हूं कि एक चिलमची मेरे पीछे पीछे कुछ कदम आते हुए मुझ को रुकने को कहता है और पूछता है कि पुड़िया चाहिए क्या? उसके मुंह से यह सुनते ही मैने उस को ऊपर से नीचे तक एक पुलिसिया अंदाज़ में घूरा और उससे कहा कि कितने की है। मेरे मुंह से यह सुनते ही उसके चेहरे पर एक हर्ष की लहर दौड़ गई और वह बोला पहले एक कश लगाऊ फिर देखना और हम वही रेल की पटरी पर बैठ कर कश लगाते है और पहले ही कश में मुझ को ज्ञात हो गया कि भाई यह तो कोई बबाल लिए हुए है। और मैंने उससे तीन पुड़िया नशा  ले लिया और वापसी के लिए उसी टूटी दीवार से होते हुए मंडी (एशिया की सबसे बड़ी फल सब्जी की मंडी) के भीतर प्रवेश कर जाता हूं और हर बढ़ते कदम से मेरी दृष्टि के सामने के नजारे और स्वर तेज़ और तेज़ और मेरा नशा तीव्र और तीव्र होता गया। उसके बाद का मुझ को ठीक ठीक कुछ स्मरण नही की उस भृमित अवस्था से किस प्रकार मैं अपने सरकरी पुलिसिया क्वाटर पर वापस पहुच पाया। लेकिन इतना अवश्य स्मरण है कि अपने उस पुलिसिया क्वाटर पर पहुच कर मैंने उस भृमित अवस्था मे सूखते कंठ से व्याकुल होते हुए दरवाजे पर एक जोरदार लात जमाई थी।

कुछ  क्षणों के उपरांत मुझ को ज्ञात हुआ कि मै तो ताला लगा कर गया था और अपनी जेब से चाबी निकाल कर मैं ताला खोल देता हूं और पुलिसिया क्वाटर के भीतर प्रवेश कर जाता हूं। अपने क्वाटर के भीतर प्रवेश करते ही मैं दरवाजे की साकल मूंद कर एक ठंडी बोतल फ्रिज से निकल कर एक ही घुट में आधी खाली कर देता हूं। अब मुझ को कुछ कुछ होश और उखड़ी सांसो पर कुछ काबू प्राप्त होता है। और मैं विचार करता हु अपनी बीती हुई रात्रि ( last night) के बारे में कि मैने क्या कुछ बबाल मचाया था। जो कि अत्यंत ही भयानक था इस बारे में भी आपको बताऊंगा मगर अभी नही उचित समय पर आगामी ब्लॉग्स में किसी एक के द्वारा। यह सब सोचते हुए मैं अपनी जेब से पुड़िया की एक सिगरेट निकाल कर अपने चौथी मंजिल के उस पुलिसिया क्वाटर की एक खिड़की के समीप खड़े हो कर बाहर का नज़ारा लेता हूं और एक झटके के साथ उस पुड़िया की सिगरेट को ज्वलित कर अत्यंत ही जोर से कश लगा देता हूं। कि ठीक उसी समय क्वाटर की डोर बेल बज उठती है। और मैं सोच में पड़ जाता हूं कि इस समय कौन आया होगा। यह सोचते हुए मै एक से दो कश और लगा देता हूं कि तभी एक बार पुनः डोर बेल बज उठती है। और मैं आहिस्ता आहिस्ता से दरवाजे के समीप पहुच कर दरवाज़े की तीसरी आंख से बहार को झांकता हु पर पुड़िया के कश से अब मुझ को पुनः भृम सा होने लगा था। मुझ को बाहर कुछ ठीक से नज़र नही आता और मै दरवाज़ा खोल देता हूं।

शेष अगले क्रम से…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

💥 एक सत्य। 5 (पांचवा ब्लॉग) एक सत्य अनुभव।

अब आगे…

  और मैं दरवाजा खोल देता हूँ। उस समय पुड़िया के सरूर में मुझ को ठीक से कुछ समझ में नही आ रहा था। हा फिर भी इतना अवश्य याद है कि शायद मैं दरवाज़ा खोल कर वापस उसी खिड़की के समीप आ कर खड़ा हो जाता हूं और अब भी वहा मौजूद उस पुड़िया की सुलगती सिगरेट को बुझा कर बाहर फेंक देता हूं। हा याद है उसके बाद मेरे समीप मेरे पापा के दो मित्र, जिन्हें मैं अच्छे से जानता था आ कर खड़े हो जाते है। और कुछ मुस्कुराते हुए मुझ से पूछते है कि यहाँ तो अज़ीब सा धुंआ है। इसके उत्तर में मैं भी मुस्कुरा कर उनसे सहमत हो जाता हूं।

ठीक उसी समय यह मुझ से कहते है कि आज पार्टी है विश्कि (मदरिया) पीएंगे। उनके मुंह से यह सुनते ही मेरा माथा कुछ ठनक जाता है और एक अजीब सी बैचेनी होने लगती है। पता नही क्यों? शायद मुझ को उनसे ऐसी किसी बात की कोई उम्मीद ना थी इसीलिए। फिर एक ख्याल आता है कि कहि कुछ तो गड़बड़ है पर उस समय तनिक भर भी एहसास नही हो सका कि आखिर क्या गड़बड़ हो सकती है। फिर भी अपनी उस बेचैनी को रोकते हुए मैं उनसे कहता हूं कि अंकल क्या मैं अपने पापा से बात कर लूं क्यों कि क्वाटर पर मेरे सिवाय कोई भी परिवार का सदस्य उस समय वहाँ मौजूद नही है। मेरे मुंह से इतना सुनते ही वह तुरंत पापा को मोबाइल से कॉल कर देते है और मेरे पापा भी अपनी सहमति दे देते है कि ठीक है पार्टी कर लो। उसके बाद वह मुझ को शायद जूते दिखाते हुए पूछते है कि यह किसके है उनके पास अपने नए जूते देख कर मेरा सरूर कुछ हलका हो जाता है। और मुझ को स्मरण होता है कि शायद मैं पुड़िया के सरूर में मंडी (एशिया की सबसे बड़ी फल एवं सब्जी मंडी) से सीधे अपने पुलिसिया क्वाटर पर आने की बजाए अपने रक्त सम्बंधित रिश्तेदार (ताऊ जी) के घर चला गया था और वहाँ अपने नए जूते छोड़ कर एक फ़टे पुराने चिथड़े के समान जूतों को पहन कर पुड़िया के सरूर में पुलिसिया क्वाटर पर आया था। अभी मैं यह सब कुछ सोच ही रहा था कि तभी उनमे से एक अंकल कहते है कि यह अपने जूते पहन लो फिर पार्टी करते है। परन्तु मैं उनसे कहता हूं कि यह मेरे जूते नही है यह फ़टे चिथड़े वाले जूते ही मेरे है और अब चलते है पार्टी करने को, पापा ने भी इजाज़त प्रदान कर दी है। और मैं अपने उस पुलिसिया क्वाटर को लॉक लगा देता हूं। उसके उपरांत हम तीनों उस पुलिसिया क्वाटर से बाहर को निकल जाते है और लगभग 100 मीटर की दूरी पर अंकल स्कूटर को रोक देते है और एक और अंकल ( जिन्हें मैं मौसा जी कहता हूं)जो वही उस पुलिस कालोनी में रहते थे वह भी स्कूटर पर बैठ जाते है और पहले वाले अंकल स्कूटर को स्टार्ट कर गेयर लगा देते है। यह सब कुछ मुझ को अत्यंत ही अजीब सा लग रहा था परन्तु मैं खामोशी से लगभग स्कूटर की स्टेपनी के ऊपर को हो कर बैठा रहता हूं। उस समय मुझ को तनिक भर भी इस बात का एहसास नही था कि जिस पुलिस कालोनी से मेरी ढाई से तीन वर्ष की (2.5 से 3 वर्ष) बहुत सी खट्टी और मीठी यादे जुड़ी है उसको उस समय मैं अंतिम बार देख रहा हु। और जो अंकल हमें पार्टी करने के लिए ले जा रहे थे वह हमे अपने उस स्कूटर पर बैठा कर उस पुलिस कालोनी से तेज़ी से बाहर की ओर निकल जाते है।

कुछ ही समय के उपरांत हम हाइवे की रेड लाइट को पार कर बुराड़ी रोड पर आ जाते है। और मैं उसी अवस्था मे लगभग स्कूटर की आधी स्टेपनी पर किसी तरह से बैठा हुआ सोच रहा था कि यहाँ तो हमारा प्लाट है ( जिस पर हम मकान बना कर वर्तमान समय में निवास कर रहे है) शायद वही खाली प्लाट पर पार्टी है आज। परन्तु जब उनका स्कूटर तेज़ी से प्लाट के मोड़ को पीछे छोड़ते हुए आगे को निकल जाता है तब मैं सोचता हूं कि आज क्या बात है और यह किस बात की पार्टी है जिसकी इजाजत पापा ने भी प्रदान कर दी है। उस अज़ीब सी अवस्था मे उस तेज़ी से चलते हुए स्कूटर पर हम चार व्यक्ति और मैं सबसे पीछे को लगभग स्टेपनी पर बैठा हुआ यही सोच विचार कर रहा था कि तभी स्कूटर एकदम से एक खाली सुनसान सड़क के एक ओर को रोक जाता है।

शेष अगले क्रम से।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
28/08/2019 at <img src=”https://vikrantrajliwal.files.wordpress.com/2019/08/1567006942685.png” alt=”1567006942685″ width=”1080″ height=”1453″ class=”alignnone size-full wp-image-5045″/>

अब आगे…

स्कूटर के एक सुनसान सड़क पर, एक तरफ खाली स्थान पर रुकते ही, हम एक, एक कर के सभी जन स्कूटर से उतर कर सड़क के किनारे खड़े हो जाते है। तदोपरांत प्रथम अंकल एक्स, (काल्पनिक नाम) लगभग 50 मीटर की दूरी पर स्थित, एक ऑफिस को देखते हुए कहते है कि वह रहा ऑफिस, आओ वही चलते है। उनके इतना कहते ही मुझे विशवास हो गया कि उस ऑफिस में ही आज पार्टी है और वहाँ पहले से ही दौर ए शराब के जाम की महफ़िल सजी हुई होगी। यह विचार करते ही मैं अत्यंत ही उत्साह से उनके साथ उस ऑफिस की ओर चल देता हूं। परन्तु वहाँ पहुँच कर मेरा माथा कुछ ठनक जाता है। वहाँ एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति सुकेश शोन्थि (काल्पनिक नाम) कुर्सी पर बैठे हुए थे।  हमे देखते ही वह मुस्कुराते हुए हमारा स्वागत करते है। और उसके आस पास कुछ सभ्य से दिखाई देते हए अन्य व्यक्ति भी खड़े थे। हम ऑफिस में प्रवेश करते हुए उनके सामने की कुर्सी पर विराजमान हो जाते है। हमारे कुर्सी पर बैठते ही वह अधेड़ उम्र के व्यक्ति मुस्कुराते हुए मुझ से पूछते है कि क्या मुझ को जानते हो? मुझे यह सब कुछ अत्यंत ही अज़ीब से महसूस हो रहा था। अपनी उस बेचैनी पर किसी प्रकार नियन्त्रण करते हुए मैं उनसे अत्यन्त ही सहज भाव से कहता हूं कि नही! मैं आपको नही जानता। तब वह मुझ से पूछते है कि सिगरेट या शराब पीते हो। उनके इस प्रकार के वार्तालाप से मेरी छुपी हुई बेचैनी कुछ कुछ प्रकट होने लगी। उस समय मैं यह नही समझ पा रहा था कि वह मुझ से ऐसा प्रश्न क्यों पूछ रहे है। जब हम यहाँ पार्टी करने आए है तो जाहिर है कि शराब पिएंगे ही, फिर वह ऐसा अज़ीब व्यवहार क्यों कर रहे है। इन सभी विचारो से झुझते हुए तब मैं उनसे कहता हु की हा पिता हु। मंगवा लीजिए। मेरे इतना कहते ही अंकल एक्स कुर्सी से खड़े हो जाते है एवं उनके साथ ही अंकल वाई (मौसा जी) और मैं भी अपनी अपनी कुर्सी से खड़े होते हुए ऑफिस से बाहर निकल जाते है। फिर जहा अंकल एक्स ने अपना स्कूटर खड़ा किया था ठीक वही आकर एक बन्द दरवाजे के समीप खड़े हो जाते है। तब अंकल एकस मुझ से कहते है कि विक्की (मेरा पेट नाम) आओ अंदर चलते है। उनके इतना कहते ही मुझ को ऐसा लग की हा अब पार्टी शुरू होने वाली है। और मैं उनके पीछे जैसे ही मुड़ा तभी अंकल वाई (मौसा जी) ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बहुत ही आत्मविश्वास के साथ जोर देते हुए, मुझ से कहा कि विक्की अंदर मत जाइओ। यही मेरे पास खड़ा रहे। अंकल वाई (मौसा जी) जो कि दिल्ली पुलिस विभाग में कार्य करते है। उनके इस प्रकार के अज़ीब व्यवहार से मुझ को अत्यंत ही हैरानी हुई। उस समय मुझ को किंचित मात्र भी एहसास नही हो सका कि वह मुझ से ऐसा क्यों कह रहे है। तभी अंकल एक्स एक आवाज़ लगाते हुए कहते है कि विक्की आ जा। और मैं अंकल वाई (मौसा जी) से कहता हूं कि कुछ नही होगा आ जाओ अंदर ही पार्टी है। इतना कहते हुए मैं अंकल एक्स के साथ उस बन्द दरवाजे से होते हुए अंदर घुस जाता हूं।

उस समय मुझ को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उस बन्द दरवाजे के पीछे अवश्य ही शराब और नशे का कोई रंगारंग कार्यक्रम चल रहा होगा या ऐसा ही कोई रंग रंगीला कार्यक्रम आज अवश्य ही होने को है। तभी तो ऐसे सुनसान एवं ख़ुफ़िया स्थान पर हम पार्टी करने के लिए आज इस प्रकार से स्कूटर पर बैठ कर आए है। मैं तो लगभग स्टेपनी पर बैठ कर वहा पहुचा था। परन्तु जैसे ही मैं उस बन्द दरवाजे से होते हुए भीतर  प्रवेश करता हु, तो मेरे होश ओ हवास उड़ जाते है। उस बन्द दरवाजे के अंदर प्रवेश करते ही मेरी नज़रो के सामने मेरी हम उम्र नोजवान लड़को एवं कुछ मुश्तण्डो की तरह दिखाई देने वाले जवान लड़को कि एक पूरी फ़ौज थी। उन्हें देख कर प्रथम विचार मुझ यही आया था कि यह जरूर कोई बच्चा जेल है। और आज यही पार्टी करने के लिए हम आए है। इस एक एहसास के साथ अंकल एक्स के पीछे पीछे मैं उस बन्द दरवाजे से होते हुए समीप के एक कमरे में प्रवेश कर जाता हु। जहाँ एक बिस्तर और कुछ अन्य छूट पुट सा साज समान मौजूद था। उस कमरे मैं प्रवेश करते ही मुझ को ऐसा लगा कि हा यही वह स्थान है जहाँ पार्टी होगी। अंकल एक्स और मैं उस कमरे में मौजूद बैठने लायक एकमात्र स्थान उस बिस्तर पर बैठ जाते है। तब अंकल एक्स कहते है कि अपने जूते उतार कर आराम से बैठ जाओ, मैं अभी आता हूं। उनके इतना कहते ही मुझ को ऐसा एहसास हुआ कि जरूर वह अंकल वाई (मौसा जी) को बुलाने के साथ ही पार्टी कि व्यवस्था करने के लिए गए है। उनके जाने के उपरांत, मैं लगभव पांच मिनट तक, वैसे ही बैठा रहा तदोपरांत मैं अपनी जुराबें उतार कर एक बीड़ी सुलगाते हुए, उस बिस्तर पर बहुत ही इत्मीनान से लेट जाता हूं। उसी समय एक कमजोर शरीर का एक व्यक्ति अत्यंत ही साधारण से कपड़ो में उस कमरे के भीतर प्रवेश करता है। वह मुझ को देख कर ना जाने क्यों मुस्कुरा रहा था। मैं उससे कुछ कहता उससे पूर्व ही वह उस कमरे में पोचा लगाना प्रारम्भ कर देता है। तब मैं उसी प्रकार से लेटे हुए उससे कहता हूं कि जिन अंकल एक्स के साथ मैं अंदर आया था वह कहा है? मेरे इतना कहते ही वह बिना एक क्षण भी गवाए मुस्कुराते हुए कहता है कि वह तो गए!

उस समय उसके कहने का क्या मतलब था! वह मेरी समझ मे नही आ रहा था। लगभग पांच से दस मिनट या कुछ समय तक मैं तन्हा उस कमरे के भीतर लेता हुआ, उस व्यक्ति के द्वारा कह गए उन शब्दों को समझने का प्रयास करता रहा कि वह तो गए। अचानक से एक झटके के साथ उस कमरे के भीतर मेरे पिता की उम्र का एक पहलवान के जेसा दिखाई देने वाला, बाड़ी बिल्डर व्यक्ति और उसके साथ कुछ अन्य हट्टे कट्टे युवा प्रवेश करते है। उन्हें इस प्रकार से उस कमरे के भीतर प्रवेश करते देख, मुझे कुछ हैरानी हुई। परंतु मैं उसी प्रकार से लेटा रहा। वह सभी व्यक्ति मेरे समीप ही आ कर खड़े हो जाते है तब मैं उठ कर बैठ जाता हूं एवं उनसे कहता हूं कि अंकल एक्स कहा है? तब वह भी उस प्रथम व्यक्ति के समान ही मुझ से कहते है कि वह तो गए। उनके इतना कहते ही मैं अपनी जुराबें पहनना प्रारम्भ कर देता हूं। वह मुझ से कुछ कह रहे थे परन्तु उनकी उस बात को सुनकर कि वह तो गए। मेरा रोम रोम जलते हुए अंगार के समान जलने लगा था। और मुझे उनके किसी भी शब्द को सुनने में अब कोई भी दिलचसबी नही थी। अपनी जुराबें पहनने के उपरांत अब में अपने जूते पहन कर खड़ा हो जाता हूं। अब हम सब एक दूसरे के आमने सामने अड़ कर खड़े थे। उस समय मेरा रोम रोम क्रोध से ज्वलित था और वह सब अब भी मेरी ओर देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। मुझ को यह सब कुछ अत्यंत ही अज़ीब सा प्रतीत ही रहा था। इसी अजीबो गरीब मनोस्थिति के साथ मैं उनसे कहता हूं कि मुझ को बाहर जाना है। तभी एक हटा कट्टा मुस्टंडा युवक उस कमरे का पर्दा हटा कर अंदर देखते हुए मुझ को घूरता है। तभी मुझ को वह दृश्य जो मैने उस बन्द दरवाज़े के भीतर प्रवेश करते हुए देखा था एक बार पुनः दिखाई देता है कि यहाँ ऐसे बहुत से मुस्टंडे मौजूद गए।

अकस्मात ही मुझ को एहसास होता है कि मैं बहुत ही बुरी तरह यहाँ फंस गया हूं। कुछ देर तक उस बाड़ी बिल्डर अंकल की उम्र के उस व्यक्ति को क्रोध से घूरने के उपरांत में उनके बाजू से उस कमरे के बाहर निलने का प्रयास करता हु। तब वह उसी प्रकार से मुस्कुराते हुए कहते है कि अब आप बाहर नही जा सकते हो। वह सब अब भी निरन्तर मुस्कुरा रहे थे जिससे मैं अब कुछ सहज महसूस कर रहा था। परन्तु अपनी उस सहजता को छुपाते हुए मैं उसी प्रकार से बाहर जाने के लिए कहता हूं। फिर वह बिना एक क्षण भी गवाए अपने समीप खड़े एक मुस्टंडे की तरह दिखाई देने वाले मेरे हम उम्र नवयुवक से वह कहते है कि सर्चिंग लो। उनके ऐसा कहते ही वह सर्चिंग के लिए आगे बढ़ता है परन्तु मैं उसको एक ओर को हटा कर कहता हूं कि मेरे पास कुछ भी नही है। तब वह बाड़ी बिल्डर की तरह दिखाई देने वाले महोदय स्वयँ सर्चिंग प्रारम्भ कर देते है। सर्वप्रथम वह कमीज की जेब तलाशते है परंतु उन्हें वहा कुछ भी प्राप्त नही होता। तब मैं उन्हें कहता हूं कि मैने कहा था ना कि मेरे पास कुछ नही है। तब वह मेरी पेंट की जेब तलाशी करते है अचानक ही उनके चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ जाती है और उन्हें एक पुड़िया प्राप्त हो जाती है। तब मैं उनसे कहता हूं अब आपको पुड़िया मिल गई ना। अब मुझ को बाहर जाने दीजिए। परन्तु वह अपनी सर्चिंग जारी रखते हुए एक और पुड़िया की प्राप्ति करते हुए पुनः मुस्कुराते है। तब मैं उनसे कहता हूं कि बस यही पुड़िया थी अब और नही है। अब मुझ को बाहर जाने दीजिए। परन्तु वह उसी प्रकार से अपनी सर्चिंग जारी रखते हुए तीसरी और अंतिम पुड़िया भी प्राप्त कर लेते है। मैं एक बार और उनसे कहता हूं कि अब यह आखरी पुड़िया थी और यह सब मेरी पुड़िया नही है। किसी ने मुझ को रखने के लिए पकड़ाई थी। कुछ क्षण और सर्चिंग के उपरांत उन्हें अब यकीन हो जाता है कि मैं सत्य कह रहा था। तब वह मुझ से कहते है कि अब तुम्हें यहीं रहना है। यह सुनते ही मैं भी उनकी ओर मुस्कुराते हुए स्वयँ पर एक नियन्त्रण रखते हुए कहता हूं कि ऐसा कैसे हो सकता है! मुझ को तो अभी जाना है। तब वह महोदय अत्यंत ही सहज भाव से कहते है कि यह नशा मुक्ति केंद्र है। एवं अब आपको यही रहना होगा। उनके मुंह से यह सुनते ही मेरे रग रग में एक बार पुनः क्रोध की अग्नि ज्वलित हो उठती है। परंतु उस स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए, मैं एक मौन धारण कर लेता हूं।

तब वह एक युवक शाक़िर (काल्पनिक नाम) को कहते है कि इनका फैमली के साथ इंट्रोडक्शन (पहचान) करवा आओ। उस समय मुझ को ऐसा लगा कि मेरे माता जी और पिता जी यहाँ मौजूद है एवं मुझ को यहाँ रखने से पूर्व एक बार उनसे मेरा वार्तालाव करवाने के लिए ले जा रहे है। यदि ऐसा हुआ तो मैं आज और अभी यहाँ से बाहर निकल जाऊंगा क्यों कि यह अभी मुझे जानते नही है कि मैं कितना खूंखार एवं मेनोप्लेटिड हो सकता हु। मैं अभी यह सब कुछ विचार कर ही रहा था कि तभी शाक़िर मेरे समीप आ कर मुझ से कहता है कि आओ फैमली से इंट्रोडक्शन कर लेते है। वहाँ पहुच कर आप क्या कहोंगें? कुछ क्षण की ख़ामोशी के उपरांत वह मुझ को पुनः समझाते हुए कहता है कि तुम्हारा क्या नाम है? मैं जी विक्की। तब वह कहता है कि ऐसे मत बोलना, कहना मेरा नाम है नशेबाज विक्की। उसके मुँह से यह सुनते ही मुझ को ऐसा लग की वह मेरा मजाक बनाने को कोशिश कर रहा है। फिर मैं उसके पीछे पीछे समीप के एक बन्द पर्दे के पीछे मौजूद हॉल में प्रवेश कर जाता हूं।

शेष अगले ब्लॉग से…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

21 अक्टूबर 2019 समय दोपहर 2:28 बजे।

Author, Writer and Poet Vikrant Rajliwal.

नमस्कार मित्रों, आज से चार वर्ष पूर्व अपनी जिस अधूरी कहानी एक अत्यधिक दिलचसब नाटक के एहसासों को लिखने का प्रयास किया था! अब अपने अंतिम चरण; यानी कि लगभग अपनी 50% फाइनल एडिटिंग का कार्य सम्पन्न कर चुका हूं।

शीघ्र ही मेरी वह प्रथम अत्यधिक विस्तृत दर्दभरी कहानी एक पुस्तक के रूप में आपके विश्वसनीय हाथों के सपुर्द्ध कर दी जाएगी।

विक्रांत राजलीवाल।

Hello friends, four years ago, I had tried to write my first incomplete story of this very interesting drama. Now its last stage; That is, almost 50% of final editing has been completed.

Soon my first very detailed story , very sensitive drama will be made in the form of a book with your trusted hands.

Vikrant Rajliwal.

work on my upcoming novel+drana story

👸 पहली नज़र। (दर्दभरी नज़म दास्ताँ।) With YouTube Video Link.

🌹 पहली नज़र।

दिखलाती है ज़िन्दगी, हर कदम पर, करीब से अपना रंग।

बतलाती है खून ए ज़िगर कि वो अधूरी दास्ताँ, हर रंग से अपने।।

दे देती है, दर्द कोई बिछुड़ा फिर से, आता है बदल कर रूप सामने, फिर से वो दर्द।।।

दहलीज है बिछुड़ती जवानी की, आगाज है बेदर्द बुढ़ापे का।

समा है ऐतबार से, महफ़िल है फिर से आबाद, जो एक दीवाने की।।

हो गया एक रोज़, दीदार ए यार, धड़कने ये खो गई।

लौट आईं मोहब्ब्त दिल में खोई आरज़ू कोई जाग गई।।

किया है मज़ाक, ज़िन्दगी ने, ज़िन्दगी में दिन ये कौन सा आया।

दहलीज़ है बुढ़ापे की, बिछुड़े यार से, ये सितम, जिस पर मिलाया।।

एक रोज, एक दम से दीदार ये किस का हुआ।

देखते ही जान गया ये दिल, हा इसी से तो प्यार हुआ।।

एक ज़माने के बाद, ये किस ने नज़रो से नज़रो को मिलाया।

करीब दिल के आकर मेरे, ठहरी ज़िन्दगी से बेजान दिल को धड़काया।।

सितम इस दिल पर हो रहा, तोड़ कर बिजलिया, धड़कनो पर, बेदर्द सावन भी रो रहा।।।

इंतेहा दर्द ए दिल, मोहब्ब्त जो अब हो गई, ज़माने की है
रुसवाई।

बरस रहे आँख से आँसू, बात है दिल कि दिल को जो दिल ने बतलाई।।

आई है बन कर, सावन की बहार, बे-मौसम ज़िन्दगी मेरी जो बंजर बियाबान।

मुस्कुराहट है लबो पर गुलाबी उसके, जाग गए देख कर,
करीब से दिल के सब अरमान।।

दर्द है जुदाई का, जख़्म उसके भी जख्मी सिने में।

कहना चाहती है वो भी कुछ, सुनना चाहता हु में भी कुछ।।

कर रहे दीदार दोनों, बिछुड़े जो एक ज़माने से।

सदियों से खमोश लब, बेड़िया अब भी ज़माने से।।

लकीर है मिटने लगी, वक़्त की यू ही आज जो अचानक से।

याद है उल्फ़त के अब भी वो दिन, बढ़ने लगी धड़कने ज़िन्दगी की जब अचानक से।।

बदला-मौसम, समा बदला, बदल गए सब नज़ारे।

आ जाती है याद ज़िन्दगी, तमाम अधूरी वो बहारे।।

नादां उम्र से नादां धड़कने, नादां थे वो अफ़साने।

हो गए ज़माने से जो, नादां थे वो फ़साने।।

याद है…

याद है अब भी, सावन कि वो बात।

नीरस थी जब ज़िन्दगी, पूरे चाँद की वो रात।।

बेजान मौसम में, एक रोज जान आ गई।

सुन-सान गली महोले कि धड़कने जाग गई।।

तन्हा थे लम्हे, अजीब से जो खामोश, उनसे जो एक अहसास हुआ।

देख कर खुशनुमा मौसम, फिर मुझ को जो विशवास हुआ।।

चारो ओर एक खामोशी सी छा गई।

माहौलें (पड़ोस) में मेरे रहने को एक हूर आ गई।।

एक इत्तफाक किसमत ने मेरे साथ किया।

घर के सामने मेरे, उसने एक घर लिया।।

देख कर उस को, ये दिल धड़क गया।

जाने को करीब उसके, ये मन मचल गया।।

देख कर नज़ारा ए हुस्न, मौसम भी मदहोश हो गया।

हर अदा थी कातिल उसकी, दिल ए दीवाना कही खो गया।।

गिरती थी हुस्न ए शबाब से उसके बेबस इस दिल पर बिजलिया तब।

चलती थी इठला कर जब, भूल जाता था ये दिल भी धड़कना तब।।

कतार घर के सामने, मनचलो की उस के लगने लगी।

करने को दिदार ए हुस्न, जंग उन-में कोई खूनी मचने लगी।।

देख कर नज़ारा, ये बर्बादी का अपनी, मन मेरा कूछ परेशान हुआ।

करता हूं मोहब्ब्त मैं भी उस-से, जान कर हाल ए दिल ये दिल हैरान हुआ।।

करता हूँ दिदार ए हुस्न, नज़रे बचा कर खिड़की से रोज़ अपनी।

जीता हूँ, मरता हूँ, तन्हा, घुट-घुट कर किसमत से रोज़ अपनी।।

नही आती है नींद बेदर्द रातो से दर्द ये आज-कल।

सताती है याद ए दिलरुबा, सितम ये हर-पल।।

दीवाना ए हुस्न ये जहां सारा लगता है उसका।

हर कोई है जलने को आतुर, परवाना ए हुस्न ये जहां सारा लगता है उसका।।

सुर्ख गुलाबी लबो पर निकलती है लगा कर लाली वो जब।

लग जाती है दीवाने उन मनचलो में उसके कोई होड़ तब।।

एक शोर सा मच जाता है भरे बाजार में तब।

छुरिया चल जाती है कत्ल हो जाता है भरे बाजार में तब।।

देख कर नज़ारा ए हुस्न वो मदमस्त उसका, वख्त भी ठहर जाता है।

एक दिदार ए सनम के खातिर, हर कोई इस जहां में मचल जाता है।।

देख लेती है, उठा कर जब भी, मदहोश निगाहें वो अपनी, बेबस है दिल ए दीवाना धड़क से धड़क जो जाता है।

मोहब्ब्त जताने को सनम से अपने ए पाबंदियों वो बेहिंतिया तड़प जाता है।।

न जाने क्यों एक रोज मोहब्ब्त ने रंग अपना दिखलाया।

हुस्न को है इश्क से काम, नाम ए मोहब्ब्त जो दीवाने को बुलाया।।

देख कर नज़दीक से बदन वो क़ातिलाना-हुस्न उसका,
बुरा हाल था।

शराबी निगाहों से वॉर, वो मनमोहक उसके शारीरिक उभार, जीना अब मेरा दुशवार था।।

धधक रहे थे अंगार नाजुक वो गुलाबी लब उसके।

झुलस रहा था दीवाना, तपिश जो गुलाबी-लबो से हर लम्हा उसके।।

एक रोज नज़रे-चार, अनजाने ही, जो उनसे हो गई।

कर के नज़दीक से दिदार ए हुस्न, धड़कने ए दिवाना जो खो गई।।

वो आए करीब, इस दिल के, वो एक नशा था।

देखा नशीली निगाहों से उसने, उनमे एक नशा था।।

कर रही थी दिदार ए यार जो नज़रे नज़दीक से।

उठा था दर्द ए धड़कन, देखा जो उनको नज़दीक से।।

अक्सर होती है, मुलाकाते उनसे, मुस्कुरा कर आता है हुस्न ए यार वो करीब।

जगा कर आरज़ू, खोई कोई तमन्ना, खो जाता है कसम, फिर वो नसीब।।

अरमान दिल के अब जाग गए, एक ही पल में दीवाना जो जहां सारा पा गए।

खिल उठे महोबत के गुल, गुलिस्तां ए मोहब्ब्त जो रेगिस्तान से दिवाना पा गए।।

मुस्कुराता है देख कर, हर अदा से अल्हड़ वो हुस्न जब।

करता है वॉर, जख़्मी अरमान, बेबस इस दिल पर जब।।

भूल जाता है धड़कना, ठहर जाती है धड़कने ए दिल वही पर जब।

बेजान सी है जो धड़कने, धड़कना चाहती है वो जब।।

लव है खामोश से एक थरकन सी जो उनमे आई, चाहते है कुछ कहना शायद हम दोनों ही जब।

आलम है बेबसी भरा अहसास ए दिल, खामोशी जो साथ अपने लिए, रह जाते है खमोश से हम दोनों ही जब।।

आती है दिल-रुबा वो, होते है दीदार ए यार, बरसते है तीर ए हुस्न, शराबी निगाहों से अब अक्सर।

धड़कता-दिल, धड़काते है हुस्न ए यार, और भी खामोशी से बेदर्दी अब अक्सर।।

होता है इज़हार ए मोहब्ब्त नज़रो से जो दीवाना, वक़्त बे वक़्त जो उनसे सितम अब अक्सर।

करते है गुफ्त-गु, साए में नज़दीक से मोहब्ब्त, एहसास जो उनके अब अक्सर।।

आलम ए बेबसी, वो इज़हार ए मोहब्ब्त, तरसता है सुनने को दीवाना जो अक्सर।

यकीन ए मोहब्ब्त वो ख़्याल ए तन्हाई, सिहर जाता है ख़ौफ़ से दीवाना जो अक्सर।।

दीदार ए यार ये समा ए ऐतबार मिलता है तन्हाई में नसीब से अब अक्सर।

तीर ए मोहब्ब्त ये जख्म ए दिल, लगते है रुसवाई से सरेराह, अब अक्सर।।

नही मालूम है गहराई, सितमगर ए सनम, काफ़िर उस हसीना के दिल ओ धड़कनो की क्या है दीवाना।

धड़कते-दिल तड़पती धड़कनो को सकूँ एक लम्हा भी वो लेने नही देती, दर्द ए दिल ये दर्द है धड़कनों पर दीवाना ।।

जो है मोहब्ब्त दीवाने से उस को, नाम ए मोहब्ब्त बन्द लबो से ग़ुलाबी वो अपने क्यों बोल नही देती।

जख़्म है दिल के हर जख्मो पर वो मरहम, मोहब्ब्त से अपने, धड़कनो को दिल के सकूँ क्यों नही देती।।

महक जाता है समा, बदलता है रंग, शर्म ओ हया से चेहरे का जो उसके गुलाबी।

पुकारता है दर्द ए दिल, नाम ए मोहब्ब्त वो नाम उसका, देखा जब भी मदहोश निगाहों में जो उसकी शराबी।।

धड़कती जवां धड़कने, उफान एक उनमे आ गया।

यकीन ए दीवाना, सनम के अब वो करीब आ गया।।

किया मज़ाक, ए वख्त जो हाल ए दिल, एक रोज़, धड़कनो से सनम को जब सुनाया।

समझा सनम ने दिल-लगी, ए मुकदर दिल-चिर दीवाने ने
फिर अपना दिखलाया।।

बदला रूप फिज़ाओ ने हालात जो खिलाफ हो गए।

पहले झुके पहलो में वो, फिर लिप्ट के रो दिए।।

किया इजहार ए दोस्ती, मोहब्ब्त का उसमे कोई नाम नही।

मोहब्ब्त तो है ए दोस्त मग़र, मक्कारी कोई उनमे नही।।

बन कर दोस्त, आती है दिलरुबा, जब भी कोई नज़दीक,
नज़रो के सामने।

एक आरज़ू,वो लव्ज़ ए महोबत दब जाते है दिखती है जब भी वो नज़रो के सामने।।

रहता है इंतज़ार, एक एहसास वो पल है मोहब्ब्त, जिस पल उसे भी हो जायगी।

तड़पेगा-दिल एक रोज़ ए मोहब्ब्त उस सितमगर का, जिस पल मोहब्ब्त उसे भी दीवाने से अपने हो जायगी।।

इंतज़ार ए हुस्न से हुस्न ए दीवाने कई मनचलों का हाल बेहाल होते देखा।

दीदार ए हुस्न से बांधे टक-टकी, नज़रो में अपनी, अंजाम कइयो का बुरा देखा।।

चीर दी है सरे-राह कइयों ने फड़कती नसें, शरीर की अपने, हुस्न ए शबाब के वास्ते।

फोड़ दिए है सरे-राह, कइयो ने बेमतलब सर अपने, आपसी तकरार के वास्ते।।

हाल ए दिल दीवाने का भी, बेहाल नज़र आता है।

देख कर दीवाने ए सनम, मनचले वो चौखट पर उसकी दिल तड़प जाता है।।

मौसम है वीरान बिन दीदार ए सनम, ये कैसी वीरानी।

हालात है खिलाफ, ये दर्द ए मोहब्ब्त ये कैसी ज़िन्दगानी।।

ज़िन्दगी है उजाड़ मेरी किस तन्हाई में खो गई जो।

सनम है सितमगर मेरे, क्या किसी गैर की हो गई वो।।

जख्म ये गहरा, टूटे दिल पर, एक रोज, बेहूदा कैसा पड़ गया।

देखा जो सनम को अपने, न जाने क्यों ये दिल तड़प गया।।

आ रहे थे सनम कहि से शायद कहि पर वो जा रहे थे।

आईना ए महोबत, वो अक्स नज़रो में, किसी गैर का, मोहब्ब्त एक दूसरे से दोनों फरमा रहे थे।।

गुजर गए न जाने मौसम कितने, कितने ज़माने बीत गए।

तड़प ए दिल, तन्हाइयों से दीवाना, जख्म न जाने टूटे दिल
पर कितने पड़ गए।।

तड़प टूटे-दिल की टूटी धड़कनो से जो अब बर्दाश नही होती।

सताता है ख़्याल ए सनम, बिन सनम दर्द ये ज़िन्दगी, आवाज़ दिल के वीराने से कोई अब नही होती।।

बदमिजाज जो मौसम, एक रोज सरेराह हो गया।

अहसास ए ज़माना, हर कोई यहाँ खो गया।।

वक़्त की लकीर पर एक हादसा जो अब हो गया।

आशिक एक दीवाना जो सनम का, सनम को कहि ले गया।।

तन्हा छोड़ दीवाने को जो तन्हाई में, उड़ गए पंछी महोबत के न जाने कहाँ वो।

आई न याद दीवाने की जो अपने, तन्हा मार गए जो एक दीवाने को बेदर्दी वो।।

करी है महरबानी जो बेबस अपने एक दीवाने पर, खून ए ज़िगर, छोड़ दिया, चौखट पर मेरी तन्हा एक पैगाम।

पड़ा है जख्मी, तन्हा सा वही चोखट पर मेरी, तन्हा सनम का जो आखरी वो एक पैगाम।।

लिपटा है एक गुलाब उस से, काँटे हज़ारो रुसवाई के कई, चुम रहा है बेबसी से धूल चोखट की मेरी, तन्हा सनम का वो एक पैगाम।

टूटे-दिल की टूटी धड़कने, भूल गए जो अपना नाम, ठहर गयीं उखड़ती हर सांस, जाम है रगों का जो बहता उफ़ान।।

काँपते हाथ, थरथराती जुबां, मासूम थे वो अरमान।

पढ़ रहे महबूब का जो अपने, आखरी था वो फरमान।।

चिर दिया इश्क़ ने दिल अपना जो निकाल, नम आँखों से पढ़ कर तन्हा सनम का वो तन्हा एक पैगाम।

हर लव्ज़, वो हर अक्षर थे उसके, सुना रहे हाल ए दिल, दर्द सनम का जो एक दास्ताँ।।

नम आंखों से लिखी है उन्होंने जो इल्तिज़ा एक आख़री।

दर्द ए दिल कर रहे है दर्द बयां, अश्को के उस पर, निसान वो आखरी।।

टूटा जो दिल टूट कर बिखर गए सब अरमान, टूटे इस दिल के जितने थे जो आखरी।

झलक रहा, दर्द ए दिल, दर्द हर लव्ज़ वो अक्षर थे उसके जो आखरी।।

लिखा था खून ए श्याही से दर्द ए दिल वो नम आंखों से उसने दिल का जो अपने हाल।

पढ़ रहा है, दीवाना उसका, ए दिल धड़कनो को अब जरा तू अपने ले सम्भाल।।

हो गए जो दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न अब मुझ को तुम याद।।

जा रही हूं छोड़ कर, चौखट पर तुम्हारी तन्हा एक पैगाम।

पढ़ लेना तुम उस को, लिपटा हो जिस से टूटा एक गुलाब।।

याद न करना कभी, समझना कोई ख़्वाब।

टूटेगी नींद जब तुम्हारी, टूट जाएगा यह ख़्वाब।।

अलविदा ए यार, आखरी, रखना अपना ख़्याल।

दिख जाएगा जल्द ही ज़माने में, तुम को भी हसीन कोई ख़्वाब।।

करे मोहब्ब्त दिल से जो, देना तुम उसका साथ।

भूल जाना मुझ को तुम, दे देना उस को यह गुलाब।।

जा रही हुं, अब दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न अब मुझ को तुम याद।।

तड़प गया दिल, बिखर गई, टूट कर हर सांस।

पढ़ कर महबूब का अपने, आखरी वो फरमान।।

टूटा जो दिल एक दीवाने का, उठती है दिल से एक फ़रियाद।

खड़ा है राह ए सनम, अब भी दीवाना, करता है हर लम्हा जो सनम को याद।।

दिल में है मोहब्ब्त उसकी, हर धड़कन में है उसका एक इंतज़ार।

रुकी है ज़िन्दगी, ठहर गयी हर सांस, हर सांस में अब भी है कायम उसका एक एहसास।।

तड़पता दिल, टूटी धड़कने, ले रही है, दीवाना ए सनम से एहसास ए मोहब्ब्त का जो इम्तेहां ।

आरज़ू एक मोहब्ब्त, बेताब है हर सांस, दे-देगा दीवाना, अब भी ए मोहब्ब्त, मोहब्ब्त का हर इम्तेहां।।

जला देगा, सितम ए इश्क, मिटा देगा ए मोहब्ब्त खुद को अब ये दीवाना।

धड़कता दिल, बन्द सीने से जो हुस्न ए यार का अब भी है सनम का अपने वो दीवाना।।

दास्तान ए मोहब्ब्त जख्मी ये दिल जो सरेराह हो गया।

हुआ जो दीदार ए सनम दीवाना ए सनम फिर से कहि जो खो गया।।

तड़प ए दिल, बेबस है बेहिंतिया जो एक दीवाना, अंजाम ए मोहब्ब्त जो अंजाम ए दीवाना दिखता नही।

राह ए सनम, एक रोग है मोहब्ब्त, जो एक आशिकाना, दर्द ए दिल क्यों दर्द ए दीवाना अब मिटता नही।।

दम तोड़ती ये मोहब्ब्त, सुनाती है हर धड़कन से अब भी मोहब्ब्त का मोहब्ब्त से फिर वही तराना।

एहसास ए जुदाई साथ ये दीदार ए सनम, खिले एक अरसे से गुल तो खो गया कहि वीराना।।

धड़कता है दिल, तो धड़कनो से एक आवाज़ होती है।

हर धड़कन नाम ए महबूब दीवाने के साथ होती है।।

इंतज़ार है एक धड़कन, वो राह है सुनी, खड़ा एक ज़माने से जहाँ जो सनम-दीवाना।

आरज़ू है एक अधूरी, थामे है हाथो में अपने अब भी जो गुलाब वो वर्षो पुराना।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
(Republish)

पुनः प्रकाशित।

YouTube Link Is Mentioned in below.

पहली नज़र। ( दर्दभरी नज़म दास्ताँ।)

🍂 दर्द ए जुदाई गाना। (with YouTube Live Performance video)

मेरा प्रथम गीत; दृश्य इस प्रकार से है कि एक प्रेमी युगल बिछुड़ रहा है या बुछुड़ जाते है और वह प्रेमी युगल एक दर्द भरी पुकार से तड़पते हुए करहा उठते है। (पुनः प्रकाशित)

रुक रुक रुक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

महोबत को तेरी भुला न सकेंगे।

न जिंदा रहे सकेंगे न हम मर सकेंगे।।

दर्द ए दिल तुझ से दुआ हम करेंगे।

आईने में दिल के तुझ को देखा करेंगे।।

रुक रुक रुक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

आ आ आ आ आ ए दिल-रुबा।

न जा जा जा जा जा तू है कहा।।

यादो को तेरी मिटा न सकेंगे।

न मिल हम सके तो हर लम्हा रोआ करेंगे।।

दर्द ए जुदाई दूर तुझ से तन्हा तड़पा करेंगे।

ज़ख्मो को दिल के हम कुरेदा करेंगे।।

रुक रुक रूक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

ज़ख्मो को दिल के सी न हम सकेंगे।

न दवा हम करेंगे न उनको भर सकेंगे।।

फिज़ाओ में सुनी, तन्हाइयो में अक्सर।

यादो में अपनी, दुआओ में अक्सर।।

तड़प ए दिल दिल कि गहराइयो में फिर भी, मिला हम करेंगे…ए प्रिया।

जागती आखो से अपने, अधूरे ख्वाबो में फिर भी, तुझ को पूजा करेंगे…ए प्रिया।

रुक रुक रुक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish at vikrantrajliwal.com)

YouTube Live Video link is mentioned in below.

शराबों। (पुनः प्रकाशित)

ना वो प्याला रहा सलामत, ना वो दौर ए दस्तूर ही रह पाया कायम, बदलते समय से बदल गए हर यार यहाँ।

यारो में यार मेरा यार शराबों… विक्रांत राजलीवाल।

देखें इस दुनियां में यार बहुत, ढूंढे ना ढूंढ़ पाए फिर भी यार शराबों सा हम यार यहाँ।।

हर घुट से उतरता ज़हर, घुट घुट से चढ़ता ज़हर, तासीर है तिलस्मी, जिसका हर तिलस्म लाजवाब।

महक से चढ़ती मदहोशी, कोई ख़ुमारी सी सवार, स्वाद से है जिंदा जिसके मरते हर ख़्वाब।।

हर लम्हा एक सरूर, सरूर से कायम एक ख़ुमारी, हर ख़ुमारी बुलाती है करीब अपने, यारों में यार मेरा यार शराबों।

सरूर से मह के कायम है सरूर हर लम्हा जो महोबत, हर लम्हा पहुचाता है सकूँ तड़पती चाहतो को मेरे, मेरा यार शराबों।।

कभी टूटते तो कभी जुड़ते टार टूटे दिल के मेरे, हर बार जोड़ जाता है टूटे दिल के तार मेरे, मेरा यार शराबों।

उजाड़ गुलिस्तां, बंजर ख़्वाब, ज़िंदगी भी है मेरी बेज़ार, खिलते गुल, महकते ख़्वाब, बदल देता है जिंदगी हर घुट से अपनी मेरा यार शराबों।।

आबाद है वीराना ज़िन्दगी का जिससे, हर एहसास है जिससे मेरे रूहानी, रंगीन है कण कण जिसका हर बून्द एक पानी।

यारो में यार मेरा यार शराबों, रंगीन ख्वाबों का एक ख्वाब मेरा यार शराबों, टूटे एहसासों से मुर्दा ख्वाहिशों की जिंदा एक जिंदगानी।

हा बोतल में बंद है मेरा यार शराबों, तड़पता है एक मुलाक़ात को हर लम्हा, हर लम्हा करता है इंतज़ार शिदत से मेरा, मेरा यार शराबों।

हा कहते है मुझे शराबी, तलब है हर लम्हा ही मुझे शराब की, शराब से ही जिंदा है मेरी धड़कती ये जो जिंदगानी,

लिख दिया हर धड़कती धड़कनो पर नाम यारो का अपने, यारो में यार मेरा यार शराबों, यारो में यार मेरा यार शराबों…यार शराबों।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

प्रथम प्रकाशित समय 15/03/2019 at 12:35pm

(पुनः प्रकाशित 4/03/2020 समय प्रातः 10:45 बजे।

ब्रह्मांड और मस्तिष्क। (पुनः प्रकाशित)

हमारा यह विशालकाय ब्रह्माण्ड अनेक प्रकार के रहस्यों को अपने में समाय हुए हैं। और इस ब्रह्माण्ड के रहस्य अनेक प्रकार के आचर्यो से परिपूर्ण हैं। उन रहस्यो या आचार्यो कि कलपना भी कोई साधारण मनुष्य मस्तिक्ष नही कर सकता। परन्तु फिर भी कुछ  होनहार मस्तिक्ष उन तमाम अदभुत ब्रह्माण्ड के रहस्यों में से किसी ना किसी रहस्य का से पर्दा उठाने की एक भरपूर कोशिश करते हुए अनेक प्रकार के प्रमाण नित्य नए दिन जग जाहीर करते हैं।

ब्रह्मांड और मस्तिक्ष।

यहाँ मैं हर उस मस्तिक्ष से यह पूछना चाहूंगा कि क्या वह प्रमाण हमेशा सौ प्रतिशत सत्य होते है? कई बार वो प्रमाण सत्य होते हुए भी सत्य प्रतीत नही होते।  साधारण मस्तिक्ष कहे या अपने में व्याकूल मस्तिक जिनकी संख्या अमूमन ज्यादा ही होती हैं। उन्हें वो तथ्य या प्रमाण केवल काल्पनिक ही प्रतीत होते हैं। तो क्या वह मस्तिक्ष पूरी तरह असत्य साबित हो सकते हैं? या उन साधारण से प्रतीत होते हुए मस्तिक्षो की सोच के पीछे कोई असाधारण सोच छुपी हुई है? खैर जो भी हो… कई बार हम सभी ने देखा हैं कि जो प्रमाण किसी सहस्य के उजागर कि दिशा में आज सत्य प्रतीत होते हैं कुछ समय उपरांत कोई अन्य ज्ञानी या असाधारण मस्तिक्ष उस प्रमाण को अपने द्वारा एकत्रित प्रमाणों के द्वारा असत्य सिद्ध  करते हुए एक नए प्रमाण या तथ्यों के साथ जग जाहिर कर देता हैं।

हमारा मस्तिक्ष कई बार अपने तथ्यों को सुलझाये बिना ही परिमाण घोषित कर देता हैं। दरअसल हमारा यह मानव मस्तिक्ष हैं क्या? कही इसमें भी कम्प्यूटर की भांति केवल तथ्यों (data) का केवल संग्रह मात्र ही तो नही?

हमारे इस संसार में कई होनहार और जिज्ञासा से परिपूर्ण मस्तिक्ष मौजूद हैं। परंतु फिर भी अगर कोई ज्ञानी मस्तिक्ष
कोई गलती कर दे तो क्या यह पूरी तरह उसी का दोष होता हैं? आखिर यह गलत जानकारी या असत्य तथ्य उस मस्तिक्ष में आया कहा से? कही यह तो नही कि किसी चालक या भृमित मस्तिक्ष ने यह असत्य तथ्य उस मस्तिक्ष के सॉफ्टवेयर प्रोग्राम में स्थानांतरण या अपलोड कर दिया हो? और खुद सामने आये बिना ही अपना प्रयोग उस मस्तिक्ष के द्वारा कि करे गए असफल प्रयोगों  से खुद के प्रयोग या प्रमाण सत्य सिद्ध कर रहा हो?

खैर जो भी हो! मैं आपसे पूछना चाहूंगा कि अगर कोई दूषित या भृमित मस्तिक्ष आपके सम्मुख आ जाये तो क्या…? किसी न किसी को तो इस दूषित मानव मस्तिक्ष साफ्टवेयर  का तोड़ ढूँढना ही पड़ेगा। पर कैसे ?

दरअसल यह एक दूषित सॉफ्टवेर होते हुए भी एक प्रकार का * हानिकारक वायरस * कि ही भांति हमारे मानव मस्तिक्ष के कार्य प्रणाली को प्रभावित करते हुए उसे नष्ट कर सकता है। परन्तु इस वायरस का भी तोड़ हमारे अपने मानव मस्तिक्ष में ही कहि छुपा हुआ है। जिसे बस एक उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता मात्र होती है। यह पूर्णता सत्य है। जी हा आज से ही नही बल्कि अनादि-काल से हमारे अपने मानव मस्तिक्ष के पास ऐसे -ऐसे एंटी वायरस या तोड़ मौजूद है जिंकी कल्पना भी कोई साधारण मानव मस्तिक्ष नही कर सकता।

आज के संदर्भ में अगर हम बात करे तो आज का मानव मस्तिक्ष खुद को कुछ ज्यादा ही तीव्र और तरार * fast * समझने की भूल करता जा रहा हैं। और उन तमाम एंटी-वायरसो को नकारते हुए उन्हें फिजूल का या बेकार का सिद्ध करने पर उतारू होता जा रहा हैं।

क्या आप को ज्ञान है कि आखिर क्या हैं यह एंटी-वायरस? और यह कार्य कैसे करता हैं?

जी इसका जवाब छुपा हैं अधयातम में, जी हा अपने सही ही सुना है अधयातम! अध्यात्म ही एक मात्र ऐसा जरिया हैं जिसके द्वारा हम उन तमाम दूषित मस्तिक्षो के साथ साथ अपने मस्तिक्ष की भी मरम्मत करते हुए उन समस्त दूषित मानव मस्तिक्षो का इलाज अध्यात्म के एंटी-वायरस के द्वारा करते हुए उन्हें सुधारा जा सकता हैं।

फिर भी आज का तेज मस्तिक्ष उन सभी आधात्मिक साफ्टवेयरो को नकारते हुए नित्य नए प्रयोग करता ही जा रहा हैं। कई बार स्थिति अत्यंत ही भयानक रूप धारण कर लेती हैं। और कोइ एंटी वायरस भी फिर उन दूषित मानव मस्तिक्षो के काम नही आ पता। फिर उन तमाम दूषित मानव मस्तिक्षो को उनके दूषित हो चुके साफ्टवेयर को उपचार हेतु  मानव मस्तिक्ष साफ्टवेयर इंजीनियर यानि मानव मस्तिक्ष सुधार गृह *mental hospital* जिस को हम पागलखाने के नाम से भी जानते है उन्हें वहा दाखिल, नाम दर्ज करवाना पड़ता हैं। परन्तु ध्यान रहे कि अक्सर लोग रिपेयर कि हुई हर वस्तु को एक शंखा की नज़रो से देखते आये हैं तो क्या?

मस्तिक्ष की दुनिया भी बड़ी अजीब दुनिया हैं साहब। मेरी नज़रो में वह मानव मस्तिक्ष बड़े ही निराले होते है जो बिना वायरस के या गड़बड़ी होने पर अध्यात्म के एंटी वायरस के डोज से काम चला लेते हैं। और स्वस्थ्य महसूस करते हुए प्रसन्नचित रहते है।

आज कल नित्य नई खोज हो रही हैं। और वो नई खोज नई न होते हुए भी बहुत ही प्राचीन होती हैं अध्यात्म के मार्ग पर। कई बार अपने में कुछ विद्वान् मस्तिक्षो को हम अक्सर कहते सुनते आए है कि यह विषय या यह अधयातम का मार्ग या आध्यात्मिक सॉफ्ट-वेयर बेकार हैं और यह तो महिला मस्तिक्ष का या कायर मस्तिक्षो से सम्बंधित सॉफ्ट वेयर हैं। तो क्या हमें ये बात मन लेनी चाहिए कि महिला मसितक्ष और पुरुष मस्तिक्ष भिन -भिन होते हैं। और उनका सॉफ्टवेयर अलग-अलग ढंग से कार्य करते हैं? या प्रकृति ने उन्हें अलग -अलग ढंग से या अलग अलग विचारो के साथ बनाया हैं। यह तो साधारण मानव मस्तिक्षो कि कोरी कल्पना मात्र हैं साहब।

सदियों से पुरुष मस्तिक्ष ने महिला मस्तिक्ष को अपने से शीर्ण या कम बुद्धि का ही समझा हैं। तो क्या एक मस्तिक्ष केवल लिंग के आधार द्वारा उच्च या निम्न हो सकता हैं?
देखा जाये तो आज पुरुष मस्तिक्ष कुछ हैरान और परेसान सा हैं आखिर क्यों?

सबसे पहले तो मैं यहाँ स्पष्ट कर दु कि कोई भी मानव मस्तिक्ष केवल लिंग के आधार द्वारा उच्च या निम्न कोटि का कदापि नही ही सकता है। अगर कोई ऐसा सोचता है तो यह उस मानव का, उसके दूषित मानव मस्तिक्ष का ही दोष है। मेरे इस कथन के द्वारा हो सकता है कि कई दूषित मानव मस्तिक्षो के मन में एक विचार उतपन हो रहा होगा कि आखिर ऐसा क्यों?

तो जानिए जनाब क्यों की आज महिला मस्तिक्ष ने अपने आपको, अपने असाधारण मस्तिक्ष को इस संसार के हर क्षेत्र में स्थापित कर यह साबित कर के दिखा दीया है कि उनका महिला मस्तिक्ष मानव सॉफ्टवेयर किसी भी प्रकार से किसी भी पुरुष प्रधान मानव मस्तिक्ष सॉफ्टवेयर से शीर्ण या कम बुद्धि नही रखता है।

आज महिलाए नित्य नए इतिहास रच रही हैं। क्यों की अगर कोई गलती होती हैं तो दोष किसी मस्तिक्ष का नही होता बल्कि उस सोच का या उस सॉफ्ट-वेयर का होता हैं जो उसे चलता हैं। दोष उन आकड़ो का होता है जो उसमे जाने अनजाने अपलोड हो जाते हैं या कर दिए जाते है।

आज जिस प्रकार से महिला मस्तिक्ष ने अपने सॉफ्ट-वेयर का इस्तेमाल कर के दिखलाया हैं और जो इतिहास रचे हैं
उससे यह साबित हो गया हैं कि अगर हम अपने मस्तिक्ष का सही इस्तेमाल करे तो हर किसी मस्तिक्ष को अपने मानव मस्तिक्ष के सॉफ्ट-वेयर पर गर्व हो जायेगा।

इसी प्रकार से ब्रह्मांड और मस्तिक्ष के राज भला कोई पूरी तरह से हल कर सका हैं नही दोस्तों अभी तो केवल शुरुआत मात्र ही हैं। आज हमें एक ऐसे मानव मस्तिक्ष  सॉफ्ट-वेयर की अति आवश्यकता हैं जो हम सब कि आने वाली पीढ़ियों को नैतिकता, मानवता और समानता की एक नेक राह पर चला सके।

और उस मानवता से परिपूर्ण साफ्टवेयर या विचारों एवं आदर्शो के ऊपर कोई भी दूषित वायरस अपना कार्य न कर सके। तभी हर एक मस्तिक्ष खुद को स्वस्थ्य और ताज़ा महसूस करते हुए खुद पर गर्व पायेगा। आज की युवा पीढ़ी को चाहिए कि वह भविष्य के लिए ऐसे ही युवा मस्तिक्ष तैयार करे और यह हर एक जिम्मेवार व्यक्ति की ज़िमेदारी हैं मेरे मित्रों।

अगर ऐसा हो पाया तो वह दिन दूर नही जब कोई भी मस्तिक्ष खुद को हिन् और असहाय समझने की भूल नही करेगा। और इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड पर केवल सुशासन का एक छत्र राज होगा। आखिर वह दिन कब आएगा!!! कब आएगा… वह दिन ?

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(पुनः प्रकाशित आपकी अपनी ब्लॉग साइट  vikrantrajliwal.com पर)

🌹 कार्य, अनुभव एवं परिचय। ✍️(https://vikrantrajliwal.com)

नमस्कार मेरा नाम विक्रांत राजलीवाल है। मै हरित विहार बुराड़ी दिल्ली 84 भारत में रहता हूं। और मुझ को नई नई कहानियां, नाटक, सँवाद, किस्से, गीत, ग़ज़ल, नज़म, लिखना अत्यंत ही पसन्द है। और मैं अपने ह्रदय से इच्छुक हु की आपके साथ जुड़ सकूँ। एवं अपनी लेखन कला (कहानियां, सँवाद, नाटक, गीत ग़ज़ल) से कला साहित्य की सेवा कर सकूँ।

वर्ष 2016 मैं मेरी प्रथम पुस्तक एहसास प्रकाशित हुई थी जो कि सामाजिक एवं मानवतावादी भावनाओं से प्रेरित काव्य एवं नज़म के रूप में किस्से एवं कविताएं है।
अभी तक मेने सैकड़ो, नज़म, ग़ज़ल, कविताएं, लेख, ब्लॉग्स एवं

सबसे महत्वपूर्ण मेरी पहली अति रोमांचक कहानी भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए) लिख कर अपनी ब्लॉग साइट https://vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित कर चुका हूं।

साथ ही मैंने कुछ समय पूर्व जिंदगी के हर रंग को दर्शाती हुई एक और कहानी+नाटक को पूर्ण किया है जो अभी तक अप्रकाशित है।
आशा करता हु आप तक मेरी आवाज अवश्य पहुच पाएगी।

आपका सेवक विक्रांत राजलीवाल।

मेरी लेखनी https://vikrantrajliwal.com

💥 एक सेवा। // 💥 A Social Service.

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🙏 यदि आप गरीब बच्चों, नशे से पीड़ित बच्चों, बीमार बच्चों के साक्षरता, स्वास्थ्य एवं बहेतर जीवन से सम्बंधित समाज कार्य करते है तो आप कभी भी मेरा चेरिटेबल नज़म, ग़ज़म, काव्य एवं शायरी का कार्यक्रम बिल्कुल मुफ्त करवा सकते है। इसके लिए मैं आपको कोई भी राशि नही लूंगा अपितु यकीन मानिए आप के इस नेक कार्य में अपनी रचनात्मक रचनाओं की प्रस्तुति कर मुझे ह्रदय से खुशी होगी।

विक्रांत राजलीवाल।

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🙏 If you work for the society related to literacy, health and better life of poor children, drug addicts, sick children, then you can get my charitable najam, ghazam, poetry and shayari program absolutely free. For this I will not take any amount from you, but believe me, I will be happy from my heart by presenting my creative works in this noble work of yours.

Vikrant Rajliwal.

VIKRANTRAJLIWAL.COM

विक्रांत राजलीवाल। (एक दर्द एक कहानी।)

मैं यानी की विक्रांत राजलीवाल, आपका अपना मित्र, जीवन के हर रूप को दर्शाती हुई, प्रेम और मित्रता के नाजुक से रिश्तों से झुझती हुई अपनी जिस दर्दभरी कहानी पर वर्ष 2016 से कार्य कर रहा था एवं जो कुछ दिन पूर्व ही अपने अंजाम तक पहुच सकी है। मेरी उस अनकही और अनसुनी दर्द ए जिंदगी को दर्शाती हुई अत्यंत ही रोमांचक कहानी के एडिटिंग कार्य पर मैंने कार्य प्रारम्भ कर दिया है।

प्रभु कृप्या से शीघ्र ही मेरी यह कहानी आपको ‘अमेज़ॉन’ पर पढ़ने हेतु प्राप्त हो पाएगी।

आशा करता हु आपको मेरी यह कहानी अवश्य पसन्द आए।

विक्रांत राजलीवाल।

I mean Vikrant Rajliwal, your own friend, depicting every form of life, struggling with the fragile relationship of love and friendship, working on his painful story which was working since 2016 and which reached its end just a few days ago. Could. I have started work on the editing work of a very exciting story depicting my untold and unheard pain.

You will soon get this story from God Grace to read on Amazon.

Hope you like this story of mine.

Vikrant Rajaliwal.