👸 पहली नज़र। (दर्दभरी नज़म दास्ताँ।) With YouTube Video Link.

🌹 पहली नज़र।

दिखलाती है ज़िन्दगी, हर कदम पर, करीब से अपना रंग।

बतलाती है खून ए ज़िगर कि वो अधूरी दास्ताँ, हर रंग से अपने।।

दे देती है, दर्द कोई बिछुड़ा फिर से, आता है बदल कर रूप सामने, फिर से वो दर्द।।।

दहलीज है बिछुड़ती जवानी की, आगाज है बेदर्द बुढ़ापे का।

समा है ऐतबार से, महफ़िल है फिर से आबाद, जो एक दीवाने की।।

हो गया एक रोज़, दीदार ए यार, धड़कने ये खो गई।

लौट आईं मोहब्ब्त दिल में खोई आरज़ू कोई जाग गई।।

किया है मज़ाक, ज़िन्दगी ने, ज़िन्दगी में दिन ये कौन सा आया।

दहलीज़ है बुढ़ापे की, बिछुड़े यार से, ये सितम, जिस पर मिलाया।।

एक रोज, एक दम से दीदार ये किस का हुआ।

देखते ही जान गया ये दिल, हा इसी से तो प्यार हुआ।।

एक ज़माने के बाद, ये किस ने नज़रो से नज़रो को मिलाया।

करीब दिल के आकर मेरे, ठहरी ज़िन्दगी से बेजान दिल को धड़काया।।

सितम इस दिल पर हो रहा, तोड़ कर बिजलिया, धड़कनो पर, बेदर्द सावन भी रो रहा।।।

इंतेहा दर्द ए दिल, मोहब्ब्त जो अब हो गई, ज़माने की है
रुसवाई।

बरस रहे आँख से आँसू, बात है दिल कि दिल को जो दिल ने बतलाई।।

आई है बन कर, सावन की बहार, बे-मौसम ज़िन्दगी मेरी जो बंजर बियाबान।

मुस्कुराहट है लबो पर गुलाबी उसके, जाग गए देख कर,
करीब से दिल के सब अरमान।।

दर्द है जुदाई का, जख़्म उसके भी जख्मी सिने में।

कहना चाहती है वो भी कुछ, सुनना चाहता हु में भी कुछ।।

कर रहे दीदार दोनों, बिछुड़े जो एक ज़माने से।

सदियों से खमोश लब, बेड़िया अब भी ज़माने से।।

लकीर है मिटने लगी, वक़्त की यू ही आज जो अचानक से।

याद है उल्फ़त के अब भी वो दिन, बढ़ने लगी धड़कने ज़िन्दगी की जब अचानक से।।

बदला-मौसम, समा बदला, बदल गए सब नज़ारे।

आ जाती है याद ज़िन्दगी, तमाम अधूरी वो बहारे।।

नादां उम्र से नादां धड़कने, नादां थे वो अफ़साने।

हो गए ज़माने से जो, नादां थे वो फ़साने।।

याद है…

याद है अब भी, सावन कि वो बात।

नीरस थी जब ज़िन्दगी, पूरे चाँद की वो रात।।

बेजान मौसम में, एक रोज जान आ गई।

सुन-सान गली महोले कि धड़कने जाग गई।।

तन्हा थे लम्हे, अजीब से जो खामोश, उनसे जो एक अहसास हुआ।

देख कर खुशनुमा मौसम, फिर मुझ को जो विशवास हुआ।।

चारो ओर एक खामोशी सी छा गई।

माहौलें (पड़ोस) में मेरे रहने को एक हूर आ गई।।

एक इत्तफाक किसमत ने मेरे साथ किया।

घर के सामने मेरे, उसने एक घर लिया।।

देख कर उस को, ये दिल धड़क गया।

जाने को करीब उसके, ये मन मचल गया।।

देख कर नज़ारा ए हुस्न, मौसम भी मदहोश हो गया।

हर अदा थी कातिल उसकी, दिल ए दीवाना कही खो गया।।

गिरती थी हुस्न ए शबाब से उसके बेबस इस दिल पर बिजलिया तब।

चलती थी इठला कर जब, भूल जाता था ये दिल भी धड़कना तब।।

कतार घर के सामने, मनचलो की उस के लगने लगी।

करने को दिदार ए हुस्न, जंग उन-में कोई खूनी मचने लगी।।

देख कर नज़ारा, ये बर्बादी का अपनी, मन मेरा कूछ परेशान हुआ।

करता हूं मोहब्ब्त मैं भी उस-से, जान कर हाल ए दिल ये दिल हैरान हुआ।।

करता हूँ दिदार ए हुस्न, नज़रे बचा कर खिड़की से रोज़ अपनी।

जीता हूँ, मरता हूँ, तन्हा, घुट-घुट कर किसमत से रोज़ अपनी।।

नही आती है नींद बेदर्द रातो से दर्द ये आज-कल।

सताती है याद ए दिलरुबा, सितम ये हर-पल।।

दीवाना ए हुस्न ये जहां सारा लगता है उसका।

हर कोई है जलने को आतुर, परवाना ए हुस्न ये जहां सारा लगता है उसका।।

सुर्ख गुलाबी लबो पर निकलती है लगा कर लाली वो जब।

लग जाती है दीवाने उन मनचलो में उसके कोई होड़ तब।।

एक शोर सा मच जाता है भरे बाजार में तब।

छुरिया चल जाती है कत्ल हो जाता है भरे बाजार में तब।।

देख कर नज़ारा ए हुस्न वो मदमस्त उसका, वख्त भी ठहर जाता है।

एक दिदार ए सनम के खातिर, हर कोई इस जहां में मचल जाता है।।

देख लेती है, उठा कर जब भी, मदहोश निगाहें वो अपनी, बेबस है दिल ए दीवाना धड़क से धड़क जो जाता है।

मोहब्ब्त जताने को सनम से अपने ए पाबंदियों वो बेहिंतिया तड़प जाता है।।

न जाने क्यों एक रोज मोहब्ब्त ने रंग अपना दिखलाया।

हुस्न को है इश्क से काम, नाम ए मोहब्ब्त जो दीवाने को बुलाया।।

देख कर नज़दीक से बदन वो क़ातिलाना-हुस्न उसका,
बुरा हाल था।

शराबी निगाहों से वॉर, वो मनमोहक उसके शारीरिक उभार, जीना अब मेरा दुशवार था।।

धधक रहे थे अंगार नाजुक वो गुलाबी लब उसके।

झुलस रहा था दीवाना, तपिश जो गुलाबी-लबो से हर लम्हा उसके।।

एक रोज नज़रे-चार, अनजाने ही, जो उनसे हो गई।

कर के नज़दीक से दिदार ए हुस्न, धड़कने ए दिवाना जो खो गई।।

वो आए करीब, इस दिल के, वो एक नशा था।

देखा नशीली निगाहों से उसने, उनमे एक नशा था।।

कर रही थी दिदार ए यार जो नज़रे नज़दीक से।

उठा था दर्द ए धड़कन, देखा जो उनको नज़दीक से।।

अक्सर होती है, मुलाकाते उनसे, मुस्कुरा कर आता है हुस्न ए यार वो करीब।

जगा कर आरज़ू, खोई कोई तमन्ना, खो जाता है कसम, फिर वो नसीब।।

अरमान दिल के अब जाग गए, एक ही पल में दीवाना जो जहां सारा पा गए।

खिल उठे महोबत के गुल, गुलिस्तां ए मोहब्ब्त जो रेगिस्तान से दिवाना पा गए।।

मुस्कुराता है देख कर, हर अदा से अल्हड़ वो हुस्न जब।

करता है वॉर, जख़्मी अरमान, बेबस इस दिल पर जब।।

भूल जाता है धड़कना, ठहर जाती है धड़कने ए दिल वही पर जब।

बेजान सी है जो धड़कने, धड़कना चाहती है वो जब।।

लव है खामोश से एक थरकन सी जो उनमे आई, चाहते है कुछ कहना शायद हम दोनों ही जब।

आलम है बेबसी भरा अहसास ए दिल, खामोशी जो साथ अपने लिए, रह जाते है खमोश से हम दोनों ही जब।।

आती है दिल-रुबा वो, होते है दीदार ए यार, बरसते है तीर ए हुस्न, शराबी निगाहों से अब अक्सर।

धड़कता-दिल, धड़काते है हुस्न ए यार, और भी खामोशी से बेदर्दी अब अक्सर।।

होता है इज़हार ए मोहब्ब्त नज़रो से जो दीवाना, वक़्त बे वक़्त जो उनसे सितम अब अक्सर।

करते है गुफ्त-गु, साए में नज़दीक से मोहब्ब्त, एहसास जो उनके अब अक्सर।।

आलम ए बेबसी, वो इज़हार ए मोहब्ब्त, तरसता है सुनने को दीवाना जो अक्सर।

यकीन ए मोहब्ब्त वो ख़्याल ए तन्हाई, सिहर जाता है ख़ौफ़ से दीवाना जो अक्सर।।

दीदार ए यार ये समा ए ऐतबार मिलता है तन्हाई में नसीब से अब अक्सर।

तीर ए मोहब्ब्त ये जख्म ए दिल, लगते है रुसवाई से सरेराह, अब अक्सर।।

नही मालूम है गहराई, सितमगर ए सनम, काफ़िर उस हसीना के दिल ओ धड़कनो की क्या है दीवाना।

धड़कते-दिल तड़पती धड़कनो को सकूँ एक लम्हा भी वो लेने नही देती, दर्द ए दिल ये दर्द है धड़कनों पर दीवाना ।।

जो है मोहब्ब्त दीवाने से उस को, नाम ए मोहब्ब्त बन्द लबो से ग़ुलाबी वो अपने क्यों बोल नही देती।

जख़्म है दिल के हर जख्मो पर वो मरहम, मोहब्ब्त से अपने, धड़कनो को दिल के सकूँ क्यों नही देती।।

महक जाता है समा, बदलता है रंग, शर्म ओ हया से चेहरे का जो उसके गुलाबी।

पुकारता है दर्द ए दिल, नाम ए मोहब्ब्त वो नाम उसका, देखा जब भी मदहोश निगाहों में जो उसकी शराबी।।

धड़कती जवां धड़कने, उफान एक उनमे आ गया।

यकीन ए दीवाना, सनम के अब वो करीब आ गया।।

किया मज़ाक, ए वख्त जो हाल ए दिल, एक रोज़, धड़कनो से सनम को जब सुनाया।

समझा सनम ने दिल-लगी, ए मुकदर दिल-चिर दीवाने ने
फिर अपना दिखलाया।।

बदला रूप फिज़ाओ ने हालात जो खिलाफ हो गए।

पहले झुके पहलो में वो, फिर लिप्ट के रो दिए।।

किया इजहार ए दोस्ती, मोहब्ब्त का उसमे कोई नाम नही।

मोहब्ब्त तो है ए दोस्त मग़र, मक्कारी कोई उनमे नही।।

बन कर दोस्त, आती है दिलरुबा, जब भी कोई नज़दीक,
नज़रो के सामने।

एक आरज़ू,वो लव्ज़ ए महोबत दब जाते है दिखती है जब भी वो नज़रो के सामने।।

रहता है इंतज़ार, एक एहसास वो पल है मोहब्ब्त, जिस पल उसे भी हो जायगी।

तड़पेगा-दिल एक रोज़ ए मोहब्ब्त उस सितमगर का, जिस पल मोहब्ब्त उसे भी दीवाने से अपने हो जायगी।।

इंतज़ार ए हुस्न से हुस्न ए दीवाने कई मनचलों का हाल बेहाल होते देखा।

दीदार ए हुस्न से बांधे टक-टकी, नज़रो में अपनी, अंजाम कइयो का बुरा देखा।।

चीर दी है सरे-राह कइयों ने फड़कती नसें, शरीर की अपने, हुस्न ए शबाब के वास्ते।

फोड़ दिए है सरे-राह, कइयो ने बेमतलब सर अपने, आपसी तकरार के वास्ते।।

हाल ए दिल दीवाने का भी, बेहाल नज़र आता है।

देख कर दीवाने ए सनम, मनचले वो चौखट पर उसकी दिल तड़प जाता है।।

मौसम है वीरान बिन दीदार ए सनम, ये कैसी वीरानी।

हालात है खिलाफ, ये दर्द ए मोहब्ब्त ये कैसी ज़िन्दगानी।।

ज़िन्दगी है उजाड़ मेरी किस तन्हाई में खो गई जो।

सनम है सितमगर मेरे, क्या किसी गैर की हो गई वो।।

जख्म ये गहरा, टूटे दिल पर, एक रोज, बेहूदा कैसा पड़ गया।

देखा जो सनम को अपने, न जाने क्यों ये दिल तड़प गया।।

आ रहे थे सनम कहि से शायद कहि पर वो जा रहे थे।

आईना ए महोबत, वो अक्स नज़रो में, किसी गैर का, मोहब्ब्त एक दूसरे से दोनों फरमा रहे थे।।

गुजर गए न जाने मौसम कितने, कितने ज़माने बीत गए।

तड़प ए दिल, तन्हाइयों से दीवाना, जख्म न जाने टूटे दिल
पर कितने पड़ गए।।

तड़प टूटे-दिल की टूटी धड़कनो से जो अब बर्दाश नही होती।

सताता है ख़्याल ए सनम, बिन सनम दर्द ये ज़िन्दगी, आवाज़ दिल के वीराने से कोई अब नही होती।।

बदमिजाज जो मौसम, एक रोज सरेराह हो गया।

अहसास ए ज़माना, हर कोई यहाँ खो गया।।

वक़्त की लकीर पर एक हादसा जो अब हो गया।

आशिक एक दीवाना जो सनम का, सनम को कहि ले गया।।

तन्हा छोड़ दीवाने को जो तन्हाई में, उड़ गए पंछी महोबत के न जाने कहाँ वो।

आई न याद दीवाने की जो अपने, तन्हा मार गए जो एक दीवाने को बेदर्दी वो।।

करी है महरबानी जो बेबस अपने एक दीवाने पर, खून ए ज़िगर, छोड़ दिया, चौखट पर मेरी तन्हा एक पैगाम।

पड़ा है जख्मी, तन्हा सा वही चोखट पर मेरी, तन्हा सनम का जो आखरी वो एक पैगाम।।

लिपटा है एक गुलाब उस से, काँटे हज़ारो रुसवाई के कई, चुम रहा है बेबसी से धूल चोखट की मेरी, तन्हा सनम का वो एक पैगाम।

टूटे-दिल की टूटी धड़कने, भूल गए जो अपना नाम, ठहर गयीं उखड़ती हर सांस, जाम है रगों का जो बहता उफ़ान।।

काँपते हाथ, थरथराती जुबां, मासूम थे वो अरमान।

पढ़ रहे महबूब का जो अपने, आखरी था वो फरमान।।

चिर दिया इश्क़ ने दिल अपना जो निकाल, नम आँखों से पढ़ कर तन्हा सनम का वो तन्हा एक पैगाम।

हर लव्ज़, वो हर अक्षर थे उसके, सुना रहे हाल ए दिल, दर्द सनम का जो एक दास्ताँ।।

नम आंखों से लिखी है उन्होंने जो इल्तिज़ा एक आख़री।

दर्द ए दिल कर रहे है दर्द बयां, अश्को के उस पर, निसान वो आखरी।।

टूटा जो दिल टूट कर बिखर गए सब अरमान, टूटे इस दिल के जितने थे जो आखरी।

झलक रहा, दर्द ए दिल, दर्द हर लव्ज़ वो अक्षर थे उसके जो आखरी।।

लिखा था खून ए श्याही से दर्द ए दिल वो नम आंखों से उसने दिल का जो अपने हाल।

पढ़ रहा है, दीवाना उसका, ए दिल धड़कनो को अब जरा तू अपने ले सम्भाल।।

हो गए जो दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न अब मुझ को तुम याद।।

जा रही हूं छोड़ कर, चौखट पर तुम्हारी तन्हा एक पैगाम।

पढ़ लेना तुम उस को, लिपटा हो जिस से टूटा एक गुलाब।।

याद न करना कभी, समझना कोई ख़्वाब।

टूटेगी नींद जब तुम्हारी, टूट जाएगा यह ख़्वाब।।

अलविदा ए यार, आखरी, रखना अपना ख़्याल।

दिख जाएगा जल्द ही ज़माने में, तुम को भी हसीन कोई ख़्वाब।।

करे मोहब्ब्त दिल से जो, देना तुम उसका साथ।

भूल जाना मुझ को तुम, दे देना उस को यह गुलाब।।

जा रही हुं, अब दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न अब मुझ को तुम याद।।

तड़प गया दिल, बिखर गई, टूट कर हर सांस।

पढ़ कर महबूब का अपने, आखरी वो फरमान।।

टूटा जो दिल एक दीवाने का, उठती है दिल से एक फ़रियाद।

खड़ा है राह ए सनम, अब भी दीवाना, करता है हर लम्हा जो सनम को याद।।

दिल में है मोहब्ब्त उसकी, हर धड़कन में है उसका एक इंतज़ार।

रुकी है ज़िन्दगी, ठहर गयी हर सांस, हर सांस में अब भी है कायम उसका एक एहसास।।

तड़पता दिल, टूटी धड़कने, ले रही है, दीवाना ए सनम से एहसास ए मोहब्ब्त का जो इम्तेहां ।

आरज़ू एक मोहब्ब्त, बेताब है हर सांस, दे-देगा दीवाना, अब भी ए मोहब्ब्त, मोहब्ब्त का हर इम्तेहां।।

जला देगा, सितम ए इश्क, मिटा देगा ए मोहब्ब्त खुद को अब ये दीवाना।

धड़कता दिल, बन्द सीने से जो हुस्न ए यार का अब भी है सनम का अपने वो दीवाना।।

दास्तान ए मोहब्ब्त जख्मी ये दिल जो सरेराह हो गया।

हुआ जो दीदार ए सनम दीवाना ए सनम फिर से कहि जो खो गया।।

तड़प ए दिल, बेबस है बेहिंतिया जो एक दीवाना, अंजाम ए मोहब्ब्त जो अंजाम ए दीवाना दिखता नही।

राह ए सनम, एक रोग है मोहब्ब्त, जो एक आशिकाना, दर्द ए दिल क्यों दर्द ए दीवाना अब मिटता नही।।

दम तोड़ती ये मोहब्ब्त, सुनाती है हर धड़कन से अब भी मोहब्ब्त का मोहब्ब्त से फिर वही तराना।

एहसास ए जुदाई साथ ये दीदार ए सनम, खिले एक अरसे से गुल तो खो गया कहि वीराना।।

धड़कता है दिल, तो धड़कनो से एक आवाज़ होती है।

हर धड़कन नाम ए महबूब दीवाने के साथ होती है।।

इंतज़ार है एक धड़कन, वो राह है सुनी, खड़ा एक ज़माने से जहाँ जो सनम-दीवाना।

आरज़ू है एक अधूरी, थामे है हाथो में अपने अब भी जो गुलाब वो वर्षो पुराना।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
(Republish)

पुनः प्रकाशित।

YouTube Link Is Mentioned in below.

पहली नज़र। ( दर्दभरी नज़म दास्ताँ।)
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🌠 Cosmos And Master's. (Republished)

Many of our mysteries have been adjusted in our vast universe. And the mysteries of this universe are full of a variety of abilities. Even those mysteries or Acharyas can not be imagined by any ordinary man. But still some promising masters declare the world the new day in a variety of ways by trying a lot to uncover the mysteries of all the wonderful miracles of the supernatural universe.

Cosmos And Master’s

Here I would like to ask from every mascot whether the evidence is always 100 percent true? Many times those proofs do not appear to be true even when it is true. Normal maushchya or paused mastik, whose numbers are usually more. Those facts or proofs only seem to be imaginary. So can the mathak prove completely untrue? Or is there any extraordinary thinking hidden behind the mindset of those seemingly ordinary? Whatever the case … many times we all have seen that the evidence that appears to be true today in the direction of a co-existence, some time after some other knowledgeable or extraordinary masters prove that the evidence is false by evidence collected by them. The world reveals a new evidence or facts.

Our Mentor often declares the quantity without solving its facts. Actually we have this human mantra? Is it not just the collection of data, just like a computer in this?

There are many promising and curious manuscripts present in our world. But even if some knowledgeable mind
If you make a mistake, is it completely the fault of him? After all, did this false information or false fact come in that mathak? Is it anyway that a driver or a ghostly master has transferred or faked this false fact to the software program of that master? And without being able to come out of his own self, his experiments proved that he was using his own experiment with unsuccessful experiments?

well whatever! I would like to ask that if any corrupted or devious mascot comes to you, what …? Someone will have to find a break from this malicious software software. but how ?

Actually it can be destroyed by affecting the functioning of our human masters, even though it is a corrupted software * like a type of harmful virus *. But the break of this virus is hidden in our own human brain. Which just requires a proper guidance. This perfection is true. Not only from today but from our own time, there is such an anti virus or break with our own human masters, which can not even imagine any ordinary human being.

In today’s context, if we talk about, today’s human masters are making a mistake to understand themselves as something more intense and faster than * fast *. And they are getting ready to prove them defective or useless while refusing all those anti-viruses.

Do you have the knowledge that what is the anti-virus? And how does this work?

G’s answer is hiding in the supernatural. Spirituality is the only way through which we can repair all those malicious human beings with the help of anti-virus of spirituality by repairing them with all those malicious heads.

Yet today’s sharp masters are continuously experimenting with innovation, refusing all those personalized software. Many times the situation is very terrible. And no antivirus can also be used for those corrupt human masters. Then all those corrupt human masters have to enter the name, filing of names, for the treatment of their infected software, human masti software engineer i.e. Human Mental Reform Home * mental hospital * which we also know as madhouse. But keep in mind that often people have come to see everything repaired with a glimpse of a sign, then what?

The world of mausoleum is also a big weird world. In my eyes, the human mansatta is very unique, without any viruses or disturbances, they work on the anti-virus dosage of spirituality. And feel happy while feeling healthy.

Today, daily new discoveries are happening. And those new discoveries are very old despite not being new, on the path of spirituality. Many times we have heard some scholars say that we have heard that this topic or the path of the superstitious or spiritual soft-ware is useless, and this is the soft ware associated with women’s work or cowardly mastheads. So should we have to accept that women’s women and men’s brains are illusory. And do their software work differently? Or nature made them differently or with different ideas. These are mere mere human memories that are mere mere imagination.

For millennia, the male masculature has understood the female masculature as being less or less of its intelligence. So can a person be high or low only by the basis of gender?
If you see, men’s masks are somewhat shocked and paradigm, then why?

First of all, I can explain here that no human mantra can only be of high or low rank by the basis of gender. If someone thinks so, then it is the fault of that human, its contaminated human masculature. Through my statement, there may have been an idea in the minds of many corrupt human minds, why it is so?

So know that today the woman’s masculature has shown herself, by establishing her extravagant faculty in every field of this world, by proving that her female masters human software is in any way wiped out from any male dominated human masti software Or does not have less intelligence.

Today women are constantly creating new history. Why if there is a mistake, the blame is not of any kind, but of the thinking or the soft-ware it moves. The defect is of those figures which are unknowingly uploaded or made in it.

The manner in which women’s masks have been shown using their softwares and which have created history
It has proved to him that if we use our gifts properly, then every person will be proud of the soft-ware of his human masters.

Similarly, the universe of the universe and the mauschak can not be solved completely, no friends are still only beginning. Today, we are in dire need of a human mood softwire which can lead all future generations on a noble path of ethics, humanity and equality.

And no harmful virus can do its work on the software or ideas and ideals that are perfect for humanity. Only then will each one proud himself, feeling himself healthy and refreshing. Today’s younger generation should prepare such a young mind for future, and it is the responsibility of every responsible person. My friends

If that happens, then the day is not far when no masculine will forget to understand itself as Hind and helpless. And on this whole universe, only a parade of good governance will be the rule. When will that day come !!! When will that day … that day?

Written by Vikrant Rajliwal

(Translated by Vikrant Rajliwal,
Republish on your own blog site https://vikrantrajliwa.com )

🌹 कार्य, अनुभव एवं परिचय। ✍️(https://vikrantrajliwal.com)

नमस्कार मेरा नाम विक्रांत राजलीवाल है। मै हरित विहार बुराड़ी दिल्ली 84 भारत में रहता हूं। और मुझ को नई नई कहानियां, नाटक, सँवाद, किस्से, गीत, ग़ज़ल, नज़म, लिखना अत्यंत ही पसन्द है। और मैं अपने ह्रदय से इच्छुक हु की आपके साथ जुड़ सकूँ। एवं अपनी लेखन कला (कहानियां, सँवाद, नाटक, गीत ग़ज़ल) से कला साहित्य की सेवा कर सकूँ।

वर्ष 2016 मैं मेरी प्रथम पुस्तक एहसास प्रकाशित हुई थी जो कि सामाजिक एवं मानवतावादी भावनाओं से प्रेरित काव्य एवं नज़म के रूप में किस्से एवं कविताएं है।
अभी तक मेने सैकड़ो, नज़म, ग़ज़ल, कविताएं, लेख, ब्लॉग्स एवं

सबसे महत्वपूर्ण मेरी पहली अति रोमांचक कहानी भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए) लिख कर अपनी ब्लॉग साइट https://vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित कर चुका हूं।

साथ ही मैंने कुछ समय पूर्व जिंदगी के हर रंग को दर्शाती हुई एक और कहानी+नाटक को पूर्ण किया है जो अभी तक अप्रकाशित है।
आशा करता हु आप तक मेरी आवाज अवश्य पहुच पाएगी।

आपका सेवक विक्रांत राजलीवाल।

मेरी लेखनी https://vikrantrajliwal.com

💥 एक सेवा। // 💥 A Social Service.

🕊️
🙏 यदि आप गरीब बच्चों, नशे से पीड़ित बच्चों, बीमार बच्चों के साक्षरता, स्वास्थ्य एवं बहेतर जीवन से सम्बंधित समाज कार्य करते है तो आप कभी भी मेरा चेरिटेबल नज़म, ग़ज़म, काव्य एवं शायरी का कार्यक्रम बिल्कुल मुफ्त करवा सकते है। इसके लिए मैं आपको कोई भी राशि नही लूंगा अपितु यकीन मानिए आप के इस नेक कार्य में अपनी रचनात्मक रचनाओं की प्रस्तुति कर मुझे ह्रदय से खुशी होगी।

विक्रांत राजलीवाल।

🕊️
🙏 If you work for the society related to literacy, health and better life of poor children, drug addicts, sick children, then you can get my charitable najam, ghazam, poetry and shayari program absolutely free. For this I will not take any amount from you, but believe me, I will be happy from my heart by presenting my creative works in this noble work of yours.

Vikrant Rajliwal.

VIKRANTRAJLIWAL.COM

मेरी कलम मेरी आवाज़।

यदि अपने से कोई भी नवन्तुक या प्रोफ़ेशनल कवि, शायर, ग़ज़लकार, व्यंग्यकार, कहानीकार, नाटककार मित्र जो अपनी रचनाओं के साथ समूह के प्रोजेक्ट्स पर भी परफॉर्मेंस प्रदान कर सकते है


एवं सबसे अहम जो एक टीम एक साहितीयिक परिवार के रूप में मेरे साथ कार्य करना करने के इच्छुक है तो अभी व्हाट्सअप नम्बर। 91+9354948135 पर मुझ से सम्पर्क कीजिए।

आपका मित्र एक रचनाकर, कवि, शायर, नज़्मकार, ग़ज़लकार, व्यंग्यकार, नाटककार एवं कहानीकार विक्रांत राजलीवाल।

एक सूचना।

🌅 सुप्रभात मित्रों शीघ्र ही आपको मेरी ब्लॉग वेबसाइट पर प्रकाशित मेरी रचनाओँ एवं कहानी के संग्रह के साथ ही ; मेरी प्रथम विस्तृत कहानी पाठन हेतु उपलब्ध करवा दी जाएगी।

जिसके शीर्षक से आपको शीघ्र ही सूचित कर दिया जाएगा। कृपया अपना अनोमोल प्रेम स्वरुप आशीर्वाद प्रदान कीजिए।

कवि शायर एवं कहानीकार विक्रांत राजलीवाल।

🕯️🏷️एहसास।/🕯️🏷️ My Feeling's.

आज किसी ने पूछा कि क्या आप शायरी के कार्यक्रम के लिए प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्पर्क के इच्छुक है तो हम आपकी भेंट करवा सकते है?

तो मैंने अत्यंत ही सरल शब्दों में उत्तर दिया कि जी शुक्रिया परन्तु साहित्य के मसले में मैं किसी किंग से कम स्वयं को नही समझता हूं। यस आई एम ए किंग ऑफ़ एक्सप्रेस मय ओं फीलिंग्स थ्रो मय पोएट्री 📝।

इससे अलग मैं चपड़ासी भी हु, क्लर्क भी हु, ग्रेजुएट हु, वन ईयर कम्प्यूटर कोर्स किया है। टाइपिंग जानता हूं। जीवन में कड़ा संघर्ष करने के उपरांत, 17 वर्ष की उम्र में पुनर्वास का कठोर दंड भुगतने के उपरांत, जीवन के प्रत्येक क्षण सत्य का सामना करते हुए। 10वी से दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक, कम्प्यूटर कोर्स, टाइपिंग सिख सका हु। हा मै एक मामूली आदमी के समान कार्य करता हु।

परन्तु यहाँ साहित्य का विषय आता है तो मै विकाऊ नही, आई एम ए किंग। मैं स्वयं के लिए लिखता हूं, गाता हु, रिकार्ड करता हु। अपनी सेल्फ पब्लिश्ड किताब प्रकाशित करवाता हु। क्यों? क्योंकि ई आम नॉट फ़ॉर सेल।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल।

Today someone asked if you are willing to contact prestigious institutions for the program of poetry, then we can meet you?

So I replied in very simple words, thank you, but in the matter of literature, I do not think of myself as less than a king. Yes I’m a King of Express May On Feelings Through My Poetry.

Apart from this, I am a peon, a clerk and a graduate, have done one year computer course. I know typing After struggling hard in life, at the age of 17, after facing the harsh punishment of rehabilitation, facing the truth every moment of life. I graduated from Delhi University from 10th, computer course, learned typing. Yes, I act like a modest man.

But here comes the subject of literature, so I am not sold, Yes, I MA King of my literature. I write for myself, sing, record. I get my self published book published. Why? Because I am not for sale.

Thank you.

Vikrant Rajliwal.

भोंडा। (एक दिलचस्प उपन्यास) With YouTube Video link. *विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एवं प्रसारित*

नमस्कार प्रिय पाठकों एवं ह्रदय अज़ीज़ श्रुताओं, आज अपनी एक अत्यंत ही दिलचस्प और भावनात्मक प्रेम कहानी “भोंडा।” का आपकी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रथम प्रकाशन करने के उपरांत, अब आपके अपने YouTube चैनल Voice Of Vikrant Rajliwal पर स्वयँ अपने स्वरों के द्वारा अपने इस प्रथम प्रकाशित उपन्यास भोंडा। को रिकार्ड कर अपलोड करते हुए मुझ को अत्यधिक हर्ष एवं रोमांच की अनुभूति प्राप्त हो रही है। भोंडा केवल एक कहानी ही भी है बल्कि यह स्वयं के भीतर एक ऐसे भावनात्मक एहसासों को संजोए हुए है जिसको लिखते समय मैं स्वयं अत्यधिक भावुक हो गया था।

अब आपका अधिक समय ना लेते हुए मैं यानी कि आपका अपना मित्र इतना ही कहना चाहूंगा कि “भोंडा सिर्फ एक कहानी ही नही है अपितु यह एक ऐसे सत्य को दर्शाती है जिसे अक्सर बहुत से युवाओं ने अनादि काल से विभिन्न प्रकार से महसूस किया है और ना जाने कब तक वह भोंडा के ही भांति उन एहसासो को महसूस करते रहेंगे।”

आशा करता हु आपको मेरी यह कहानी बल्कि अब यह कहना अधिक उचित होगा कि आपको आपकी अपनी यह कहानी “भोंडा।” आपके अपने मित्र विक्रांत राजलीवाल के साधारण से स्वरों के द्वारा सुनकर एवं महसूस करते हुए अवश्य पसन्द आएगी।

विक्रांत राजलीवाल।

मेरे फ़ेसबुक पेज़ का यूआरएल पता है।

भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए) – Vikrant Rajliwal Writing Blog’s And Website’s (Reblog/Republish)

 by Voice Of Vikrant Rajliwal ( My Writing, My Blogs & My Voice).In Blog.Leave a Commenton भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए) – Vikrant Rajliwal Writing Blog’s And Website’s (Reblog/Republish)

YouTube video link of Bhondha is https://youtu.be/P8YjIu5S5cc

If you like novel Bhondha and YouTube videos so pls subscribe my YouTube channel.

💥 एक संकल्प एक योगदान।

मित्रों मेरे जीवन का केवल एकलौता मकसद यही है कि मैं अपने जीवन अनुभवो से उन मासूम बालको को एक उचित दिशा का ज्ञान करवा सकूँ जो आज भी किसी ना किसी नशे की गिरफ्त में फंस कर अपना उज्वल भविष्य अनजाने ही बर्बाद कर रहे है।

काव्य शायरी नज़म ग़ज़ल दास्ताने लिखना एवं गाना केवल मेरा निजी शोक है एवं मैं जो पोस्ट करता हु की आप मेरा काव्य नज़म ग़ज़ल दस्तानों का कार्यक्रम बुक कर सकते है तो इसके पीछे केवल और केवल एकलौता कारण यही है कि मुझ को उन मासूम नशे से पीड़ित उन अबोध बालको की मदद करने हेतु बहुत सा रुपया चाहिए। जिससे मैं उन्हें कुछ मूलभूत सुविधाए प्रदान कर सकूँ। जिससे उनका उनके परिवार में पुनर्वास हो कर उनका जीवन  स्तर कुछ सुधर सके।

इसीलिए आप मेरा साहित्यिक काव्य शायरी का कार्यक्रम बुक कर के सीधे उन मासूम बच्चों को एक नया जीवन सहज ही प्रदान कर सकते है। इसके साथ ही यदि आप स्वयं किसी नशा मुक्ति या बाल सुधार कार्यक्रम के संचालक है तो आप आप ही मेरा साहित्यिक काव्य शायरी का कार्यक्रम निःशुल्क बुक कर अपना स्थान सुनिचित कर सकते है। मुझ को पूरी उम्मीद है कि जब आपके पेशेंट अपने बीच मे से ही निकले हुए किसी साहित्यकार की रचनाओँ को सुनेंगे तो उन्हें अवश्य ही आत्मशांति प्राप्त होएगी।
निम्नलिखित नम्बर के ज़रिए व्हाट्सएप पर मुझ से सम्पर्क कर सकते है

91+9354948135
दिल्ली 84

💥 नशा एवं पारिवारिक कलेश एक दूसरे के साथ साथ ही चलते है। यहाँ नशे से तातपर्य है कि जब आप का आपके व्यसनों पर नियन्त्रण शेष नही बच पाता। या फिर आप नशे के समक्ष स्वयँ को जर्जर महसूस करते हुए अपना नियन्त्र खो देते है।

जब ऐसा होता है तो आपका सामना होता है पारिवारिक कलेश से एवं तब आपको आवश्यकता होती है एक ऐसे ज्ञानी या अनुभवी व्यक्तित्व के व्यक्ति की जो आपकी उस स्थिती को समझने में आपकी सहायता कर सकें।

यदि आप भी ऐसी ही किसी समस्या से सामना कर रहे है तो आज ही विक्रांत राजलीवाल जी से यानी कि मुझ से मिल कर अपनी समस्या का 100%स्थाई  समाधान प्राप्त कर सकते है वह भी बिल्कुल निशुल्क।

क्योंकि रचनात्मक रचनाएँ लिखना मेरा शौक है एवं नशा मुक्ति से पारिवारिक कलेश मुक्ति मेरा कर्म है। मैं नज़म शायरी, दास्तानों के कार्यक्रम के लिए पेमेंट इसलिए लेता हूं क्यों कि उन रुपयों से मैं अधिक विस्तृत पैमाने पर नशा मुक्ति एवं पारिवारिक कलेश मुक्ति हेतू निःशुल्क सेवा इस समस्त संसार के उन पीड़ित परिवारों को उपलब्ध करवा सकूँ।

इसलिए आप यदि मुझ से मेरी नज़म दस्तानों, काव्य, नज़म ग़ज़ल का कोई भी कार्यक्रम करवाते है तो आप सीधे तौर पर समाज के उन पीड़ित परिवारों के कल्याण हेतु अपना एक अनमोल सहयोग सहज ही प्रदान कर देते है।

अंतः एक बार पुनः आप सभी को सूचित करता हु की यदि आप उपरोक्त विषय नशा मुक्ति एवं पारिवारिक कलेश मुक्ति की समस्या का एक स्थाई समाधान प्राप्त करना चाहते है तो आज ही विक्रांत राजलीवाल जी से यानी कि मुझ से सीधा सम्पर्क कीजिए।

साथ ही आप मेरा कोई नज़म ग़ज़ल, काव्य-कविताओं के साथ नज़म दस्तानों का सांस्कृतिक एवं मंनोरंजक कार्यक्रम भी बुक कर सकते है। मेरा सम्पर्क सूत्र नीचे अंकित है।

धन्यवाद।
विक्रांत राजलीवाल।

सम्पर्क सूत्र है।

वट्सअप नम्बर:: 91+9354948135

दिल्ली 84

🇮🇳 मंत्री जी। (सम्पूर्ण काव्य किस्सा) with my latest YouTube video link.

🇮🇳 मंत्री जी। काव्य किस्सा, एक व्यंग्यात्मक काव्य है। जिसको लिखने एवं रिकार्ड करने का सबसे महत्वपूर्ण कारण, इस संसार के समस्त दरिद्र एवं भ्र्ष्ट राजनीतिक से पीड़ित व्यक्तियों को, एक उचित लाभ पहुचाने का प्रयास मात्र है।

आशा करता हु मंत्री जी को देखने एवं सुननेवाले, आप सभी महानुभव अपने अपने स्तर पर, एक सकरात्मक सहयोग प्रदान करते हुए, इस संसार के समस्त दरिद्रों एव भ्र्ष्ट राजनीतिक से पीड़ित व्यक्तियों को, एक उचित लाभ एव सहानुभति पहुचा सकें।

जय हिन्द।

🙏 पाठन कीजिए मेरे यानी कि विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक काव्य किस्सा मंत्री जी का, एवं काव्य के अंत मे मंत्री जी। की नवीनतम वीडियो लिंक है जिसको छू कर आप काव्य मंत्री जी। जो कि एक व्यंग्यात्मक एवं संदेशात्मक काव्य है का स्वयं मेरे स्वरों के साथ सुनने का आनन्द प्राप्त कर सकते है।

🇮🇳 मंत्री जी। (सम्पूर्ण काव्य किस्सा)

आज ये अजब गज़ब क्या हो गया, ऐसा लगता है कि सूर्य कहि खो गया।

क्योंकि सूर्य तो ऊगा ही नही और पड़ोसी का मुर्गा कुकडु कु बोल गया।।

सुन कर बांग वो कुकडु कु मुर्गे कि मंत्री जी घबरा गए।
अलार्म बजने से पूर्व ही निंद्रा तोड़ उठ कर बैठ गए।।

देख कर हालत उनकी अजीब, उनकी धर्म पत्नी घबरा गई।
वह गई दौड़ कर तुरन्त और बी पी की गोली ले कर आ गई।।

वह बोली ऐसा क्या गज़ब हो गया।
सूर्य तो अभी ऊगा ही नही,
और आपको यह क्या हो गया।।

क्यों कर निंद्रा कच्ची आज आपकी टूट गई।
अलार्म के बजने से पूर्व ही निंद्रा कैसे खुल गई।।

कुछ कहते मंत्री जी इससे पूर्व ही धर्मपत्नी जी ने पसीना उनका पोछ दिया।
दबा कर मंत्री जी के गलफड़े, एक गोली को बी पी की उसमे घुसेड़ दिया।।

मंत्री जी अब कुछ हैरान से थे।
ऐसा हो रहा था प्रतीत कि वह कुछ परेशान से थे।।

अचानक से मंत्री जी कुछ सकपका से गए, वह बोले ऐसी तो कोई भी बात नही।
मुझे मालूम है कि सूर्य अभी ऊगा नही और यह अलार्म भी अभी तक बोला नही।।

न हो तुम परेशान, यह तड़प यह बेचैनी तेरी अति शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी।

माहौल है आज कल रैलियों का चुनावी एव मिलेगी जब राजशाही कुर्सी तो ससुरी नींद फिर से मिल जाएगी।।

नही यह सर्दी या ज़ुकाम मौसमी, यह है सत्ता की भूख,
अतरंगी इन हालातों में निंद्रा कैसे फिर मुझे आ जाएगी।।।

धर्म पत्नी जी आप तो ख़ामख़ा ही सकपका गई हो।

और बिन बात ही बी पी की गोली को ले कर आ गई हो।।

मुझे तो कोई भी परेशानी ऐसी नही और आप ख़ामख़ा डॉक्टर बन कर आ गई हो।

धर्म पत्नी हो आप एक नेता की खेल यह भी है एक अतरंगी, ज्ञात है जो यह आपको तो फिर क्यों आप सकपकाई हो।।

यह सुनते ही धर्मपत्नी जी अब के जो फिर से कुछ सकपाई।
वह आई कुछ समीप और व्यथा व्याकुल ह्रदय कि अपने बताई।।

वह बोली आज क्योंकर मंत्री जी इतनी जल्दी उठ गए हो, यह देख कर मैं कुछ घबराई थी।

देखा जो व्याकुल आपको तो न जाने क्यों बिन बात ही मैं कुछ घबराई और सकपकाई थी।।

कुछ और तो सूजा नही मुझ को मंत्री जी, हड़बड़ाहट में इसलिए ले कर बी पी की गोली आई थी।।।

अब के मंत्री जी जो कुछ मुस्काए।
दे कर ताव नुकीली भद्दी मुछो पर अपनी,
अब वह जो कुछ बतियाए।।

वह बोले तुम अभी तलक हो नादान, दोष इसमें तुम्हारा कोई नही।
आज तलक हो शायद हमसे अंजान, दोष इसमें तुम्हारा कोई नही।।

मैदान में लाल गंज के बड़े, हो हल्ला है आज भारी।
होंगे बड़े बड़े ग़द्दावर मंत्री उपस्थित वहाँ,
लहर गठबंधन की मंच से संचालन कि मेरी ही है आज जिम्मेवारी।।

बीच निंद्रा से मधुर स्वप्न को इसी के वास्ते जो स्वम् ही तोड़ दिया अपने।
न हो हैरान के टूटे हर स्वप्न को साकार प्रिय कर देंगे जरूर आज हम अपने।।

मंत्री जी धर्मपत्नी जी को अभी कुछ समझा ही रहे थे।
व्यथा व्याकुल ह्रदय की अपने अभी उन्हें बता ही रहे थे।।

उसी समय मुर्गे ने पड़ोस के तीव्र बांग अपनी लगा दी।
और समीप रखे अलार्म ने भी अपनी ध्वनि सुना दी।।

हो गया एहसास मंत्री जी को कि हा अब सुबह हो गई थी। क्योंकि पड़ोस के मुर्गे ने बांग और समीप के अलार्म ने ध्वनि अपनी सुना दी थी।।

यह जानते ही मंत्री जी ने अपनी आंखें कुछ फड़फड़ाई और जोरदार एक अंगडाई लगाई।
घुमा कर नाज़ुक कलाइया उन्होंने सुखी हड्डियां जो अपनी फिर कड़कड़ाई।।

सूर्य ऊगा तो फूल सा खिल कर छा गया निल गगन में एक प्रकाश।
खिल उठे मंत्री जी भी फूल के समान किया उन्होंने फिर स्नान।।

पहन कुर्ता खादी का अपना नवीन, देख रहे है किसकी राह।
देख उन्हें हुआ प्रतीत कि जैसे उन्हें अभी भी है कुछ चाह।।

झलक रही है स्वार्थी भद्दे चेहरे पर कुछ बेचैनी सी उनके बढ़ी हुई।
उनको है प्रतीक्षा किसी खास कि शायद, स्थिर है मुद्रा उनकी, स्थिर है बेचैनी सी।।

अपनी इसी बैचेनी में आवाज एक धर्मपत्नी जी को अपनी लगा दी।
तभी हुई दस्तक एक और किसी ने उनके दरवाजे की घण्टी बजा दी।।

आया है भाषण की लेकर के उनकी उनका पी ए एक पर्ची, बात उनको उनके नोकर ने आहिस्ता से यह बता दी।

दौड़ पड़े मंत्री जी सुनते ही यह और पहुच समीप लापरवा पी ए के अपने, कुछ डॉट फटकार उन्होंने उसको जो लगा दी।।

वह बोले नही है तुमको तनिक भी ध्यान, इतना विलंभ से जो अब आते हो।
इतना विलंभ जटिल इन परिस्थितियों में क्यों कर के भला तुम लगाते हो।

उनका पी ए भी निकला टेडी खीर वह तुरन्त अपनी भुल मान गया।
कर के टेडी कानी आँख को एक अपनी, मंत्री जी से वो कुछ बतला गया।।

न हो नाराज मंत्री जी वह बोला कि इस पर्ची में अजब गजब का है भारी बवाल।
इसमें कोरा भाषण ही नही, संवेदनशील भावो का है एक भरा पूरा मकडजाल।।

अपने इस विलंभ के लिए हु मैं महोदय ह्रदय से अपने जो क्षमा प्राथी।
न करें अब आप विलम्ब, कर दीजिए कूच मैदान में कि हर कोई है आपका वहा प्रतिक्षाथि।।

सुन कर पी ए का ऐसा उत्साहवर्धक संवाद अपने मंत्री जी भी उत्साह से भर गए।
ले कर पर्ची अपने पी ए के हाथ से तीखी सी एक नज़र शब्द अक्षरों से दौड़ा गए।।

वह बोले तुम आए विलंभ से क्रोध मुझ को अत्यंत भारी तब हुआ।

कार्य से परन्तु तुम्हारे हर्षित यह मन उपवन अब जो मेरा हुआ।।

खबर मैदान लाल गंज की भी कुछ साथ अपने क्या लाए हो।
या खाली संवाद पर्ची सहित ही कोरे ठूठ से चले आए हो।।

सुनाया मंत्री जी के पी ए ने वास्तविक समस्त फिर हाल कि हो हल्ला है भारी वहाँ।

हर कोई है उत्साहित और सब के सब जनमानस आप के हि है प्रतिषार्थी सिर्फ वहाँ।।

भरा है जन्मांसो से खचाखच मैदान लाल गंज, बची न क्यारी कोई भी रिक्त प्रशंषको से आपके वहाँ।।।

ले कर समस्त परिस्तिथियों का जायज़ा मंत्री जी फिर मुस्काए।
बैठ गाड़ी में लाल बत्ती की अपने मैदान लाल गंज को वो फिर आए।।

सत्य है मैदान लाल गंज में हो हल्ला है आज अत्यंत ही भारी ।
हर कोई है मंत्री जी का प्रतिषार्थी और उनका उत्साह भी है अत्यंत ही भारी।।

आपसी गठबंधन का मंच यह खेल कुछ कुछ नही अत्यंत ही निराला है।
दुध से भरी हंडिया को जैसे कुछ बिलोटनो ने आपस मे ही बाट डाला है।।

ठहरे हुए जल मे मार के राजनीतिक लाठी इस प्रकार से जैसे,
पक्ष में अपने लहर सी कोई उन्होंने चलाई।

सौ चूहे खा कर के देखंगे आज घोटाली,
कौन कौन सी सियानी बिल्ली हज करने को चुनावी आई।।

आए है राज्य राज्य से कई घोटाले बाज भी मंत्री जो पुराने।
हुआ है स्वागत सत्कार अत्यंत मंत्री जी का भी भारी जो अपने।।

इसी धमाचौकड़ी और होहल्ले के मध्य आई मंत्री जी के भाषण संवाद कि बारी।
मंत्री जी है अपने बहुत ही होशियार, स्थान से अपने उन्होंने अपनी आंखे दोनों मुचकाली।।

राजनीतिक इस उखट पटक में मंत्री जी का भरे मंच पर
कुर्ता कुर्सी से उनकी अटक गया।

यू ही उन्होंने आगे को बढ़ना चाहा, तो कुर्ता उनका अकड़ कर के फट गया।।

देख नग्न यू बदन मंत्री जी का अपने खस्ताहाल।
मच गया भरी सभा मे फिर जैसे कोई बबाल।।

ऊपर से था कुर्ता चमकदार जो उनका फट गया।
अंदर से थी बनियान एक उनकी, छिद्र जिसका घिनोना अब सब को दिख गया।।

देख ये आम जनता होले से कुछ मुस्काई।
मंत्री जी की तो जैसे अब शामत सी आई।।

किसी मनचले ने इस पर भी चुटकी ले डाली।
ध्यान है आप का मंत्री जी कहा,
आपके खस्ताहाल कुर्ते ने तो आप कि पोल ही खोल डाली।।

यह सुनते ही घबराई जनता ने फिर से लगाया जो एक ठहाका।
मंत्री जी भी नही थे नादान, फ़टी बनियान के उस छिद्र को उन्होंने हाथों से था अपने ढका।।

फ़टी बनियान, फ़टी किस्मत, फट गया था उनके बुलन्द सितारों का ढ़ोल।
हर कोई लगा रहा था ठहाका जैसे खुल गई हो उनके घोटाले वाली कोई पोल।।

जोड़ कर अपनी हिम्मत समस्त, भरे मंच से उन्होंने फिर एक यह तरकीब लगाई।।
वह बोले कि नही कोई दोष इसमें उनका कि उनके कुर्ते का आस्तीन ही पुराना था।।

इसलिए पाए में कुर्सी के अटक कर उधड़ गया।
स्वम् तो फटा ही ज़ालिम छेद बनियान में भी कर गया।।

तभी नेता जी का एक चमचा मंच से के कूद गया।
उड़ाई थी जिस मनचले ने नेता जी की खिल्ली,
सीधा उस पर ही जाकर गिर गया।।

भाप गए मंत्री जी भी तुरंत समस्त हालात।
निकाल बगल से वादों का अपने पर्चा चुनावी,
शुरू कर दी उन्होंने अपनी बात।।

हर शब्द हर वचन थे बनावटी उनके,
घिनोने मायाजाल हो कोई जैसे।

झलकता छल, दूषित चरित्र, समान फ़टे कुर्ते के नंगापन उनका, कपटी हर भाव हो कोई उनके जैसे।।

भरी हुंकार फ़टे कुर्ते से सीना फिर ताने मंत्री जी जो अपना।
बोले मिटा देंगे दरिद्रता दरिद्र की, कर देंगे चौतरफा विकास अब के हम ऐसा।।

गांव किसी प्रान्त में ढूंढे न ढूंढ पाओंगे, भूखा कोई गरीब कहि फिर तुम नंगा।

लक्ष्य एक है एक ही मुद्दा, रोटी कपड़ा और मकान हम सब का हो अपना।।

हर स्वप्न कर देंगे तुम्हारा हम पूर्ण।
आएंगे जीत कर इस बार बहुमत से जब पूर्ण।।

दिखा कर स्वप्न सुहावने, दिन सुनहरे, पूर्ण एक विकास के।
उतर मंच से, बैठ गाड़ी में अपनी, चले गए मंत्री जी अपने ठाठ से।।

देख चतुराई नेता जी की अपने परेशान जनता जो होले होले से फिर मुस्काई।

चालाकी मंत्री जी कि ये घर पहुच कर, हर किसी ने एक दुज्जे से फिर बतलाई।।

यही सत्य है यही होता है हर बार, चुनावी इम्तेहान, चुनावी प्रक्रिया से पूर्व।

झूठे वादों से चुनावी, ठगी जनता, बेबसी पर अपनी जब मुस्काए।।

और नेता जी भी चालाकी पर अपनी सीना ठोक कर जब इठलाए।।।

क्यों बट जाता है वर्गों में जात पात के देश ये प्यार अपना।

अमीर बन जाता है और अमीर, नसीब पर गरीब के लग जाता है क्यों, भुखमरी, लाचारी, बेबसी से पूर्ण गरीबी का एक ताला।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

15/12/2018 at 22:30

पुनः प्रकाशित नवीनतम वीडियो यूट्यूब वीडियो लिंक के साथ 26 अक्टूबर वर्ष 2019 समय रात्रि 9:20 बजे।

यूट्यूब नवीनतम वीडियो लिंक है।

Watch “🇮🇳 मंत्री जी। ( Mantri ji ) written and Voice by Vikrant Rajliwal” on YouTube

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👉 https://youtu.be/4OFVU01dPT0 🙏💖💖

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