True Experience.

Today, when someone who knows and understands me closely from me, asks what is the real reason behind the positive change that is happening within you? Then I would like to tell them that in the year 2000, when I was 15 or 16, I contacted my father and informed him that my health is bad and on the way I told him the reality that someone should fill me with a cigarette Has given drink And this has been happening for a long time. Then my father became very angry with me. And they said to me with the same angry voice that you should tell all this to the doctor!

The most important first topic here is that I was willing to accept the truth in my ignorant age, and to free myself from all kinds of harmful substances. And the second most important topic is that at that time the knowledge to understand my real situation was not available to myself and my family. For this reason, I was imprisoned at home despite not wanting due to ignorance. What would be the health, my physical and mental health also got greatly distorted. Due to this ignorance, I also suffered many physical and mental injuries. Whose pain I may not be able to express even if I want to.

Thereafter, my father provided me with a cure for health enhancement through many Hakiams, tantrikas and hospitals. But all were found in futility. Finally in the year 2004, I was admitted to the rehabilitation center. Where I was getting the knowledge that I was facing after facing many complicated and difficult results, I realized that this is what I needed and still am! But in this way, like a prisoner, in punitive situations, like a bird in a cage, I may not be able to achieve health in an environment of fear. While ignoring all the complex and harsh results there, the divine knowledge that I was receiving is just life.

And while accepting the position of prisoner, I continued to adopt divine knowledge of my life as a slave. But today after 15 years, in December, 2019, I can say that the divine knowledge that I was in need of at the age of 15 or 16 in 2000. The unknown path which I had chosen for myself by truth. I could not work in my life in an environment of Dependence like a prison and forcefully. But this does not mean that that divine knowledge proved futile in my life. But in a free environment today without any restriction, with a self-acknowledgment of self-free and positive efforts, after graduation from Delhi University free of all kinds of harmful addictions from 28 months to 5 days, through a creative writing of literature I am doing service

That is why if a positive change can come in my life, then you or your family or the child who is stuck in the grip of addictions can also have a positive change in their life. And they can do a better job than me. If they just need, then a qualified person and friend who can understand their problems closely can help them by understanding them and their problems.

Written by Vikrant Rajliwal.

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एक सत्य अनुभव।

आज मुझ से मुझ को समीप से जानने एवं समझने वाला कोई व्यक्ति जब  पुछता है कि आप के भीतर जो एक सकरात्मक परिवर्तन देखने को प्राप्त हो रहा है उसके पीछे वास्तविक कारण क्या है? तब मैं उनसे यही कहना चाहूंगा कि वर्ष 2000 में जब मैं 15 या 16 वर्ष का था तब मैंने अपने पिताजी से संपर्क कर उन्हें सूचित किया कि मेरी तबियत खराब है एवं राह में मैने उनसे वास्तविकता बतलाई कि मुझ को किसी ने सिगरेट में कुछ भर कर पिला दिया है। और ऐसा बहुत समय से हो रहा है। तब मेरे पिता जी मुझ पर अत्यंत क्रोधित हो गए। और उन्होंने मुझ से उसी क्रोधित स्वरों के साथ कहा कि यह सब डॉक्टर को बतइयो!


यहाँ सबसे अहम प्रथम विषय यह है कि मैं आपका अपना मित्र उस अबोध उम्र में सत्य स्वीकार कर, स्वयं हर प्रकार के हानिकारक प्रदार्थों से मुक्त होने के लिए इच्छूक था। एवं दूसरा सबसे अहम विषय यह है कि उस समय मेरी वास्तविक स्थिति को समझ सकने का ज्ञान स्वयं मुझ को एवं मेरे परिवारजनों को भी उबलब्ध नही था। इसी कारण अज्ञानता के कारण ना चाहते हुए भी मैं घर में कैद हो कर रहा गया। स्वास्थ्य तो क्या प्राप्त होता मेरा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य भी अत्यधिक विकृत होता गया।  इसी अज्ञानता के कारण मुझ को कई प्रकार की शारिरिक एवं मानसिक चोटें भी लगी। जिनके दर्द को शायद मैं चाह कर भी बयां ना कर सकूँ।

तदोपरांत मेरे पिताजी ने कई हकीमों, तांत्रिकों एवं हॉस्पिटल से मुझ को स्वस्थ्य वृद्धि हेतु इलाज मुहैया करवाया। परन्तु सब व्यर्थता को प्राप्त हुए। अंततः वर्ष 2004 मैं मुझ को पुनर्वासकेन्द्र मै भर्ती करवाया गया। जहाँ बहुत से जटिल एवं कठोर परिणामो को झेलने हुए मुझ को जो ज्ञान प्राप्त हो रहा था उससे मुझ को एहसास हुआ कि हा इसी की तो मुझ को अत्यंत आवश्यकता थी और अब भी है! परन्तु इस प्रकार से एक कैदी की भांति, दण्डनात्मक परिस्थितियों में, इस प्रकार एक पिंजरे के पंछी की भांति डर के माहौल में शायद मैं स्वास्थ्य को प्राप्त ना कर सकूँ। जबकि वहाँ के समस्त जटिल एवं कठोर परिणामो को नज़रंदाज़ करते हुए, जो दिव्य ज्ञान मुझ को प्राप्त हो रहा था बस वही तो जीवन है।


एवं कैदी सी की स्थिति को ना चाहते हुए भी स्वीकारते हुए, एक गुलाम कि भाँति अपने जीवन के दिव्य ज्ञान को मैं अपनाता रहा। परन्तु आज 15 वर्षो के उपरांत दिसम्बर वर्ष 2019 में मैं यह कह सकता हु की वह दिव्य ज्ञान जिसकी मुझ को वर्ष 2000 में 15 या 16 वर्ष की उम्र में अत्यधिक आवश्यकता थी। जिस अनजान मार्ग को सत्य के द्वारा मैंने स्वयं के लिए स्वयं ही चुना था। एक अस्वतंत्र एवं जोरजबरदस्ती के माहौल में मेरे जीवन मे  कार्य ना कर सका। परन्तु इसका तातपर्य यह नही की वह दिव्य ज्ञान मेरे जीवन मे व्यर्थ सिद्ध हुआ। अपितु एक स्वतंत्र माहौल में  आज में बिना किसी बन्धन के, एक आत्मस्वीकृति के साथ स्वयं के स्वतंत्र एवं सकरात्मक प्रयासो के साथ 28 महीने 5 दिनों से हर प्रकार के हानिकारक व्यसनों से मुक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के उपरांत, एक रचनात्मक लेखनी के द्वारा साहित्य की सेवा कर रहा हु।

इसीलिए यदि मेरे जीवन में एक सकरात्मक परिवर्तन आ सकता है तो तो आप या आपके परिजन या वह बालक जो व्यसनों की गिरफ्त में फंसे हुए है, उनके जीवन मे भी एक सकरात्मक परिवतर्न अवश्य उतपन हो सकता है। एवं वह मुझ से भी बहुत अच्छा कार्य कर सकते है। बस उन्हें आवश्यकता है तो उनकी समस्याओं को समीप से समझ सकने वाले एक ऐसे योग्य व्यक्ति एवं मित्र की जो उन्हें एवं उनकी समस्याओं को समझते हुए उनकी सहायता कर सके।


विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

💥 एक संकल्प एक योगदान।

मित्रों मेरे जीवन का केवल एकलौता मकसद यही है कि मैं अपने जीवन अनुभवो से उन मासूम बालको को एक उचित दिशा का ज्ञान करवा सकूँ जो आज भी किसी ना किसी नशे की गिरफ्त में फंस कर अपना उज्वल भविष्य अनजाने ही बर्बाद कर रहे है।

काव्य शायरी नज़म ग़ज़ल दास्ताने लिखना एवं गाना केवल मेरा निजी शोक है एवं मैं जो पोस्ट करता हु की आप मेरा काव्य नज़म ग़ज़ल दस्तानों का कार्यक्रम बुक कर सकते है तो इसके पीछे केवल और केवल एकलौता कारण यही है कि मुझ को उन मासूम नशे से पीड़ित उन अबोध बालको की मदद करने हेतु बहुत सा रुपया चाहिए। जिससे मैं उन्हें कुछ मूलभूत सुविधाए प्रदान कर सकूँ। जिससे उनका उनके परिवार में पुनर्वास हो कर उनका जीवन  स्तर कुछ सुधर सके।

इसीलिए आप मेरा साहित्यिक काव्य शायरी का कार्यक्रम बुक कर के सीधे उन मासूम बच्चों को एक नया जीवन सहज ही प्रदान कर सकते है। इसके साथ ही यदि आप स्वयं किसी नशा मुक्ति या बाल सुधार कार्यक्रम के संचालक है तो आप आप ही मेरा साहित्यिक काव्य शायरी का कार्यक्रम निःशुल्क बुक कर अपना स्थान सुनिचित कर सकते है। मुझ को पूरी उम्मीद है कि जब आपके पेशेंट अपने बीच मे से ही निकले हुए किसी साहित्यकार की रचनाओँ को सुनेंगे तो उन्हें अवश्य ही आत्मशांति प्राप्त होएगी।
निम्नलिखित नम्बर के ज़रिए व्हाट्सएप पर मुझ से सम्पर्क कर सकते है

91+9354948135
दिल्ली 84

💥 नशा एवं पारिवारिक कलेश एक दूसरे के साथ साथ ही चलते है। यहाँ नशे से तातपर्य है कि जब आप का आपके व्यसनों पर नियन्त्रण शेष नही बच पाता। या फिर आप नशे के समक्ष स्वयँ को जर्जर महसूस करते हुए अपना नियन्त्र खो देते है।

जब ऐसा होता है तो आपका सामना होता है पारिवारिक कलेश से एवं तब आपको आवश्यकता होती है एक ऐसे ज्ञानी या अनुभवी व्यक्तित्व के व्यक्ति की जो आपकी उस स्थिती को समझने में आपकी सहायता कर सकें।

यदि आप भी ऐसी ही किसी समस्या से सामना कर रहे है तो आज ही विक्रांत राजलीवाल जी से यानी कि मुझ से मिल कर अपनी समस्या का 100%स्थाई  समाधान प्राप्त कर सकते है वह भी बिल्कुल निशुल्क।

क्योंकि रचनात्मक रचनाएँ लिखना मेरा शौक है एवं नशा मुक्ति से पारिवारिक कलेश मुक्ति मेरा कर्म है। मैं नज़म शायरी, दास्तानों के कार्यक्रम के लिए पेमेंट इसलिए लेता हूं क्यों कि उन रुपयों से मैं अधिक विस्तृत पैमाने पर नशा मुक्ति एवं पारिवारिक कलेश मुक्ति हेतू निःशुल्क सेवा इस समस्त संसार के उन पीड़ित परिवारों को उपलब्ध करवा सकूँ।

इसलिए आप यदि मुझ से मेरी नज़म दस्तानों, काव्य, नज़म ग़ज़ल का कोई भी कार्यक्रम करवाते है तो आप सीधे तौर पर समाज के उन पीड़ित परिवारों के कल्याण हेतु अपना एक अनमोल सहयोग सहज ही प्रदान कर देते है।

अंतः एक बार पुनः आप सभी को सूचित करता हु की यदि आप उपरोक्त विषय नशा मुक्ति एवं पारिवारिक कलेश मुक्ति की समस्या का एक स्थाई समाधान प्राप्त करना चाहते है तो आज ही विक्रांत राजलीवाल जी से यानी कि मुझ से सीधा सम्पर्क कीजिए।

साथ ही आप मेरा कोई नज़म ग़ज़ल, काव्य-कविताओं के साथ नज़म दस्तानों का सांस्कृतिक एवं मंनोरंजक कार्यक्रम भी बुक कर सकते है। मेरा सम्पर्क सूत्र नीचे अंकित है।

धन्यवाद।
विक्रांत राजलीवाल।

सम्पर्क सूत्र है।

वट्सअप नम्बर:: 91+9354948135

दिल्ली 84

एक आभार। 🙏

वर्ष 2008 में, जीवन एक दम से बदल गया। अचानक ही मुझ को, जब पता चला कि इस बार जो मेरे हाथों में किताब है। वह वास्तविक रूप से सत्य है। एवं मैने परीक्षा की तैयारी, प्रारम्भ कर दी। अब मैं पूर्व की अपेक्षा, स्वयं को अधिक सन्तुष्ट, महसूस कर पा रहा था। आज लगभग 6 वर्षो के गेप के उपरांत, मेरे हाथों में एक बार पुनः सरस्वति विराजमान थी। जो मुझ से कह रही थी कि यही अवसर है पुत्र, स्वयँ के अज्ञान को दूर करते हुए। ग्रेजुएट साक्षरता को प्राप्त करने का।

उस समय मैं शायद अपनी उन भावनाओं से कुछ अनजान था। एवं आज लगभग 11 वर्षो के उपरांत दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होने के उपरांत, एवं निरन्तर सक्रिय रहते हुए मुझ को, जो साहित्यिक रचनाओँ को रचने का एक अवसर, एक वरदान स्वररूप प्राप्त हुआ है। मैं चाह कर भी, अपनी इस भावना को, शायद व्यक्त ना कर सकूँ।

मैं यानी कि आपका अपना मित्र विक्रांत राजलीवाल, माँ सरस्वती समेत आपने इष्ट देवताओं एवं आप आप सभी प्रशंशको का हार्दिक आभार व्यक्त करता हु।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

3 नवम्बर वर्ष 2019 समय प्रातः 9:27 बजे।

एक टिस। // A Pain.

आज बहुत से व्यक्ति मेरे प्रति यही सोचते है कि मैं अपने जीवन उदेश्यों में असफल हो चुका हूं। अपने जीवन मे हार चुका हूं। यदि वह आज ऐसा कहते या सोचते है तो इसके पीछे भी कोई ना कोई कारण भी अवश्य ही होगा? परन्तु उन कारणों की वास्तविकता क्या है और क्यों है? ऐसे जानने कि किसी भी व्यक्ति की कभी भी कोई रुचि ना होगी। यदि आज कोई मुझ को असफल या हारा हुआ कहते हुए मुझ को तोड़ने का प्रयत्न करते हुए तोड़ देता है? तो क्या, मैं उन्हें अपने जीवन को संकट में डालने का दोषी सिद्ध करते हुए स्वयँ के संघर्ष को धुत्कार दु!

नही! मैं ऐसा नही कर सकता हु। परंतु आज वर्षो के संघर्ष के उपरांत मुझ को एहसास होता है कि जीव ने जीवन को अपने स्वयँ ही सँवारा है स्वयँ ही बिगाड़ा है, स्वयं ही बिगाड़ा है, हा स्वयं ही बिगाड़ा है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
24/10/2019 at 9:10 am

A Pain.

Today many people think towards me that I have failed in my life objectives. I have lost in my life. If he says or thinks so today, there must be some reason behind it too? But what is the reality of those reasons and why? Knowing that no person will ever have any interest. If today someone breaks me while trying to break me by calling me a failure or a loser? So what, while proving them guilty of putting their lives in jeopardy, I despise my own struggle!

no! I can not do this But today, after years of struggle, I realize that the creature has spoiled life on its own, has spoiled itself, has spoiled itself, and has spoiled itself.

Written by Vikrant Rajliwal.
24/10/2019 at 9:10 am

💥 कर्म एवं कर्मफल। / 💥 Karma And Karma.

यदि आप स्वयं में सकरात्मक बदलाव उतपन्न करते हुए अपने जीवन में आत्मशांति का अनुभव प्राप्त करना चाहते है, तो आज और अभी से किसी भी एक महान व्यक्त्वि के व्यक्ति के जीवन अनुशाशन, एवं विचारों का अनुसरण करना प्रारंभ कर दीजिए।

इस प्रकार से आप पाएंगे कि कुछ समय के उपरांत आप नकल से असल को प्राप्त हो जाएंगे। क्योंकि मात्र सोचने से हम मनुष्यों के जीवन मे कोई भी सकरात्मक बदलाव उतपन्न नही हो सकेगा। इसके लिये हमें सकरात्मकता का अनुसरण करते हुए नकल से असल तक पहुचना ही पड़ेगा।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
23 अक्टूबर, 2019 समय 10:57 am

💥 Karma And Karma. (Translated)

If you want to get a sense of self-peace in your life by creating a positive change in yourself, then start following the life, discipline and thoughts of any one great person today and now.

In this way you will find that after some time you will get the real one by copying. Because just thinking, we will not be able to create any positive change in our human life. For this, following the positiveness, we have to reach from imitation to the real.

Thank you.

Written by Vikrant Rajliwal.

23 October, 2019 time 10:57 am

कृपया अपने जीवन मूल्यों को पहचानिए। / Know The Value Of You Life.

नमस्कार प्रियजनों, वैसे तो मुझ को अपनी और आप सब की अपनी इस ब्लॉग साइट पर ही अपने विचारों को अपनी लेखनी के माध्यम द्वारा प्रस्तुत करना अधिक शांति प्रदान करवाता है। परन्तु कभी कभी आप भावुक हो कर अपनी भावनाओं बह जाते है। ऐसे ही बीते कुछ समय के दौरान मैंने अपने फेसबुक पेज के प्रिय फॉलोवर्स के लिए कुछ समाजिक एवं रचनात्मक विषय को पोस्ट के माध्यम द्वारा साँझा किया था। जिन्हें फेसबुक ने एक ही क्षण में डिलीट कर दिया। अभी तक मैं अपने फेसबुक पेज़ पर अपने माता एवं पिता की महेनत की कमाई के लगभग 15,000 हज़ार खर्ज कर चुका हूं। एवं कुछ महीने पूर्व फ़ेसबुक ने मुझ को 700 ₹ का टोकन दिया था। अपने फेसबुक पेज को प्रमोट करने हेतु। परन्तु जब मैने उसका इस्तेमाल किया तो मेरे पिताजी के बैंक खाते से 10000 हज़ार रुपए चोरी हो गए। खैर, आज मैं, अपनी इन ग़लतियो से सिख लेते हुए, अपनी उन्ही समाजिक एवं रचनात्मक विषयो को आपकी इस ब्लॉग साइट पर साँझा कर रहा हु।

Translated.

Hello dear ones, by the way, it gives me more peace to present my thoughts on your blog site through your stylus. But sometimes you get emotional and your feelings get carried away. During the same time, I had shared some social and creative topics through posts for the dear followers of my Facebook page. Which Facebook deleted in an instant. So far, I have spent about 15,000 thousand rupees on my Facebook page and the income of my mother and father. And a few months ago Facebook gave me a token of 700 ₹. To promote your Facebook page. But when I used it, 10,000 rupees were stolen from my father’s bank account. Well, today, while learning from these mistakes, I am sharing my same social and creative subjects on this blog site.

आज का विचार।

आप केवल सत्यकर्म कर सकते है परन्तु आपके द्वारा किए गए प्रत्येक सत्यकर्मो के प्रतिफल आपको सत्यकर्मी व्यक्त्वि के व्यक्तियों द्वारा सहज ही आशीष प्राप्त होगा एवं कुकर्मि व्यक्ति के व्यक्तियों द्वारा रचित छल, कपट एवं दुर्व्यवहारों से आपका प्रत्यक्ष सामना होगा सहज ही है।

एवं यहाँ आपके सत्यकर्म एवं आपका दृढ़ साहस ही आपको इस संसार के समस्त कुकर्मियों से सुरक्षा प्रदान करते हुए, आपके प्रत्येक सत्यकर्मो से आपके दिव्य व्यक्त्वि में एक ऐसी दिव्य शक्ति एवं ऊर्जा उतपन करेगा, जिसके समक्ष कोई भी कुकर्मी क्षण भी ठहर नही सकेगा एवं निच्छित ही वह अपने पतन को प्राप्त होंगे।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

18 अक्टूबर वर्ष 2019 समय प्रातः 9:17 बजे। (फेसबुक पर)

आज ही आपकी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com से जुड़ जाए एवं YouTube चैनल Voice Of Vikrant Rajliwal को सब्सक्राइब करे।

यूआरएल है https://www.youtube.com/channel/UCs02SBNIYobdmY6Jeq0n73A

Today’s thought. (Translated)

You can only do Satyakarma but the reward for every Satyakarma you have done will be blessed by the people of the person of Satyakarm and you will be directly confronted with the deceit, deception and misconduct by the persons of Kukarmi (evil-doer).

And here only your Satyakarma and your steadfast courage will inculcate in your divine person a divine power and energy from each of your Satyakarma, giving you protection from all the misdeeds of this world, In front of which no evil-doer can stop even for a moment and he will surely achieve his downfall.

Written by Vikrant Rajliwal.

October 18, 2019 at 9:33 am (On Facebook)

Join your own blog site vikrantrajliwal.com today and subscribe to the YouTube channel Voice of Vikrant Rajliwal.

The URL is https://www.youtube.com/channel/UCs02SBNIYobdmY6Jeq0n73A

यदि आप हानिकारक व्यसनों से मुक्त होना चाहते है! तो स्वयं के प्रति एक विशवास उतपन कीजिए। एक दृढ़ संकल्प के साथ, एक स्वास्थ्य जीवन शैली को अपनाइए। अपने जीवन से प्रत्येक हानिकारक भोज (हानिकारक खाद्य प्रदार्थ, नशीले खाद्य प्रदार्थ) का त्याग कीजिए। शुद्ध विचारो को धारण कीजिए। एवं उनका पालन कीजिए। अपने धर्म को, यहाँ अपने धर्म से तत्प्रय है कि जिस धर्म या सम्प्रदाय को आपकी अंतरात्मा के द्वारा स्वीकार किया गया है। उस अपने धर्म के साथ अध्यात्म, योग एवं प्राकृतिक व्यायाम से भी जुड़ने का प्रयत्न कीजिए। एवं सबसे महत्वपूर्ण हर विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आदर्शो के साथ ईमानदार रहिए।

जब उपरोक्त विषयों का आप अपने स्वास्थ्य जीवन शैली में पालन करते हुए उनका ईमानदारी से निर्वाह करना प्रारम्भ कर देंगे तब आपका जीवन स्वयँ ही सकरात्मक बदलाव के साथ परिवर्तित होते हुए दिव्यता से महक उठेगा।

क्योंकि इसके सिवाय और कोई भी मार्ग उपको शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य प्रदान नही कर सकेगा! यह मैं स्वयं के निजी अनुभवो के द्वारा प्राप्त एक स्वास्थ्य एवं निर्णयक जीवन शैली की प्राप्ति के उपरांत उपरोक्त विषय लिख या कह रहा हु।

मैं वर्ष 2003 या 04 से कई प्रकार के उतार चढ़ावों से गुजरने के उपरांत। बीते दो वर्षों से पूर्णतः किसी भी प्रकार के हानिकारक व्यसन के सेवन से मुक्त एक स्वास्थ्य जीवन जी रहा हु। क्यों कि जब आप के समीप स्वयं के मानसिक एवं शारिरिक विकास के लिए स्वतंत्रता होती है। एवं आप को उसका महत्व ज्ञात होता है। तो आपके जीवन मे एक सकरात्मक परिवर्तन सहज ही उतपन्न हो जाता है। आज मैं व्यायाम करता हु। अध्ययन करता हु। एवं बीते 26 महीनों और 6 दिनों से सोशल मीडिया पर किसी भी प्रकार के हानिकारक व्यसन से मुक्त सक्रिय भी हु। मैंने इस दौरान सैकड़ो रचनाए, काव्य, कविताएं, नज़म ग़ज़ल,गीत, व्यंग्य , एवं सामाजिक, आद्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक लेखों को लिखा एव प्रकाशित किया एवं अपनी अति विस्तृत नज़म दस्तानों को भी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित किया। इसी दौरान मैने अपना प्रथम लघु उपन्यास भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए) को लिखा एवं कुछ दिन पूर्व ही अपनी ब्लॉग साइट पर प्रकाशित भी किया है। इसके साथ हु अपने यूट्यूब चैनल Voice Of Vikrant Rajliwal पर बहुत सी अपनी रचनाओं एवं दास्तानों की रिकार्डिन भी करि है।

यह सब कुछ उन्ही उपरोक्त विषय का दृढ़तापूर्वक पालन करने से ही सम्भव हो सका है।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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🇮🇳 वास्तविक स्वतंत्रता।

क्रूर, तानाशाह एवं अत्याचारी व्यवस्था से स्वतँत्रता प्राप्ति हेतु आपको सत्याग्रह के साथ आक्रामक हथियारों से भी शश्क्त होना पड़ता है।

एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत जब आपका सामना, भृष्टाचारी संस्थाओ, क्रूर तानाशाह, एवं अत्याचारी व्यक्तित्व के व्यक्तियों के साथ, उनके द्वारा स्थापित उनके मकड़जाल से होता है और आप स्वयँ को उसमे सम्पुर्ण रूप से फंसा हुआ पाते है। तब उन से मुक्ति हेतु आपको सत्यकर्मो, अनुशाशन, के साथ अपने अधिकारों का ज्ञान भी अति आवश्यक है। यह ज्ञान आपको उचित शिक्षा की प्राप्ति के उपरांत सहज ही प्राप्त हो जाता है। इस भृष्ट मकड़जाल को तोड़ना सहज नही। परन्तु आप स्वयँ को दृढ़ आत्मविश्वास के साथ सत्यकर्मो एवं निस्वार्थ कर्मो के द्वारा ईमानदारी से इस दिव्य मार्ग पर अड़िग रख कर उस मकड़जाल से मुक्त हो जाएंगे।

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण विषय यह है कि क्या आप वास्तविक रूप से एक उज्वल स्वतंत्र व्यक्तित्व की प्राप्ति के लिए प्रयासरत है या नही?

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

13 अक्टूबर प्रातः 8:19 बजे फेसबुक पर।

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💥 चक्रव्यूह।

कर्मो की कर्मगति एवं विचारों के प्रभावों द्वारा रचित चक्रव्यूह के मध्य, ज्ञान एवं अज्ञान की, अत्यंत ही शुष्म परत होती है। प्रथम एवं एकमात्र स्थान ज्ञान को प्राप्त है। ज्ञान जो सत्य के स्वीकार स्वरूप सहज ही प्राप्त होता है। जिसके प्रभाव से हम चक्रव्यूह के मध्य होते हुए भी, उन्नति को प्राप्त हो जाते है। इस एक विषय को छोड़ कर, समस्त विषय अज्ञानता के सूचक होते है।

जिसके परिणामस्वरूप अज्ञानी व्यक्ति सुसंगत एवं उन्नतिपूर्ण वातावरण के मध्य होते हुए भी, ज्ञान एवं अज्ञान के मध्य उस शुष्म परत के अपरिचित होते हुए, स्वयं के अज्ञान एवं उस अज्ञान के परिणामस्वरूप, अपने कुकर्मो की कर्मगति के द्वारा रचित, विनाश के चक्रव्यूह के मध्य फंस कर, अकस्मात ही अपने पतन को प्राप्त हो जाते है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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💥 Trap Chakaravyuh (Translated)

In the middle of the chakravyuh composed by the effects of the actions and thoughts of karma, there is a very soft layer of knowledge and ignorance. Knowledge is the first and only place. Knowledge that is accepted in the form of truth is easily attained. Due to which we get progress despite being in the middle of Chakravyuh. Except this one subject, all subjects are indicative of ignorance.

As a result, the ignorant person, despite being in the middle of a coherent and prosperous environment, being unfamiliar with that sushma layer between knowledge and ignorance, as a result of his ignorance and that ignorance, composed by the deeds of his kukarmo, stuck between the cycle of destruction.

Constructed by the deeds of his kukarmo, he suddenly gets his downfall, trapped in the middle of the cycle of destruction.

Written by Vikrant Rajliwal.
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आज का विचार। रचनात्मक एवं जीवन अनुभव लेखन लेखनी या कलात्मक क्रिया सम्बंधित कला, कोई प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा की विषय वस्तु नही है। अपितु रचनात्मक या जीवन अनुभव लेखन लेखनी, या कलात्मक क्रिया सम्बंधित कला, स्वयं को अत्यंत ही समीप से जानने एवं समझने का एक सत्य अनुभव है। इसीलिए जब आप स्वयँ को विजयता घोषित करने हेतु या अपनी कला से अन्य जनो की कला को पछाड़ने के लिए, अपनी कला का प्रदर्शन करते है, तो आप अध्यात्म एवं प्राकृतिक एहसासो से विमुख होते हुए, एक अनचाहे चक्रव्यूह में अंजाने ही फंस कर अपने दिव्य ईष्वरीय प्राकृतिक एहसासों को सहज ही खो देते है। धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

आज ही जुड़े आपकी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com से। (21 अक्टूबर 2019 समय प्रातः 7:24 बजे इंस्टाग्राम)

आज का विचार एवं परामर्श। 😇 स्वयं को आवश्यकता से अधिक चतुर समझना, आपको इस भरे संसार में एक दिन एक दम से तन्हा एवं बर्बाद कर देगा। क्योंकि यह बिल्कुल वैसा ही जैसे कि आप स्वयं जिस डाल के सहारे बैठे हुए है उसी डाल को आप स्वयं की काट डाले। इसीलिए दुसरो को दोषी ठहराने से पूर्व स्वयं के गिरेबाँ में भी एक बार अवश्य आप झांक कर देखे कि कही आप स्वयं भी तो दोषी नही है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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Today’s thoughts and advice. (Translated) Thinking yourself smarter than necessary, will single-handedly ruin you one day in this stuffy world. Because it is exactly the same as the one on which you are sitting on your own, you cut the same piece yourself. That is why, before convicting others, you must also peep once in your fall that you are guilty at all yourself.

Written by Vikrant Rajliwal.

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शायर!

जी हा मैं शायर हु और शायरी भी करता हु मियां। आज कल मैंने लिखना भी शुरू किया है और शायरी को सुनना भी! जी क्या कहा आपने शायरी शेरों का नही कायरों का काम है! टूट कर बिखर जाएंगे। मियां हम ही शेर है एक यहाँ, बाकी सब तो ढेर है सिर्फ यहा। शेर ए शायरी से शेर पे शेर कहने की हिम्मत रखते है मियां। अभी फ़िलहाल हमें फुर्सत नही, आपको फिर किसी और रोज़ पाठ हम ही पढ़ाएंगे मियां।

राम राखा

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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💥 एक कटु सत्य। यदि एक बकरी को एक खूंखार शेर के समीप बांध दिया जाए एवं उसको पोष्टिक से पोष्टिक आहार भी दिया जाए। तो भी वह शारिरिक एवं मानसिक रूप से जर्जर होते हुए, बीमारी को प्राप्त हो जाएगी। ऐसे ही यदि आपके परिवार में कोई नशे का सेवन करता है तो उसका नकारात्मक प्रभाव आपके चेतन एवं अचेतन मस्तिक्ष पर अवश्य ही होगा। जिससे प्रभाव से आप भी बीमार हो अपने पतन को अवश्य ही प्राप्त हो जाएंगे। कृपया ध्यान दीजिए। प्रथम उदाहरण में बकरी एक जानवर है एवं वह हम मनुष्य के समान बुद्धिमान नही है। इसीलिए उसको उस विषय का ज्ञान समझाने पर भी ज्ञात नही हो पाएगा कि शेर का अपना एक स्थान है एवं वह उस दायरे तक सीमित है। और आपका अपना एक सुरक्षित दायरा है आप उसमे निचिंत हो जाए।

द्वितीय उदाहरण में हम मनुष्यो में मनुष्य यानी कि वह मनुष्य जिन्हें ईष्वर की कृप्या प्राप्त है वह एक उचित मार्गदर्शन के द्वारा इस ज्ञान को समझ एवं अपने जीवन मे पूर्णतः ढाल पाते है कि आपके परिवार में जो मनुष्य नशा कर रहा है वह उसका जीवन है एवं उसका अपना एक उचित दायरा है यदि आप स्वयं ना चाहे तो वह आप तक कदापि नही पहुच सकता है। पुनः इस विषय पर प्रकाश डालता हु की हम मनुष्य है जानवर नही। यहाँ हम स्वयं से अधिक उस परिवार के सदस्य या मित्र के लिए चिंतित हो जाएंगे। और मनुष्यो में मनुष्य यानी कि वह मनुष्य जिन्हें ईष्वर की कृप्या प्राप्त है। एक कदम आगे को बढ़ते हुए परिवार के उस नशेबाज सदस्य या मित्र जो कि वास्तविक रूप से एक बीमार व्यक्ति है को एक उचित मार्गदर्श, जिसे हम काउंसलिग भी कहते है, एक अनुभवी एवं ज्ञानी व्यक्ति के द्वारा अवश्य उपलब्ध करवाएंगे। जिससे उस परिवार के सदस्य या मित्र के जीवन मे भी एक प्रकाश उत्पन्न हो सकें।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

आज ही फॉलो करें एवं जुड़ जाए आपकी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com से।

💥 A harsh truth. (Translated) If a goat is tied near a ferocious lion and a nutritious nutritious diet should also be given to it. Even then, while being physically and mentally disreputable, the disease will be acquired. In the same way, if someone in your family consumes intoxication, then it will definitely have a negative effect on your conscious and unconscious mind. Because of which you are also sick with the effect, your fall will definitely be achieved. Please Note. In the first instance the goat is an animal and he is not as intelligent as we humans. Therefore, even after explaining the knowledge of the subject to him, he will not be able to know that the lion has a place of its own and it is limited to that realm. And you have a safe circle of your own. In the second example, we humans in humans, ie the man who is blessed by God, through proper guidance, understand this knowledge and fully mold it in his life that the person who is intoxicated in his family is his life and He has a reasonable scope of his own, if you do not want to do it yourself, then he cannot reach you. Again, we throw light on the subject that we are humans and not animals. Here we will become more concerned about that family member or friend than ourselves. And humans in humans, that is, humans who have the grace of God. Going a step ahead, an intoxicated member or friend of the family, who is actually a sick person, must provide a suitable guide, also known as counseling, by an experienced and knowledgeable person. So that a light can arise in the life of that family member or friend.

Thank you.

Written by Vikrant Rajliwal.

Follow today and get connected to your own blog site vikrantrajliwal.com.

धन्यवाद।

यह वह समजिक एवं रचनात्मक विषय थे जिन्हें मैंने फेसबुक पर अपने कुछ फॉलोवर्स के लिए लिखा था एवं जिन्हें फेसबुक ने मात्र कुछ ही क्षणों में डिलीट कर दिया।

एक चोटिल एहसास। // A Hurt Feeling.

🙏🇮🇳 आज मैं यानी कि आपका मित्र एक साधारण से परिवार का भारतीय बालक स्वयँ के कुछ एहसासों को आप सभी प्रियजनो के साथ साँझा करने जा रहा हु। इस संसार मे प्रत्येक व्यक्ति का समय अत्यंत ही मूल्यवान होता है चाहे वह कोई सेलिब्रिटी हो या मेरे जैसा एक साधारण सा लेखक। और जब कोई आपके समय के मूल्य को अनदेखा करते हुए, आपके सामाजिक एवं रचनात्मक कार्यो पर अनैतिक प्रशन चिन्ह लगाने का प्रयत्न करें तो, उससे हमारे ह्रदय को अत्यंत चोट पहुचती है। ऐसे ही कुछ संवेदनशील विषय को मैं निमोक्त बताने का एक प्रयत्न करूँगा।

Today I mean that your friend is going to share some of his own feelings with an ordinary Indian boy. Every person’s time in this world is extremely valuable whether it is a celebrity or a simple writer like me. And when someone tries to put an unethical question mark on your social and creative works, ignoring the value of your time, it hurts our heart immensely. I will make an effort to declare some sensitive subject like this.

ShameOnYouFacebook

मेरी इन समाजिक पोस्ट के समान ही बहुत सी पोस्ट्स को फेसबुक ने डिलीट किया है। आखिर मेरी इन पोस्ट्स में क्या अनैतिक विषय वस्तु है? अभी तक मैं अपने माता पिता के मेहनत की कमाई के 15,000 रु से अधिक इस फ़ेसबुक पेज पर खर्ज कर चुका हूं। और अब जब मैने भुतकाल से शिक्षा प्राप्त करते हुए, इस फेसबुक पेज़ पर पैसा लगाना बन्द कर दिया है तो फ़ेसबुक मेरी सामाजिक पोस्ट्स को डिलीट एवं पेज़ के फंक्शन्स पर रोक लगा रहा है।

Shame on you Facebook. Like my social posts, Facebook has deleted many posts. After all what is the unethical content in my posts? So far, I have spent more than Rs 15,000 of my parents’ hard earned money on this Facebook page. And now that I have stopped spending money on this Facebook page while getting education from the past, Facebook is deleting my social posts and prohibiting page functions.

Shame on you Facebook.

मुझे एवं मेरे जैसे बहुत से लेखकों एवं पाठको को फेसबुक से बहुत सी समस्या है। इसीलिए मैंने अपनी वेबसाइट बनाई थी। जहाँ मैं अपनी लेखनी के माध्यम द्वारा अपने पाठकों से जुड़ सको।

यदि फेसबुक ऐसा ही अनैतिक व्यवहार करता रहा तो मुझ को अपना फेसबुक अकाउंट निष्क्रिय करना ही होगा।

मेरी जिन सामाजिक पोस्ट्स को फेसबुक अनैतिक कह कर उन्हें डिलीट किया है उन्हें मैं यानी कि विक्रांत राजलीवाल अब अपनी स्वयं की वेबसाइट पर प्रकाशित करूँगा।

मैं कोई करोड़पति नही की हर महीने हज़ारो रुपए बेमतलब ही फेसबुक पेज़ पर खर्ज कर सकूँ। इसीलिए फेसबुक के इस अनैतिक व्यवहार से मैं अत्यंत ही आहात हुआ हूं।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

फेसबुक लिंक
https://www.facebook.com/vikrantrajliwal85/
Shame On You Facebook

I and many writers and readers like me have a lot of problems with Facebook. That’s why I created my website. Where I can connect with my readers through my writing.

If Facebook continues to behave like this, then I have to deactivate my Facebook account.

My social posts, which have been deleted by Facebook as unethical, I will publish them on my own website, ie Vikrant Rajliwal.

I am not a millionaire, I can spend hundreds of thousands of rupees on a Facebook page every month. That is why I am extremely shocked by this unethical behavior of Facebook.

Thank you.

Written by Vikrant Rajliwal.

Facebook link👇👇👇👇
https://www.facebook.com/vikrantrajliwal85/
Shame On You Facebook🖕🖕🖕

💥 One Truth. 6 (Sixth Blog) A truth inspired by true experiences.

Now further …

On a deserted road of a scooter, as soon as we stop in an empty space on one side, we all, one by one, get off the scooter and stand on the side of the road. Thereafter, Uncle X, (fictitious name), located about 50 meters away, while looking at an office, says that he is an office, let’s go. As soon as he said this, I was convinced that there is a party in that office today and there must have already been a sprinkling of liquor and sprinkles of liquor. On thinking this, I very enthusiastically walk with them towards that office. But upon reaching there, my forehead gets a tinkle. There, a middle-aged man Sukesh Shonthi (fictitious name) was sitting on the chair. He smiles at us and welcomes us. And there were other decent people standing around him. We enter the office and sit on the chair in front of him. While sitting in our chair, that middle-aged man smilingly asks me, do you know me? I was feeling very strange all this. While somehow controlling my restlessness, I tell him very easily that no, I do not know you. Then he asks me whether you smoke cigarettes or alcohol. My hidden uneasiness began to appear from their conversation. At that time I could not understand why he was asking me such a question. When we come to party here, we will naturally drink alcohol, then why are they behaving so strangely. Bowing to all these thoughts, then I tell them that yes I am Drinking alcohol. Get it now. As soon as I say this, Uncle X stands up from the chair and along with him Uncle Y (Moussa ji) and I also get out of the office while standing in my chair. Then where Uncle X had parked his scooter, he comes and stands near a closed door. Then Uncle Ekus tells me that Vicky (my nick name) let’s go inside. As soon as they say this, I feel that the party is going to start. And as soon as I turned behind them, then Uncle Yai (Moussa ji) held my hand and insisted with great confidence, told me not to go inside Vicky. This is what remained with me. Uncle Yai (Mausa ji) who works in Delhi Police Department. I was very surprised by his strange behavior. At that time, I could not even realize why he was saying this to me. Then Uncle X makes a voice saying that Vicky come. And I tell Uncle Yai (Mousa ji) that nothing will happen, come and go. Saying so, I enter inside with Uncle X through that closed door.

At that time it seemed to me that behind the closed door there must be some colorful program of alcohol’s or any such colorful program is going to be there today. That is why we have come on such a scooter today to party at such a deserted and secret place. I almost reached there by sitting at Stepney. But as soon as I enter through the closed door, my senses fly away. As soon as I entered inside that closed door, in front of my eyes, my young boys and young men who looked like some mushtando (Healthy boys), there was a whole army. The first thought that came to me after seeing them was that this is definitely a child prison. And today we have come to this party. With this one feeling behind Uncle X, I enter a nearby room, through that closed door. Where a bed and some other discount put-alike was present. As soon as I entered that room, I felt that this is where the party will be today. The only place Uncle X and I sit in that room is to sit on that bed. Then Uncle X says take off your shoes and sit comfortably, I come now. As soon as he said this, I realized that he definitely went to call Uncle Yai (Mausa ji) and arrange the party. After he left, I sat there for about five minutes, and after that I took off my socks and smoked a bidi (cigar), and lay very leisurely on that bed. At the same time a person of a weak body enters the room in the most ordinary clothes. Don’t know why he was smiling at me. Before I tell him anything, he starts to poach in that room. Then I lie down to him in the same way that Uncle X I came in with is said? As soon as I say this, he smiles without missing a single moment and says that he has gone!

What did he mean at that time? I could not understand that. For about five to ten minutes or some time I kept taking the lonely inside the room, trying to understand those words of the person that he had gone. Suddenly with a jerk, inside the room, a wrestler type of my father’s age, a body builder, and a few other hatted young men enter with him. I was surprised to see them entering the room like this. But I kept lying down like that. All those people stand near me and then I get up and sit and tell them that where is Uncle X I said? Then he, like that first person, tells me that he has gone. As soon as they say this, I start wearing my socks. He was saying something to me, but after listening to him that he went. My Rome Rome (inside my body) was burning like a burning ember. And I was not interested in hearing any of his words. After wearing my socks, I now stand up wearing my shoes. Now we all stood face to face each other. At that time my Rome Rome (my body inside) was burning with anger and all of them were still smiling while looking at me. All this seemed to me very strange. With this strange poor mood I tell them that I have to go out. Just then a young man removes the curtain of the room and stares at me, looking inside the room. Then the scene that I saw entering inside the closed door once again appears that many such mustandas (Healthy Boys) were present here.

Suddenly I realize that I am stuck here very badly. After a while, after staring at him with anger, that Body Builder Uncle’s age, I try to knock him out of the room with his arm. Then he smiles in the same way that you can no longer go out. They were all still smiling. Which made me feel a little comfortable now. But hiding that ease, I ask him to go out in the same way. Then without losing even a single moment, he says to another young man, who appears like a mustanda standing near him, that he should take a search. As soon as he says this, he proceeds to search, but I remove him from one side and say that I have nothing. Then he starts searching himself, who looks like a Body builder. First he searches for the shirt pocket but he finds nothing there. Then I tell them that I had said that I have nothing. Then he searches my paint pocket and suddenly a smile comes on his face and he gets a pudding. Then I tell them, now you have got the pudiya. Now let me go out. But while continuing his search, he smiles again, getting another pudiya. Then I tell them that it was just this pudiya anymore. Now let me go out. But by continuing his search in the same way, he also obtains the third and final pudiya. I tell him once more that this was now the last lap and it is not my lap. Someone caught me to keep. After a few moments and searching, he is now convinced that I was telling the truth. Then he tells me that now you have to be here. On hearing this, I too smiled towards them and kept a control on myself and said how could this happen? I have to go now. Then the sir says very simply that this is a de-addiction center. And now you have to be the same. On hearing this from his mouth, the fire of anger once again ignited in my veins. But realizing the seriousness of that situation, I take a silence.

Then he calls a young man Shakir (fictional name) to get his family introduced with introduction. At that time, it seemed to me that my mother and father are present here and are taking me to get my talks once before placing me here. If this happens then I will get out of here today and now because it is not yet known to me how dangerous and menopaulated I can be. I was just contemplating all this when Shakir comes near to me and tells me that let’s do the family introduction. What will you say after reaching there? After a few moments of silence, he again explains to me, what is your name? Yes, I Vicky. Then he says don’t speak like that, say my name is Addict Vicky. On hearing this from his mouth, I felt as if he was trying to make fun of me. Then I enter the hall behind a closed curtain close behind him.

From the next next blog…

Written by Vikrant Rajliwal

(Translated)

21 October 2019 Time at 8:12 pm.

💥 एक सत्य। 6 (छटवा ब्लॉग) सत्य अनुभवों से प्रेरित एक सत्य।

अब आगे…

स्कूटर के एक सुनसान सड़क पर, एक तरफ खाली स्थान पर रुकते ही, हम एक, एक कर के सभी जन स्कूटर से उतर कर सड़क के किनारे खड़े हो जाते है। तदोपरांत प्रथम अंकल एक्स, (काल्पनिक नाम) लगभग 50 मीटर की दूरी पर स्थित, एक ऑफिस को देखते हुए कहते है कि वह रहा ऑफिस, आओ वही चलते है। उनके इतना कहते ही मुझे विशवास हो गया कि उस ऑफिस में ही आज पार्टी है और वहाँ पहले से ही दौर ए शराब के जाम की महफ़िल सजी हुई होगी। यह विचार करते ही मैं अत्यंत ही उत्साह से उनके साथ उस ऑफिस की ओर चल देता हूं। परन्तु वहाँ पहुँच कर मेरा माथा कुछ ठनक जाता है। वहाँ एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति सुकेश शोन्थि (काल्पनिक नाम) कुर्सी पर बैठे हुए थे। हमे देखते ही वह मुस्कुराते हुए हमारा स्वागत करते है। और उसके आस पास कुछ सभ्य से दिखाई देते हए अन्य व्यक्ति भी खड़े थे। हम ऑफिस में प्रवेश करते हुए उनके सामने की कुर्सी पर विराजमान हो जाते है। हमारे कुर्सी पर बैठते ही वह अधेड़ उम्र के व्यक्ति मुस्कुराते हुए मुझ से पूछते है कि क्या मुझ को जानते हो? मुझे यह सब कुछ अत्यंत ही अज़ीब से महसूस हो रहा था। अपनी उस बेचैनी पर किसी प्रकार नियन्त्रण करते हुए मैं उनसे अत्यन्त ही सहज भाव से कहता हूं कि नही! मैं आपको नही जानता। तब वह मुझ से पूछते है कि सिगरेट या शराब पीते हो। उनके इस प्रकार के वार्तालाप से मेरी छुपी हुई बेचैनी कुछ कुछ प्रकट होने लगी। उस समय मैं यह नही समझ पा रहा था कि वह मुझ से ऐसा प्रश्न क्यों पूछ रहे है। जब हम यहाँ पार्टी करने आए है तो जाहिर है कि शराब पिएंगे ही, फिर वह ऐसा अज़ीब व्यवहार क्यों कर रहे है। इन सभी विचारो से झुझते हुए तब मैं उनसे कहता हु की हा पिता हु। मंगवा लीजिए। मेरे इतना कहते ही अंकल एक्स कुर्सी से खड़े हो जाते है एवं उनके साथ ही अंकल वाई (मौसा जी) और मैं भी अपनी अपनी कुर्सी से खड़े होते हुए ऑफिस से बाहर निकल जाते है। फिर जहा अंकल एक्स ने अपना स्कूटर खड़ा किया था ठीक वही आकर एक बन्द दरवाजे के समीप खड़े हो जाते है। तब अंकल एकस मुझ से कहते है कि विक्की (मेरा पेट नाम) आओ अंदर चलते है। उनके इतना कहते ही मुझ को ऐसा लग की हा अब पार्टी शुरू होने वाली है। और मैं उनके पीछे जैसे ही मुड़ा तभी अंकल वाई (मौसा जी) ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बहुत ही आत्मविश्वास के साथ जोर देते हुए, मुझ से कहा कि विक्की अंदर मत जाइओ। यही मेरे पास खड़ा रहे। अंकल वाई (मौसा जी) जो कि दिल्ली पुलिस विभाग में कार्य करते है। उनके इस प्रकार के अज़ीब व्यवहार से मुझ को अत्यंत ही हैरानी हुई। उस समय मुझ को किंचित मात्र भी एहसास नही हो सका कि वह मुझ से ऐसा क्यों कह रहे है। तभी अंकल एक्स एक आवाज़ लगाते हुए कहते है कि विक्की आ जा। और मैं अंकल वाई (मौसा जी) से कहता हूं कि कुछ नही होगा आ जाओ अंदर ही पार्टी है। इतना कहते हुए मैं अंकल एक्स के साथ उस बन्द दरवाजे से होते हुए अंदर घुस जाता हूं।

उस समय मुझ को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उस बन्द दरवाजे के पीछे अवश्य ही शराब और नशे का कोई रंगारंग कार्यक्रम चल रहा होगा या ऐसा ही कोई रंग रंगीला कार्यक्रम आज अवश्य ही होने को है। तभी तो ऐसे सुनसान एवं ख़ुफ़िया स्थान पर हम पार्टी करने के लिए आज इस प्रकार से स्कूटर पर बैठ कर आए है। मैं तो लगभग स्टेपनी पर बैठ कर वहा पहुचा था। परन्तु जैसे ही मैं उस बन्द दरवाजे से होते हुए भीतर प्रवेश करता हु, तो मेरे होश ओ हवास उड़ जाते है। उस बन्द दरवाजे के अंदर प्रवेश करते ही मेरी नज़रो के सामने मेरी हम उम्र नोजवान लड़को एवं कुछ मुश्तण्डो की तरह दिखाई देने वाले जवान लड़को कि एक पूरी फ़ौज थी। उन्हें देख कर प्रथम विचार मुझ यही आया था कि यह जरूर कोई बच्चा जेल है। और आज यही पार्टी करने के लिए हम आए है। इस एक एहसास के साथ अंकल एक्स के पीछे पीछे मैं उस बन्द दरवाजे से होते हुए समीप के एक कमरे में प्रवेश कर जाता हु। जहाँ एक बिस्तर और कुछ अन्य छूट पुट सा साज समान मौजूद था। उस कमरे मैं प्रवेश करते ही मुझ को ऐसा लगा कि हा यही वह स्थान है जहाँ पार्टी होगी। अंकल एक्स और मैं उस कमरे में मौजूद बैठने लायक एकमात्र स्थान उस बिस्तर पर बैठ जाते है। तब अंकल एक्स कहते है कि अपने जूते उतार कर आराम से बैठ जाओ, मैं अभी आता हूं। उनके इतना कहते ही मुझ को ऐसा एहसास हुआ कि जरूर वह अंकल वाई (मौसा जी) को बुलाने के साथ ही पार्टी कि व्यवस्था करने के लिए गए है। उनके जाने के उपरांत, मैं लगभव पांच मिनट तक, वैसे ही बैठा रहा तदोपरांत मैं अपनी जुराबें उतार कर एक बीड़ी सुलगाते हुए, उस बिस्तर पर बहुत ही इत्मीनान से लेट जाता हूं। उसी समय एक कमजोर शरीर का एक व्यक्ति अत्यंत ही साधारण से कपड़ो में उस कमरे के भीतर प्रवेश करता है। वह मुझ को देख कर ना जाने क्यों मुस्कुरा रहा था। मैं उससे कुछ कहता उससे पूर्व ही वह उस कमरे में पोचा लगाना प्रारम्भ कर देता है। तब मैं उसी प्रकार से लेटे हुए उससे कहता हूं कि जिन अंकल एक्स के साथ मैं अंदर आया था वह कहा है? मेरे इतना कहते ही वह बिना एक क्षण भी गवाए मुस्कुराते हुए कहता है कि वह तो गए!

उस समय उसके कहने का क्या मतलब था! वह मेरी समझ मे नही आ रहा था। लगभग पांच से दस मिनट या कुछ समय तक मैं तन्हा उस कमरे के भीतर लेता हुआ, उस व्यक्ति के द्वारा कह गए उन शब्दों को समझने का प्रयास करता रहा कि वह तो गए। अचानक से एक झटके के साथ उस कमरे के भीतर मेरे पिता की उम्र का एक पहलवान के जेसा दिखाई देने वाला, बाड़ी बिल्डर व्यक्ति और उसके साथ कुछ अन्य हट्टे कट्टे युवा प्रवेश करते है। उन्हें इस प्रकार से उस कमरे के भीतर प्रवेश करते देख, मुझे कुछ हैरानी हुई। परंतु मैं उसी प्रकार से लेटा रहा। वह सभी व्यक्ति मेरे समीप ही आ कर खड़े हो जाते है तब मैं उठ कर बैठ जाता हूं एवं उनसे कहता हूं कि अंकल एक्स कहा है? तब वह भी उस प्रथम व्यक्ति के समान ही मुझ से कहते है कि वह तो गए। उनके इतना कहते ही मैं अपनी जुराबें पहनना प्रारम्भ कर देता हूं। वह मुझ से कुछ कह रहे थे परन्तु उनकी उस बात को सुनकर कि वह तो गए। मेरा रोम रोम जलते हुए अंगार के समान जलने लगा था। और मुझे उनके किसी भी शब्द को सुनने में अब कोई भी दिलचसबी नही थी। अपनी जुराबें पहनने के उपरांत अब में अपने जूते पहन कर खड़ा हो जाता हूं। अब हम सब एक दूसरे के आमने सामने अड़ कर खड़े थे। उस समय मेरा रोम रोम क्रोध से ज्वलित था और वह सब अब भी मेरी ओर देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। मुझ को यह सब कुछ अत्यंत ही अज़ीब सा प्रतीत ही रहा था। इसी अजीबो गरीब मनोस्थिति के साथ मैं उनसे कहता हूं कि मुझ को बाहर जाना है। तभी एक हटा कट्टा मुस्टंडा युवक उस कमरे का पर्दा हटा कर अंदर देखते हुए मुझ को घूरता है। तभी मुझ को वह दृश्य जो मैने उस बन्द दरवाज़े के भीतर प्रवेश करते हुए देखा था एक बार पुनः दिखाई देता है कि यहाँ ऐसे बहुत से मुस्टंडे मौजूद गए।

अकस्मात ही मुझ को एहसास होता है कि मैं बहुत ही बुरी तरह यहाँ फंस गया हूं। कुछ देर तक उस बाड़ी बिल्डर अंकल की उम्र के उस व्यक्ति को क्रोध से घूरने के उपरांत में उनके बाजू से उस कमरे के बाहर निलने का प्रयास करता हु। तब वह उसी प्रकार से मुस्कुराते हुए कहते है कि अब आप बाहर नही जा सकते हो। वह सब अब भी निरन्तर मुस्कुरा रहे थे जिससे मैं अब कुछ सहज महसूस कर रहा था। परन्तु अपनी उस सहजता को छुपाते हुए मैं उसी प्रकार से बाहर जाने के लिए कहता हूं। फिर वह बिना एक क्षण भी गवाए अपने समीप खड़े एक मुस्टंडे की तरह दिखाई देने वाले मेरे हम उम्र नवयुवक से वह कहते है कि सर्चिंग लो। उनके ऐसा कहते ही वह सर्चिंग के लिए आगे बढ़ता है परन्तु मैं उसको एक ओर को हटा कर कहता हूं कि मेरे पास कुछ भी नही है। तब वह बाड़ी बिल्डर की तरह दिखाई देने वाले महोदय स्वयँ सर्चिंग प्रारम्भ कर देते है। सर्वप्रथम वह कमीज की जेब तलाशते है परंतु उन्हें वहा कुछ भी प्राप्त नही होता। तब मैं उन्हें कहता हूं कि मैने कहा था ना कि मेरे पास कुछ नही है। तब वह मेरी पेंट की जेब तलाशी करते है अचानक ही उनके चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ जाती है और उन्हें एक पुड़िया प्राप्त हो जाती है। तब मैं उनसे कहता हूं अब आपको पुड़िया मिल गई ना। अब मुझ को बाहर जाने दीजिए। परन्तु वह अपनी सर्चिंग जारी रखते हुए एक और पुड़िया की प्राप्ति करते हुए पुनः मुस्कुराते है। तब मैं उनसे कहता हूं कि बस यही पुड़िया थी अब और नही है। अब मुझ को बाहर जाने दीजिए। परन्तु वह उसी प्रकार से अपनी सर्चिंग जारी रखते हुए तीसरी और अंतिम पुड़िया भी प्राप्त कर लेते है। मैं एक बार और उनसे कहता हूं कि अब यह आखरी पुड़िया थी और यह सब मेरी पुड़िया नही है। किसी ने मुझ को रखने के लिए पकड़ाई थी। कुछ क्षण और सर्चिंग के उपरांत उन्हें अब यकीन हो जाता है कि मैं सत्य कह रहा था। तब वह मुझ से कहते है कि अब तुम्हें यहीं रहना है। यह सुनते ही मैं भी उनकी ओर मुस्कुराते हुए स्वयँ पर एक नियन्त्रण रखते हुए कहता हूं कि ऐसा कैसे हो सकता है! मुझ को तो अभी जाना है। तब वह महोदय अत्यंत ही सहज भाव से कहते है कि यह नशा मुक्ति केंद्र है। एवं अब आपको यही रहना होगा। उनके मुंह से यह सुनते ही मेरे रग रग में एक बार पुनः क्रोध की अग्नि ज्वलित हो उठती है। परंतु उस स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए, मैं एक मौन धारण कर लेता हूं।

तब वह एक युवक शाक़िर (काल्पनिक नाम) को कहते है कि इनका फैमली के साथ इंट्रोडक्शन (पहचान) करवा आओ। उस समय मुझ को ऐसा लगा कि मेरे माता जी और पिता जी यहाँ मौजूद है एवं मुझ को यहाँ रखने से पूर्व एक बार उनसे मेरा वार्तालाव करवाने के लिए ले जा रहे है। यदि ऐसा हुआ तो मैं आज और अभी यहाँ से बाहर निकल जाऊंगा क्यों कि यह अभी मुझे जानते नही है कि मैं कितना खूंखार एवं मेनोप्लेटिड हो सकता हु। मैं अभी यह सब कुछ विचार कर ही रहा था कि तभी शाक़िर मेरे समीप आ कर मुझ से कहता है कि आओ फैमली से इंट्रोडक्शन कर लेते है। वहाँ पहुच कर आप क्या कहोंगें? कुछ क्षण की ख़ामोशी के उपरांत वह मुझ को पुनः समझाते हुए कहता है कि तुम्हारा क्या नाम है? मैं जी विक्की। तब वह कहता है कि ऐसे मत बोलना, कहना मेरा नाम है नशेबाज विक्की। उसके मुँह से यह सुनते ही मुझ को ऐसा लग की वह मेरा मजाक बनाने को कोशिश कर रहा है। फिर मैं उसके पीछे पीछे समीप के एक बन्द पर्दे के पीछे मौजूद हॉल में प्रवेश कर जाता हूं।

शेष अगले ब्लॉग से…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

21 अक्टूबर 2019 समय दोपहर 2:42 बजे।