काल चक्र।

चक्र काल से छूट ना कोई पाएगा, प्रत्येक कदम, प्रत्येक श्वास, गुजरता प्रत्येक क्षण, एहसास चक्र काल का करवाएगा।

होनी-अनहोनी, साक्षी कर्म कांड, सहभागी सत्य कर्म साथ-साथ, मृत्यु-जीवन से साक्षात्कार, ध्वनि ह्रदय जो धड़काएगा।।

भावना-प्रेम, अश्रु-क्रोध, चेतन एहसास, स्मृति-विस्मृति, जो साथ साथ, अंधकार में सूर्य नया, चेतना मृत जगाएगा।

राह सत्य पर पथिक अनजान, मंजिल अब अपनी पाएगा, छूट गए जो राही पुराने, स्वयं अब ज्ञान दिशा दिखलाएगा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

13 दिसम्बर 2019 समय प्रातः 10:28 बजे।

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True Experience.

Today, when someone who knows and understands me closely from me, asks what is the real reason behind the positive change that is happening within you? Then I would like to tell them that in the year 2000, when I was 15 or 16, I contacted my father and informed him that my health is bad and on the way I told him the reality that someone should fill me with a cigarette Has given drink And this has been happening for a long time. Then my father became very angry with me. And they said to me with the same angry voice that you should tell all this to the doctor!

The most important first topic here is that I was willing to accept the truth in my ignorant age, and to free myself from all kinds of harmful substances. And the second most important topic is that at that time the knowledge to understand my real situation was not available to myself and my family. For this reason, I was imprisoned at home despite not wanting due to ignorance. What would be the health, my physical and mental health also got greatly distorted. Due to this ignorance, I also suffered many physical and mental injuries. Whose pain I may not be able to express even if I want to.

Thereafter, my father provided me with a cure for health enhancement through many Hakiams, tantrikas and hospitals. But all were found in futility. Finally in the year 2004, I was admitted to the rehabilitation center. Where I was getting the knowledge that I was facing after facing many complicated and difficult results, I realized that this is what I needed and still am! But in this way, like a prisoner, in punitive situations, like a bird in a cage, I may not be able to achieve health in an environment of fear. While ignoring all the complex and harsh results there, the divine knowledge that I was receiving is just life.

And while accepting the position of prisoner, I continued to adopt divine knowledge of my life as a slave. But today after 15 years, in December, 2019, I can say that the divine knowledge that I was in need of at the age of 15 or 16 in 2000. The unknown path which I had chosen for myself by truth. I could not work in my life in an environment of Dependence like a prison and forcefully. But this does not mean that that divine knowledge proved futile in my life. But in a free environment today without any restriction, with a self-acknowledgment of self-free and positive efforts, after graduation from Delhi University free of all kinds of harmful addictions from 28 months to 5 days, through a creative writing of literature I am doing service

That is why if a positive change can come in my life, then you or your family or the child who is stuck in the grip of addictions can also have a positive change in their life. And they can do a better job than me. If they just need, then a qualified person and friend who can understand their problems closely can help them by understanding them and their problems.

Written by Vikrant Rajliwal.

एक सत्य अनुभव।

आज मुझ से मुझ को समीप से जानने एवं समझने वाला कोई व्यक्ति जब  पुछता है कि आप के भीतर जो एक सकरात्मक परिवर्तन देखने को प्राप्त हो रहा है उसके पीछे वास्तविक कारण क्या है? तब मैं उनसे यही कहना चाहूंगा कि वर्ष 2000 में जब मैं 15 या 16 वर्ष का था तब मैंने अपने पिताजी से संपर्क कर उन्हें सूचित किया कि मेरी तबियत खराब है एवं राह में मैने उनसे वास्तविकता बतलाई कि मुझ को किसी ने सिगरेट में कुछ भर कर पिला दिया है। और ऐसा बहुत समय से हो रहा है। तब मेरे पिता जी मुझ पर अत्यंत क्रोधित हो गए। और उन्होंने मुझ से उसी क्रोधित स्वरों के साथ कहा कि यह सब डॉक्टर को बतइयो!


यहाँ सबसे अहम प्रथम विषय यह है कि मैं आपका अपना मित्र उस अबोध उम्र में सत्य स्वीकार कर, स्वयं हर प्रकार के हानिकारक प्रदार्थों से मुक्त होने के लिए इच्छूक था। एवं दूसरा सबसे अहम विषय यह है कि उस समय मेरी वास्तविक स्थिति को समझ सकने का ज्ञान स्वयं मुझ को एवं मेरे परिवारजनों को भी उबलब्ध नही था। इसी कारण अज्ञानता के कारण ना चाहते हुए भी मैं घर में कैद हो कर रहा गया। स्वास्थ्य तो क्या प्राप्त होता मेरा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य भी अत्यधिक विकृत होता गया।  इसी अज्ञानता के कारण मुझ को कई प्रकार की शारिरिक एवं मानसिक चोटें भी लगी। जिनके दर्द को शायद मैं चाह कर भी बयां ना कर सकूँ।

तदोपरांत मेरे पिताजी ने कई हकीमों, तांत्रिकों एवं हॉस्पिटल से मुझ को स्वस्थ्य वृद्धि हेतु इलाज मुहैया करवाया। परन्तु सब व्यर्थता को प्राप्त हुए। अंततः वर्ष 2004 मैं मुझ को पुनर्वासकेन्द्र मै भर्ती करवाया गया। जहाँ बहुत से जटिल एवं कठोर परिणामो को झेलने हुए मुझ को जो ज्ञान प्राप्त हो रहा था उससे मुझ को एहसास हुआ कि हा इसी की तो मुझ को अत्यंत आवश्यकता थी और अब भी है! परन्तु इस प्रकार से एक कैदी की भांति, दण्डनात्मक परिस्थितियों में, इस प्रकार एक पिंजरे के पंछी की भांति डर के माहौल में शायद मैं स्वास्थ्य को प्राप्त ना कर सकूँ। जबकि वहाँ के समस्त जटिल एवं कठोर परिणामो को नज़रंदाज़ करते हुए, जो दिव्य ज्ञान मुझ को प्राप्त हो रहा था बस वही तो जीवन है।


एवं कैदी सी की स्थिति को ना चाहते हुए भी स्वीकारते हुए, एक गुलाम कि भाँति अपने जीवन के दिव्य ज्ञान को मैं अपनाता रहा। परन्तु आज 15 वर्षो के उपरांत दिसम्बर वर्ष 2019 में मैं यह कह सकता हु की वह दिव्य ज्ञान जिसकी मुझ को वर्ष 2000 में 15 या 16 वर्ष की उम्र में अत्यधिक आवश्यकता थी। जिस अनजान मार्ग को सत्य के द्वारा मैंने स्वयं के लिए स्वयं ही चुना था। एक अस्वतंत्र एवं जोरजबरदस्ती के माहौल में मेरे जीवन मे  कार्य ना कर सका। परन्तु इसका तातपर्य यह नही की वह दिव्य ज्ञान मेरे जीवन मे व्यर्थ सिद्ध हुआ। अपितु एक स्वतंत्र माहौल में  आज में बिना किसी बन्धन के, एक आत्मस्वीकृति के साथ स्वयं के स्वतंत्र एवं सकरात्मक प्रयासो के साथ 28 महीने 5 दिनों से हर प्रकार के हानिकारक व्यसनों से मुक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के उपरांत, एक रचनात्मक लेखनी के द्वारा साहित्य की सेवा कर रहा हु।

इसीलिए यदि मेरे जीवन में एक सकरात्मक परिवर्तन आ सकता है तो तो आप या आपके परिजन या वह बालक जो व्यसनों की गिरफ्त में फंसे हुए है, उनके जीवन मे भी एक सकरात्मक परिवतर्न अवश्य उतपन हो सकता है। एवं वह मुझ से भी बहुत अच्छा कार्य कर सकते है। बस उन्हें आवश्यकता है तो उनकी समस्याओं को समीप से समझ सकने वाले एक ऐसे योग्य व्यक्ति एवं मित्र की जो उन्हें एवं उनकी समस्याओं को समझते हुए उनकी सहायता कर सके।


विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

भोंडा। (एक दिलचस्प उपन्यास) With YouTube Video link. *विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एवं प्रसारित*

नमस्कार प्रिय पाठकों एवं ह्रदय अज़ीज़ श्रुताओं, आज अपनी एक अत्यंत ही दिलचस्प और भावनात्मक प्रेम कहानी “भोंडा।” का आपकी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रथम प्रकाशन करने के उपरांत, अब आपके अपने YouTube चैनल Voice Of Vikrant Rajliwal पर स्वयँ अपने स्वरों के द्वारा अपने इस प्रथम प्रकाशित उपन्यास भोंडा। को रिकार्ड कर अपलोड करते हुए मुझ को अत्यधिक हर्ष एवं रोमांच की अनुभूति प्राप्त हो रही है। भोंडा केवल एक कहानी ही भी है बल्कि यह स्वयं के भीतर एक ऐसे भावनात्मक एहसासों को संजोए हुए है जिसको लिखते समय मैं स्वयं अत्यधिक भावुक हो गया था।

अब आपका अधिक समय ना लेते हुए मैं यानी कि आपका अपना मित्र इतना ही कहना चाहूंगा कि “भोंडा सिर्फ एक कहानी ही नही है अपितु यह एक ऐसे सत्य को दर्शाती है जिसे अक्सर बहुत से युवाओं ने अनादि काल से विभिन्न प्रकार से महसूस किया है और ना जाने कब तक वह भोंडा के ही भांति उन एहसासो को महसूस करते रहेंगे।”

आशा करता हु आपको मेरी यह कहानी बल्कि अब यह कहना अधिक उचित होगा कि आपको आपकी अपनी यह कहानी “भोंडा।” आपके अपने मित्र विक्रांत राजलीवाल के साधारण से स्वरों के द्वारा सुनकर एवं महसूस करते हुए अवश्य पसन्द आएगी।

विक्रांत राजलीवाल।

मेरे फ़ेसबुक पेज़ का यूआरएल पता है।

https://www.facebook.com/vikrantrajliwal85

भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए) – Vikrant Rajliwal Writing Blog’s And Website’s (Reblog/Republish)

 by Voice Of Vikrant Rajliwal ( My Writing, My Blogs & My Voice).In Blog.Leave a Commenton भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए) – Vikrant Rajliwal Writing Blog’s And Website’s (Reblog/Republish)

YouTube video link of Bhondha is https://youtu.be/P8YjIu5S5cc

If you like novel Bhondha and YouTube videos so pls subscribe my YouTube channel.

क़त्ल ए एहसास। With YouTube video link.

नशा है फ़िज़ाओं में आज, बहकी-बहकी सी सांसे, कुछ-कुछ मदहोश सी है।

साथी है साथ में आज, उफ़ान ए धड़कन, अंजाम ए हक़ीक़त, हैरानी सी है।।

रास्ते है साथ में आज, तलाश ए हौसले, मंजिले कुछ-कुछ अंजान सी है।

जशन है साथ माहौल में आज, निसान ए उदासी, अब भी मेरे साथ सी है।।

आरज़ू है साथ मे आज, अक्स ए जुदाई, पहेलु में खुशियां, धड़कने फिर भी हैरान सी है।

अल्फ़ाज़ है साथ रूह में आज, ख़ामोश ये जुबां, कत्ल ए एहसास, कलम मेरी दम तोड़ने को है।।

कलम है हाथ मे आज, नासूर ए जख़्म, खून ए श्याही, फड़कती हर एक नब्ज़, गुम सी है।

यक़ीन है साथ साए में आज, उदास ये लम्हे, इंतज़ार अब भी सांसो में, हर साया साथ छोड़ने को हैं।।

विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।

राम जन्म। with YouTube link video

सुनिए मेरे यानी कि आपके मित्र विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक भक्तिमय काव्य रचना राम जन्म। आपके अपने यूट्यूब चैनल Voice Of Vikrant Rajliwal पर।

जय श्री राम।

एवं चैनल को सब्सक्राइब अवश्य कीजिएगा।

एक थे राजा बहुत महान।
नही थी पर उनके कोई संतान।।

रहती थी उनको एक चिंता यह भारी,
कैसे बढ़ पाएगा अब उनका महान वंश।

अभी तो है वो जिंदा, चल रही है श्वास उनकी मगर,
क्या आ पाएगा कभी इस धरा पर उनका भी अंश।।

देख राजा को अपने यू चिंतामग्न,
आए एक ऋषि और सोचा एक उपाय।

करके हवन किए उतपन जो उन्होंने कुछ फल।
हुआ सन्तोष कि मिलेगा राजन को अब अपने बल।।

किया शंका का निवारण उन्होंने सबकी,
दिया ज्ञान का फिर जो उन्होंने एक सन्देश।

फल नही है राजन ये कोई मामूली।
खिलेगी इससे सुनी बगिया की हर डाली।।

सुन कर वचन दिव्य अमृत के ज्ञानी ऋषि से,
हुआ सन्तोष उनको अत्यंत, खिल उठा जीवन खाली।।।

अब राजन को कुछ विचार सा जो आया।
फल लेकर ऋषि से वो उनको रानियो को दे आया।।

दिव्य फल पाकर समीप, चारो रानी भी हरषाई थी।
उनके सुने जीवन मे सुगन्ध बहार की जो अब आई थी।।

यह सब था विधान विधि का।
मायाजाल था स्वयं ईष्वर का।।

करने को नाश पाप का, धरा पर अवतार धर्म का आना था।
ये हवन ये फल ये विधान विधि का तो एक बहाना था।।

अब दुष्टो का अंत दूर नही।
अब सन्तो को किसी का डर नही।।

वह दिन भी प्रभु कृपा से जल्द आ गया।
आसमान से जब बादल काला छट गया।।

राम जन्म का दिन अत्यंत ही निराला था।
हर कोई था प्रसन्न और,
प्रसन्ता ने सबकी दुख को मार डाला था।।

किया स्थापित धर्म जो धरा पर, स्थापित आदर्श व्यवहारों से उनके हुआ।
हर बाधा झुक कर छट गई स्वयं, आदर्शो से उनके उदय सवेरा दिव्य हुआ।।

आखिर हाथो उनके ही संहार दुष्टो का हुआ।
खिला पुष्प मर्यादा का एक और उसका विस्तार हुआ।।

नही भूलना चाहिए कभी हमे।
राह दिव्य जो मिली उनसे हमे।।

आदर्श जीवन मर्यादित व्यवहार, धर्म जीवन से मिला उनके जो हमे।
हर बाधा को कर के पार, सयंम जीवन से विजय पताका,
हर्षोल्लास दिया जो हमे।।

आज हज़ारो वर्षो के उपरांत, भूल गया मर्यादा क्यों अपनी आज का स्वार्थी इंसान।
साथ पापी का देकर फैलाया जो भर्ष्टाचार, देख मासूमों निर्दोषों की पीड़ा भी नही जागता क्यों उनका धर्मो ईमान।।

कहा गया वो पुष्प धर्म (ईमानदारी, मर्यादा) का, खिलाया जो श्री राम ने था।
कर अधर्म का नाश पूण्य से, मर्यादा की माटी में, सूर्य एक नया जीवन में सबके जलाया था।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
29/11/2019 at 8:07 pm
(Republish)

शायरी।

🌹 आज भी दिखती है बोतल शराब की, होती है महसूस वो सुगंध उसकी समीप अपने जैसे बहार की।

जी हाँ मोहब्ब्त है आज भी मुझ को सुर्ख लहू के रंग सी, बेटी जो अंगूर की, वो है मोहब्ब्त पहली मेरी, बोतल शराब की, बोतल शराब की, बोतल शराब की।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

💥 एक संकल्प एक योगदान।

मित्रों मेरे जीवन का केवल एकलौता मकसद यही है कि मैं अपने जीवन अनुभवो से उन मासूम बालको को एक उचित दिशा का ज्ञान करवा सकूँ जो आज भी किसी ना किसी नशे की गिरफ्त में फंस कर अपना उज्वल भविष्य अनजाने ही बर्बाद कर रहे है।

काव्य शायरी नज़म ग़ज़ल दास्ताने लिखना एवं गाना केवल मेरा निजी शोक है एवं मैं जो पोस्ट करता हु की आप मेरा काव्य नज़म ग़ज़ल दस्तानों का कार्यक्रम बुक कर सकते है तो इसके पीछे केवल और केवल एकलौता कारण यही है कि मुझ को उन मासूम नशे से पीड़ित उन अबोध बालको की मदद करने हेतु बहुत सा रुपया चाहिए। जिससे मैं उन्हें कुछ मूलभूत सुविधाए प्रदान कर सकूँ। जिससे उनका उनके परिवार में पुनर्वास हो कर उनका जीवन  स्तर कुछ सुधर सके।

इसीलिए आप मेरा साहित्यिक काव्य शायरी का कार्यक्रम बुक कर के सीधे उन मासूम बच्चों को एक नया जीवन सहज ही प्रदान कर सकते है। इसके साथ ही यदि आप स्वयं किसी नशा मुक्ति या बाल सुधार कार्यक्रम के संचालक है तो आप आप ही मेरा साहित्यिक काव्य शायरी का कार्यक्रम निःशुल्क बुक कर अपना स्थान सुनिचित कर सकते है। मुझ को पूरी उम्मीद है कि जब आपके पेशेंट अपने बीच मे से ही निकले हुए किसी साहित्यकार की रचनाओँ को सुनेंगे तो उन्हें अवश्य ही आत्मशांति प्राप्त होएगी।
निम्नलिखित नम्बर के ज़रिए व्हाट्सएप पर मुझ से सम्पर्क कर सकते है

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दिल्ली 84

💥 नशा एवं पारिवारिक कलेश एक दूसरे के साथ साथ ही चलते है। यहाँ नशे से तातपर्य है कि जब आप का आपके व्यसनों पर नियन्त्रण शेष नही बच पाता। या फिर आप नशे के समक्ष स्वयँ को जर्जर महसूस करते हुए अपना नियन्त्र खो देते है।

जब ऐसा होता है तो आपका सामना होता है पारिवारिक कलेश से एवं तब आपको आवश्यकता होती है एक ऐसे ज्ञानी या अनुभवी व्यक्तित्व के व्यक्ति की जो आपकी उस स्थिती को समझने में आपकी सहायता कर सकें।

यदि आप भी ऐसी ही किसी समस्या से सामना कर रहे है तो आज ही विक्रांत राजलीवाल जी से यानी कि मुझ से मिल कर अपनी समस्या का 100%स्थाई  समाधान प्राप्त कर सकते है वह भी बिल्कुल निशुल्क।

क्योंकि रचनात्मक रचनाएँ लिखना मेरा शौक है एवं नशा मुक्ति से पारिवारिक कलेश मुक्ति मेरा कर्म है। मैं नज़म शायरी, दास्तानों के कार्यक्रम के लिए पेमेंट इसलिए लेता हूं क्यों कि उन रुपयों से मैं अधिक विस्तृत पैमाने पर नशा मुक्ति एवं पारिवारिक कलेश मुक्ति हेतू निःशुल्क सेवा इस समस्त संसार के उन पीड़ित परिवारों को उपलब्ध करवा सकूँ।

इसलिए आप यदि मुझ से मेरी नज़म दस्तानों, काव्य, नज़म ग़ज़ल का कोई भी कार्यक्रम करवाते है तो आप सीधे तौर पर समाज के उन पीड़ित परिवारों के कल्याण हेतु अपना एक अनमोल सहयोग सहज ही प्रदान कर देते है।

अंतः एक बार पुनः आप सभी को सूचित करता हु की यदि आप उपरोक्त विषय नशा मुक्ति एवं पारिवारिक कलेश मुक्ति की समस्या का एक स्थाई समाधान प्राप्त करना चाहते है तो आज ही विक्रांत राजलीवाल जी से यानी कि मुझ से सीधा सम्पर्क कीजिए।

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धन्यवाद।
विक्रांत राजलीवाल।

सम्पर्क सूत्र है।

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दिल्ली 84

💥 सत्य स्वीकार। / 💥 Accept The Truth.

स्वयं को सबसे ख़ास समझते हुए अपने जीवन के हादसों को नकारना! कि मैं तो सबसे अलग हु मेरे साथ ऐसा कैसे हो सकता है। मेरी तो कोई भी ग़लती नही है। फिर मेरे साथ ऐसा कैसे हो सकता है? नही, नही मैं बिल्कुल सही हु, ऐसा तो हुआ है या नही हुआ है, मुझ को पता ही नही! अपने जीवन की समस्याओं को अस्वीकार करते हुए हमेशा ही मैं भागता रहा हु। और आज भी स्वयं को सबसे ख़ास या महत्वपूर्ण मानते हुए वास्तविकता को स्वीकार ना करू! तो मैं अपने जीवन को एक ऐसी क्रूर नरकाग्नि में स्वयं के द्वारा ना चाहते हुए भी स्वयं अपने जीवन को झुलसा दूंगा।

इसीलिए सर्वप्रथम मैं यह स्वीकार करता हु कि मैं भी एक पूर्णतः सामान्य जन के समान प्रसन्ता एवं आत्मशांति का हकदार हु। इसीलिए आज मैं अपने जीवन के उन सभी हादसों और समस्याओं को स्वीकारते हुए अपने स्वयं के विकास एवं आत्मशांति के प्रति ईमानदारी पूर्वक व्यवहार करता हु।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

Accept The Truth.

Considering myself to be the most special, denying the accidents of my life, how can I be so different with me. There is no mistake of mine. How can this happen to me then? No, no, I am absolutely right, whether this has happened or not, I do not know! I have always been running away while rejecting the problems of my life. And even today, considering myself as the most special or important person and not accepting the reality, I will scorch my life in a cruel inferno fire even without wanting to by myself.

That is why, first of all, I accept that I am entitled to happiness and self-peace like a normal person. That is why today I accept all those accidents and problems in my life and behave honestly for my own development and self-peace.

Thank you

Written by Vikrant Rajliwal.

एक आभार। 🙏

वर्ष 2008 में, जीवन एक दम से बदल गया। अचानक ही मुझ को, जब पता चला कि इस बार जो मेरे हाथों में किताब है। वह वास्तविक रूप से सत्य है। एवं मैने परीक्षा की तैयारी, प्रारम्भ कर दी। अब मैं पूर्व की अपेक्षा, स्वयं को अधिक सन्तुष्ट, महसूस कर पा रहा था। आज लगभग 6 वर्षो के गेप के उपरांत, मेरे हाथों में एक बार पुनः सरस्वति विराजमान थी। जो मुझ से कह रही थी कि यही अवसर है पुत्र, स्वयँ के अज्ञान को दूर करते हुए। ग्रेजुएट साक्षरता को प्राप्त करने का।

उस समय मैं शायद अपनी उन भावनाओं से कुछ अनजान था। एवं आज लगभग 11 वर्षो के उपरांत दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होने के उपरांत, एवं निरन्तर सक्रिय रहते हुए मुझ को, जो साहित्यिक रचनाओँ को रचने का एक अवसर, एक वरदान स्वररूप प्राप्त हुआ है। मैं चाह कर भी, अपनी इस भावना को, शायद व्यक्त ना कर सकूँ।

मैं यानी कि आपका अपना मित्र विक्रांत राजलीवाल, माँ सरस्वती समेत आपने इष्ट देवताओं एवं आप आप सभी प्रशंशको का हार्दिक आभार व्यक्त करता हु।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

3 नवम्बर वर्ष 2019 समय प्रातः 9:27 बजे।