Page 2 of 21

🌹 अश्क़। (एक दर्द भरी प्यारी सी सौगात के साथ)

ये अश्क़ है दिवाने (विक्रांत राजलीवाल।) के जो करते है बयां दर्द मोहब्ब्त का मोहब्ब्त से मेरे। हर दर्द से छलकता है अश्क़ मोहब्ब्त का मोहब्ब्त से मेरे।।
आज अपनी इस नज़म को एक दर्द भरी प्यारी सी सौगात के साथ आप सभी मित्रों के लिए पुनः प्रकाशित कर रहा हु। जिसमे आपको दर्द ए दिल को बयां करती हुई कुछ और पँक्तियों को पढ़ने का आनन्द एक लुफ्त प्राप्त हो सकें। तो पेश ए ख़िदमत है आपकी अपनी नज़म 🌹 अश्क़। (एक दर्द भरी प्यारी सी सौगात के साथ)

🌹 अश्क़।

मोहब्ब्त से कायल है मोहब्ब्त से महबूब की वो अपने, लम्हा लम्हा मर्ज़ ए मोहब्ब्त से घायल है मोहब्ब्त से महबूब की वो अपने।

देखता है सूरत ए यार बेहद नज़दीक से वो अपने, करता है मोहब्ब्त, महबूब को बेहद नज़दीक से वो अपने।।

हुस्न के वार से इश्क़ तड़प जाता है बेहिंतिया, उठ उठ कर सर्द रातो में ज़ख्मो को कुरेद देता है वो अपने बेहिंतिया।

उसकी मदहोश आँखें उसके दर्दो को बयाँ करती है, हर दर्द से उसके, उसका दीवाना तड़प जाता है आज भी बेहिंतिया।।

चिर के दिल ख़ंजर से ज़हरीले अपना, फैला दिया ज़हर रग रग में नाम ए मोहब्ब्त बेवफाई उसकी, है जो आज भी बहुत ज़हरीला।

पहुचाता है सकूँ जख्मों को मेरे, हर एक ज़ख्म नया, कर देता है जिंदा, ज़हर झूठी मोहब्ब्त का उसकी, है जो आज भी बहुत ज़हरीला।।

हर वफ़ा से उसकी फ़रेब कोई झलक कर दिख जाता है आज भी जो उसका।

हर वफ़ा से आज भी है कायल दीवाना, ज़हर मोहब्ब्त का कर के बर्दाश उसका।।

ज़ख्म जो दिल के कभी भर ना सके, हर ज़ख्मो को मान कर एक सौगात उसकी, हम जो कभी मर ना सके।

एहसास मिटा कर भी उसका हम जो उसको कभी भुला ना सके, मासूम चेहरे से सरेराह हम आज भी उसके नक़ाब फ़रेबी जो उठा ना सके।।

नाम मोहब्ब्त का मोहब्ब्त से लेते है उनकी, आज भी हम ए दिवाने।

हर राज मोहब्ब्त के बैठे है छुपा कर मोहब्ब्त से उनके, आज भी हम ए दिवाने।।

अक्स मोहब्ब्त का उनकी मिटता नही, आज भी टूटे दिल से जो ए दिवाने।

हर अक्स मोहब्ब्त का है बेनाम एक टूटा आईना उनकी, आज भी जो ए दिवाने।।

हर असूल ए मोहब्ब्त को निभाते हुए, हर दर्द ए दिल दर्द जो मोहब्ब्त का उनकी दिल से टूटे अपने छुपाते हुए।

कर गया बर्दाश हर दर्द मोहब्ब्त का दर्द मेरा, हर दर्द एक ज़ख्म दिल का बन गया नासूर, बयान फ़रेब उनका करते हुए।

बर्दाश नही दर्द ये दिल का, धड़कता दिल सीने में अब हमें,
धड़कती हर धड़कन सुनाती है फ़रेबी हर दास्ताँ ए मोहब्ब्त जो उनकी।

हर दर्द एक दास्ताँ जो अश्क़ है मोहब्ब्त का, छलकता दर्द, हर एहसास ए मोहब्ब्त सरेराह, आज भी फ़रेबी मोहब्ब्त से जो उनकी।।

उनकी वो मासूम अदाएं, मदहोश शराबी निगाहें, आज भी आ जाती है याद जो, हर एक बात उनकी सबक जिंदगी का बन गया छलकता अश्क़ जो हर एक दर्द मेरा।

हर दर्द जो एक सबक बन गए, जिंदगी को जीने का जिंदा एक हर्फ़ बन गए, किताब ए मोहब्ब्त है दास्ताँ ए जिंदगी, हर दास्ताँ करती है बयां, अश्क़ जो एक दर्द मेरा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

5/09/2019 at 11:05 am1567654951010

Advertisements

🌹 पहली नज़र। (दर्दभरी नज़म दास्ताँ) with My video & link.

नमस्कार प्रिय मित्रों (ह्रदय अज़ीज़ सब्सक्राइबर्स), मैने अपनी प्रकाशित पुस्तक “एहसास” जिसका केंद्र बिंदु हम सभी के सभ्य समाज के कठोर होते भाव व्यवहारों एव उन कुप्रथाओ पर जो आज विज्ञान की आड़ में और भी अधिक फल फूल रही है पर अपनी संवेदनशील काव्य किस्सों के द्वारा एक प्रहार का प्रयास मात्र है कि 25 अत्यधिक संवेदनशील काव्य किस्सों, कविताओं के साथ कुछ दर्दभरी नज़म दास्ताँ भी लिखी थी। जिनमे से लघु एवं अत्यधिक लघु नज़म दास्तानों (पहली नज़र, पैग़ाम ए मोहब्ब्त, सितमगर हसीना, अक्सर सोचता हूं तन्हा अंधेरी रातो में कि…, धुंधलाता अक्स एवं एक खेल जिंदगी, को मैं वर्ष 2017-18 मध्य ही आपकी अपनी इस ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित कर चुका हूं।

एव उन समस्त नज़म दास्ताँ में से मेरी सबसे खास मेरे जीवन की मेरी पहली चार अत्यधिक दर्दभरी नजम दास्ताँ में से पहली तीन दास्ताँ ( एक इंतज़ार…मोहब्ब्त, एक दीवाना और बेगुनाह मोहब्ब्त) को अपने सक्रिय ब्लॉग “दास्ताँ” के तहत प्रकाशित कर चुका है एव जल्द ही मैं अपनी अब तक कि लिखी हुई अंतिम सबसे खास दर्दभरी नज़म दास्ताँ में से एक “मासूम मोहब्ब्त” को प्रकाशित करूँगा।

आज मै अपनी एक लघु दर्दभरी नज़म दास्ताँ “पहली नज़र” को एक बार पुनः प्रकाशित कर रहा हु। परन्तु इस बार कुछ यह कुछ खास है कि मैं अपनी दर्दभरी नज़म दास्ताँ “पहली मोहब्ब्त” के साथ अपने ह्रदय के समीप स्थापित अपने स्वरों के साथ रिकॉर्डिड अपनी वीडियो भी अपलोड कर रहा हु। साथ ही इस बार के पाठन में आपको जो कुछ अलग एव ख़ास प्राप्त है वह यह है कि इस बार टंकण त्रुटियों पर विशेष ध्यान देते हुए उनमे सुधार कर दिया गया है। साथ ही वीडियो को सुन कर भी अब और भी अधिक लुफ्त एवं वास्तविक भाव ज्ञात कर सकते है।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल।

🌹 पहली नज़र।
(एक दर्दभरी दास्ताँ)

👰🏻 पहली नज़र। 

दिखलाती है ज़िन्दगी, हर कदम पर, करीब से अपना रंग।

बतलाती है खून ए ज़िगर कि वो अधूरी दास्ताँ, हर रंग से अपने।।

दे देती है, दर्द कोई बिछुड़ा फिर से, आता है बदल कर रूप सामने, फिर से वो  दर्द।।।

दहलीज है बिछुड़ती जवानी की, आगाज है बेदर्द बुढ़ापे का।

समा है ऐतबार से, महफ़िल है फिर से आबाद, जो एक दीवाने की।।

हो गया एक रोज़, दीदार ए यार, धड़कने ये खो गई।

लौट आईं मोहब्ब्त दिल में खोई आरज़ू कोई जाग गई।।

किया है मज़ाक, ज़िन्दगी ने, ज़िन्दगी में दिन ये कौन सा आया।

दहलीज़ है बुढ़ापे की, बिछुड़े यार से, ये सितम, जिस पर मिलाया।।

एक रोज, एक दम से दीदार ये किस का हुआ।

देखते ही जान गया ये दिल, हा इसी से तो प्यार हुआ।।

एक ज़माने के बाद, ये किस ने नज़रो से नज़रो को मिलाया।

करीब दिल के आकर मेरे, ठहरी ज़िन्दगी से बेजान दिल को धड़काया।।

सितम इस दिल पर हो रहा, तोड़ कर बिजलिया, धड़कनो पर, बेदर्द सावन भी रो रहा।।।

इंतेहा दर्द ए दिल, मोहब्ब्त जो अब हो गई, ज़माने की है 
रुसवाई।

बरस रहे आँख से आँसू, बात है दिल कि दिल को जो दिल ने बतलाई।।

आई है बन कर, सावन की बहार, बे-मौसम ज़िन्दगी मेरी जो बंजर बियाबान।

मुस्कुराहट है लबो पर गुलाबी उसके, जाग गए देख कर, 
करीब से दिल के सब अरमान।।

दर्द है जुदाई का, जख़्म उसके भी जख्मी सिने में।

कहना चाहती है वो भी कुछ, सुनना चाहता हु में भी कुछ।।

कर रहे दीदार दोनों, बिछुड़े जो एक ज़माने से।

सदियों से खमोश लब, बेड़िया अब भी ज़माने से।।

लकीर है  मिटने लगी, वक़्त की यू ही आज जो अचानक से।

याद है उल्फ़त के अब भी वो दिन, बढ़ने लगी धड़कने ज़िन्दगी की जब अचानक से।।

बदला-मौसम, समा बदला, बदल गए सब नज़ारे।

आ जाती है याद ज़िन्दगी, तमाम अधूरी वो बहारे।।

नादां उम्र से नादां धड़कने, नादां थे वो अफ़साने।

हो गए ज़माने से जो, नादां थे वो फ़साने।।

याद है…

याद है अब भी, सावन कि वो बात।

नीरस थी जब ज़िन्दगी, पूरे चाँद की वो रात।।

बेजान मौसम में, एक रोज जान आ गई।

सुन-सान गली महोले कि धड़कने जाग गई।।

तन्हा थे लम्हे, अजीब से जो खामोश, उनसे जो एक अहसास हुआ।

देख कर खुशनुमा मौसम, फिर मुझ को जो विशवास हुआ।।

चारो ओर एक खामोशी सी छा गई।

माहौलें (पड़ोस) में मेरे रहने को एक हूर आ गई।।

एक इत्तफाक किसमत ने मेरे साथ किया।

घर के सामने मेरे, उसने एक घर लिया।।

देख कर उस को, ये दिल धड़क गया।

जाने को करीब उसके, ये मन मचल गया।।

देख कर नज़ारा ए हुस्न, मौसम भी मदहोश हो गया।

हर अदा थी कातिल उसकी, दिल ए दीवाना कही खो गया।।

गिरती थी हुस्न ए शबाब से उसके बेबस इस दिल पर बिजलिया तब।

चलती थी इठला कर जब, भूल जाता था ये दिल भी धड़कना तब।।

कतार घर के सामने, मनचलो की उस के लगने लगी।

करने को दिदार ए हुस्न, जंग उन-में कोई खूनी मचने लगी।।

देख कर नज़ारा, ये बर्बादी का अपनी, मन मेरा कूछ परेशान हुआ।

करता हूं मोहब्ब्त मैं भी उस-से, जान कर हाल ए दिल ये दिल हैरान हुआ।।

करता हूँ दिदार ए हुस्न, नज़रे बचा कर खिड़की से रोज़ अपनी।

जीता हूँ, मरता हूँ, तन्हा, घुट-घुट कर किसमत से रोज़ अपनी।।

नही आती है नींद बेदर्द रातो से दर्द ये आज-कल।

सताती है याद ए दिलरुबा, सितम ये हर-पल।।

दीवाना ए हुस्न ये जहां सारा लगता है उसका।

हर कोई है जलने को आतुर, परवाना ए हुस्न ये जहां सारा लगता है उसका।।

सुर्ख गुलाबी लबो पर निकलती है लगा कर लाली वो जब।

लग जाती है दीवाने उन मनचलो में उसके कोई होड़ तब।।

एक शोर सा मच जाता है भरे बाजार में तब।

छुरिया चल जाती है कत्ल हो जाता है भरे बाजार में तब।।

देख कर नज़ारा ए हुस्न वो मदमस्त उसका, वख्त भी ठहर जाता है।

एक दिदार ए सनम के खातिर, हर कोई इस जहां में मचल जाता है।।

देख लेती है, उठा कर जब भी, मदहोश निगाहें वो अपनी, बेबस है दिल ए दीवाना धड़क से धड़क जो जाता है।

मोहब्ब्त जताने को सनम से अपने ए पाबंदियों वो बेहिंतिया तड़प जाता है।।

न जाने क्यों एक रोज मोहब्ब्त ने रंग अपना दिखलाया।

हुस्न को है इश्क से काम, नाम ए मोहब्ब्त जो दीवाने को बुलाया।।

देख कर नज़दीक से बदन वो क़ातिलाना-हुस्न उसका, 
बुरा हाल था।

शराबी निगाहों से वॉर, वो मनमोहक उसके शारीरिक उभार, जीना अब मेरा दुशवार था।।

धधक रहे थे अंगार नाजुक वो गुलाबी लब उसके।

झुलस रहा था दीवाना, तपिश जो गुलाबी-लबो से हर लम्हा उसके।।

एक रोज नज़रे-चार, अनजाने ही, जो उनसे हो गई।

कर के नज़दीक से दिदार ए हुस्न, धड़कने ए दिवाना जो खो गई।।

वो आए करीब, इस दिल के, वो एक नशा था।

देखा नशीली निगाहों से उसने, उनमे एक नशा था।।

कर रही थी दिदार ए यार जो नज़रे नज़दीक से।

उठा था दर्द ए धड़कन, देखा जो उनको नज़दीक से।।

अक्सर होती है, मुलाकाते उनसे, मुस्कुरा कर आता है हुस्न ए यार वो करीब।

जगा कर आरज़ू, खोई कोई तमन्ना, खो जाता है कसम, फिर वो नसीब।।

अरमान दिल के अब जाग गए, एक ही पल में दीवाना जो जहां सारा पा गए।

खिल उठे महोबत के गुल, गुलिस्तां ए मोहब्ब्त जो रेगिस्तान से दिवाना पा गए।।

मुस्कुराता है देख कर, हर अदा से अल्हड़ वो हुस्न जब।

करता है वॉर, जख़्मी अरमान, बेबस इस दिल पर जब।।

भूल जाता है धड़कना, ठहर जाती है धड़कने ए दिल वही पर जब।

बेजान सी है जो धड़कने, धड़कना चाहती है वो जब।।

लव है खामोश से एक थरकन सी जो उनमे आई, चाहते है कुछ कहना शायद हम दोनों ही जब।

आलम है बेबसी भरा अहसास ए दिल, खामोशी जो साथ अपने लिए, रह जाते है खमोश से हम दोनों ही जब।।

आती है दिल-रुबा वो, होते है दीदार ए यार, बरसते है तीर ए हुस्न, शराबी निगाहों से अब अक्सर।

धड़कता-दिल, धड़काते है हुस्न ए यार, और भी खामोशी से बेदर्दी अब अक्सर।।

होता है इज़हार ए मोहब्ब्त नज़रो से जो दीवाना, वक़्त बे वक़्त जो उनसे सितम अब अक्सर।

करते है गुफ्त-गु, साए में नज़दीक से मोहब्ब्त, एहसास जो उनके अब अक्सर।।

आलम ए बेबसी, वो इज़हार ए मोहब्ब्त, तरसता है सुनने को दीवाना जो अक्सर।

यकीन ए मोहब्ब्त वो ख़्याल ए तन्हाई, सिहर जाता है ख़ौफ़ से दीवाना जो अक्सर।।

दीदार ए यार ये समा ए ऐतबार मिलता है तन्हाई में नसीब से अब अक्सर।

तीर ए मोहब्ब्त ये जख्म ए दिल, लगते है रुसवाई से सरेराह, अब अक्सर।।

नही मालूम है गहराई,  सितमगर ए सनम, काफ़िर उस हसीना के दिल ओ धड़कनो की क्या है दीवाना।

धड़कते-दिल तड़पती धड़कनो को सकूँ एक लम्हा भी वो लेने नही देती, दर्द ए दिल ये दर्द है धड़कनों पर दीवाना ।।

जो है मोहब्ब्त दीवाने से उस को, नाम ए मोहब्ब्त बन्द लबो से ग़ुलाबी वो अपने क्यों बोल नही देती।

जख़्म है दिल के हर जख्मो पर वो मरहम, मोहब्ब्त से अपने, धड़कनो को दिल के सकूँ क्यों नही देती।।

महक जाता है समा, बदलता है रंग, शर्म ओ हया से चेहरे का जो उसके गुलाबी।

पुकारता है दर्द ए दिल, नाम ए मोहब्ब्त वो नाम उसका, देखा जब भी मदहोश निगाहों में जो उसकी शराबी।।

धड़कती जवां धड़कने, उफान एक उनमे आ गया।

यकीन ए दीवाना, सनम के अब वो करीब आ गया।।

किया मज़ाक, ए वख्त जो हाल ए दिल, एक रोज़, धड़कनो से सनम को जब सुनाया।

समझा सनम ने दिल-लगी, ए मुकदर दिल-चिर दीवाने ने
फिर अपना दिखलाया।।

बदला रूप फिज़ाओ ने हालात जो खिलाफ हो गए।

पहले झुके पहलो में वो, फिर लिप्ट के  रो दिए।।

किया इजहार ए दोस्ती, मोहब्ब्त का उसमे कोई नाम नही।

मोहब्ब्त तो है ए दोस्त मग़र, मक्कारी कोई उनमे नही।।

बन कर दोस्त, आती है दिलरुबा, जब भी कोई नज़दीक, 
नज़रो के  सामने।

एक आरज़ू,वो लव्ज़ ए महोबत दब जाते है दिखती है जब भी वो नज़रो के सामने।।

रहता है इंतज़ार, एक एहसास वो पल है मोहब्ब्त, जिस पल उसे भी हो जायगी। 

तड़पेगा-दिल एक रोज़ ए मोहब्ब्त उस सितमगर का, जिस पल मोहब्ब्त उसे भी दीवाने से अपने हो जायगी।।

इंतज़ार ए हुस्न से हुस्न ए दीवाने कई मनचलों का हाल बेहाल होते देखा।

दीदार ए हुस्न से बांधे टक-टकी, नज़रो में अपनी, अंजाम कइयो का बुरा देखा।।

चीर दी है सरे-राह कइयों ने फड़कती नसें, शरीर की अपने, हुस्न ए शबाब के वास्ते।

फोड़ दिए है सरे-राह, कइयो ने बेमतलब सर अपने, आपसी तकरार के वास्ते।।

हाल ए दिल दीवाने का भी, बेहाल नज़र आता है।

देख कर दीवाने ए सनम, मनचले वो चौखट पर उसकी दिल तड़प जाता है।।

मौसम है वीरान बिन दीदार ए सनम, ये कैसी वीरानी।

हालात है खिलाफ, ये दर्द ए मोहब्ब्त ये कैसी ज़िन्दगानी।।

ज़िन्दगी है उजाड़ मेरी किस तन्हाई में खो गई जो।

सनम है सितमगर मेरे, क्या किसी गैर की हो गई वो।।

जख्म ये गहरा, टूटे दिल पर, एक रोज, बेहूदा कैसा पड़ गया।

देखा जो सनम को अपने, न जाने क्यों ये दिल तड़प गया।।

आ रहे थे सनम कहि से शायद कहि पर वो जा रहे थे।

आईना ए महोबत, वो अक्स नज़रो में, किसी गैर का, मोहब्ब्त एक दूसरे से दोनों फरमा  रहे थे।।

गुजर गए न जाने मौसम कितने, कितने ज़माने बीत गए।

तड़प ए दिल, तन्हाइयों से दीवाना, जख्म न जाने टूटे दिल
पर कितने पड़ गए।।

तड़प टूटे-दिल की टूटी धड़कनो से जो अब बर्दाश नही होती।

सताता है ख़्याल ए सनम, बिन सनम दर्द ये ज़िन्दगी, आवाज़ दिल के वीराने से कोई अब नही होती।।

बदमिजाज जो मौसम, एक रोज सरेराह हो गया।

अहसास ए ज़माना, हर कोई यहाँ खो गया।।

वक़्त की लकीर पर एक हादसा जो अब हो गया।

आशिक एक दीवाना जो सनम का, सनम को कहि ले गया।।

तन्हा छोड़ दीवाने को जो तन्हाई में, उड़ गए पंछी महोबत के न जाने कहाँ वो।

आई न याद दीवाने की जो अपने, तन्हा मार गए जो एक दीवाने को बेदर्दी वो।।

करी है महरबानी जो बेबस अपने एक दीवाने पर, खून ए ज़िगर, छोड़ दिया, चौखट पर मेरी तन्हा एक पैगाम।

पड़ा है जख्मी, तन्हा सा वही चोखट पर मेरी, तन्हा सनम का जो आखरी वो एक पैगाम।।

लिपटा है एक गुलाब उस से, काँटे हज़ारो रुसवाई के कई, चुम रहा है बेबसी से धूल चोखट की मेरी, तन्हा सनम का वो एक पैगाम।

टूटे-दिल की टूटी धड़कने, भूल गए जो अपना नाम, ठहर गयीं उखड़ती हर सांस, जाम है रगों का जो बहता उफ़ान।।

काँपते हाथ, थरथराती जुबां, मासूम थे वो अरमान।

पढ़ रहे महबूब का जो अपने, आखरी था वो फरमान।।

चिर दिया इश्क़ ने दिल अपना जो निकाल, नम आँखों से पढ़ कर तन्हा सनम का वो तन्हा एक पैगाम।

हर लव्ज़, वो हर अक्षर थे उसके, सुना रहे हाल ए दिल, दर्द सनम का जो एक दास्ताँ।।

नम आंखों से लिखी है उन्होंने जो इल्तिज़ा एक आख़री।

दर्द ए दिल कर रहे है दर्द बयां, अश्को के उस पर, निसान वो आखरी।।

टूटा जो दिल टूट कर बिखर गए सब अरमान, टूटे इस दिल के जितने थे जो आखरी।

झलक रहा, दर्द ए दिल, दर्द हर लव्ज़ वो अक्षर थे उसके जो आखरी।।

लिखा था खून ए श्याही से दर्द ए दिल वो नम आंखों से उसने दिल का जो अपने हाल।

पढ़ रहा है, दीवाना उसका, ए दिल धड़कनो को अब जरा तू अपने ले सम्भाल।।

हो गए जो दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न अब  मुझ को तुम याद।।

जा रही हूं छोड़ कर, चौखट पर तुम्हारी तन्हा एक पैगाम।

पढ़ लेना तुम उस को, लिपटा हो जिस से टूटा एक गुलाब।।

याद न करना कभी, समझना कोई ख़्वाब।

टूटेगी नींद जब तुम्हारी, टूट जाएगा यह ख़्वाब।।

अलविदा ए यार, आखरी, रखना अपना ख़्याल।

दिख जाएगा जल्द ही ज़माने में, तुम को भी हसीन कोई ख़्वाब।।

करे मोहब्ब्त दिल से जो, देना तुम उसका साथ।

भूल जाना मुझ को तुम, दे देना उस को यह गुलाब।।

जा रही हुं, अब दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न अब मुझ को तुम याद।।

तड़प गया दिल, बिखर गई, टूट कर हर सांस।

पढ़ कर महबूब का अपने, आखरी वो फरमान।।

टूटा जो दिल एक दीवाने का,  उठती है दिल से एक फ़रियाद।

खड़ा है राह ए सनम, अब भी दीवाना, करता है हर लम्हा जो सनम को याद।।

दिल में है मोहब्ब्त उसकी, हर धड़कन में है उसका एक इंतज़ार।

रुकी है ज़िन्दगी, ठहर गयी हर सांस, हर सांस में अब भी है कायम उसका एक एहसास।।

तड़पता दिल, टूटी धड़कने, ले रही है, दीवाना ए सनम से एहसास ए मोहब्ब्त का जो इम्तेहां ।

आरज़ू एक मोहब्ब्त, बेताब है हर सांस, दे-देगा दीवाना, अब भी ए मोहब्ब्त, मोहब्ब्त का हर इम्तेहां।।

जला देगा, सितम ए इश्क, मिटा देगा ए मोहब्ब्त खुद को अब ये दीवाना।

धड़कता दिल, बन्द सीने से जो हुस्न ए यार का अब भी है सनम का अपने वो दीवाना।।

दास्तान ए मोहब्ब्त जख्मी ये दिल जो सरेराह हो गया।

हुआ जो दीदार ए सनम दीवाना ए सनम फिर से कहि जो खो गया।।

तड़प ए दिल, बेबस है बेहिंतिया जो एक दीवाना, अंजाम ए मोहब्ब्त जो अंजाम ए दीवाना दिखता नही।

राह ए सनम, एक रोग है मोहब्ब्त, जो एक आशिकाना, दर्द ए दिल क्यों दर्द ए दीवाना अब मिटता नही।।

दम तोड़ती ये मोहब्ब्त, सुनाती है हर धड़कन से अब भी मोहब्ब्त का मोहब्ब्त से फिर वही तराना।

एहसास ए जुदाई साथ ये दीदार ए सनम, खिले एक अरसे से गुल तो खो गया कहि वीराना।।

धड़कता है दिल, तो धड़कनो से एक आवाज़ होती है।

हर धड़कन नाम ए महबूब दीवाने के साथ होती है।।

इंतज़ार है एक धड़कन, वो राह है सुनी, खड़ा एक ज़माने से जहाँ जो सनम-दीवाना।

आरज़ू है एक अधूरी, थामे है हाथो में अपने अब भी जो गुलाब वो वर्षो पुराना।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
27/08/2019 at 7:45am
(पुनः प्रकाशित अपनी रिकॉर्डिड वीडियो एव youtube लिंक के साथ।)

YouTube video link is mentioned in his.
👉 https://youtu.be/A_5bLVHS9yo

कृपया मेरे YouTube चैनल को सब्सक्राइब (Subscribe)

अवश्य कीजिएगा।

💥 मेरी लेखनी का एक लघु परिचय। ✍️ // 💥 A short introduction to my writing. ✍️

💥Spiritual communicator, Motivational Speaker, Author, Writer, Poet And Thinker.

विक्रांत राजलीवाल।

(समाजिक कार्यकर्ता, कवि, शायर, नज़्मकार, ग़ज़लकार, गीतकार, व्यंग्यकार, लेखक एव नाटककार-कहानीकार-सँवादकार)

1) एहसास प्रकाशित पुस्तक (published Book) : अत्यधिक संवेदनशील काव्य पुस्तक एहसास, जिसका केंद्र बिंदु हम सब के असंवेदनशील होते जा रहे सभ्य समाज पर अपनी काव्य और कविताओं के द्वारा एक प्रहार का प्रयास मात्र है।

Sanyog (संयोग) प्रकाशन घर शहादरा द्वारा प्रकाशित एव ए वन मुद्रक द्वरा प्रिंटिड। प्रकाशन वर्ष जनवरी 2016. प्रकाशित मूल्य 250:00₹ मात्र।

2) My Site: Vikrant Rajliwal
Url address: vikrantrajliwal.com

वर्ष 2016-17 से अब तक सैकड़ो दर्दभरी नज़्म, ग़ज़ल, बहुत सी काव्य-कविताए एव कुछ व्यंग्य किस्से, कुछ एक गीतों के साथ बहुत से विस्तृत समाजिक, आध्यात्मिक एव मनोवैज्ञानिक लेखों के साथ कई प्रकार के सामाजिक एव आध्यात्मिक विचार लिख कर अपनी साइट पर प्रकाशित कर चुके है। जिनकी संख्या आपके प्रेम से दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। एवं20180905_120418 स्वम् की कई नज़्म कविताओं एव लेखों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर चुके है।

3) Youtube channel: Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal पर मेरे द्वारा लिखित मेरी समस्त रचनाओँ जैसे प्रकाशित पुस्तक एहसास से अति संवेदनशील काव्य- कविताए, और मेरी निजी लेखनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित मेरी सैकड़ो नज़्म, ग़ज़ल और बहुत सी काव्य, कविताओँ एव्यंग्य किस्सों को मेरे स्वयं के स्वरों के साथ देखने और सुनने के लिए मेरे YouTube चैनल को अभी Subscribe कीजिए।

👉 आगामी रचनाएँ (Upcoming Creation’s) : अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर सक्रिय अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ श्रृंखला “दास्ताँ” के अंतर्गत चौथी एवं अब तक लिखी गई अंतिम अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ “मासूम मोहब्ब्त” प्रकाशित करि जाएगी।

जल्द ही अपनी ब्लॉग साइट vikranrajliwal.com पर अपनी कुछ लघु कहानियों का प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करूँगा।

👉 साथ ही मैं वर्ष 2016 से एक अत्यंत ही दर्दभरा जीवन के हर रंग को प्रस्तुत करती एक सामाजिक कहानी, एक नाटक पर कार्य कर रहा हु।

💥 इसके साथ ही शायद आप मे से बहुत से महानुभव इस बात से परिचित नही होंगे कि मैं आपका अपना मित्र विक्रांत राजलीवाल वर्ष 2003-04 से नशे से पीड़ित मासूम व्यक्तियों के लिए निःस्वार्थ भाव से सेवा करता आ रहा हु एव स्वम भी कई प्रकार के जटिल उतार चढ़ाव के उपरांत एक शुद्ध रिकवरी को प्राप्त कर सका हु।

यदि आप मुशायरे या कवि सम्मेलन के आयोजक है और आप मेरी सैकड़ो दर्दभरी नज़्म ग़ज़ल शायरी या काव्य कविताओं के द्वारा मेरे कार्यक्रम को बुक करते है तो यकीन मानिए इस प्रकार से आप अपना एक अनमोल योगदान उन मासूमो के लिए सहज ही प्रदान कर सकते है। क्योंकि मेरी कला के कार्यक्रम से होने वाली 100% कमाई नशे से पीड़ित उन गरीब एव बेबस मासूमो के इलाज लिए समर्पित होगी। जिन्होंने अपना जीवन जीने से पूर्व ही नशे के आदि बन कर बर्बाद करना शुरू कर दिया है या बर्बाद कर चुके है।

😇 समाज सेवा: स्वमसेवी नशामुक्ति कार्यक्रम के तहत नशे की गिरफ्त में फंसे नवयुवको एवं व्यक्तियों को एक स्वास्थ्य जीवन को जीने के लिए प्रेरित करता आ रहा हु। स्वमसेवी संस्थाओं एवं स्वयम से जन सम्पर्को के माध्यम द्वारा निशुल्क सेवा भाव से वर्ष 2003 से अब तक।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

मेरासंपर्क सूत्र नीचे अंकित है।

My Whatsapp no: 91+9354948135

(Translated)

One service and one collaboration

Hello Friends, Many of you may not be familiar with the greatness that I have been serving my self-indigenous friends Vikrant Rajliwal with selfless service for innocent people who have been suffering from intoxicants since 2003-04. After a complex fluctuation of type, I could get a pure recovery.

And if you are the organizer of mushere or poet conference or you can book my program with my hundreds of painful najm ghazal shayari or poetic poems and also in your program, believe that in this way you have a valuable contribution They can easily provide for those innocent people. Because 100% earnings from my program will be dedicated to the treatment of those poor and unemployed innocent people who have started wasting or wasted by becoming addicted to drugs before living their lives.

Name: Vikrant Rajliwal

Published book: एहसास (a highly sensitive poetic book inspired by social and humanitarian values) published by Sanyog publication house shahdara. Which was also showcased at the Delhi World Book Fair in the same year 2016.

🎤 Upcoming creations: The story of my fourth and last nazam tales written so far. And a play, a painful story presenting every run of life.

😇 Social service: Swamsevy has been promoting the life of the youth and all the people trapped under the influence of intoxicants as a drug addiction program. Free service charges through Swamsevy institutions from 2003 till now.

Thank you

Vikrant Rajliwal

Hometown: Delhi.

The contact form is displayed below.

My Whatsapp no: 91 + 9354948135

यह है अब तक का मेरे द्वारा सम्पन्न एव आगामी लेखन कार्य, जो आप सभी प्रियजनों के प्रेम एव आशीर्वाद से शीघ्र अति शीघ्र ही सम्म्प्न हो अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हो जाएगा। आप सभी प्रियजन अपना प्रेम एव आशीर्वाद अपने रचनाकार मित्र विक्रांत राजलीवाल पर यू ही बनाए रखे।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल।

एक हक़ीक़त।

सुलगते हर एहसासो से अपने सुलगता सा जा रहा हु मैं।

बिखरते हर अरमानो से अपने बिखरता सा जा रहा हु मैं।।

दिख जाता है आईना आज भी जब मुझे, बतलाता है दर्द तन्हाई का अपनी एक ख़ामोशी से मुझे।

हक़ीक़त है जो हक़ीक़त नही, हर हक़ीक़त को करता बयां एक हक़ीक़त से वो मेरी मुझे।।

एक उड़ान अधूरी उड़ना आज भी है ख्वाहिश, हर उड़ान जिंदगी की उड़ने से पहले पँछी जो कैद हो गए।

कदमो से बंधी जंजीरे, लहूलुहान सी तड़पती सांसे, ख़ामोश हर एहसास मेरे एक ख़ामोशी से जो टूट गए।।

कोई तम्मना, कोई आरज़ू अधूरी सलामत ना बचा सके जो हम।

हर बढ़ते कदम से खुद को तन्हा और तन्हा सा करते गए जो हम।।

बदलते मौसम ने बतलाया है हर बार हमें कि ए मुसाफिर समय के, दूर है बहुत काफिला तेरा अब भी बहुत जो कहि खोया हुआ।

एक उम्मीद मेरी जो एक दुआ अब भी है सलामत, राह ए हक़ीक़त से है रौशन उमीदों का मेरा जो टूटा दिया।।

अक्स ए हक़ीक़त मिटा देगा जल्द ही हर अंधेरा, दिख जाएगा मुझ को मेरा फिर से जब वो खोया काफ़िला।।।

हो कर मज़बूर खुद से सिमट जाएगी हर तन्हाइयां एक रोज़ मुझ में, मिटते हर निशां जिंदगी के जब खुद ही एक रोज़ लौट आएंगे।

कब के बिछुड़े हम खुद से ही एक रोज़ जब अचानक से टकराएंगे, हक़ीक़त है ये किस्सा, हर गम ज़िन्दगी के उस रोज मिट जाएंगे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

21/08/2019 at 12:05 pmFB_IMG_1509257727466

💥 VIKRANTRAJLIWAL.COM AND MY SPIRITUAL PROGRAM (NA) ✍️

In the last few days, some inspirational ideas and articles written by my pen on various platforms of social media to promote my blog site vikrantrajliwal.com and my spiritual program.

बीते कुछ दिवसों में अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com एवं अपने आध्यात्मिक कार्यक्रम के प्रचार प्रसार हेतु सोशल मीडिया के अनेक मंचो पर मेरी कलम के द्वारा लिखे गए कुछ प्रेरणदायक विचार एव लेख।

💥 मित्रों जीवन को जीना है तो अपनो के प्रति अपने सच्चे मित्रों के प्रति हर प्रकार कि दुर्भावनाओं को अपनी ठोकर से मार कर कुचल दीजिए।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

मेरी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com को फॉलो कीजिए।

Translated

💥 Friends, if you want to live your life, then you can crush all kinds of maliciousness towards yourself and your true friends by crushing them with your feet.

Written by Vikrant Rajliwal.

Follow my blog site vikrantrajliwal.com.

💥
भृम है आँखों पर आपका जो आपके अपनो के प्रति कठोर हर भाव हर व्यवहार को दर्शाता है।

क्योंकि कभी जो दिखता एवं महसूस होता है वो सत्य से विपरीत आपका भृम भी हो सकता है।

ज्ञान और अज्ञान के बीच भृम की अत्यंत ही महीन परत होती है। जिसे कोई उचित ज्ञान का जानकर एवं एक दिव्य ज्ञान से शुशोभित ज्ञानी व्यक्ति ही आपके जीवन से मिटाते हुए, आपको एक दिव्य ज्ञान एव दिव्य प्रकाश को महसूस करने का एक अलौकिक अनुभव प्रदान कर सकता है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित सत्य अनुभवो से प्ररित।

मेरी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com को फॉलो कीजिए।

Translated

💥
The ignorance that you have on your eyes reflects your hard feelings and every harsh behavior towards your loved ones.

Because sometimes what you see and feel can be your ignorance contrary to the truth.

There is a very thin layer of misunderstanding between knowledge and ignorance. Whom a person knowing with proper knowledge and a knowledgeable person of divine knowledge can erase from your life, giving you a divine knowledge and a supernatural experience of feeling divine light.

Inspired by true experiences written by Vikrant Rajliwala

Follow my blog site vikrantrajliwal.com.

💥 सुप्रभात मित्रों।

यदि आप अपने से श्रेष्ठ अनुभवों के व्यक्तियों का एवं उनके निःस्वार्थ भाव से किए हुए कार्यो का सम्मान नही करते है। तो वास्तव में आप स्वयं का, स्वयं के व्यक्तित्व का भी सम्मान नही करते है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

फॉलो करें vikrantrajliwal.com

💥 Good Morning Friends.

If you do not respect the people with best experiences than you and the work done by them selflessly. So in reality you do not respect yourself, your personality also.

Written by Vikrant Rajliwal.

Follow vikrantrajliwal.com

💥 मित्रों जीवन को जीना है तो अपनो के प्रति अपने सच्चे मित्रों के प्रति हर प्रकार कि दुर्भावनाओं को अपनी ठोकर से मार कर कुचल दीजिए।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

मेरी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com को फॉलो कीजिए।

Translated

💥 Friends, if you want to live your life, then you can crush all kinds of maliciousness towards yourself and your true friends by crushing them with your feet.

Written by Vikrant Rajliwal.

Follow my blog site vikrantrajliwal.com.

💥
भृम है आँखों पर आपका जो आपके अपनो के प्रति कठोर हर भाव हर व्यवहार को दर्शाता है।

क्योंकि कभी जो दिखता एवं महसूस होता है वो सत्य से विपरीत आपका भृम भी हो सकता है।

ज्ञान और अज्ञान के बीच भृम की अत्यंत ही महीन परत होती है। जिसे कोई उचित ज्ञान का जानकर एवं एक दिव्य ज्ञान से शुशोभित ज्ञानी व्यक्ति ही आपके जीवन से मिटाते हुए, आपको एक दिव्य ज्ञान एव दिव्य प्रकाश को महसूस करने का एक अलौकिक अनुभव प्रदान कर सकता है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित सत्य अनुभवो से प्ररित।

मेरी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com को फॉलो कीजिए।

Translated

💥
The ignorance that you have on your eyes reflects your hard feelings and every harsh behavior towards your loved ones.

Because sometimes what you see and feel can be your ignorance contrary to the truth.

There is a very thin layer of misunderstanding between knowledge and ignorance. Whom a person knowing with proper knowledge and a knowledgeable person of divine knowledge can erase from your life, giving you a divine knowledge and a supernatural experience of feeling divine light.

Inspired by true experiences written by Vikrant Rajliwala

Follow my blog site vikrantrajliwal.com.

💥 इस स्वार्थी संसार मे किसी भी भाव व्यवहार की अपनी ओर से पहल करना इस सृष्टि के प्रारम्भ से ही अत्यंत जटिल एवं कठिन भाव व्यवहार रहा है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

आज ही जुड़िए vikrantrajliwal.com से।

Translated

💥 Taking initiative on behalf of any behavior in this selfish world has been a very complex and difficult behavior since the beginning of this creation.

Written by Vikrant Rajliwala

Follow my site vikrantrajliwal.com

Join vikrantrajliwal.com today.

💥
ऐसा क्यों?

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

आज ही जुड़े vikrantrantrajliwal.com से।
💥
Why is this?

Written by Vikrant Rajaliwal.

Linked to vikrantrantrajliwal.com today.

💥
क्योंकि हम मनुष्य इस सृष्टि के प्रारम्भ से ही प्रत्येक नवीन विचार एवं व्यवहार के द्वारा एक अनजाने भय से भयभीत होते आए है। और उन्हें अपनाने या समझने के विचार मात्र से ही हमारा हलक सुख कर बैठ जाता है और हमारी व्याकुल आत्मा स्वयं के व्यक्तिव में परिवर्तन की आशंका मात्र से काँप जाती है। चाहे वह परिवर्तन सकरात्मक ही क्यों न हो।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

मेरे ब्लॉग vikrantrajliwal.com को फॉलो करें।

💥
Because we humans have been afraid of an unintentional fear from the beginning of this creation through every new thought and behavior. And with the thought of adopting or understanding new ideas and practices, our throat gets dry and our distraught soul is shaken by the possibility of change in our personality. Even if that change is positive.

Written by Vikrant Rajliwala.

Follow my blog vikrantrajliwal.com

💥
आज जमाना बदल गया है मित्रों, अब किसी भी लेखक कलाकार, कवि, एवं शायर को किसी भी घमंड से चूर अत्यचारी के समक्ष अपनी चप्पलें घिसते हुए अपने आत्मसम्मान को स्वयं अपने ही हाथो क़त्ल करते हुए किसी भी घमंड से चूर अत्यचारी के समक्ष अपनी कला को जीवित रखने हेतु झुकने की कतई भी आवश्यकता नही है।

आज ईष्वर की कृप्या से इंटरनेट जिंदाबाद है और अनेकों ऑनलाइन मंच है जहाँ से आप अपनी कला का प्रदर्शन जारी रखते हुए एक आत्मसम्मान के साथ अपनी कला को जीवित रख सकते है।

हो सकता है इसमें आपको कामयाब होने में एक अरसा भी लग जाए, परन्तु मैं विक्रांत राजलीवाल आपको विशवास देता हूं कि उस एक अरसे के बाद भी आप एक बादशाह के सम्मान ही स्वयं के आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए खुद को सम्मानित महसूस कर सकेंगे। मुझ को यकीन है आपको तो यकीन है ना!

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

आज ही जुड़िए मेरी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com से।

Translated

💥
Today, the time has changed, friends, now any writer, artist, poet and poet is not required to bow down to keep his art alive by killing his own self-esteem in front of an arrogant person.

Today, due to the kindness of God, the Internet is alive and there are many online forums from which you can continue to showcase your art and keep your art alive with a self respect.

It may take you an time to succeed in this, but I mean that your friend Vikrant Rajliwal gives the assurance to all of you that even after that one time you will protect your self-respect like a king. Will be able to feel honored. I’m sure are you sure?

Written by Vikrant Rajliwala

Join my blog site vikrantrajliwal.com today.

#curruption #Literature #System #भृष्ट #साहित्यिक #व्यवस्था #इंटरनेट #internet #poetry #Shayari #Vikrant #Rajliwal #freedom #wisdom

💥 सुप्रभात मित्रों,

जीवन का एक अचूक मन्त्र है यही तंत्र है कि हम अपने जीवन के प्रत्येक क्षण व्यस्त रहे, व्यवस्त रहे एवं स्वच्छता को अपनाते हुए प्रभु की मस्ती में मस्त रहे।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

आज ही जुड़े vikrantrajliwal.com से।

Translated

💥 Good morning friends

There is an unmistakable mantra of life, this is the system that we remain busy at every moment of our life, stay busy in the joy of God while adopting cleanliness.

Written by Vikrant Rajliwala

Linked to vikrantrajliwal.com today.

💥आपने आपके अपनो को हानिकारक व्यसनो की चपेट में एक बीमार व्यक्ति के सामान तड़पते देखा है।

पर क्या आपको यह ज्ञात है कि वह वास्तव में एक बीमार व्यक्ति ही है जिसका उपचार केवल आध्यात्मिक कार्यक्रम के तहत कुछ गिने चुने जानकर व्यक्तियों के द्वारा ही सम्भव है।

जरा कुछ क्षण स्वयं के चित्त को शांत रखते हुए एक बार पुनः विचार कीजिए।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

आज ही जुड़े मेरी साइट vikrantrajliwal.com से।

You have seen your loved ones suffering like a sick person in the grip of harmful addictions.

  But do you know that he is really a sick person whose treatment is possible only by a few people knowing that under the spiritual program.

  Just think again, keeping yourself calm for a few moments.

  Written by Vikrant Rajliwala

Linked to my site vikrantrajliwal.com today.

इस संसार मे कुछ व्यक्तियों को इंकलाब की बोली ही समझ मे आती है। उनसे आप कितना ही विन्रम क्यों ना हो जाए परन्तु वो आपको निर्जीव समझते हुए आपकी हर विन्रमता को नकारते हुए आपके व्यक्तिव को गारेंटिड लेने से बाज नही आते।

ऐसे ही व्यक्तियों के लिए मैं यानी कि विक्रांत राजलीवाल आज सरेआम अपने इस फेसबुक के पेज़ से अपने हज़ारो फॉलोवर्स मित्रों को साक्षी मानते हुए कहता हूं कि आप बाज़ आ जाए कहि ऐसा ना हो सच्चाई का दिव्य प्रकाश आपकी मलिन आत्मा को जिंदा ही ना भस्म कर दे।

स्मरण रहें जब जब उस संसार से किसी सच्चे व्यक्तिव ने इस संसार के किसी भी भाग से इंकलाब किया है तब तब जन जागृति क्रान्तियों का एक सैलाब उमड़ा है। फिर चाहे आप स्वयं को कितना ही सभ्य साबित करने का प्रयत्न क्यों ना करें। परन्तु जब अध्यात्म की बुलन्द आवाज़ के साथ इंकलाब हुआ है तब हर सभ्य चेहरों से उनका सभ्य होने का नक़ाब सच्चाई की एक हुंकार मात्र से खण्ड खण्ड हुआ है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

फॉलो करें मेरी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com को।

Vikrant Rajliwal
(Recovery Addict)
Author, Writer, Poet, Dramatist, Spiritual Thinker And Writer.

💥
इस मनुष्य जीवन मे आप अपने व्यक्तिव में एक सकरात्मक परिवर्तन रातो रात या अकस्मात ही उप्पन नही कर सकते। इसके लिए आपको एक योग्य मार्गदर्शक की अति आवश्यकता जीवन के पग पग पर हर कदम पर अवश्य महसूस होती रहेगी।

क्यों कि आज आप जिस जटिल समाजिक स्थितियों का सामना कर रहे है वह जटिल स्थितियां या गम्भीर समस्याएं भी रातो रात या अकस्मात ही आपके जीवन मे प्रवेश नही कर सकी है।

इसीलिए उनके समाधान हेतु आपको एक योग्य गुरु एव ज्ञानी मार्गदर्शक के अंतर्गत एक गहन चिंतन एवं एक उचित जीवन प्रणाली को समझना एव अपनाना ही होगा।

आपका मित्र विक्रांत राजलीवाल।
(रिकवरी एडिक्ट)

आज ही जुड़िए मेरी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com से।

Translated

Vikrant Rajliwal
(Recovery Addict)
Author, Writer, Poet, Dramatist, Spiritual Thinker And Writer

💥
In this human life, you cannot achieve a positive change in your personality in the night or accidentally. For this, you will definitely feel the need of a qualified guide at every step on the path of life.

Because the complex social situations you are facing today, even complex situations or serious problems could not enter your life overnight or accidentally.

That is why you have to understand and adopt a deep thinking and a proper life system under a qualified guru and knowledgeable guide to solve them.

Your friend Vikrant Rajliwal.
(Recovery Addict)

Follow my Blog site vikrantrajliwal.com Now!

💥
एक निर्जीव होता या निष्क्रिय होता वृक्ष (घर, परिवार या कोई संस्था) जब एक दिव्य उजाले की दिव्य ऊर्जा से स्वयं की निष्प्राण होती शाखाओं की जीवन धारा में कोई भी जीवन प्राण रूपी ऊर्जा प्रदान करने हेतु कोई भी प्रयास ना करे तो ज्ञात रहे उसका अंत अब निच्छित है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

आज ही जुड़िए मेरी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com से।
#Narcotics #Anonymous #Programme #Recovery #Life #Vikrant #Rajliwal #Experience

Translated

💥
A tree that is a lifeless ( Home, Family and Institution) or a tree lying dormant, when one does not make any effort to provide life-like energy in the life stream of the branches, which is self-sacrificed by the divine energy of a divine light, then its end is now certain.

Written by Vikrant Rajliwal.
Follow my blog site vikrantrajliwal.com
#Narcotics #Anonymous #Programme #Recovery #Life #Vikrant #Rajliwal #Experience

💥
आज मै यानी कि अपनी अंतरात्मा से एक अध्यात्म प्रोग्राम का फालोवर एक रिकवरी एडिक्ट विक्रांत राजलीवाल अपने इस फ़ेसबुक पेज़ के इन चंद गिने चुने से मेरे ह्रदय अज़ीज़ फॉलोवर्स समेत इस संसार के प्रत्येक उस एडिक्ट के लिए जो आज भी किसी ना किसी हानिकारक व्यसन की चपेट में एक अशांत जीवन जीने को मजबूर है के लिए उनकी आत्मा के शांति के लिए अपनी उच्च शक्ति उस परमपिता परमेश्वर से एक आत्मशांति की प्रार्थना करता हु। ईष्वर हम हम की आत्मा को एक आत्मशांति प्रदान करने की कृपया करे।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल।
(रिकवरी एडिक्ट)

मेरी सेवा का लाभ प्राप्त करने हेतु वट्सअप के जरिए सम्पर्क कीजिए। जी इस पेज पर अंकित है।

#NA #Programme #Vikrant #Rajliwal #HaiPower

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

Thank You.

Written By

Vikrant Rajliwal

💥 One Truth. 4 (Fourth Blog) A Real truth based on Truth Events.

By now, you have known how in the year 2003-04, going through a tender age, how an insignificant change has come in my life and how and with which thoughts started that day. And how do I get out of my police official quarters and pass through Mandi (Asia’s largest fruit and vegetable market) with a broken wall sitting on the roadside across the market, near some of the addicts and some other addicts gaming on gilasiyo
on the ground near them Got to stand up and then ..

Now further.

  And then a voice came from one side that is to bet? As soon as I hear this, I walk away from them that a addict comes a few steps behind me and asks me to stop and ask do you want to pudiya (bhaag & Dhatura? Hearing this from his mouth, I stared at him from top to bottom in a police manner and told him how much it was. On hearing this from my mouth, a wave of joy ran across his face and he said, first to take a puff, then to see and we sit on the railway track and inhale and in the first puff I came to know that my brother Somebody has a bubble. And I took three drug Pudiya (bhaang & dhatura) from her and entered the mandi (Asia’s biggest fruit vegetable market) through the same broken wall to come back and with every rising step the sight and tone in front of my vision was loud and Fast and my intoxication continued to intensify. After that, I have no recollection of how I was able to get back to my government police quarters from that confusing state. But it is so important to remember that on reaching my police quarters, I had a strong kick on the door of my policeman’s quatter while suffering from thirst and dry throat.

After a few moments, I came to know that I had locked and after removing the key from my pocket, I open the lock and enter inside the police quarters. As soon as I enter my quater, I close the door and empty a cold bottle from the fridge and empty half of it in one knee. Now I get some control over my senses and my breath. And I think about my last night what I had created something scary. I will tell you about that which was very terrible, but not yet at the appropriate time by one of the upcoming blogs. Thinking of all this, I take a cigarette out of my pocket and stand outside a window of that fourth floor policeman quater and take a look outside and with a jerk, ignite that curvy cigarette very loudly. I puff. At the same time, the door bell of the Quarter rings. And I start wondering who would have come this time. Thinking that I give one to two puffs and that is when the doorbell rings again. And I slowly approached near the door and peeped out of the door with the third eye, But the saroor, which had drunk the puff of a drunk cigarette, was now beginning to dominate my brain again. And in that stage I don’t see any thing properly outside and I open the door with a jerk.

Remaining next blog …

A real truth based on true events written by Vikrant Rajliwal

19 August 2019 at 1:45pm

If there has been any error in my translation, due to which someone is hurt, then I apologize.

🕯️ बेगुनाह मोहब्ब्त। (दास्ताँ के तहत तीसरी दर्दभरी दास्ताँ)

बेगुनाह मोहब्ब्त मेरी आज तक कि समस्त दास्तानों में से एक ऐसी दास्ताँ है जिसको लिखते समय मै खुद भी अपने आँसुओ को रोक ना सका था। और आज अपनी या अब यह कहना अधित उचित होगा कि आपकी अपनी इस दास्ताँ को प्रकाशित करते हुए मैं फिर से बेहद भावुक हो रहा हु।

अब आपका अधिक समय ना लेते हुए सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि… यह दास्ताँ नही कोई आम यह एहसास है उन रूहों के जिन्होंने ना जाने किस तरह मेरी कलम के द्वारा मुझ से यह दास्ताँ लिखवा दी।

उम्मीद करता हु आपको मेरी यह दर्दभरी मोहब्ब्त की दास्तां जिसको मैंने अपने अश्को से लिखा है पसन्द आए।

🕯️ बेगुनाह मोहब्ब्त।

वक़्त की चादर पर जो अब एक गुनाह हो गया।

समझा सनम को जो बेवफ़ा तो एक गुनाह हो गया।।

दिल को उस के मासूम को एक इल्ज़ाम जो हमनें दे दिया।

खुद ही मार कर दिल पर फिर ख़ंजर ख़ूनी जो दिल रो दिया।।

जिस्म से बूढ़ा अब अपने जो हो गया हूं।

झुर्रियों में अपनी अब कहि जो खो गया हूं।।

जान ना बच पाई अब कोई जो मुझ में।

तबियत भी कुछ बदहवास सी है अब जो मुझ में।।

छूटने को है बस अब जो मेरी जान।

पल भर का ही हु शायद अब जो मैं मेहमान।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

चेहरे की झुर्रियों से मेरी दिलबर की वफ़ा झलकती है।

नोच डालो तुम इन्हें, इनसे बेवफ़ाई मेरी अब झलकती है।।

गुजरते है दिन मेरे मौत के सन्नाटे में।

डर जाता है दिल मेरा इन सुनी अंधेरी रातो में।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

सिहर (काप) जाता हूं देख कर महबूब ए मोहब्ब्त का वो आईना।

दिखती नही उस में वफ़ा, बतलाता है मुझ को वो आईना।।

टूटी खटिया पे तन्हा पड़ा, अब किसे मैं ढूंढ रहा।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

तन्हा अंधेरी इन रातो में टूट कर बिजली सी मुझ पर कोई चोंध जब जाति है।

बन के साया एक मौत का कोई, अक्स अपना मुझे जब दिखा जाती है।।

कड़क के टूटी खटिया ये मेरी जैसे कर्राह जाती है और भी टूट जो जाती है।

लेते हुए नाम ए सनम एक याद आह दिल से निकल जाती है उसको शायद जो बुलाती है।।

याद सनम को करते हुए धड़कने जो जख़्मी दिल की रुक जाती है उसको शायद जो बुलाती है।।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।।

टूटी खटिया ये वीरान कोठरी तन्हा पड़ा है कब से दीवाना सनम का जो यहाँ।

कर गई बेवफ़ाई मौत भी जो ढूंढ ना पाई मुझे वहा, कब से दीवाना तन्हा पड़ा सनम का जो यहाँ।।

वफ़ा ए महबूब जो वफ़ा सनम की एक इल्ज़ाम उस पर कोई बेहूदा दीवाना हो गया।

दुपट्टे पे रेशमी जो मख़मली उसका, दाग दीवाना बेहूदा सा उस पर हो गया।।

समझा जो बेवफ़ा सनम को अपने, ए वक़्त तो ये दीवाना खुद ही बेवफ़ा हो गया।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

वो तो हर पल घुटती रही।

तन्हा जीती और मरती रही।।

हाल ये उसका जो जान ना पाया।

बेबसी ये उसकी जो अपना उसे मान ना पाया।।

सितम जो रूह पर मासूम, वार बेदर्दी से कर दिया।

खुद ही दिल हाथो से अपना, जो चिर कर रख दिया।।

दे कर वफ़ा को इल्ज़ाम बेवफ़ाई का उसकी, गुन्हेगार ये दीवाना जो उसका अब हो गया।

देख कर ये हाल अपना तड़प कर रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

जान हक़ीक़त ए सनम दीवाना जो उसे जान गया।

मासूम धड़कने वो मासूम दिल दीवाना जो उसे पहचान गया।।

ना कोई चाल ना ही कोई इल्ज़ाम उस पर अब रहा ना बाकी।

टूट गए आईने सब फ़रेबी कोई इलज़ाम कोई फ़रेब अब रहा ना बाकी।।

मज़बूरियों ने इस ज़माने की जो बेदर्द, एक दिवाने को सनम से जुदा जो कर दिया।

सितम ए दिल दिल को दिवाने के सरेराह, बेबसी ने उसकी चकनाचूर जो कर दिया।।

ढूंढता है दीवाना अब भी उसे वक़्त की किताब में।

महफूज़ है यादें अब भी उसकी जो वक़्त की किताब में।।

हो कर जुदा दीवाना अपने सनम से मिल ना पाया फिर उसे।

ढूंढता है निसान ए क़दम सनम के हर तरफ पुकारता है अब भी उसे।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया सब भी जख़्मी दिल मेरा।।

दिन वो अब भी जवानी के अपने याद आते है।

महबूब की अपने हर सौगात साथ अपने लाते है।।

धड़कनों में एक आख़री मेरे अब भी एक तम्मना है।

हर धड़कन टूटने से पहले अपनी आखरी एक दीदार सनम का अब भी चाहते है।।

याद है वो मदहोश निगाहें उनका वो क़ातिल हुस्न, जवानी के अब भी वो दिन।

बन के मोहब्ब्त फड़कती रगों में दौड़ता लहू, सनम से अपने दीवानगी के वो दिन।।

वो वक़्त वो समा वो मिज़ाज ए मौसम बेहद अज़ीब था।

वो आलम मदहोशी का हर तरफ वो गुल वो गुलिस्तां वो महकता ग़ुलाब ए मोहब्ब्त बेहद अज़ीब था।।

करता था मोहब्ब्त एक हुस्न से जो एक दीवाना, वो दस्तूर ए मोहब्ब्त वो ज़ालिम ज़माना बेहद अज़ीब था।।।

एक इंतज़ार था हर लम्हा एक हसीन का, कर दे मदहोश जो दिवाने को।

कर दे जख़्मी दिल चिर के क़ातिल निग़ाहों से अपने जो निहार कर दिवाने को।।

अंगड़ाई लेता महकता वो सनम अब भी है याद दिवाने को।

बदलती निगाहें वो लहू बरसाता आसमां अब भी है याद दिवाने को।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

याद है वक़्त वो जब…

एक रोज़ इत्तफाक एक अज़ीब सा हो गया।

टकरा गए जो एक हुस्न से तो वार धड़कते दिल पर हो गया।।

नही नादां ये इश्क़ ये दीवाना तंग एक गली से एक रोज़ जो गुजर गया।

सामना वो मदहोश हुस्न से वार शराबी निग़ाहों का दिल पर अपने जो हो गया।।

नही मिलता है फिर चैन की लूट गया ये दीवाना, एक हसीना से सरेराह टकरा जाने के बाद।

नज़र आता है फिर हर तरफ चेहरा वो उनका हसीन, क़ातिल से सरेराह अपने टकरा जाने के बाद।।

कहते है अनहोनी ज़माने में जिसे एक दिवाने से अब वो हो गई।

आता है नज़र हर तरफ चेहरा वो उसका, यकीं है मोहब्ब्त दिल ए दिवाने को अब एक हसीना से जो हो गई।।

ढूंढता है दीवाना वही हसीं समा, वो मदहोश निगाहें, वो हुस्न ए यार दुबारा।

यकीं है दीवाना पा जाएगा एक रोज़ उसे, धड़केगा ये दिल ए दीवाना दुबारा।।

हटा दिया रुख से अपने नक़ाब जो उन्होंने सरेराह भरे बाजार ।

कर दिया जख़्मी ये दिल ए दीवाना जो उन्होंने रुख से अपने हटा कर नक़ाब सरेराह भरे बाजार।।

खिल उठा जो चेहरा वो हसीन उनका, एक दूजे को करीब से देखने के बाद।

किया नज़ारा बेहिंतिया मोहब्ब्त का उन्होंने, भर के नज़रो में मोहब्ब्त एक दूजे को देखने के बाद।।

भर कर मदहोश निग़ाहों में बेहिंतिया मोहब्ब्त दिवाने को उन्होंने क्यों देख लिया।

कर दिया वार धड़कनों पर मेरे, जख्म दिल पर देकर सरेराह जो उन्होंने मुझे लूट लिया।।

दिल की किताब के पन्नों पे हुस्न का गुलाबी नाम लिख दिया।

हुई जो नज़रे चार सरेराह उनसे, धड़कते दिल को थामे दिवाने ने उनसे उनका नाम पूछ लिया।।

उस दिलबर का जो अब बुरा हाल हो गया।

उसका भी जीना जो अब दुशवार हो गया।।

आए वो करीब हमारे तो उनको भी हम से प्यार हो गया।

देखा जो नज़रो में नज़रो के एक दूजे के इज़हार ए प्यार हो गया।।

नही मिलता है आराम धड़कनो को मेरी अब क्यों?।

नही रहता है सकूँ सांसो में मेरी अब क्यों?।।

ख़्याल ए सनम हर लम्हा सताता है मुझे अब क्यों?।

बेचैन ए दीवाना हर लम्हा रहता है तन्हा रातों में अब क्यों?।।

मोहब्ब्त जब खुद मुझ पर महरबान हो गई।

वीरान दुनिया ये मेरी अब गुलज़ार हो गई।।

रहता है ख्याल ए सनम इस दिल मे जो मेरे, ना जाने क्यों एक हसीना वो मुझ पर महरबान हो गई।।।

खिलते है गुल बागों में अक्सर, हुस्न से इश्क की वहा जब मुलाक़ात होती है।

देखते है मदहोशी से निग़ाहों में मदहोश उनकी जब, बिन बोले ही अक्सर वहा फिर बात होती है।।

सादगी से अपनी हुस्न वो अंजान सा लगता है।

नज़दिक से कर दीदार ए जलवा ए हुस्न हाल बेहाल सा दिवाने का लगता है।।

सितमगर से एक अक्सर नज़रे चार होती है।

जख़्मी ये दिल वार धड़कनो पर जब मुलाक़ात उनसे होती है।।

तन्हा थे जो लम्हे कभी ज़िन्दगी ये दिवाने की हसीं वादिया महक महकती मोहब्ब्त के बन गई।

बेनाम थी जो धड़कने कभी ज़िन्दगी ये दिवाने की एक नाम वो नाम ए सनम नाम जो उनके हो गईं।।

धड़कता है दिल देख कर दिवाने का चेहरे की हसीं जो उनके वो सुर्ख लाली एक।

डरता है दिल ए दीवाना नादां सोच कर कमसिन उसे जो हसीना वो मतवाली एक।।

ज़िंदगी ये हमारी खुशनुमा और भी हो जाती है।

हसीं चेहरे की सुर्ख लाली देख हमारी धड़कने जब बढ़ जाती है।।

दे कर दिवाने को क़ातिल जब मुस्कुराहट एक झलक देख लेती है वो।

धड़कते दिल की धड़कती हर धड़कनो को हमारी धड़का और भी देती है वो।।

भर के मदहोश निगाहों में अपनी बेहिंतिया मोहब्ब्त वो।

दे कर ज़ख्म दिल और जख़्मी दिल ए दीवाना कर देती है वो।।

राह ए मोहब्ब्त सुने थे दिवाने ने किस्से जो कई हज़ार।

हो गए फ़ना जो जल कर परवाने हुस्न पर उनकी उन मज़ारों पर हर बार।।

ऐसा क्यों लगता है मोहब्ब्त ये दिवाने को भी जला देगी।

बेवफ़ाई जो करि उन्होंने तो मुझ को भी रुला देगी।।

मलिका ए हुस्न है सनम वो मेरा, ये जानता है दीवाना।

कतार है दीवानों की उसके आस पास, ये मानता है दीवाना।।

महरबान है हुस्न वो हसीना सिर्फ इश्क़ ए दीवाना पर, इस बात से नही है इश्क़ ये अनजान।

दे देगा मोहब्ब्त में हुस्न की इश्क़ ये अपना उनके लिए अपनी ये जान।।

लगने लगी है सितमगर वो अपनी, उसकी दुनिया रंगीन है।

मरता है सारा जहां उस पर, हर अदा से अपने वो कमसिन है।।

बिखेर देती है मदहोश निग़ाहों से देख कर, जब वो क़ातिल अपनी जो मुस्कान।

खिल जाते है गुल जमीं पर बंजर, हो जाता है हुस्न से उसके फिर वो गुलिस्तां।।

हुस्न है धड़कने हर किसी की और उनकी जवानी है जान।

उनके ही मदमस्त हुस्न से है वीरानों यहां धड़कती जो जान।।

धड़कता है दिल सीने में जो सनम के, हर धड़कन है उसकी दिवाने की जो जान।।।

दिलाते है यकीं रख के दिल पर हर बार दिवाने के हाथ वो।

मर तो सकती है जल कर मग़र बेवफ़ाई जो ख़ंजर दिल पर दिवाने के मार नही सकती है वो।।

बदल गया मौसम बदल गई फ़िज़ाए जो मोहब्ब्त की एक रोज़।

टूटी है कड़क कर दिल पर जो बिजली दिवाने के एक रोज़।।

बदला जो रुख बहती हवाओ ने एक रोज़, जरूर कुछ बात है।

हुआ हादसा जो कहि पर एक रोज़, जरूर ये दिल यू ही नही परेशान है।।

बदला है रुख हवा का एक रोज़ जो कहि, एहसास उसका यहा हो रहा।

टूटी है डोर ए मोहब्ब्त एक रोज़ जो कहि, दर्द ए दिल उसके खिंचाव से उसका दीवाना रो रहा।।

बिजली एक रोज़ क़यामत की मुझ पर टूट गई।

धड़कते दिल की धड़कने मेरे कहि जो छूट गई।।

फट कर आसमां भी गर्ज के रो पड़ा।

डर कर मोहब्ब्त भी सरेराह मर गई।।

याद है नज़ारा अब भी वो आह से भरा।

बिना कुछ कहे ही दिल रो रहा था मेरा।।

याद है नज़ारा अब भी दर्द ए दिल जो दर्द भरा।

बिना ज़ख्म ही चिर रहा था जख़्मी दिल मेरा।।

अज़ीब सा एक वाक्या एक रोज़ जो दिवाने ने देख लिया।

सनम से करते हुए किसी गैर को मोहब्ब्त जो दिवाने ने देख लिया।।

बेवफ़ाई पर सनम की दिल को उस रोज दिवाने के हैरत हुई।

बेवफ़ा वो क्यों सनम मेरे, किसी गैर की भूल कर मुझे जो हुई।।

निकला था इश्क तो हुस्न के एक दीदार में।

कदम शोलो पर रख जलते जो उसके प्यार में।।

दहक उठे दिल मे फिर क्यों जलते शोले।

हो गए बर्फ फिर क्यों मोहब्ब्त के जलते शोले।।

हो गया जख़्मी दिल वो मेरा जो तड़प गया।

छोड़ दामन में किसी गैर के उनको फिर वो रो दिया।।

नही है अंजान एहसास ए हुस्न हर चाल ज़हरीली हुस्न की इश्क़ अब जान गया।

बेवफ़ा है हुस्न जो अपने इश्क़ से, सितम खुद पर इसे इश्क़ अब मान गया।।

दिल चिर देती है यू ही दिवाने का अब भी वो।

धड़कने तोड़ देती है फ़रेबी नज़रो में ला कर मोहब्ब्त वो।।

दिया है जला दिल इश्क़ का कर के हुस्न ने बेवफ़ाई।

दिया है रुला रूह ए मोहब्ब्त जो उसने कर के मोहब्ब्त की रुसवाई।।

नाक़ाम इश्क़ को हुस्न की मक्कारी जो अब भी दिखती है।

छुप छुप कर सितमगर किसी गैर से वो अब भी मिलती है।।

याद है…

दिखा कर जलवा ए हुस्न ने जलवा ए बेवफ़ाई, धड़कने धड़कते दिल की जब रोक दी।

ऐसा मारा तमाचा टूटे दिल पर मेरे, जीते जी ही उसने सांसे मेरी रोक दी।।

लेकर फ़रेबी मुस्कुराहट आई जब वो मेरे पास।

भर कर नज़रो में मोहब्ब्त झूठी बैठ गई वो मेरे पास।।

कर दिया जख़्मी रख के दिल पर उसमे बेवाफ़ाई से अपना जब हाथ।

कर रही है बैठ कर अब नज़दीक मेरे वो मोहब्ब्त की बात।।

तोड़ दी हर धड़कने रोक दी सब सांसे कर दिया इतना मज़बूर।

दिखता नही दिवाने को अक्स अपना, नही कोई अपना कसूर।।

लेता है बदल रूप वो हुस्न अपना।
लगा कि दाग दामन पर रौशन,
निकलती है ढक दाग को कर के रंगीन वो पर्दा अपना।।

पर्दा है महीन शराफ़त भरा, ढक नही पाता दाग दामन पर अपने बेवाफ़ाई से जो भरा।

झटक कर हाथ दिवाने का एक बेवफ़ा ने सरेराह, मज़ाक मोहब्ब्त का सरे अंजुमन जो उड़ा दिया।।

बेवफ़ा सनम से मुलाक़ात अब भी जो हो रही है।

जख़्मी ये दिल ए दीवाना रूह उसकी जो रो रही है।।

लगता है हुस्न अंजान मगर इश्क़ नही अब नादां।

फ़ितरत है फ़रेबी जो उनकी इश्क़ नही अब अंजान।।

एहसास ए दीवाना सनम जो दगाबाज़ हो गए।

कर के मोहब्ब्त किसी गैर से दामन में उसके खो गए।।

ज़ख्म दिल का सहलाना हाथो से अपने नही असां।

धड़कनो से नाम एक बेवफ़ा का अपनी खुद मिटा पाना नही असां।।

लपटों से धधकती आग के दीवाने को अपने सनम ने जो छोड़ दिया।

कर के मोहब्ब्त किसी गैर से जो बेवफ़ा दिवाने से अपने, दिल दिवाने का तोड़ दिया।।

बेवाफ़ाई का बेवफ़ा सनम से इक़रार करवाना असां नही।

सितमगर का फ़रेबी दिल से उसके नाम मिटाना असां नही।।

मोहब्ब्त का अपनी उसी तरह दिवाने से करती है अब भी वो इज़हार।

भर के मदहोश निगाहों में मोहब्ब्त, दिल पर करती है दिवाने के वो वार।।

धड़कने मुस्कुराहट से अब भी एक उसकी दिवाने की बढ़ जाती है।

इठलाती चाल पर अब भी जो उसकी, सांसे दिवाने की रुक जाती है।।

खड़ा है दीवाना उसके इंतज़ार में अब भी वही।

ए वक़्त टूटे दिल मे मगर एहसास ए मोहब्ब्त कोई एहसास नही।।

बेवफ़ा सनम दिवाने से मुलाक़ात फिर भी है करती।

झूठी मोहब्ब्त से इज़हार ए मोहब्ब्त का वो है करती।।

तड़प दिल की देख कर अपनी दीवाना यह मान गया।

करता है मोहब्ब्त सनम से अब भी, आह से टूटे दिल की इस बात को मान गया।।

अंजान है हुस्न एहसास ए दीवाना जो अपनी वो बेवफ़ाई से।

परेशान है इश्क, एहसास ए हुस्न जो अंजान है वो खुद अपनी बेवफ़ाई से।।

रुला देती है आँसुओ से दिवाने को मोहब्ब्त के अपने झूठे।

तड़पा देती है दिल ए दीवाना दिखा कर मोहब्ब्त के फ़साने झूठे।।

डाल दिया है पर्दा रूह पर क्यों अपनी उसने।

रोक दी है सांसे दिखा कर फ़रेबी मोहब्ब्त क्यों अपनी उसने।।

नही पड़ता है फ़र्क कोई कर के मोहब्ब्त ज़ाहिर उनको झूठे अपने एहसासों से।

हो गया है फ़ना कब का दीवाना देख नज़दीक दिल के उन्हें फ़रेबी उनकी मोहब्ब्त से।।

जख़्मी दिल के ज़ख्म एक रोज़ जो फिर से रो दिए।

देख दामन में किसी गैर के फिर से उन्हें, टुकड़े टूटे दिल के टुकड़े टुकड़े हो गए।।

हर टुकड़े से दिल के निकल रही फ़रियाद।

तोड़ा दिल दिवाने का सनम ने अब है जो गैर के साथ।।

आईने ने मोहब्ब्त के दीवाने को फिर से जला दिया।

दिखा कर अक्स ए बेवफ़ाई सनम का, फिर से मार दिया।।

दौलत ए मोहब्ब्त से दीवाना दिखता था कभी जो शहंशाहों सा।

बेवफ़ाई ए सनम ने कर दिया कंगाल उसे दिखता है हाल ए सूरत अब उसका कोई फ़कीरी सा।।

बदल गया बदलते मौसम की तरह जो दिलबर मेरा।

मुर्झा गया गुलिस्तां पतझड़ आने से पहले ही मोहब्ब्त का मेरा।।

ए मोहब्ब्त हर बार मोहब्ब्त से इश्क जो मज़बूर हो गया।

जान बेवफ़ाई जो हक़ीक़त ए यार, कहि अंधेरे गर्द में खो गया।।

हिम्मत ए इश्क़ टूट जाती है जो बता दे वो हुस्न को।

आईना ए हक़ीक़त जो दिखा दे बेवफ़ाई उसकी जो उसको।।

यकीं है इस कदर एक दिवाने का वफ़ा ए मोहब्ब्त पर अपनी।

कर देगा इस कदर मज़बूर हुस्न को दिखा कर आईना मोहब्ब्त का वो अपनी।।

हो कर बेबस वफ़ा से कर लेगा इकरार ए दगा खुद मोहब्ब्त का सनम वो बेवफ़ा अपनी।।।

मिलते है कर के पत्थर जो एहसासो को इस दिल के अब भी एक बेवफ़ा के साथ।

करती बयां मोहब्ब्त की वो अब भी दिवाने को अपनी हर एक बात।।

अपनी मोहब्ब्त और वफ़ा उसे मोहब्ब्त की एक जिंदा मिसाल लगती है।

अश्को से भीगा दामन में मेरे फ़रेबी जब सर वो अपना रखती है।।

बदस्तूर जारी है बेवफ़ा सनम से मोहब्ब्त की मुलाकाते।

हो जाएगी फ़ना एक रोज़ मोहब्ब्त से मेरी, मोहब्ब्त की दे रही है वो सौगातें।।

सुन कर एक बेवफ़ा से वफ़ा के वो अल्फ़ाज़।

रो दिया दिल तड़प कर सुन बेवफ़ा लबो से वफ़ा के अल्फ़ाज़।।

मासूम है धड़कने जो दिल में मेरे, करती है कई संगीन सवाल।

दे दु ज़वाब हर सवाल का जो ऐसे नही थे दिवाने के हाल।।

होती है सितमगर से अपने अब भी क्यों मोहब्ब्त की ये जख़्मी मुलाक़ातें।

मिलती है दामन में बेवफ़ाई के सरेराह जो वफ़ा की ये बेचैन सौगातें।।

नही है वाकिफ़ हक़ीक़त से हुस्न वो बेवफ़ा सनम मेरा।

नही रहा नादां इश्क़ ये अब जख़्मी है जो मेरा।।

नसों में अपनी ज़हर एक बेवाफ़ाई भरा उनकी जो उतार दिया।

कर के वफ़ा बेवफ़ा से एक खुद को हमने जीते जी ही जो मार दिया।।

बेवफ़ाई से सनम की ख़ुद को जिंदा ही हमने जला दिया।

रुसवाई से मोहब्ब्त की अपनी, प्याला ज़हर का हलक से उतार दिया।।

याद आई जब उसकी तो ज़ख्मो को अपने नासूर बना दिया।

मार कर जख़्मी दिल पर ख़ंजर ख़ूनी लहू अपना बहा दिया।।

उतार कर फड़कती रगों में सीसा कोई पिंघला, दिल से नाम बेवफ़ा का मिटा दिया।।।

दिया है दाग मोहब्ब्त का, नाम ए मोहब्ब्त लबो से उसके निकलने ना अब पाए।

मज़बूर है इश्क जान हक़ीक़त अब भी नज़रो में बहुत, कहि बदनाम ना वो हो जाए।।

कसमें हज़ारो वफ़ा की हमसे, हुस्न वो बेवफ़ाई से आज भी दोहरा गया।

हर सितम झेल कर जख़्मी दिल पर हज़ारो अपने, इश्क ये फिर से आज जख़्मी होता गया।।

जलता है दिल दिवाने का एक, धड़कनो में अब जान नही।।

छूटता है दम दिवाने का एक, सांसो पर उसे अब एतबार नही।।

लगते है ज़ख्म दिल पर मगर आह अब निकलती नही।

दर्द है बेहिंतिया सांसो पर मगर चोट क्यों दिखती नही।।

मिलता है हुस्न ए यार मुस्कुरा कर अब भी आता है दिवाने के जब भी करीब।

देता है सौगात प्यार की बैठाकर एतबार से अब भी अपने करीब।।

तोड़ दिया एतबार एक बेवफ़ा ने अपने यार का क्यों?।

मार कर ख़ंजर बग़ल से ख़ूनी उस को, दम घोट दिया प्यार का क्यों?।।

यकीं मोहब्ब्त का भर कर मदहोश निग़ाहों में अपनी फ़रेबी दिल ए दीवाना तोड़ दिया।

एतबार वफ़ा का बेवफा सनम ने दिला कर हर टुकड़े को टूटे दिल के फिर बिखेर दिया।।

ऐसा लगता है खेल बर्बाद ये मोहब्ब्त का खत्म जल्द ही हो जाएगा।

दिल है फ़रेबी हुस्न का, रौशनी मोहब्ब्त से मोहब्ब्त की दीवाना जरूर उसे दिखलाएगा।।

हैरान है दीवाना, हैरानी की ये बात।

दिख रही है सूरत उसकी वो कुछ उदास।।

आई क़रीब एक रोज़ वो, सूरत कुछ उसकी उदास दिखती है।

ऐसा लगता है तबियत कुछ उसकी नासाज़ लगती है।।

पूछते है दिवाने से अपने बेवफ़ा वो सनम एक रोज़, हो गए जुदा जो हम तो क्या करोंगे।

याद करोंगे हुस्न ए यार को या कर के बदनाम हमे, किसी गैर पर मरोंगे।।

रख दिया ना जाने क्यों हाथ दिल पर बेवफ़ा उस सनम ने जख़्मी दिल जो दिवाने का।

ले रही है एतबार ए वफ़ा अब क्यों, सब कुछ लूट कर वो अपने दिवाने का।।

फ़रमाते है बेवफ़ा वो सनम मेरे वक़्त ए जुदाई भरी बातें।

पूछते है बिन सनम कट पाएँगी क्या दिवाने की तन्हा रातें।।

कहती है दिवाने से वो, जल्द ही जुदा अब शायद हो जाएंगे।

ना दिखो जो तुमको कभी, तन्हा तो नही तब हो जाओंगे।।

कसक ए मोहब्ब्त से दामन ए वफ़ा पाक कर रहे है जो।

मदहोश निग़ाहों से गिरते वो अश्क़, फ़रेबी कत्ल दिवाने का रहे है वो।।

यकीं ए दीवाना सनम वो बेवफ़ा वफ़ा गैर से कर रहे है जो।

कर के क़त्ल सुने अरमानों का सरेराह बातें जुदाई भरी कर रहे है वो।।

बात सनम कोई बेवफ़ा जुदाई की जब करने लगे।

सुर्ख गुलाबी लबो से ख़ुद हक़ीक़त अपने बयाँ करने लगे।।

दे देगा इश्क़ दिलासा फिर भी उसे।

धड़कने सुना देगा दिल चिर कर फिर भी उसे।।

दिखा कर आईना बर्बाद मोहब्ब्त का अपनी।

हर ज़ख्म से टूटे दिल के आ रही है एक आह अपनी।।

अंगार है बरस रहे जो अश्क़ बन के, नम आँखों से मेरा लहू।

इम्तेहां ए मोहब्ब्त जो हो रहा तड़प के रो रही है मेरी रूह।।

हो गया बेवफ़ा हुस्न वो, बेवफ़ाई की एक मिसाल बन गया।

बहा कर अश्क़ नम निग़ाहों से अपने, आशिक़ का अपने दिल चिर दिया।।

दे रहे है यकीं, मोहब्ब्त का एतबार बेवफ़ा सनम वो अपनी।

करता है हुस्न सिर्फ इश्क़ से मोहब्ब्त, दर्द ए जुदाई दे देगी जान वो अपनी।।

दिल चिर कर अपना दिखा सकती है वो।

हर धड़कन को रोक कर मिटा सकती है वो।।

लिख दिया टूटे दिल की जो वीरान धड़कनो पर एक नाम वो नाम ए मोहब्ब्त।

इश्क़ को हुस्न पर ना रहा फिर अब क्यों एक यकीं जो यकीं ए मोहब्ब्त।।

झेल गया ख़ंजर ए बेवफ़ाई धड़कनो से अपने, इश्क़ ए दीवाना जो नादां नही।

कर देगा रुसवा ज़माना वफ़ा ए मोहब्ब्त हमारी, अंजाम ए मोहब्ब्त ऐसा कोई नही।।

दिल बदल जाए हुस्न ए सनम जो मिज़ाज ए मौसम की तरह।

थाम के हाथ मोहब्बत किसी गैर से जो चली जाए बेवफ़ा चाल सियार की तरह।।

मोहब्ब्त है जो किसी गैर से तो हाथ उसका थाम ले।

ले रही है इम्तेहां ए दीवाना जो बेवफ़ा अब तो रब का नाम ले।।

आ रही जो खबर आग गुलिस्तां में लग गई।

मोहब्ब्त करते किसी गैर से नज़रे दिलरुबा की अपने दिवाने पर जो ठहर गई।।

उड़ गए क्यों होश ए यार जो सरेराह, मदहोश निगाह एक दम से उसकी, सन सी क्यों जो रह गई।

एहसास ए पत्थर वो एहसास ए यार, ना जाने क्यों सरेराह उनकी, पथराई निगाहें जो बरस गई।।

भीगा जो अश्को से दामन किसी गैर का उनके, आग गुलिस्तां में दिवाने के जो लग गई।।।

समझ गया दिल ए नादां ये दीवाना, वो वक़्त भी आ गया, जुदा जब हो जाएंगे।

करते है गैर से बेवफ़ा सनम जो मोहब्ब्त, ये पल उसी के अब हो कर वो रह जाएंगे।।

सदियों से है तन्हा इश्क़, बेदर्द ज़माने में जो तड़प रहा।

याद हुस्न को करते हुए, घुट घुट कर हर लम्हा जीता और मर रहा।।

देखना है अंजाम ए मोहब्ब्त, बेवफा सनम वार सीने पर कब करेंगे।

तन्हा छोड़ दिवाने को अपने, हाथ किसी गैर का सरेराह वो थाम लेंगे।।

क़यामत दिल पर बेवफ़ा के बन कर बिजली कोई टूट गई।

लिपटी थी दामन से गैर के, निंद जब उसकी उड़ गई।।

नज़रे मिली दिवाने से तो नज़रे उसकी झुक गई।

जख़्मी हो गया दिल मेरा, धड़कने जब उसकी रुक गई।।

तस्वीर ए मोहब्ब्त थी धुंधलाई सी जो, एकदम से साफ वो अब हो गई।

चली हवा तूफ़ानी सी जब, हर बात अधूरी सी जब पूरी हो गई।।

उतर गया नक़ाब ए चेहरा सूरत से जो उनकी, बिन बोले ही हर बात वहा फिर हो गई।।।

जख़्मी दिल ए दीवाना हर ज़ख्म को दिल के कुछ सकूँ मिला।

कुरेदें ज़ख्म दिल के जो हर ज़ख्म अब नासूर बना।।

तड़पती रूह दिवाने की उसको कुछ आराम मिला।

रह गई थी कब्र जो खुली उन एहसासो को अब मुक्कमल मुकाम मिला।।

झूठी महफ़िल में हुस्न की इश्क़ ए दीवाने अब कोई काम नही।

एक बेवफ़ा की मोहब्ब्त में मोहब्ब्त जो अब नीलम हुई।।

फट गए पर्दे बेवफ़ाई के महीन सब उनमे अब आराम नही।

आ गई सूरत ए यार असल नज़र, नक़ाब ए वफ़ा अब बेवफ़ाई नही।।

नही है आदि इश्क़ ये मेरा इन बेदर्द से दर्दो का दिवाने।

ना जाने सह गया सितम कैसे इन बेदर्द बेदर्दो का दिवाने।।

दिखते नही बेवफ़ा सनम कहि, बेवफ़ाई से अपनी क्या सहम गए।

गुजर गए है ना जाने मौसम कितने, रुसवाई से अपनी सितमगर कहि छुप गए।।

जानते है इश्क़ ए दीवाना है सवाल कई।

छुपे है हर सवाल ए मोहब्ब्त है मसले कई।।

हर मसाला है मोहब्ब्त दिल की गहराई से जो।

हर गहराई है राज दिल के छुपाए उन्होंने जो।।

नादां है इश्क़ हो गया जो नीलम।

कुचला गया खाई ठोकरे उसने जो सरेराम।।

फिर एक रोज़…

निकला है चाँद कहि आज किसी ओर से, एक अरसे के बाद।

दिख रहे है मासूम चेहरे पर उसके बेवफ़ाई के घिनोने जो दाग।।

रोशनी है बेनूर सी उसकी, जल रहा जो ये एतबार।।।

दर्द ए जुल्म की हो गई अब इंतेहा, हर दर्द, हर अधूरी आरज़ू एक साथ जो रो पड़े।

आ गए नज़दीक बेवफ़ा दिवाने के क्यों, झुका कर निगाहें अपनी साथ दिवाने के वो जो खड़े।।

देख रही है मदहोश निगाहों में अपनी भर कर प्यार।

तड़प रही है टूटे दिल पर दिवाने के रख कर अपना हाथ।।

उठ चुका है हर पर्दा बेवफ़ाई का चेहरे से जो उनके।

आ गई है दुबारा फिर ये कौन सा नक़ाब जो चेहरे पर उनके।।

दे रहा है हो कर बेसुध हुस्न दुहाई वफ़ा की दिवाने को तन्हाई में अपने।

ले रहा है लिपट कर नाम ए वफ़ा दिवाने से तन्हाई में अपने।।

आँखों से आँसू रुकते नही।

तड़प दिल की कुछ कम तो नही।।

लव्ज़ है मासूम से उसके, सुर्ख लबो से नज़रे क्यों हटती नही।।।

दर्द ए दिल बन कर अश्क़ मासूम निग़ाहों से शराबी जो उसकी झलक गया।

खून ए ज़िगर दिवाने का देख कर उसकी तड़प जो तड़प गया।।

आँसुओ से बेवफ़ा सनम के दर्द झलक रहे।

तड़पता दिल हर टूटती धड़कने नाम ए दीवाना ले रहे।।

सुन कर नाम ए वफ़ा लबों से बेवफा के एक, ज़ख्म ए दिल जो दिवाने के जलते रहे।

हुस्न मरता रहा इश्क तड़पता रहा, देख ये हाल ए सनम ज़ख्म दिल के रो रहे।।

मोहब्ब्त से उनकी ज़ख्म छीलते रहे, हम मरते रहे, हर लम्हा ही दिल दीवानों के जो जलते रहे।।।

रख कर टूटे दिल की टूटी धड़कनो पर हाथ अपना, दे रहे है यकीं वो।

दामन है पाक हुस्न का ए दिवाने, नही है बेवफा वो।।

नही है बेवफ़ा सनम वो, सितम दिल पर उसके हो रहा।

मज़बूर है दस्तूर ए ज़माने से टूट कर दिल उसका रो रहा।।

ना समझ बेवफ़ा सनम को अपने ए दिवाने।

ना दे इल्ज़ाम ए बेवफ़ाई दिल को उसके ए दिवाने।।

मज़बूर है ये हसीना बेदर्द से, खून के रिश्तों और मुफ़लिसी भरे अफ़साने से।।

ले कर नाम ए मोहब्ब्त ए दिवाने ये हुस्न है बदनाम।

जाता है पहलो में गैर के, रूह को उसके नही है आराम।।

मोहब्ब्त के अलावा सितम है कई इस ज़माने में ए दिवाने।

तोड़ सकती है दिल हसीना अपना, पी कर ज़हर ए रुसवाई बेदर्दी इस ज़माने में ए दिवाने।।

देख कर दामन में गैर के, ना समझ लेना तुम गैर मुझ को ए मेरे दिवाने।

जिंदा है अब भी मोहब्ब्त तुम्हारी, हर धड़कन पे है नाम ए दीवाना जो तेरा ए दिवाने।।

एहसास है जो एक गैर का, जान मुफ़लिसी ने निकाल दी कर के अपना बेदर्द वार।

साया है जो एक मौत का, लटकी है सर पर अब भी एक नंगी जो तलवार।।

सितम से मज़बूर है हसीना ये अपनो पे, नही छोड़ सकती उनका जो साथ।

निकला है बिज जो दरख़्त से एक, बन गया अब हुस्न ए शबाब जो तुम्हारा ग़ुलाब।।

कांट दु उस दरख़्त को ले कर मोहब्ब्त का अब कैसे मैं नाम।।।

याद फिर भी आए जब मेरी, चाँद आसमां पर देख लेना।

ना मिले सकूँ ए दिल जब, नाम ए बेवफ़ा सनम को अपने दे देना।।

कर देना रुसवाई इस ज़माने में, एक नाम बेवफ़ा हर जगह बेवफ़ाई से लिख देना।

हालात ख़िलाफ़ जो हो गए, जुबां से निकले ना कोई भी अल्फ़ाज़।

जल्द ही ले आएगा एक अंजान घर आंगन में मेरे बारात।।

मज़बूर है बेहिंतिया बेवफ़ा सनम को जान लेना, अलग ना उससे अब हो पाऊंगी।

हो रही हु जुदा जो अपने महबूब से, फिर से ना अब मिल पाऊंगी।।

समझ लेना तुम मुझे बेवाफ़ाई की कोई घिनोनी सौगात।

आ रही है जल्द ही आंगन में मेरे एक अजनबी की बारात।।

हो कर ओझल नज़रो से हुस्न कहि अब खो गया।

छोड़ कर तड़पता दिवाने को दूर नज़रो से हो गया।।

हाल ए दिल जान अपने सनम का, दिल ए दीवाना एक रो रहा।

समझा जो बेवफ़ा वफ़ा को उसकी, रूह ए दीवाना एक दीवाना तड़प रहा।।

आईना ए मोहब्ब्त चमक गया महबूब की सच्चाई से।

दिख रहा अक्स ए मोहब्ब्त उनकी अब वफ़ाई से।।

जान कर हक़ीक़त ए सनम तड़प गई रूह दिल भी रो रहा।

ज़ख्म बेहिंतिया पहले से थे, जख़्मी अब फिर से दिल ए दीवाना हो रहा।।

दिल है बीमार मेरा, रोग ए मोहब्ब्त जो लाइलाज़।

दर्द ए दिल की दवा जो नही, हर धड़कन भी जो सनम के नाम।।

दर्द ए दिल बीमार का एक रोज़ जो बढ़ गया।

हर नव्ज़ रुक गई और कलेजा भी जो फट गया।।

देखी जो आंगन में बारात सनम की उसके, ये दिल तड़पा बेहिंतिया और धड़कना भूल गया।

जान दर्द ए जुदाई ये दिल जो एक दिवाने का टूटा, टूटने से पहले एक आह लेना भी भूल गया।।

हो रही है आतिश बाजी आंगन से ये किस के यू ही अचानक से।

रो रहे है ज़ख्म दिल के हो कर नासूर ये किस के यू ही अचानक से।।

आंगन से उनके धुन जो शहनाई की आ रही है दर्द भरी।

टूटती धड़कने तोड़ते हुए दूर सनम को ले जा रही है दर्द भरी।।

हाल ए बेहाल है उधर भी जो सनम का, देख रही है पल पल हर लम्हा वो किस की राह।

सुनी है नज़रे उसकी, नही निकलती दिल से जो उसके आह से भरी कोई आह।।

रात है मेहंदी की सब सखिया है उसके साथ।

लब है ख़ामोश उसके, बेचैन है धड़कने करने को दिवाने से कोई बात।।

जगमगाहट है सितारों सी घर आंगन जो उसका चमक रहा।

जल रहे है फानूस हर ओर दिल से फिर भी अंधेरा झलक रहा।।

दे रही दुहाई तड़पती धड़कने दिल की होने से पहले उसकी जो विदाई।

दिख जाएगा दीवाना जरूर वो उसका होने से पहले उसकी आखरी जो विदाई।।

उठ गई डोली बुझ गई हर शमा उसके इंतज़ार की उसके साथ, आया ना दिलबर वो दिल का उसके, यार हरजाई।

दर्द ए दिल सरेराह नम आंखों से झलक गया।

बैठ गई डोली में हसीना, दीवाना भी उसका तड़प गया।।

उठी थी डोली जिस लम्हा ये आसमां, ये चाँद भी उसका लाल हो गया।

गिरी थी बिजली दिल पर जो मेरे, गर्ज कर बरसा के शोले वो भी जो रोआ फिर बरस गया।।

टूट गया दिल ए दीवाना हर धड़कन से जख्मी हो गया।

देख कर मंजर एक दिवाने की बर्बादी हर कोई वहा रो दिया।।

तन्हा छोड़ तड़पता सनम दूर कहि परदेश को चला गया।

कसमे वादे तोड़ कर सब, हर टुकड़े पर दिल के दास्ताँ ए बेवफ़ाई लिख गया।।

दिन गुजरते रहे दूर सनम से जुदाई मे।

मौसम ज़िन्दगी के बदलते रहे बेदर्द अंधेरी तन्हाई में।

बिछुड़े सनम से फिर कभी मिल ना पाया जो दीवाना।

याद सनम को करते हुए तार टूटे दिल के कभी छेड़ ना पाया फिर से दीवाना।।

रह गए जो सवाल अधूरे कई, टूटे दिल की तन्हाई में।

ढूंढ़ ना पाया जबाब उनका कोई, हर लम्हा दीवाना तन्हाई में।।

जबाब अधूरे एहसासो का अपने हर सवालों का मुमकिन अब नही।

दीदार ए यार मिल जाए वो बिछुड़ा सनम ए मोहब्ब्त मुमकिन अब नही।।

एहसास ए सनम के हर एहसास है जख़्मी अब भी दिल मे जो बाकी।

टूट गए जो तार ए मोहब्ब्त हर एहसास है अधूरा एक साया जो मौत का अभी बाकी।।

महबूब की मोहब्ब्त से जख़्मी ये दिल दिवाने का हो गया।

इंतज़ार है अब भी उसका, जान के दिल दिवाने का रो गया।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

सताती है हर लम्हा याद तेरी, जान दिवाने की निकल जाती है।

होता नही दीदार ए यार, तड़प ये तेरी दिवाने को बहुत रुलाती है।।

आती है याद दिवाने की क्या तुझ को भी ए बिछुड़े सनम, याद से दिवाने की क्या तू भी तड़प जाती है।

ले कर नाम ए दीवाना अपने दिवाने को, हर लम्हा क्या तू भी उसे बुलाती है।।

तन्हा है हर धड़कन बेशक़ से टूटे दिल की मेरे, हर धड़कन से छुपाए हु सूरत ए यार आवाज़ अब नही उन धड़कनो में कोई है।

ज़ख्म ना सिलने पाए टूटे दिल की हर जख़्मी धड़कनो के मेरे, आहट अब दिवाने को अपनी मौत की आई है।।

याद हर लम्हा बेवफ़ाई अपनी, दिल में एक तन्हाई, सुनी नज़रो में अब भी सूरत ए यार दिवाने, याद दिल मे मेरे जो उसकी समाई है।।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा, अब भी जख़्मी दिल मेरा, आहहह ए मोहब्ब्त…अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

प्रकाशन की तिथि 14/08/2019

समय 2:45 pm

( वैसे तो मैने ताइपिंग करते हुए अत्यधिक सतर्कता बरती है फिर भी यदि कहि कोई त्रुटि हो गई हो, तो उसे जल्द ही सुधार कर पुनः रिब्लोग के द्वारा प्रकाशित कर दिया जाएगा।)Photo_1565605680338

🌹 एक दीवाना। (दास्ताँ के तहत दूसरी दर्द भरी दास्ताँ)

एक दीवाना मेरे द्वारा लिखी गई मेरे उन अनकहे एहसासों को बयां करती है जो कभी भी एक मुक्कमल अंजाम तक ना पहुच सकें। और जिन्हें चाह कर भी मैं कभी किसी के साथ बयां ना कर सका।
उम्मीद करता हु शायद आप तक मेरे वह एहसास पहुच सके। और आपको मेरी नज़म श्रृंखला के तहत यह दूसरी दर्द भरी दास्ताँ “एक दीवाना” पसन्द आए।

🌹”एक दीवाना।”

लिख देगा कलम ए मोहब्बत से नाम ए सनम दीवाना।

हो गई ख़त्म जो श्याही कलम में उसकी तो लहू अपना भर देगा फिर उसमें दीवाना।।

ले आया चुरा कर वक़्त ए ज़माने से अफ़साना ए मोहब्बत फिर जो।

हो गया गुनाह ए मोहब्बत नज़र ए महबूब में बता दिया सरेराह अफ़साना फिर मोहब्बत का जो।।

हुस्न औऱ इश्क की बातों से अंजान हु।

प्यार और मोहब्बत की सौगातों से अंजान हु।।

शिकवा ना गिला है इस बात का किसी हुस्न वाले से, दिलफेंक आशिक़ाना मिज़ाज से अपने परेशान हु।

हो कर फ़िदा हर क़ातिल अदा पर हुस्न के, नादां दिल के अपने मिज़ाज ए आशिक़ी से परेशान हु।।

मोहब्बत से सनम की हम जो दीवाना हो गए।

नादां उम्र में ही संगीन कई अफ़साने हो गए।।

हो गया ज़ख़्मी दिल टूट कर जो दीवाने का, दर्द ए दिल से हम फिर परवाना हो गए।

देखे जो शोले मदहोश नज़रों में नफ़रत के उनकी, जला कर ज़ख़्मी दिल शोले पर उनके, हम फिर दिलजले हो गए।।

हुस्न और इश्क़ की अजीब सी तासीर लगती है।

हर आशिक़ के लिए खुशनुमा कोई एक सौगात लगती है।।

होते है ख़ुशनसीब वो आशिक, वो दीवाने, नसीब में जिनके बेशकीमती ये सौगात होती है।

हक़ीक़त ए मोहब्बत बिन सनम ये जिंदगानी, खाती है ठोकरे और घनघोर काली रात नसीब में फिर दीवानों के होती है।।

किसी हुस्न वाले को ए दोस्त इल्जाम कोई देना ठीक नही।

मरते हुए आशिक़ और डूबते हुए दीवाने को बचाना रीत ये उनकी नही।।

क्या है इसमें ये उनका दोष।

वो तो है हमेशा से ही जो मदहोश।।

मरना है जिसे वो मरेगा ही।

डूबना है जिसे वो डूबेगा ही।।

बचा पाया है कौन उसे भला बेदर्द जो इस ज़माने में।

नही होती है प्रीत किसी से हुस्न वालो को बेदर्द जो इस जमाने मे।।

अफ़साना ए दीवाना…

हुस्न की बहार में उनकी डूब के मर जाने को जी चाहता है।

हुआ जो सनम से प्यार तो अब लूट जाने को जी चाहता है।।

भट्टी है दहकती हुई जो ये अंगार ए हुस्न ए शबाब से, दीवाने का जलते जले जाने का उसमे जी चाहता है।

महबूब की याद में अपने घुट घुट कर जीना, तड़पते हुए मरते मर जाने का फिर जी चाहता है।।

आता है बेदर्द जब भी ये ख़ूनी सावन, आग दीवाने पे बेहिंतिया वो बरसाता है।

तड़पता है दिल ये बेबस, सकूँ ए दीवाना फिर सरेराह जो लूट कर कहि खो जाता है।।

बेदर्द सावन की काली तन्हा रातों से, एक आग सी कोई जिस्म में भड़क जाती है।

जख़्मी दिल बन्द सीने में जिंदा जो दफ़न, एक फ़ांस सी कोई धड़कनो में उसके चुभ जाती है।।

आती है याद जब भी सनम की अपने, बन कर आँसू, लहू दीवाने का बह जाता है।

करते हुए एक सितमगर को अपने याद, रुका दिल जोरों से फिर धड़क जाता है।।

यादों में है सनम की वो खुशबू कोई ग़ुलाब की जो।

मल्लिका ए हुस्न है सनम वो कोई महताब की जो।।

किया है धड़कते दिल पर बेशक़ से वार उसने मेरे जो।

दिया है ज़ख्म तड़पती धड़कनो पर सरेराह बेशक़ से दर्द दिल का मेरे जो।

दीवाने के लिए उम्मीद का फिर भी चाँद वो कोई आफ़ताब लगती है।

हर लम्हा दर्द ए दिल दीवाने की मरहम जो उसकी एक दिलकश मुस्कान लगती है।

सितमगर कहूँ उसे अपना या मौत का अपनी कोई बेदर्द एक पैगाम।

लिख दिया लहू से दिल के दिल पर जिसने मेरे ये आखरी एक फ़रमान।।

कर के क़त्ल मदहोश निग़ाहों से, सब कुछ लूट लिया जो तूने मेरी जान।

बेबस है जख़्मी दिल जो मेरा, धड़कनो में उसके नही अब कोई जान।।

खाया है धोखा जो प्यार का, नही जीने का मुझ में अब कोई अरमान।।।

कहते है दुनिया मोहब्बत की जिसे, तन्हा ही दीवाना जो उसमे भटक रहा।

ढूंढता है सदियोँ से बिछुड़ा सनम, मासूम दिल जो बेहिंतिया उसका तड़प रहा।।

नादां दिल ए दीवाने ये क्या तुझ को हो गया।

हर अदा पर क़ातिल हुस्न के फ़िदा तू क्यों हो गया।।

दिखा था दीवाने जो कभी वीरानियों में महोबत का खिलता एक सुर्ख कमल।

चाहा जो झुक कर उसे उठाना, खिसख गई दलदली रुसवाईयों की सिखकती ज़मीन, हो गया साए से कहि दफ़न बदनामियों से मेरे वो मेरा खिलता प्यार का कमल।।

रहता है दीवाने को तन्हा चाँदनी रातों में इंतज़ार अब किसका।

हो जाती है दीवाने की दूर तन्हाई, दिखता है अक्स चांद में जब अपने महबूब का।।

याद है…

देखा था सनम को दीवाने ने जब पहली बार।

आया था मन मे दीवाने के तब नेक एक ख़्याल।।

हो नही सकती ये कोई मामूली इंसान।

जाग गए देख कर जिसे दिल के सब अरमान।।

दिल ने कहा दीवाने से दीवाने के ये तो कोई हूर दिखती है।

अपनी मदहोश जवानी के नशे में शायद ये चूर लगती है।।

दिल के हाथों ये दीवाना जो अपने मजबूर है।

फिर किसलिए सनम से वो अब अपने दूर है।।

देख कर बेबस नज़रो से अपनी उसे, सोचता है कुछ दीवाना जो अब।

मदहोश निगाहों ने उनकी उसे, देखा होगा क्या दीवाने को अपने अब।।

या यह भी कोई फिर धोखा निगाहों का होगा अब।

देखना ये दिल दीवाने का बहुत बेबस होगा अब।।

मदहोश निग़ाहों में सनम की एक अजीब से नशे को देखा था।

हो गया था मदहोश दीवाना भी, एक अनोखे नशे को जब देखा था।।

अजीब सी कशिश थी नज़रो में एक उसकी जो।

समुंद्र सी गहराई थी नज़रो में एक उसकी जो।।

दिखता है दरिया ए मोहब्बत बेशुमार, मदहोश नज़रों में उसकी जो।

चाहता है डूब जाए दिल ए दीवाना वो उसमे, दिखता है दरिया ए मोहब्बत नज़रो में जो उसकी जो।।

ऐसा लगा वो भी अब शायद वफ़ा दीवाने से करेंगे।

जल्द ही हम दोनों अब शायद एक दूजे पर मर मिटेंगे।।

सनम की उन तीखी नज़रो का जादू चल गया।

होश ओ हवास को दूर कहि जो दीवाने से ले गया।।

नज़दीक से दीवाने ने एक रोज जो दिलबर को देख लिया।

हो गया बेहोश दीवाना जलवा ए हुस्न जो नजदीक से उसने देख लिया।।

नही है एहसास ए दीवाना अब बाकी जो दीवाने का अपने जो अब।

आलम ए बेसुधी जो किए जा रहे है दीदार ए सनम का अपने जो अब।।

कड़कती है बिजली दूर कहि कोई जो जब।

आता है होश ए दीवाना फिर वही जो जब।।

होश में दीवाना है फिर आया जब।

खुद को सनम के बेहद नज़दीक है पाया जब।।

इस जुर्रत पर खुद अपनी हैरान था ये दीवाना।

इस हरक़त से खुद अपनी कुछ परेशान था ये दीवाना।।

खुद से होकर के फिर शर्मिंदा, हट जाता है दूर सनम से ये दीवाना।

हो गया दीवाने को ये क्या, हर लम्हा यादों में उसकी खुद को पता है अब ये दीवाना।।

तमन्ना एक ही बाकी है दीवाने की अब।

हो जाए फिर एक बार दीदार ए सनम दीवाने को अब।।

ना जाने दीदार ए सनम अब हो पाएगा कब।

ऐसा क्यों लगता है दीवाना सनम को अपने दुंद ना पाएगा अब।।

जल्द ही वो दिन भी तक़दीर से दीवाने की आ गया अब।

देख के उन्हें बेबस दिल में फिर से एहसास ए प्यार समा गया जब।

देखता है जितनी मर्तबा सनम को दीवाना ये सनम का।

धड़कता है उतनी मर्तबा दिल ए दीवाना जो दीवाना सनम का।।

हो जाता मजबूर हर बार बेक़ाबू धड़कनो से जो दिल ए दीवाना।

जख़्मी दिल के जख़्मी एहसासों से जताता है प्यार अपने सनम को ये दीवाना।।

बेबाक़ मोहब्बत का अपनी एहसास उसे दिलाना चाहता है ये दीवाना।

धड़कते हुए दिल को अपने इस तरह शायद कुछ सकूँ पहुचाना चाहता है ये दीवाना।।

ना जाने क्यों एक अनजाने ख़ौफ़ का साया सताता है दीवाने को हर पल।

हो गए जो खफ़ा मेरे सनम, डरता है इस एहसास से दिल ए दीवाना पल पल।।

बेबसी ये दीवाने को अपनी रुलाए जा रही थी।

ख़ूनी आँसू रोए और पिलाए जा रही थी।।

खून से भरे घुट दीवाना पिए जा रहा है क्यों?।

आँसुओ को एहसासों से अपने दबाए जा रहा है क्यों?।।

खून से भरे घुट घूट-घुट कर पी लिए।

आँसुओ को आँखों मे ख़ामोशी से दबा लिए।।

दीवाना अब अक्सर दीदार ए सनम किया करता है।

ख़यालो में अपने अब अक्सर उनसे मुलाक़ातें किया करता है।।

ना जाने ये क्या हो गया मुझ को, ऐसा लगता है कि शायद उनसे प्यार हो गया मुझ को।

हर लम्हा हर घड़ी रहता है वो मासूम चेहरा नज़रो में उनका, कसक ए दिल तड़पाता है बेहिंतिया वो मुझ को।।

अपने डर से एक अंजाने डर जाता है दीवाना।

बेबसी को जान कर अपनी, बेहिंतिया तड़प जाता है दीवाना।।

कर के एक हुस्न से बेहिंतिया मोहब्बत बहुत पछताता है अब दीवाना।

देख कर जलवा ए हुस्न अक्सर वो उनका, ना जाने क्यों मचल जाता है दीवाना।।

एक रोज़ ज़िन्दगी में फिर दीवाने के बहार आई।

सनम से इस ज़िन्दगी में एक और मुलाकात आई।।

चिर के जिस्म अपना दीवाने ने जिंदा हर नब्जों को जो अपनी खिंच लिया।

सेक के लपटों से तपिस मोहब्बत की फिर एक नया रूप जो उन्हें दिया।।

कर ली कलम दीवाने ने अब अपनी तैयार।

दिल जलों के दिल पर करने को फिर एक वार।।

रहना होशियार ए दीवानों ये दिल ये धड़कने तुम्हारी अब है हमारा शिकार।

धड़कते हर दिल को बेहिंतिया धड़का कर, धड़कती हर धड़कनो में तुम्हारे, दिखाना है धड़कते किसी दिल का अब भी जो एक इंतज़ार।।

भर के वफ़ा ए मोहब्बत फिर उसमें तुम्हारा खोया प्यार वो जगाना है।

दिखा देगा अक्स ए मोहब्बत यही ये दीवाना अपनी, ज़िन्दगी से उसे दर्द ए दिल जो मिटाना है।।

चिर के दीवाने ने जख़्मी दिल लहू अपना फिर जो सरेराह बहा दिया।

आ गया ज़लज़ला ज़िन्दगी में उसकी, मोहब्बत ने एक दिलकश हसीना की उसे पागल बना दिया।।

दिया नाम ए सनम से उसने फिर एक पैगाम।

थाम के एक हाथ मे लहू ए ज़िगर से भरा एक जाम।।

लिख रहा है नाम ए सनम लहू से दीवाना वो अपने, अब जो एक पैगाम।

उम्मीद है पा जाएगा उसे, जब पढ़ेगी लहू ए ज़िगर से वो उसका जो एक वो पैगाम।।

देखा जब उन्होंने लहू ए जिगर से मेरे, मेरा वो एक आखरी पैगाम,
हो गए खफ़ा इस कदर वो हमसे क्यों सनम जो हमारे।

कर दिए टुकड़े टुकड़े बेदर्दी से टूटे दिल के मेरे, था जो मेरी मोहब्बत का पैगाम,
समझा लहू ए ज़िगर को एक दाग बेहूदा जो उसने, चल दिए मुड़ कर फिर क्यों वो सनम हमारे।।

समझ कर जख़्मी दिल को खिलौना जो उसने मेरे।

तोड़ दिया सरेराह बेदर्दी से दिल को जो उसने मेरे।।

नज़दीक सनम के दीवाने ने एक रोज़ की जो आने की हिम्मत तो पाया।

बैठे थे दरख़्त ए ओट में एक मदहोशी से सनम हमारे, और लिपटा था दामन से उनके एक साया काला।।

देख सनम को इस तरह दिल ये दीवाने का कुछ परेशान हुआ।

जान कर हक़ीक़त ए सनम जो हाल ए दिल उनका, ये दिल ए दीवाना हैरान हुआ।।

ज़िन्दगी ये दीवाने की एक दम से तन्हा जो हो गई।

ऐसा लगा उस साए से सनम की कोई करीबी जान पहचान हो गई।।

इज़हार ए मोहब्बत अब दीवाना कैसे कर पाएगा।

बेवफ़ा सनम को अब दीवाना क्या ढूंढता ही रह जाएगा।।

ऐसा लगा हो गई दूर सितमगर की मेरे अब तन्हाई।

ना जाने क्यों ए मोहब्बत नसीब ने हमेशा ही दीवाने के ठोकरे खाई।।

देखता है ओट ए दरख़्त से सनम को अपने, साथ है अब भी उनके जो साया काला, ये दीवाना।

खोद रहा है हाथो से अपने खुद कब्र जो अपनी, जो अब भी ये उनका दीवाना।।

नज़र है किस की ये कौन ताक रहा दामन से लिपट कर सनम के, सनम को हमारे।

परेशान है बहुत बेजान ये दिल ए दीवाना, दिखता है फ़रेब नज़रो में उनकी ताक रहा दामन से जो सनम के, सनम को हमारे।।

दिख रहा बेसुध हुस्न से ज़हरीला कोई नाग मदहोशी से लिपटते हुए।

जा रहा धड़कते दिल से कोई फ़ांस, ए दीवाने मेरे जो अटकते हुए।।

देखा जो नज़ारा ए बर्बादी लुटती मोहब्बत का जो अपनी ए दीवाने।

आ गया एक ज़लज़ला कोई बर्बाद ज़िन्दगी में अब जो मेरे ए दीवाने।।

नही था दामन में कोई वो सनम के साया मोहब्बत का कोई।

कर रहा था खिलवाड़ हुस्न से कोई बन के वो साया जो मोहब्बत का कोई।।

रूह से अपनी शायद इसीलिए था वो काला।

अचानक ही दीवाने ने फ़िर खुद को था जो सम्भाला।।

कर के नज़र अंदाज़ दिन ओ दुनिया वो दीवाने को।

एक दूजे से अब बेहिंतिया जो लिपटे जा रहे थे वो।।

आ कर एक दूजे के इस कदर से नज़दीक, सितम दिल ए दीवाना पर बेहिंतिया ढाह रहे थे वो।

तड़प रहा है टूटा दिल जो दीवाने का सरेराह, दिख रहा आलम ए तन्हाई जो समा एक वीराने का था वो।।

कर रहे है नज़रंदाज़ दीवाने को हर लम्हा क्यों वो?।

नही है होश ओ हब्बाश ज़माने से है अंजान क्यों वो?।।

ना जाने इस ओर क्यों उन्होंने अपना ध्यान नही दिया।

देख रहा है टूटे दिल को थामे अब भी दीवाना, फिर क्यों उन्होंने इस ओर ध्यान नही दिया।।

पड़ गई है नज़रे दीवाने पर फिर उनकी जो मदहोश अचानक से इस तरह।

लग गई है एक आग नज़रो में उनकी जो मदहोश फिर अचानक से इस तरह।।

कह रही हो मानो दीवाने से कुछ जैसे वो निगाहें उनकी जो मदहोश।

कौन हूं मैं और नही हो सकता हु मैं उनका कोई दोस्त।।

उन मदहोश निग़ाहों में उसकी अजीब सा एक एहसास था।

दीवाने को लगा फिर भी कि हा यही तो प्यार था।।

आते है खोए होश कुछ पलों के बाद नज़र जो मुझ को।

दिखती है हक़ीक़त ए मोहब्बत ज़माने में कुछ पलों के बाद जो मुझ को।।

हो गया गुनाह ये क्या वक़्त कि जो मिटती लक़ीर पर एक।

देख कर पहलो में सनम की किसी गैर को सरेराह जो एक।।

चिर दिया दिल तोड़ दी धड़कने दीवाने ने सरेआम फिर जो अपनी हर एक।

मोहब्बत की किताब पर सितम ये गुनाह जो अब हो गया फिर से एक।।

दस्तक़ दी फिर एक रोज़ ज़िन्दगी में दीवाने की जो क़यामत ने एक।

कर दिया इस कदर मज़बूर ज़िन्दगी ने दीवाने को जो संगदिल की मोहब्बत ने एक।।

तड़प के रो रही है रूह भी जिंदा जो जिस्म से, याद हर लम्हा सनम को करते हुए।

चिर रहा है दिल, तड़प रहा जो अब भी दीवाना नाम ए सनम जो लेते हुए।।

मिलते है दिल, खिलते है गुलिस्तां अब भी बर्बाद मोहब्बत के दीवाना, तन्हाई में वो।

करते है इज़हार ए मोहब्बत मिलते है जब भी बर्बाद ये गुलशन दीवाने के जो, मोहब्बत से वो।।

जान कर हाल ए दिल ये दीवाना तड़पते जा रहा हु मैं।

शायद खुद को इस तरह से नज़दीक सनम के पा रहा हु मैं।।

हाल बेहाल दीवाने का जो एक रोज़ हो गया।

थामे हुए दिल के टुकड़े टूटे नज़दीक ए सनम पहुच गया।।

गज़ब ये हाल जो टूटा दिल भी चटक कर टूट गया।

इस तरह से अब दीवाना और भी टूट कर टूट हो गया।।

ठिठक गए जो कदम ए दीवाना नज़दिक ए यार के साए से सरेराह।

सनम ए दीवाना वो दुशनम ए मोहब्ब्त लिपटा हुआ जो अब भी उनके साए से सरेराह।।

बेदर्दी वो फ़ांस ए महोब्बत का जो ज़हरीला था मेरी, साए से सनम के दीवाने को उसने जो अब घूर लिया।

लिपट गया इस क़दर से इस क़दर वो सनम से हमारे, दम ए दीवाने का जो सरेराह उसने फिर तोड़ दिया।

हक़ीक़त है बेदर्द एक शायद जो वह दिखा रहा था मुझ को इस कदर से इस तरह वो।

साथी है दिलरुबा का एक वो ही शायद यह समझा रहा था मुझको इस कदर से इस तरह वो।।

एहसास ए दीवाना अब जल्द ही सब कुछ ये महकता गुलिस्तां जो मोहब्बत का लूट जाएगा।

बेदर्द है साया जो वह काला पहलो से सनम के दे कर ज़हर एक दर्द दीवाने को तड़पाता ही जाएगा।।

भड़क गए जो जलवे ए हुस्न के बेहिंतिया से अब।

नाम ए सनम से कूद गया दीवाना जो उसमे अब।।

झुलस गए जो अरमान ए मोहब्बत ए दीवाना जो तड़प ए दिल से अब।

बग़ावत ए महोब्बत ए दीवाना जो दीवाना टकरा गए भड़कते शोलो से अब।।

हो गया लहूलुहान टूटे दिल से जो घायल धड़कनो से संगीन अपने दीवाना।

खोई मोहब्बत को अपनी इस तरह से शायद पा गए ये अपने दीवाना।।

दिखता है नक़ाब कोई फ़रेबी जो उनकी मोहब्बत का।

खेल रहा है हुस्न से उनके अक्स ए बेवफ़ाई जो उसकी मोहब्बत का।।

जानता है दीवाना हर चाल ए बेवफ़ाई जो मक्कार की मक्कारी का।

दिखता है दगा हर लम्हा ज़िन्दगी जो मक्कार की बेवफ़ाई का।।

क़यामत एक रोज़ जो सरेराह फिर बिजली कोई दिल पर टूट गई हमारे सनम के।

दर्द ए दिल दर्द ए बेवफ़ाई दर्द की इंतेहा हो गई, दर्द ए दिल दर्द ए ज़ख्म दर्द दिल पर जो हमारे सनम के।।

ख़ुशबू वो गुलाब की महकता था गुलिस्तां ए महोब्बत हर लम्हा जो महोब्बत का हमारा।

लूट कर ख़ुशबू नोच कर हर पंखुड़ी ग़ुलाब की उड़ गया वो काफ़िर उनकी, महकता था जो ग़ुलाब ए मोहब्बत का हमारा।।

जान कर दर्द महबूब का दर्द से तड़प गया ये दीवाना।

देने को सकूँ दिल को उनके दर्द जो जीते जी मर गया ये दीवाना।।

मज़बूर दिल से दीवाना दिल पर मरहम जो जख्मो पर सनम के लगाने को गया।

ज़ख्म दिल पर सनम ने फिर दीवाने को बेवफ़ा का एक इल्ज़ाम दिया।।

कर दिया क़त्ल ए दीवाना ज़हर अब भी जो उनकी नशीली निगाहों में।

तोड़ दिया दिल नफ़रत से अपनी नफ़रत अब भी जो उनकी कंटीली निग़ाहों में।।

एहसास ए दीवाना हो गया और भी जो दूर वो सनम से सनम का दीवाना।

सितम ए मोहब्बत निग़ाहों से उनकी बरसते जो अंगार, नफ़रत सनम को अब भी उससे, जो अब भी सनम का दीवाना।।

अज़ीब सी एक बेचैनी दीवाने को अब जो एक बेखुदी सी छा गई।

सोच रहा है घड़ी ये ज़िंदगानी में अब कौन सी अचानक से आ गई।।

दुत्कार दिया सरेराह अब भी गुलिस्तां ए हुस्न ने, साथ दीवाने का अपने जो नही दिया।

एहसास ए नफ़रत बेरुखी से अपनी उसने, दीवाने को अपने जिंदा ही जो मार दिया।।

ले रही है मोहब्बत भी मोहब्बत का इस कदर इम्तेहां दीवाने का क्यों?।

दे रही है ज़ख्म दिल पर इस कदर सनम, ज़ख्म दिल ए दीवाने पर क्यों।।

रोता है तड़प कर अब तन्हा रातों में ये दीवाना।
होती है नज़रे चार इत्तफाक से जब भी उनसे,
अंगार ए नफ़रत से जल जाता है उनकी के दीवाना।।

कर के ख़ाक दिल ए दीवाना अब भी जो तड़पाती है वो।
ज़हर ज़हरीली निग़ाहों से अपने बरसाकर,
वार तड़पते दिल पर कर जाती है अब भी वो।।

क़यामत है वो मदहोश नज़रे जो उनकी, कत्ल ए दीवाना हमेशा ही ज़हर बरसाती है वो।

हताश है ये समा ये लम्हा ज़िंदगानी का, आलम ए रुसवाई हमे अब बहुत तड़पाती है वो।।

दे रहा था दर्द जो कभी दामन में सनम के दुश्मन जो साया काला।

बेध दिया था तीर ए मोहब्बत से अपनी हमने, बेदर्द वो साया काला।।

ज़ोर ए वफ़ा के सामने ठहर ना पाया।

हुंकार ए मोहब्बत से वो लड़ ना पाया।।

कर रहा था खिलवाड़ हुस्न से जो साया काला।

बिखर गया था जोश ए दीवाने से घबरा के वो साया काला।।

हो के दूर दिलरुबा से दीवाने की वो।

खो गया कहि ज़िन्दगी से दीवाने की वो।।

दे रहा था जो कभी पैगाम ए मौत हमे वो साया काला।

हुस्न से दूर कहि पर वो सनम से हमारे, छट गया था वो साया काला।।

दे रहा था जो कभी दर्द ए जुदाई हमे, अपने सनम से, दूर बहुत दूर वो हम से अब हो गया था।

दे रहा था ज़ख्म ए दिल जो कभी दर्द ए तन्हाई का अंधेरा हमे, खुद ही किसी अंधेरे में वो अब खो गया था।।

दे रहा था सदा दर्द ए जहनुम जो शैतान, दूर ज़िन्दगी से वो अब हमारी हो गया था।।।

होता नही एहसास ए बेबसी सा जो अब मुझे वो।

क्या मिल गया फिर से वो सनम मेरा अब मुझे वो।।

एक रोज़ अज़ीब से हालात मालूम हुए।

देख कर हाल ए सनम ज़ख्म जो दिल के फिर से हरे हुए।।

एक रोज़ हुस्न वो सनम हमारा बेपरवाह बीच बाजार जो हो गया।

गिरा के पल्लो सरेराह वो अपना शायद कहि खो गया।।

पड़ जाता है ज़ख्म जख़्मी जो दिल पर, भर जाता है रग रग में जैसे कोई तेज़ाब।

मदहोशी का ये आलम नही, रहता है धड़कनो में मेरा सनम बन के मेरी जान।।

हो जाता है बेपरवाह हुस्न जब मदहोश कोई ज़माने में जब।

दिखलाता है राह ए मोहब्बत दीवाना फिर उसे उसका टूटे दिल के हर अफ़साने से तब।।

कर देता है खून ए जिगर वो बरसात लहू से तब उस हसीना पे जब।

जगाता है रूह ए मोहब्बत से फिर मोहब्बत को सरेराह दीवाना इस ज़माने में तब।।

मंडरा रहे थे जो प्यासे हुस्न के भंवरे जो मनचले बेसुध हुस्न ए सनम पे सरेराह ।

चिर कर दिल हर धड़कती धड़कने दर्द ए दिल जो वफ़ा, ढक देता है पर्दा ज़माने से हुस्न ए सनम पे दीवाना फिर सरेराह।।

हर दर्द जो धड़कती ये टूटती धड़कने, होश टूटती धड़कनो से दीवाने ने सनम को दिलाना चाहा।

पाक दामन को सनम के जालिम ज़माने से इस तरह रुसवाई को उसकी हर जतन से बचाना चाहा।।

पड़ी जो नज़रे दीवाने पर उनकी बेसुध, होश में तभी आ जाती है वो।

सितम ये दर्द जो दीवाने का अपने, पल्लो फिर भी नही उठाती है वो।।

खड़ा था ख़ामोशी से हर शख्स जो वहाँ, पीए जा रहा था अब भी घुट घुट हुस्न ए शबाब क़ाफ़िर निग़ाहों से जो मदहोश हुस्न के जाम।

ज़ख्म ए जिगर वो लहू था दीवाने का जो वहा, जमता जा रहा था हर लम्हा देख नजारा बर्बादी का, जो नज़ारा नही था कोई ये आम।।

आते ही होश में जो बिजलियां दीवाने पर गिराती है अपने वो।

मदहोश निग़ाहों से जो जलते अंगार अब भी दीवाने पर जो बरसाती है अपने वो।।

जलाते है दिल जो नफ़रतों की दहकती आग से अपने दीवाने का सरेराह।

हो जाते है खफ़ा ना जाने क्यों देख दीवाने को अपने वो वहाँ सरेराह।।

बदला रूप जो सनम ने अपना ये दीवाना फिर सरेराह जो बदनाम हो गया।

गुनाह कर दिया क्या ऐसा जो सनम से दीवाना फिर दूर बहुत दूर हो गया।।

दूरी अब उन से एक हक़ीक़त जो बन गई।

नफ़रत अब उनकी जो जिंदगी हमारी बन गई।।

ये मान लिया दीवाने ने अब जो इस बात को।

ये जान लिया दीवाने ने अब जो इन हालात को।।

“ना हो पाएगी उनसे प्यार की अब कोई मुलाकात।

ना मिल पाएगी उनसे मोहब्बत की अब कोई सौगात।।”

तन्हा ज़िन्दगी को अपनी अब अपना मान लिया।

हक़ीक़त को ज़माने की अब जो पहचान लिया।।

दर्द ए दिल खो गया जो तन्हाइयों में, दर्द दिल मे अपने लिए ये दीवाना।

ज़ख्म ए दिल मर गया जो ज़ख्म दिल पर अपने लिए कहि वीराने में ये दीवाना।।

रहता था हर लम्हा जो अब भी उनका एक इंतजार।

छुपी थी हर धड़कनो में जो दिल की अब भी उनकी तस्वीर ए यार।

एक रोज़ अज़ीब से फिर हालात मालूम हुए।

जान कर ये बदला मौसम दीवाने पागल से हो गए।।

एहसास ए उजड़ा गुलिस्तां जो मोहब्बत का अब आबाद हो जाएगा।

हैरान ये दीवाना क्या उससे भी सनम को उसके अब प्यार हो जाएगा।।

नही सोचा था दीवाने ने कभी मोहब्बत की उनसे होगी इस तरह से कोई मुलाक़ात।

हक़ीक़त ए मोहब्बत जो ज़माने में होती है मोहब्बत पाक लौट के आती है खुद मोहब्बत करने को मोहब्बत की एक मुलाकात।।

नही सोचा था दिवाने ने कभी खुद ही आ जाएगी करने को क़रीब मोहब्बत का अपनी एक वो इज़हार।

ऐसा हुआ एहसास रुक जाएगी दिवाने की हर सांस, लम्हा वो मोहब्बत का क्या उनको भी है दिवाने से प्यार।।

एक रोज़ आ गए नज़दीक खुद ही होकर मज़बूर दिल से जो सनम हमारे।

मदहोश वो निगाहें कुछ कुछ उदास थी उनकी, टूट रही थी जो धड़कने दिल की दिल मे हमारे।।

कुछ क़रीब दीवाना गया, कुछ क़रीब वो आ गई।

वीरान ज़िन्दगानी में मानो की बहार दिवाने के आ गई।।

करने लगे सनम वो बेबाक़ मोहब्बत का फिर जो इज़हार।

एहसास ए दीवाना कुछ ऐसा हुआ कि वो क्यों चाहती है करवाना इकरार।।

वो सुर्ख ग़ुलाबी लब वो हसीन चेहरा उनका ही था।

सितम वो नाम लबो पर उस के क्यों किसी गैर का था।।

लब्जों से उसके उन वहाँ एक भयानक शोर सा था।

ना जाने उस लम्हा ये दीवाना क्यों ख़ामोश सा था।।

ए वक़्त एक रोज़ क्यों अनहोनी सी कोई हो गई।

धड़कते दिल की धड़कती धड़कने कहि फिर खो गई।।

तरसते थे सुनने को लब्ज दो लबो से उनके जो अपने लिए।

सुने थे लब्ज दो लबो से उनके जब जो अपने लिए।।

ऐसा लगा दिवाने को शायद क़यामत आ गई।

नज़दीक वक़्त से पहले शायद मौत उसकी आ गई।।

आए वो नज़दीक हमारे तो हैरत हुई।

सुन कर लबो से उनके नाम अपना हैरत हुई।।

आ गई ख़ुद क्यों वो नज़दीक हमारे, लेकर के हाथो में वो ग़ुलाब कई।

आ गई खुद ही जो नज़दीक वो हमारे, दिख रहे हाथो में उसके जो ग़ुलाब कई।।

छुपाए थे हर ग़ुलाब से उसने कांटे ज़हरीले कई हज़ार कई।

दिखा के आईना ए मोहब्बत करने लगी दिल पर हमारे वो वार पर वार कई हज़ार कई।।

कँटीले कांटो के उन ज़हरीले वार से।

बनावट के उनके उस बनावटी प्यार से।।

कर दिए जो महबूब ने टुकड़े टूटे दिल के मेरे कई हज़ार।

हर वार से कराहता है दीवाना, उसे अब भी है उनसे जो प्यार।।

दिख रही है अब भी जो मदहोश निगाहों में भड़कती नफ़रत एक जो उनकी।

दिखा रही है अक्स हक़ीक़त का जो मदहोश निग़ाहों में भड़कती नफ़रत जो उसकी।।

कह रही थी निगाहें वो मदहोश, नज़रो में उसकी ये दीवाना है बेवफ़ा और मक्कार।

भरी है हवस जो तुझ में, कर सकता है कैसे किसी हुस्न से दीवाना कभी प्यार।।

वक़्त वो यकीं अपना उन्हें कैसे दिला पाता।

सितम वो धड़कने अपनी, उन्हें कैसे सुना पाता।।

नही कसूर हुस्न वाले का कोई इसमें, वो वक़्त वो लम्हा वो समा ही बेवफ़ा निकले।

कोशिश वफ़ा दिलाने की बहुत दिवाने ने करि, वो हालात, वो मिज़ाज ए मौसम ही मग़र बेवफ़ा निकले।।

नही बर्दाश नफ़रत से उनका वो चेहरा लाल।

सितम है वो आग जहनुम की नफ़रत सा उनका वो चेहरा लाल।।

चिर कर दिल अपना दिखा दिया था हमने।

चौखट से सर अपना उनकी लगा दिया था हमने।।

इज़हार ए मोहब्बत वो किसकी जता रही है।

मदहोश निगाहों से वो एहसास नफऱत का जो दिखा रही है।।

ऐसा लगा था मानो क़त्ल वो हमारा सरेराह कर देगी।

ग़ुलाबी हाथो से अपने मार कर तमाचा धड़कने वो हमारी रोक देगी।।

रुक गई थी हर सांस उस लम्हा दीवाने की एक बार को, हक़ीक़त है।

ठहर गई थी हर बात उस लम्हा जैसे सारे जहां की एक बार को, हक़ीक़त है।।

दस्तूर ए वक़्त एक दम से हर दस्तूर ज़माने के बदल गए थे।

शवेत बादल रक्त के प्यासे हमारे एक दम से लाल हो गए थे।।

ऐसा लगा तलाश में थे हमारी ही वो।

पूछ रहे थे पता हमारा और हमे ही ढूंढ़ रहे थे वो।।

ऐसा लगा ख़ूनी आसमां से खून की हमारे बरसात हो रही थी।

बहुत दूर है अब दीवाना उनसे, शायद वो भी कहि किसी पर्दे के पीछे रो रही थी।

टूटा जो दिल, वो दिवाने का, दूर सनम से हो गया।

ना देख पाएगा, अब उन्हें दीवाना, जो कहि खो गया।।

कर दी ख़त्म हर तम्मना दिवाने ने दबाकर दिल की दिल मे ही क्यों?।

भटक रहा है तन्हा किसी वीराने में ये दीवाना अब भी क्यों?।।

खो गया उफ़ान धड़कनो से कहि महकता था दिलकश जो अरमान।

हो कर दूर दिखता नही अपने सनम से मुकदर जो जिंदगी का एक मोहब्बत, अब जो जान।।

एहसास ए दीवाना वो मदहोश निग़ाहों से बरसते नफ़रतों के शोले, खत्म ना कभी हो पाएंगे।

जल कर मर भी जाए दीवाना ए मोहब्ब्त, एक दूसरे के अब ना वो हो पाएंगे।।

कशिश है अज़ीब सी एक जो उसकी हर एक याद।

करता है हर लम्हा दीवाना जो उसको शिदत से याद।।

आता है ख़्याल ए दीवाना जो अब भी एक।

याद होगा दीवाना क्या उनको जो इनका वो एक।।

सावन कई ज़िंदगी के गुज़र गए अब।

क्या वो सनम दिवाने को अपने भूल गए अब।।

एक आह दर्द से भरी.. . खैर जो भी हो!

भुला ना पाएगा उनको ये उनका अब दीवाना।

जो करि है वफ़ा उन से आख़री दम तक वफ़ा निभाएगा उनसे उनका अब दीवाना।।

उस हुस्न वाले का अब भी आता है जब मासूम चेहरा याद।

ना जाने क्यों आँखों मे आँसू और तड़पते दिल ने जाग जाता है उनका प्यार।।

करते हुए बिछुड़े सनम को अब भी याद, जाग जाता है दिल ए दीवाना में जो उनका प्यार।

बरसता है लहू बन के अश्क़ दिवाने का, एहसास है वीरान ज़िन्दगी में ना हो पाएगा अब उनका कोई एक दीदार।।

एहसास है ये देख ना पाएगा अब उन्हें उनका दीवाना।

एहसास है ये मिल ना पाएगा अब उन्हें उनका दीवाना।।

अब भी अक्सर जो उसकी याद आ जाती है दिवाने।

ना चाहते हुए भी दिवाने को बेहिंतिया रुलाती है दिवाने।।

ऐसा क्यों लगता है कि अब भी वो दिवाने के है साथ ।

मदहोश निगाहों में लिए अपनी उसी नफ़रत के साथ।।

धड़कते दिल मे दिवाने के धडकती एक मोहब्बत के साथ।

ख़यालो में है उसका मेरे अब भी एक अधूरा दीदार।

मरते दम तक है तड़पती सांसो में सिर्फ उसका, हा उसका ही एक आखरी इंतज़ार।।

रहेगा ख़यालो में दिवाने के हमेशा ख़्याल अपने सनम का, वो अधूरा प्यार।

यकीं है कर लेगा एक रोज़ वो भी दीदार अपने सनम का, हा वो एक मुकम्मल दीदार।।

टूटी धड़कनो का हो जाएगा एक रोज़ ख़त्म ये इंतज़ार पुराना।

दिख जाएगा दिवाने को जब भी बिछुड़ा यार वो सनम पुराना।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

प्रकाशित तारीख़ 12/08/ 2019
समय 9:07 am

💌 सक्रिय ब्लॉग “दास्ताँ” एवं तथ्य। 🌹✍️

💌 सक्रिय ब्लॉग “दास्ताँ” एवं तथ्य। 🌹✍️

मैंने यानी कि विक्रांत राजलीवाल ने वर्ष 2015 अक्टूबर में हम सब के सभ्य समाज के जटिल और कठोर होते सम्सजिक ढांचे एवं मानवता के प्रति जटिल एवं कठोर होते भाव व्यवहारों पर अपनी 25 अति संवेदनशील कविताओं के द्वारा एक प्रहार करने का एक प्रयास किया था। जिसका एकत्रित रूप मैने पुस्तक एहसास द्वारा Sanyog प्रकाशन घर शहादरा द्वारा प्रकाशित करवाया था। एव जिसका प्रदर्शन वर्ष 2016 के दिल्ली विश्व पुरतक मेला में भी किया गया था।

इसके साथ ही मैंने उसी वर्ष 2015 अक्टूबर से जनवरी 2016 में अपनी प्रथम पुस्तक एहसास के प्रकाशन के दौरान कुछ अत्यंत दर्दभरी शायरी दास्ताँ भी लिखि थी। जिसमे से प्रथम चार नज़म दास्ताँ अत्यधिक विस्तृत एक सम्पूर्ण प्रेम दास्ताँ को अंकित करती है।
1) एक इंतज़ार… महोबत। को मै पहले ही आपकी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित एव YouTube चैनल Vikrant Rajliwal पर अपनी खुद की आवाज़ के साथ रिकार्ड कर के अपलोड कर चुका हूं।

2) एक दीवाना। को जल्द ही प्रकाशित करूँगा।

3) , 4) दास्ताँ भी दर्दवसे भरपूर अत्यंत विस्तृत दास्ताँ है अपने शायद ही अभी मेरी इन शुरुआती चार दस्तानों के जितनी दर्दभरी एवं विस्तृत कोई नज़म दास्ताँ पहले कभी पढ़ी हो। पहली दास्ताँ एक इंतज़ार… महोबत। के प्रकाशन के बाद मेरी दूसरी दर्दभरी नज़म दास्ताँ 2) एक दीवाना। के नाम की सूचना में आपको पहले ही दे चुका हूं। इसके अलावा 3) और 4) संख्या की नज़म दास्ताँ का नाम आपको उचित समय आने पर अवश्य सूचित कर बता दिया जाएगा।

इसके अलावा कुछ छोटी छोटी दस्ताने भी मैंने लिखित थी जिन्हें मैं पहले ही प्रकाशित एव अपनी आवाज़ के साथ रिकार्ड कर अपलोड कर चुका है। उनके नाम इस प्रकार से है कि 5) पहली नज़र 6) पैगाम ए मोहब्बत 7) सितमगर हसीना 8( अक्सर सोचता हूं तन्हा अंधेरी रातो में कई.. 9) एक खेल जिंदगी। 10) धुंधलाता अक्स। इन दर्दभरी दस्तानो बाद मेने कुछ शायरी भी लिखी थी जिन्हें जांचने से पता चला कि यह तो एक नज़म हो गई है जिसके मेने सोशल मीडिया और तीन टुकड़ो में इस प्रकार से प्रकाशित किया 1) मोहब्बत। ( दिख किसी गुलिस्तां में जब भी कोई गुलाब, छूने को पंखुड़ी, लेने को खुशबू …)

2) बेरवा सनम। ( देखा था ख़्वाब कभी दीवाने ने एक)

3) महक ए सनम।( जी रहा है दीवाना याद सनम को करते हुए। मर रहा है बेबसी से नाम ए सनम लेते हुए।।)

🌹👉 उपरोक्त जानकारी आपको बताने का एक ठोस कारण यह है कि आप सभी मेरी प्रकाशित एवं आगामी दर्दभरी दस्तानों के साथ एक करीबी रिश्ता महसूस करते हुए उनसे जुड़ सके। अब जल्द ही अपनी शुरआती दूसरी दर्दभरी नज़म शायरी के रूप में लिखी गई मोहब्बत के दर्द से सरोबार दास्ताँ “एक दीवाना।” को आपके पाठन के लिए प्रकाशित करूँगा।

अब अपने फेसबुक पेज़ Vikrant Rajliwal एव एक अन्य नवीन पेज़ Zindagi Ek Khwaab Hai पेज़ पर मेरा उपनाम Ek Agyat kalam द्वारा जिसका निर्माण मैने क्यों किया इस बात के एहसास को अभी तक मै खुद भी नही जान सका हु। के कुछ शेर सांझा कर रहा हु जिन्हें अभी तक मैं आपके साथ सांझा नही कर सका हु। उम्मीद करता हु आपको पसंद आए।

✍️पेज़ Vikrant Rajliwal पर मेरे वह शेर जिन्हें अपके साथ सांझा ना कर सका इस प्रकार से है कि

वह समझते है कि उन्होंने मेरा क़त्ल कर दिया। कोई बता दे उन्हें जा कर के की अभी साँसे जिंदा है मेरी।

तुम बेशक़ से हो गए हो मुर्दा ए मेरे हम सायों मग़र कुछ उम्मीद अभी भी है बाक़ी तुम्हारे मुर्दा एहसासों में जिंदा जो मेरे एहसासों की गर्मी है।

पूछुंगा एक रोज़ मेरे रब से कि क्यों तूने मुझे हमसफ़र भी बेजान पत्थर से दिए है मुर्दा। जो जिंदा है या मर गए है जीते जी किसे खबर।

बेजान ये एहसास एक रोज़ कर दूंगा जिंदा, जिंदा हर एहसासों की गर्मी अभी बहुत बाकी है कहि जिंदा एहसासों में मेरे।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

Follow my personal blog site vikrantrajliwal.com

✍️पेज़ Zindagi Ek Khwaab Hai पर मेरे द्वारा लिखित कुछ शेर रचना इस प्रकार से है जिन्हें एक संग्रह के रूप में आप स ही के पाठन हेतु प्रकाशित कर रहा हु।

1) कभी देखा है ज़िन्दगी को,बेहद हसीन लगती है जैसे कोई हसीं ख़्वाब अधूरा सा कहि रह गया हो।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक अज्ञात कलम के उपनाम से।

2) 💃 ये जो जिंदगी है ना एक कठपुतली है। यहाँ हर एक रिश्ता दूसरे को खींच कर नचा देता है।

थोड़ी सी भी ढ़ील छोड़ो तभी कोई खीच कर डोर जिंदगी की काट देता है।।

क्यों है कि नही प्यारे।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।एक अज्ञात कलम के उपनाम से।
#V
3) 🌹 उसको शायद आज भी बहुत यक़ीन है ख़ुद पर, नही तो वो क्या कब का बीच राह से लौट ना गया होता।

असर रूह का उसके यक़ीनन रूमानियत भरा ही होगा, हर अल्फ़ाज़ भी तो उसके मदहोश से कर देते है।

हम है कि आज भी इम्तेहां बेदर्दी से उसके एहसासों का एक इम्तेहां आज भी जो लेते है।

और वो है कि हमे फिर भी अपना महबूब कहता है शायद उसे आज भी इंतज़ार है किसी की मोहब्बत का, वर्ना तो कौन हम जैसे संगदिलों पर बहा कर अश्क़ अपने जाया करता है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक अज्ञात कलम के उवणं से।
#VR

4) हवाओं के रुक जाने से सांसे रुक सकती है मग़र जो वो रुक जाए तो जिंदगी रुक सी जाती है।

Hawaon ke ruk jaane se sanse ruk shakti hai magar jo wo ruk jaae toh zindagi ruk si jati hai.

वो ख़ुदा तो नही फ़क़त कई मासूमो को एक ख़्वाब जिंदगी का जिंदगी को जीने के लिए दे जरूर सकता है।

Wo khudaa to nahin fakat kai masumo ko ek khwaab zindagi ka zindagi ko jine ke liye de jarur sakta hai.

यह वो नही उसका रूहानी कोई एक एहसास बोलता है। उसका दिलो को जीत लेने का एक हुनर कोई दिलकश बोलता है।

Yeh wo nahi uaska ruhani koi ek ehsaas bolta hai. Uska dilon ko jeet lene ka ek hunar koi dil kash bolta hai.

तबाह ये दुनियां बेईमान ही सही, क़यामत से खुद ही अनजान जो सही। फ़क़त वो आज भी देखता है ख़्वाब जिंदगी का मासूम मासूमो के लिए, लहू सींचती कलम और बर्बाद ख्वाहिशें साथ लिए।

Tabah ye duniyaa beimaan hi sahi, kayamat se khud hi anjaan jo sahi, fakat wo aaj bhi dekhta hai khwaab zindagi ka masum masumo ke liye, lahu seechti kalam orr barbaad khwahishen sath liye.

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक अज्ञात कलम के उवणं से।
#VR

5) वो आज भी नही समझा कि उसे कितने दिल अपनी धड़कनो को थामे हुए समझने लगे है।

Wo aaj bhi nahin samjha ki use kitane dil apani dhadkano ko Thame huee samjhane lage hai.

देखो ना वो आज भी उन्ही से महोबत करता है हर लम्हा ही जिन्होंने उसकी हर धड़कती धड़कनो को तोड़ने की कोशिश करि है, देखो ना वो आज भी…

Dekho na wo aaj bhi unhin se mohabbat karta hai, har lamha hi jinhone usaki har dhadakti dharkano ko todane ki koshish kari hai, dekho na wo aaj bhi…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक अज्ञात कलम के उपनाम से।

Ek agyat kalam dwara likhit

#VR

6) 💞 कहि कुछ छूट सा रहा है शायद कहि कुछ टूट सा रहा है। ए जिंदगी कहि ये मेरा ख़्वाब तो नही, ए जिंदगी कहि ये मेरा ख़्वाब तो नही…जो अब कहि छूट सा रहा है पूरा होने से पहले ही जो बेदर्दी से टूट रहा है।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक अज्ञात कलम के उवणं से ✍️ #VR

💞 Kahi kuch chutt sa rha hai shayad kahi kuch tut sa rha hai. e zindagi Kahi ye mera khwaab to nahi, e zindagi kahi ye mera khwaab to nahi…Jo ab kahi chutt sa rha hai pura hone se pahale hi jo bedardi se tut rha hai..

Ek Agyat Kalam Dwara Likhit. ✍️ #VR

#VR

यह थे वह कुछ शेर जिन्हें मेने फेसबुक पर प्रकाशित किया था अब आपके लिए एक संग्रह के रूप में प्रकाशित कर रहा हु।

🌹👉 अंत में मैं यानी कि आपका अपना मित्र विक्रांत राजलीवाल आपको यक़ीन देता हूं कि मेरी आगामी दर्दभरी नज़म दास्ताँ “एक दीवाना” को पढ़ कर आप को हक़ीक़त में एक रूमानी शायरी एक दर्द ए महोबत का एहसास जरूर हो जाएगा।
इसी एक यकीन के साथ कि मैं आपके पाठन करने के लिए “एक दीवाना।” को जल्द ही आपकी अपनी इस बल8ग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित कर सकु।

शुक्रिया।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
08/08/2019 at 9:35 pm

दर्द ए जिंदगी।

दर्द जिंदगी का जब हर हद को पार कर जाएगा, ये दीवाना गीत मोहब्बत के तब भी गुनगुनाएगा।

भुला कर हर बेरुखिया ए मोहब्बत जो सितम उनका, हर दर्द ए जिंदगी ये दीवाना सीने से अपने तब लगाएगा।।

मिटते हर निसान जिंदगी के जब सिमट कर मिट जाएंगे, बुझते हर चिरागों को रोशनी ये दीवाना कोई तब दे जाएगा।

हर आरज़ू एक ख़्वाब जिंदगी का जिंदगी से जब रूठ जाएगा, कदम खामोशियों से ये दीवाना ख़ामोशी से ख़ामोश तब हो जाएगा।।

वो जो मसीहा समझते है खुद को सितमगर मुकदर का हमारे, वक़्त एक रोज़ आईना ए हक़ीक़त उन्हें नज़दीक से दिखाएगा।

कत्ल ए एहसासों का करते है बेक़दरी से जो सरेराह वो हमारे, वक़्त लेगा इंतकाम एक रोज ख़ुद उनसे, हर गुनाह उनका उनके जब सामने आजाएगा।।

मुर्दा एहसासों से जिनकी रूह हो गई है मुर्दा, ख़ामोश एहसासों से जिनके पत्थर से एहसास।

दर्द जिंदगी का कर देगा जिंदा उनको हमारा, चीख पड़ेंगे खामोश पत्थर से उनके हर एहसास।।

विक्रांत राजलीवालPhoto_1564922896758 द्वारा लिखित।
04/08/2019 at 6:30 pm