🌹 एक इंतज़ार…मोहब्ब्त। (दर्दभरी मोहब्ब्त की एक दास्ताँ।) #FacebookLive video.

आज रात्रि अपने फेसबुक पृष्ठ Voice Of Vikrant Rajliwal पर Live आ कर के अपनी एक दर्दभरी मोहब्ब्त की दास्ताँ *एक इंतज़ार… मोहब्ब्त। को प्रस्तुत किया।

लिंक नीचे अंकित कर रहा हु। जिससे आप भी मेरी फेसबुक live वीडियो का आनन्द प्राप्त कर सके।

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1522177451271047&id=204032090116708?sfnsn=wiwspmo&extid=KHgMOzjrkobZJ8sV&d=n&vh=e

धन्यवाद।

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🌹 शायरी। (विक्रांत राजलीवाल की कलम से।)

💔 ना जिन्हें दिन को है सकूँ साँसों में; ना रातों को है आराम।

हम है वो जो रहते है हर लम्हा लेकर धधकती धड़कनों में सुलगता एक  अंगार।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

🌹 टूटा गुलाब, बिखुड़ी जो पंखुड़ियां; हर जख्म महोब्बत के नासूर हो गए।
याद में एक सितमगर कि ए दोस्त; हम जीते जी ही जो फ़ना हो गए।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

💗
हम तुम्हें ना पा सकें और तुम हर बार हमारे मासूम एहसासों का कत्ल करते गए।

नही एतबार अब हमें ख़ुद के एहसासों पर शायद, फक्त यकीं एहसासों पर तुम्हारे हम जो करते गए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

🌹  दर्द ए दिल की अपने कोई दवा अभी तक जो मुझे मिली नही।

हर जख्म फट गए मेरे बेअसर हर मरहम को कर के खुद ही।।

टूट कर मासूम एहसास हर लम्हा मेरे जो मरते गए; हर लम्हा ही हम टूटे एहसासों से जो टूटते गए।

सितम ज़िंदगी के हंसते हुए हम सहते गए; हर सितम से जिंदगी के सबक कोई नया जो सीखते गए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

19 जनवरी रविवार। समय दोपहर 2:52 बजे

🌹 फूल, पते, ग़ुलाब की पंखुड़ियां सब के सब खिल कर मुरझा गए; सब मौसम, आ कर गुजर गए, एक तुम ना आए, आ आ कर अश्क़ आँखों मे हमारी सुख गए।

बादल, वर्षा, वो बहता पानी, याद किसी की दिला गया; धड़कती धड़कन, वो बहता झरना, नाम बंद जुबां पर किसी का जो याद आ गया।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

🌹 मोहब्ब्त करना हर एक हसीन गुलाब से, काटो को चूम कर सीने से लगाना।

प्रेम पुजारी की प्रेम प्रतिज्ञा, हर हसीना को दिल मे बसाना, नैन लड़ाना गाना गाना।।

हर तीर मोहब्ब्त के दिल चिर ना दे, परीक्षा प्रेमी के प्रेम की, धड़कने तुम्हारी ना रोक दे।

दर्द जिंदगी के देख कर तुम मुड़ ना जाना, खड़ा है राह में प्रेम पुजारी हमे देख कर पलट ना जाना।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
28 जनवरी दोपहर 2:35 बजे on my writing blog site.

Book My Poetry show.

🎻 एक दर्द। (दर्दभरी नज़म) *पुनः प्रकाशित*

नही आती है नींद दीवाने को क्यों आज-कल।

विक्रांत राजलीवाल।

भूल गया है रंगीन हर ख़्वाब वो क्यों आज-कल।।

हो गया है खुद से ही बेगाना वो क्यों आज-कल।

रह गया है तन्हा भरे संसार में वो क्यों आज-कल।।

लेता है रुसवा बेदर्द रातो में नाम वो किसका आज-कल।

तड़पता है देख हाल ए दीवाना सा वो अपना आज-कल।।

ढूंढता है निसान ए महोबत, ए दर्द ए जुदाई इन काली श्याह रातो में वो किसके आज-कल।

पूछता है सवाल ए महोबत, मांगता है जवाब ए हक़ीक़त, आईने से टूटे वो किसके आज-कल।।

क्यों है इंतज़ार अब भी उसे, दर्द यह अवमस्या की रात,  ख्वाहिश है एक आखरी दीदार ए पूनम का वो एक चाँद।

क्यों है टूटती हर उम्मीद, अब भी उसे एक आरज़ू आखरी, यक़ीन है एक दर्द महोबत, अहसास ए धड़कन, उसकी हर एक बात।। विक्रांत राजलीवाल द्वरा लिखित।

Rachnakar Vikrant Rajliwal “Creation’s”

Source of publication
(Republish vikrantrajliwal.com)

नमस्कार मित्रों, आज से चार वर्ष पूर्व अपनी जिस अधूरी कहानी एक अत्यधिक दिलचसब नाटक के एहसासों को लिखने का प्रयास किया था! अब अपने अंतिम चरण; यानी कि लगभग अपनी 50% फाइनल एडिटिंग का कार्य सम्पन्न कर चुका हूं।

शीघ्र ही मेरी वह प्रथम अत्यधिक विस्तृत दर्दभरी कहानी एक पुस्तक के रूप में आपके विश्वसनीय हाथों के सपुर्द्ध कर दी जाएगी।

विक्रांत राजलीवाल।

Hello friends, four years ago, I had tried to write my first incomplete story of this very interesting drama. Now its last stage; That is, almost 50% of final editing has been completed.

Soon my first very detailed story , very sensitive drama will be made in the form of a book with your trusted hands.

Vikrant Rajliwal.

work on my upcoming novel+drana story

👥 एहसास ए पत्थर। With YouTube Link Video.

आज कल हम पत्थरों में रहते है, उजड़ा जो गुलिस्तां हमारा तो अब हम पथरो में रहते है।

करते है मुलाकाते पथरो से अक्सर, खो गया जो जलसा हमारा तो अब हम मुलाकाते पथरो से करते है।।

उम्मीद है शायद ये पत्थर कभी तो धड़केंगे, अहसास ए महोबत के अहसासों से शायद वह भी कभी तो तड़पेंगे।

दिल जो अब पत्थर हो गए, अहसास न जाने कहा खो गए, ये ख़ामोशीया है सितम उनका, हर सितम से अपने कभी तो ये पत्थर पिंघलेंगे।।

खड़ा है अब भी राह ए उम्मीदी से दीवाना, तलाश ए दरार दिख जाएगी दरार जब कोई, वॉर ए महोबत से कर देगा चूर चूर हर अहसास ए पथर को ये दीवाना।

हर दिल है ये जो पत्थर, निशां ए बेबसी से जो जख्मी, जख्म ए दिल हर अहसासों पर मरहम अपने, लगा जाएगा जल्द ही कोई ये दीवाना।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

17/03/2018 at 07:34 am
(Republish)

पुनः प्रकाशित 11 फरवरी रात्रि 12:21 बजे।

YouTube Link is mentioned in below.

एहसास ए पत्थर।

👸 पहली नज़र। (दर्दभरी नज़म दास्ताँ।) With YouTube Video Link.

🌹 पहली नज़र।

दिखलाती है ज़िन्दगी, हर कदम पर, करीब से अपना रंग।

बतलाती है खून ए ज़िगर कि वो अधूरी दास्ताँ, हर रंग से अपने।।

दे देती है, दर्द कोई बिछुड़ा फिर से, आता है बदल कर रूप सामने, फिर से वो दर्द।।।

दहलीज है बिछुड़ती जवानी की, आगाज है बेदर्द बुढ़ापे का।

समा है ऐतबार से, महफ़िल है फिर से आबाद, जो एक दीवाने की।।

हो गया एक रोज़, दीदार ए यार, धड़कने ये खो गई।

लौट आईं मोहब्ब्त दिल में खोई आरज़ू कोई जाग गई।।

किया है मज़ाक, ज़िन्दगी ने, ज़िन्दगी में दिन ये कौन सा आया।

दहलीज़ है बुढ़ापे की, बिछुड़े यार से, ये सितम, जिस पर मिलाया।।

एक रोज, एक दम से दीदार ये किस का हुआ।

देखते ही जान गया ये दिल, हा इसी से तो प्यार हुआ।।

एक ज़माने के बाद, ये किस ने नज़रो से नज़रो को मिलाया।

करीब दिल के आकर मेरे, ठहरी ज़िन्दगी से बेजान दिल को धड़काया।।

सितम इस दिल पर हो रहा, तोड़ कर बिजलिया, धड़कनो पर, बेदर्द सावन भी रो रहा।।।

इंतेहा दर्द ए दिल, मोहब्ब्त जो अब हो गई, ज़माने की है
रुसवाई।

बरस रहे आँख से आँसू, बात है दिल कि दिल को जो दिल ने बतलाई।।

आई है बन कर, सावन की बहार, बे-मौसम ज़िन्दगी मेरी जो बंजर बियाबान।

मुस्कुराहट है लबो पर गुलाबी उसके, जाग गए देख कर,
करीब से दिल के सब अरमान।।

दर्द है जुदाई का, जख़्म उसके भी जख्मी सिने में।

कहना चाहती है वो भी कुछ, सुनना चाहता हु में भी कुछ।।

कर रहे दीदार दोनों, बिछुड़े जो एक ज़माने से।

सदियों से खमोश लब, बेड़िया अब भी ज़माने से।।

लकीर है मिटने लगी, वक़्त की यू ही आज जो अचानक से।

याद है उल्फ़त के अब भी वो दिन, बढ़ने लगी धड़कने ज़िन्दगी की जब अचानक से।।

बदला-मौसम, समा बदला, बदल गए सब नज़ारे।

आ जाती है याद ज़िन्दगी, तमाम अधूरी वो बहारे।।

नादां उम्र से नादां धड़कने, नादां थे वो अफ़साने।

हो गए ज़माने से जो, नादां थे वो फ़साने।।

याद है…

याद है अब भी, सावन कि वो बात।

नीरस थी जब ज़िन्दगी, पूरे चाँद की वो रात।।

बेजान मौसम में, एक रोज जान आ गई।

सुन-सान गली महोले कि धड़कने जाग गई।।

तन्हा थे लम्हे, अजीब से जो खामोश, उनसे जो एक अहसास हुआ।

देख कर खुशनुमा मौसम, फिर मुझ को जो विशवास हुआ।।

चारो ओर एक खामोशी सी छा गई।

माहौलें (पड़ोस) में मेरे रहने को एक हूर आ गई।।

एक इत्तफाक किसमत ने मेरे साथ किया।

घर के सामने मेरे, उसने एक घर लिया।।

देख कर उस को, ये दिल धड़क गया।

जाने को करीब उसके, ये मन मचल गया।।

देख कर नज़ारा ए हुस्न, मौसम भी मदहोश हो गया।

हर अदा थी कातिल उसकी, दिल ए दीवाना कही खो गया।।

गिरती थी हुस्न ए शबाब से उसके बेबस इस दिल पर बिजलिया तब।

चलती थी इठला कर जब, भूल जाता था ये दिल भी धड़कना तब।।

कतार घर के सामने, मनचलो की उस के लगने लगी।

करने को दिदार ए हुस्न, जंग उन-में कोई खूनी मचने लगी।।

देख कर नज़ारा, ये बर्बादी का अपनी, मन मेरा कूछ परेशान हुआ।

करता हूं मोहब्ब्त मैं भी उस-से, जान कर हाल ए दिल ये दिल हैरान हुआ।।

करता हूँ दिदार ए हुस्न, नज़रे बचा कर खिड़की से रोज़ अपनी।

जीता हूँ, मरता हूँ, तन्हा, घुट-घुट कर किसमत से रोज़ अपनी।।

नही आती है नींद बेदर्द रातो से दर्द ये आज-कल।

सताती है याद ए दिलरुबा, सितम ये हर-पल।।

दीवाना ए हुस्न ये जहां सारा लगता है उसका।

हर कोई है जलने को आतुर, परवाना ए हुस्न ये जहां सारा लगता है उसका।।

सुर्ख गुलाबी लबो पर निकलती है लगा कर लाली वो जब।

लग जाती है दीवाने उन मनचलो में उसके कोई होड़ तब।।

एक शोर सा मच जाता है भरे बाजार में तब।

छुरिया चल जाती है कत्ल हो जाता है भरे बाजार में तब।।

देख कर नज़ारा ए हुस्न वो मदमस्त उसका, वख्त भी ठहर जाता है।

एक दिदार ए सनम के खातिर, हर कोई इस जहां में मचल जाता है।।

देख लेती है, उठा कर जब भी, मदहोश निगाहें वो अपनी, बेबस है दिल ए दीवाना धड़क से धड़क जो जाता है।

मोहब्ब्त जताने को सनम से अपने ए पाबंदियों वो बेहिंतिया तड़प जाता है।।

न जाने क्यों एक रोज मोहब्ब्त ने रंग अपना दिखलाया।

हुस्न को है इश्क से काम, नाम ए मोहब्ब्त जो दीवाने को बुलाया।।

देख कर नज़दीक से बदन वो क़ातिलाना-हुस्न उसका,
बुरा हाल था।

शराबी निगाहों से वॉर, वो मनमोहक उसके शारीरिक उभार, जीना अब मेरा दुशवार था।।

धधक रहे थे अंगार नाजुक वो गुलाबी लब उसके।

झुलस रहा था दीवाना, तपिश जो गुलाबी-लबो से हर लम्हा उसके।।

एक रोज नज़रे-चार, अनजाने ही, जो उनसे हो गई।

कर के नज़दीक से दिदार ए हुस्न, धड़कने ए दिवाना जो खो गई।।

वो आए करीब, इस दिल के, वो एक नशा था।

देखा नशीली निगाहों से उसने, उनमे एक नशा था।।

कर रही थी दिदार ए यार जो नज़रे नज़दीक से।

उठा था दर्द ए धड़कन, देखा जो उनको नज़दीक से।।

अक्सर होती है, मुलाकाते उनसे, मुस्कुरा कर आता है हुस्न ए यार वो करीब।

जगा कर आरज़ू, खोई कोई तमन्ना, खो जाता है कसम, फिर वो नसीब।।

अरमान दिल के अब जाग गए, एक ही पल में दीवाना जो जहां सारा पा गए।

खिल उठे महोबत के गुल, गुलिस्तां ए मोहब्ब्त जो रेगिस्तान से दिवाना पा गए।।

मुस्कुराता है देख कर, हर अदा से अल्हड़ वो हुस्न जब।

करता है वॉर, जख़्मी अरमान, बेबस इस दिल पर जब।।

भूल जाता है धड़कना, ठहर जाती है धड़कने ए दिल वही पर जब।

बेजान सी है जो धड़कने, धड़कना चाहती है वो जब।।

लव है खामोश से एक थरकन सी जो उनमे आई, चाहते है कुछ कहना शायद हम दोनों ही जब।

आलम है बेबसी भरा अहसास ए दिल, खामोशी जो साथ अपने लिए, रह जाते है खमोश से हम दोनों ही जब।।

आती है दिल-रुबा वो, होते है दीदार ए यार, बरसते है तीर ए हुस्न, शराबी निगाहों से अब अक्सर।

धड़कता-दिल, धड़काते है हुस्न ए यार, और भी खामोशी से बेदर्दी अब अक्सर।।

होता है इज़हार ए मोहब्ब्त नज़रो से जो दीवाना, वक़्त बे वक़्त जो उनसे सितम अब अक्सर।

करते है गुफ्त-गु, साए में नज़दीक से मोहब्ब्त, एहसास जो उनके अब अक्सर।।

आलम ए बेबसी, वो इज़हार ए मोहब्ब्त, तरसता है सुनने को दीवाना जो अक्सर।

यकीन ए मोहब्ब्त वो ख़्याल ए तन्हाई, सिहर जाता है ख़ौफ़ से दीवाना जो अक्सर।।

दीदार ए यार ये समा ए ऐतबार मिलता है तन्हाई में नसीब से अब अक्सर।

तीर ए मोहब्ब्त ये जख्म ए दिल, लगते है रुसवाई से सरेराह, अब अक्सर।।

नही मालूम है गहराई, सितमगर ए सनम, काफ़िर उस हसीना के दिल ओ धड़कनो की क्या है दीवाना।

धड़कते-दिल तड़पती धड़कनो को सकूँ एक लम्हा भी वो लेने नही देती, दर्द ए दिल ये दर्द है धड़कनों पर दीवाना ।।

जो है मोहब्ब्त दीवाने से उस को, नाम ए मोहब्ब्त बन्द लबो से ग़ुलाबी वो अपने क्यों बोल नही देती।

जख़्म है दिल के हर जख्मो पर वो मरहम, मोहब्ब्त से अपने, धड़कनो को दिल के सकूँ क्यों नही देती।।

महक जाता है समा, बदलता है रंग, शर्म ओ हया से चेहरे का जो उसके गुलाबी।

पुकारता है दर्द ए दिल, नाम ए मोहब्ब्त वो नाम उसका, देखा जब भी मदहोश निगाहों में जो उसकी शराबी।।

धड़कती जवां धड़कने, उफान एक उनमे आ गया।

यकीन ए दीवाना, सनम के अब वो करीब आ गया।।

किया मज़ाक, ए वख्त जो हाल ए दिल, एक रोज़, धड़कनो से सनम को जब सुनाया।

समझा सनम ने दिल-लगी, ए मुकदर दिल-चिर दीवाने ने
फिर अपना दिखलाया।।

बदला रूप फिज़ाओ ने हालात जो खिलाफ हो गए।

पहले झुके पहलो में वो, फिर लिप्ट के रो दिए।।

किया इजहार ए दोस्ती, मोहब्ब्त का उसमे कोई नाम नही।

मोहब्ब्त तो है ए दोस्त मग़र, मक्कारी कोई उनमे नही।।

बन कर दोस्त, आती है दिलरुबा, जब भी कोई नज़दीक,
नज़रो के सामने।

एक आरज़ू,वो लव्ज़ ए महोबत दब जाते है दिखती है जब भी वो नज़रो के सामने।।

रहता है इंतज़ार, एक एहसास वो पल है मोहब्ब्त, जिस पल उसे भी हो जायगी।

तड़पेगा-दिल एक रोज़ ए मोहब्ब्त उस सितमगर का, जिस पल मोहब्ब्त उसे भी दीवाने से अपने हो जायगी।।

इंतज़ार ए हुस्न से हुस्न ए दीवाने कई मनचलों का हाल बेहाल होते देखा।

दीदार ए हुस्न से बांधे टक-टकी, नज़रो में अपनी, अंजाम कइयो का बुरा देखा।।

चीर दी है सरे-राह कइयों ने फड़कती नसें, शरीर की अपने, हुस्न ए शबाब के वास्ते।

फोड़ दिए है सरे-राह, कइयो ने बेमतलब सर अपने, आपसी तकरार के वास्ते।।

हाल ए दिल दीवाने का भी, बेहाल नज़र आता है।

देख कर दीवाने ए सनम, मनचले वो चौखट पर उसकी दिल तड़प जाता है।।

मौसम है वीरान बिन दीदार ए सनम, ये कैसी वीरानी।

हालात है खिलाफ, ये दर्द ए मोहब्ब्त ये कैसी ज़िन्दगानी।।

ज़िन्दगी है उजाड़ मेरी किस तन्हाई में खो गई जो।

सनम है सितमगर मेरे, क्या किसी गैर की हो गई वो।।

जख्म ये गहरा, टूटे दिल पर, एक रोज, बेहूदा कैसा पड़ गया।

देखा जो सनम को अपने, न जाने क्यों ये दिल तड़प गया।।

आ रहे थे सनम कहि से शायद कहि पर वो जा रहे थे।

आईना ए महोबत, वो अक्स नज़रो में, किसी गैर का, मोहब्ब्त एक दूसरे से दोनों फरमा रहे थे।।

गुजर गए न जाने मौसम कितने, कितने ज़माने बीत गए।

तड़प ए दिल, तन्हाइयों से दीवाना, जख्म न जाने टूटे दिल
पर कितने पड़ गए।।

तड़प टूटे-दिल की टूटी धड़कनो से जो अब बर्दाश नही होती।

सताता है ख़्याल ए सनम, बिन सनम दर्द ये ज़िन्दगी, आवाज़ दिल के वीराने से कोई अब नही होती।।

बदमिजाज जो मौसम, एक रोज सरेराह हो गया।

अहसास ए ज़माना, हर कोई यहाँ खो गया।।

वक़्त की लकीर पर एक हादसा जो अब हो गया।

आशिक एक दीवाना जो सनम का, सनम को कहि ले गया।।

तन्हा छोड़ दीवाने को जो तन्हाई में, उड़ गए पंछी महोबत के न जाने कहाँ वो।

आई न याद दीवाने की जो अपने, तन्हा मार गए जो एक दीवाने को बेदर्दी वो।।

करी है महरबानी जो बेबस अपने एक दीवाने पर, खून ए ज़िगर, छोड़ दिया, चौखट पर मेरी तन्हा एक पैगाम।

पड़ा है जख्मी, तन्हा सा वही चोखट पर मेरी, तन्हा सनम का जो आखरी वो एक पैगाम।।

लिपटा है एक गुलाब उस से, काँटे हज़ारो रुसवाई के कई, चुम रहा है बेबसी से धूल चोखट की मेरी, तन्हा सनम का वो एक पैगाम।

टूटे-दिल की टूटी धड़कने, भूल गए जो अपना नाम, ठहर गयीं उखड़ती हर सांस, जाम है रगों का जो बहता उफ़ान।।

काँपते हाथ, थरथराती जुबां, मासूम थे वो अरमान।

पढ़ रहे महबूब का जो अपने, आखरी था वो फरमान।।

चिर दिया इश्क़ ने दिल अपना जो निकाल, नम आँखों से पढ़ कर तन्हा सनम का वो तन्हा एक पैगाम।

हर लव्ज़, वो हर अक्षर थे उसके, सुना रहे हाल ए दिल, दर्द सनम का जो एक दास्ताँ।।

नम आंखों से लिखी है उन्होंने जो इल्तिज़ा एक आख़री।

दर्द ए दिल कर रहे है दर्द बयां, अश्को के उस पर, निसान वो आखरी।।

टूटा जो दिल टूट कर बिखर गए सब अरमान, टूटे इस दिल के जितने थे जो आखरी।

झलक रहा, दर्द ए दिल, दर्द हर लव्ज़ वो अक्षर थे उसके जो आखरी।।

लिखा था खून ए श्याही से दर्द ए दिल वो नम आंखों से उसने दिल का जो अपने हाल।

पढ़ रहा है, दीवाना उसका, ए दिल धड़कनो को अब जरा तू अपने ले सम्भाल।।

हो गए जो दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न अब मुझ को तुम याद।।

जा रही हूं छोड़ कर, चौखट पर तुम्हारी तन्हा एक पैगाम।

पढ़ लेना तुम उस को, लिपटा हो जिस से टूटा एक गुलाब।।

याद न करना कभी, समझना कोई ख़्वाब।

टूटेगी नींद जब तुम्हारी, टूट जाएगा यह ख़्वाब।।

अलविदा ए यार, आखरी, रखना अपना ख़्याल।

दिख जाएगा जल्द ही ज़माने में, तुम को भी हसीन कोई ख़्वाब।।

करे मोहब्ब्त दिल से जो, देना तुम उसका साथ।

भूल जाना मुझ को तुम, दे देना उस को यह गुलाब।।

जा रही हुं, अब दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न अब मुझ को तुम याद।।

तड़प गया दिल, बिखर गई, टूट कर हर सांस।

पढ़ कर महबूब का अपने, आखरी वो फरमान।।

टूटा जो दिल एक दीवाने का, उठती है दिल से एक फ़रियाद।

खड़ा है राह ए सनम, अब भी दीवाना, करता है हर लम्हा जो सनम को याद।।

दिल में है मोहब्ब्त उसकी, हर धड़कन में है उसका एक इंतज़ार।

रुकी है ज़िन्दगी, ठहर गयी हर सांस, हर सांस में अब भी है कायम उसका एक एहसास।।

तड़पता दिल, टूटी धड़कने, ले रही है, दीवाना ए सनम से एहसास ए मोहब्ब्त का जो इम्तेहां ।

आरज़ू एक मोहब्ब्त, बेताब है हर सांस, दे-देगा दीवाना, अब भी ए मोहब्ब्त, मोहब्ब्त का हर इम्तेहां।।

जला देगा, सितम ए इश्क, मिटा देगा ए मोहब्ब्त खुद को अब ये दीवाना।

धड़कता दिल, बन्द सीने से जो हुस्न ए यार का अब भी है सनम का अपने वो दीवाना।।

दास्तान ए मोहब्ब्त जख्मी ये दिल जो सरेराह हो गया।

हुआ जो दीदार ए सनम दीवाना ए सनम फिर से कहि जो खो गया।।

तड़प ए दिल, बेबस है बेहिंतिया जो एक दीवाना, अंजाम ए मोहब्ब्त जो अंजाम ए दीवाना दिखता नही।

राह ए सनम, एक रोग है मोहब्ब्त, जो एक आशिकाना, दर्द ए दिल क्यों दर्द ए दीवाना अब मिटता नही।।

दम तोड़ती ये मोहब्ब्त, सुनाती है हर धड़कन से अब भी मोहब्ब्त का मोहब्ब्त से फिर वही तराना।

एहसास ए जुदाई साथ ये दीदार ए सनम, खिले एक अरसे से गुल तो खो गया कहि वीराना।।

धड़कता है दिल, तो धड़कनो से एक आवाज़ होती है।

हर धड़कन नाम ए महबूब दीवाने के साथ होती है।।

इंतज़ार है एक धड़कन, वो राह है सुनी, खड़ा एक ज़माने से जहाँ जो सनम-दीवाना।

आरज़ू है एक अधूरी, थामे है हाथो में अपने अब भी जो गुलाब वो वर्षो पुराना।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
(Republish)

पुनः प्रकाशित।

YouTube Link Is Mentioned in below.

पहली नज़र। ( दर्दभरी नज़म दास्ताँ।)

🍂 दर्द ए जुदाई गाना। (with YouTube Live Performance video)

मेरा प्रथम गीत; दृश्य इस प्रकार से है कि एक प्रेमी युगल बिछुड़ रहा है या बुछुड़ जाते है और वह प्रेमी युगल एक दर्द भरी पुकार से तड़पते हुए करहा उठते है। (पुनः प्रकाशित)

रुक रुक रुक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

महोबत को तेरी भुला न सकेंगे।

न जिंदा रहे सकेंगे न हम मर सकेंगे।।

दर्द ए दिल तुझ से दुआ हम करेंगे।

आईने में दिल के तुझ को देखा करेंगे।।

रुक रुक रुक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

आ आ आ आ आ ए दिल-रुबा।

न जा जा जा जा जा तू है कहा।।

यादो को तेरी मिटा न सकेंगे।

न मिल हम सके तो हर लम्हा रोआ करेंगे।।

दर्द ए जुदाई दूर तुझ से तन्हा तड़पा करेंगे।

ज़ख्मो को दिल के हम कुरेदा करेंगे।।

रुक रुक रूक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

ज़ख्मो को दिल के सी न हम सकेंगे।

न दवा हम करेंगे न उनको भर सकेंगे।।

फिज़ाओ में सुनी, तन्हाइयो में अक्सर।

यादो में अपनी, दुआओ में अक्सर।।

तड़प ए दिल दिल कि गहराइयो में फिर भी, मिला हम करेंगे…ए प्रिया।

जागती आखो से अपने, अधूरे ख्वाबो में फिर भी, तुझ को पूजा करेंगे…ए प्रिया।

रुक रुक रुक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish at vikrantrajliwal.com)

YouTube Live Video link is mentioned in below.

एहसास। (ग़ज़ल)

हम लिखते है, हम गाते है, हम गीत खुशियों के गुनगुनाते है।

साथ पल दो पल का नही, ये एहसास ह्रदय से खनखनाते है।।

मौसमो की बारिश नही, ये अश्क़, यादों की एक निशानी है।

हर पल एहसासो को अपने संजोए, हर दर्द, हर दास्ताँ, मोहब्ब्त की एक कहानी है।।

आज फिर से तेरी याद आ गई सितमगर, गुजरे महखाने की गली से होकर जब हम।

गर गुनाह है तेरी याद में मह को पीना, तो ये गुनाह करते हुए मह को पीते जाएंगे अब हम।।

बोतल शराब की एक साथी रह गई बाकी, जो साथी थे हमारे वो साथ छोड़ गए सब के सब।

हर घुट से शराब की जिंदा होते गए हम, जिंदा थी जो सांसे हर घुट से शराब की उन्हें मारते गए हम।।

दर्द और दवा का असर, हमे मालूम नही, हर दवा को ज़हर और हर ज़हर को जिंदगी में शराब से घोलते गए हम।

आज वक़्त पूछता है पता, खुद हमसे हमारा, हम उसको बतलाए तो बतलाए क्या, दो घुट भी शराब की जो पीए नही अभी हम।।

ज़ख्म जिंदगी के हज़ार मिले, हर ज़ख्म एक निशान हक़ीक़त का लगा, हर निशान पर देकर एक निशान नया, हर ज़ख्म को ज़ख्म से अपने मिटाते गए हम।।।

फ़क़त हर ज़ख्म एहसासों का, आज भी ताज़ा है हमारा, हर एहसास करता है बयां, दर्द एहसासो का हमारा, हर दर्द से झलकता है एक एहसास अधूरा हमारा।

एहसास जो अधूरे रह गए, वक़्त की बिसात पर कहि जो खो गए, ढूंढता है आज भी उन एहसासों को, एहसासों में अपने कहि, एहसास अधूरा हमारा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
13/10/2019 at 3:31 pm

Published on vikrantrajliwal.com

(पुनः प्रकाशित। 7/02/2020 सांझ 4:37 बजे।)

एक लेखक, कवि, शायर, नाटककार, व्यंग्यकार, उपन्यासकार, कहानीकार, गीतकार, ग़ज़लकार एवं ब्लॉगर।

दर्द ए जिंदगी। (पुनः प्रकाशित)

जब खाई शिखस्त हमनें, अपनो के हाथों ही खाई, नही पाए पहचान जो हाथ वो खंजर उतारा दिल मे बेदर्दी से जो गया।

हो कर बेपरवाह ज़िन्दगी से, सलूख ज़िन्दगी के हम सीखते रहे, जान हर सलूख जिंदगी के, जान जिंदगी की निकलती रही।।

दर्द हर हक़ीक़त का करते रहे जान कर भी नज़रंदाज़ हम जिनकी, सितम ये के एतबार बेवफ़ाई पर उनकी हम जो करते रहे।

धूल थी चश्मे पर फ़रेब कि उनके हमारे और हम थे नादां इस कदर की बिन बात ही आँखों को अपनी जो मलते रहे।।

हर आह को टूटी सांसो से अपने दबाए, हर ख़ुशी से हो कर अंजान, बेरूखिया जमाने की हम जो झेलते रहे।

हर अंजाम बरबादियों का लगा कर सीने से अपने, बर्बाद खामोशियों से अक्सर हम जो होते रहे।।

हर दर्द ए ज़िन्दगी को जान कर अपना, अश्क़ बहाती है आँखे, अश्क़ अक्सर नम आँखों से अपने हम जो छुपाते रहे।

बहे गए अश्क़ सरेराह फ़िर भी कई, जिन अश्को को नम आँखों मे अपनी, हम कभी जो छुपा ना सके।।

टूटे दिल की उखड़ती सांसे और दर्द तड़पती धड़कनो का वो अपने, बंद जुबां से हर दर्द को खामोशी से अक्सर हम जो दबाते रहे।

हर दर्द ए ज़िंदगी हर दर्द ए दवा को हमारे बेअसर करते रहे, और हर दर्द से एक दास्ताँ ज़िन्दगी की अपनी हम जो लिखते रहे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
28/05/2019 at5:20 pm

(पुनः प्रकाशित)

विक्रांत राजलीवाल जी के कलम से।

शराबों। (पुनः प्रकाशित)

ना वो प्याला रहा सलामत, ना वो दौर ए दस्तूर ही रह पाया कायम, बदलते समय से बदल गए हर यार यहाँ।

यारो में यार मेरा यार शराबों… विक्रांत राजलीवाल।

देखें इस दुनियां में यार बहुत, ढूंढे ना ढूंढ़ पाए फिर भी यार शराबों सा हम यार यहाँ।।

हर घुट से उतरता ज़हर, घुट घुट से चढ़ता ज़हर, तासीर है तिलस्मी, जिसका हर तिलस्म लाजवाब।

महक से चढ़ती मदहोशी, कोई ख़ुमारी सी सवार, स्वाद से है जिंदा जिसके मरते हर ख़्वाब।।

हर लम्हा एक सरूर, सरूर से कायम एक ख़ुमारी, हर ख़ुमारी बुलाती है करीब अपने, यारों में यार मेरा यार शराबों।

सरूर से मह के कायम है सरूर हर लम्हा जो महोबत, हर लम्हा पहुचाता है सकूँ तड़पती चाहतो को मेरे, मेरा यार शराबों।।

कभी टूटते तो कभी जुड़ते टार टूटे दिल के मेरे, हर बार जोड़ जाता है टूटे दिल के तार मेरे, मेरा यार शराबों।

उजाड़ गुलिस्तां, बंजर ख़्वाब, ज़िंदगी भी है मेरी बेज़ार, खिलते गुल, महकते ख़्वाब, बदल देता है जिंदगी हर घुट से अपनी मेरा यार शराबों।।

आबाद है वीराना ज़िन्दगी का जिससे, हर एहसास है जिससे मेरे रूहानी, रंगीन है कण कण जिसका हर बून्द एक पानी।

यारो में यार मेरा यार शराबों, रंगीन ख्वाबों का एक ख्वाब मेरा यार शराबों, टूटे एहसासों से मुर्दा ख्वाहिशों की जिंदा एक जिंदगानी।

हा बोतल में बंद है मेरा यार शराबों, तड़पता है एक मुलाक़ात को हर लम्हा, हर लम्हा करता है इंतज़ार शिदत से मेरा, मेरा यार शराबों।

हा कहते है मुझे शराबी, तलब है हर लम्हा ही मुझे शराब की, शराब से ही जिंदा है मेरी धड़कती ये जो जिंदगानी,

लिख दिया हर धड़कती धड़कनो पर नाम यारो का अपने, यारो में यार मेरा यार शराबों, यारो में यार मेरा यार शराबों…यार शराबों।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

प्रथम प्रकाशित समय 15/03/2019 at 12:35pm

(पुनः प्रकाशित 4/03/2020 समय प्रातः 10:45 बजे।