Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतन्त्र लेखन-

Poetry, Kavya, Shayari, Sings, Satire, drama & Articles Written by Vikrant Rajliwal

May 10, 2019
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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🕯️ ख़ामोशीया

रुकती सांसो से रुक सी जाए जब धड़कने, हर धड़कन पर पहरा कोई, शिकंजा शिकारी सा कसने जब लगे। ख़ामोश हर लव्ज़ बंद जुबां से बोलने जब लगे,दबे एहसास भी झिलमिलाती नज़रो से झलकने जब लगे।। हर आरज़ू एक फ़रियाद ख़ुद ही बनने जब लगे, हर फ़रियाद से जान जिंदगी की निकलने जब लगे। हसीं […]

April 22, 2019
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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💥 जागरूक नागरिक कर आंकलन राजनेताओं का प्रकाश सत्य से…🇮🇳

जागरूक नागरिक कर आंकलन राजनेताओं का प्रकाश सत्य से, तदुपरांत चित शांत से व्यवहार मत का बदल देगा तस्वीर बिगड़ी हर तकदीर। दृढ़ संकल्प विशवास स्वम का स्वम पर कर धारण, चल राह सत्य से, ज्ञान स्वम् का, निर्भयता से मुक्त निर्भरता, चुनाव ईमानदारी का ईमान से।। कर देगा दूर हर भर्ष्टाचार हर भृष्ट व्यवस्था, […]

क़िताब ए महोबत के पाक पन्नों पर दर्द, एक दीवाने का लहू जो अब बरस गया। जख़्मी दिल के ज़ख्मो से तमाम, तेज़ाब कोई जो सरेराह अब बरस गया।। याद आई बिछुड़े महबूब की जब जब अपने, बेदर्द यह ख़ूनी सावन भी तब तब गरजा बेहिंतिया और टूट कर बरस गया। देख कर तड़प एक […]

via 💌 एक इंतज़ार… महोबत। (दास्ताँ श्रुंखला के अंतर्गत प्रथम दास्ताँ) — Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation’s -स्वतंत्र लेखक-

April 9, 2019

March 24, 2019
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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🌹विक्रांत राजलीवाल एक परिचय।🙏

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नमस्कार प्रिय पाठको एव ह्रदय अज़ीज़ श्रुताओं, अक्सर कुछ व्यक्ति मुझ से संदेशक एव e mails के द्वारा मेरा परिचय पूछते है तो उन सभी महानुभवों समेत अपने समस्त चाहने वालो के लिए मैं पुनः अपना एक लघु परिचय यहाँ उपलब्ध करवा…

नमस्कार मित्रों, जल्द ही मैं आपका अपना रचनाकार एव कवि-शायर मित्र विक्रांत राजलीवाल अपनी आजतक की सबसे बहेत्रिन नज़्म दस्ताने। या इसे आप कुछ इस तरह से भी कह सकते है कि मेरे साधारण से जीवन की मेरी आजतक की नज़्म शायरियों में से यह दस्ताने मैने सबसे पहले लिखी थी। अन्य नज़्म शायरी मेने […]

via 🌹 दास्तां। (दर्दभरी महोबत की अति विस्तृत दस्ताने) — Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation’s -स्वतंत्र लेखक-

March 17, 2019

अब वो महफिले ना रही, अब वो हुनरबन्ध क़लमकार भी कहा दिखते है जमाने में। सुनते थे कभी जो बुज़ुर्गो से अपने कि लहू बहता था उन महफ़िलो में शायरी से शायरों के।। वो दौर, वो दस्तूर, वो ज़माना, जरूर रहे होंगे, बहता लहू भी जम जाता होगा हुस्न ओ इश्क़ के बाजारों में, वर्ना […]

via 💏 महोबतें — Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation’s -स्वतंत्र लेखक-

March 16, 2019