🌹 Book A Nazam Dastan’s And Poetry program By Vikrant Rajliwal.

कवि, शायर एवं उपन्यासकार श्री विक्रांत राजलीवाल।

Book A Nazam Dastans And Poetry program By Vikrant Rajliwal

श्री विक्रांत राजलीवाल के रोमानी स्वरों के साथ उनके द्वारा लिखित उनकी सैकड़ो नज़म, ग़ज़ल, काव्य, कविताएं एवं बहुत सी सदाबहार विस्तृत अत्यधिक दर्दभरी मोहब्ब्त की नज़म दास्तानो के साथ एक कामयाब कार्यक्रम करवाने के लिए, आप आज ही निम्लिखित मोबाईल नंबर पर सम्पर्क करें। व्हाट्सएप नंबर है 91+9354948135.

To get a Nazam, poetry Show with Vikrant Rajliwal’s romantic voice written by him with hundreds of nazams, ghazals, poems and detailed emotional love nazm dastans, you can contact the following mobile numbers and contacts today. Whatsapp no is 91+ 9354948135

🙏 आज ही जुड़िए आपकी अपनी ब्लॉग साइट https://vikrantrajliwal.com से।

विक्रांत राजलीवाल एक लघु परिचय।

अ) काव्य पुस्तक एहसास : अत्यधिक संवेदनशील काव्य पुस्तक एहसास, जिसका केंद्र बिंदु हम सब के असंवेदनशील होते जा रहे सभ्य समाज पर अपनी काव्य और कविताओं के द्वारा एक प्रहार की कोशिश मात्र है।

Sanyog (संयोग) प्रकाशन घर शहादरा द्वारा प्रकाशित एव ए वन मुद्रक द्वरा प्रिंटिड। प्रकाशन वर्ष जनवरी 2016. प्रकाशित मूल्य 250:00₹ मात्र।

आ) नज़म दास्ताने:: विक्रांत राजलीवाल जी के द्वारा लिखी एवं उनकी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित करि गई, अत्यधिक दर्दभरी विस्तृत नज़म दास्तानो का जल्द ही एक संग्रह पुस्तक के रूप में आप सभी प्रियजनों को एक भरी भेंट स्वरूप प्रदान कर दी जाएगी। उनकी दर्दभरी नज़म दस्तानों के नाम इस प्रकार से है। कि जैसे अ) एक इंतज़ार… मोहब्ब्त। आ) पहली नज़र। इ) बेगुनाह मोहब्ब्त। ई) एक दीवाना। उ) मासूम मोहब्ब्त। ऊ) सितमगर हसीना। ए) अक्सर सोचता हूं तन्हा अंधेरी रातो में। ऐ) एक खेल जिंदगी। ओ) धुंधलाता अक्स। इत्यादि। इनमें से कुछ की रिकॉर्डिड वीडियो लिंक इस प्रकार है। 1) एक इंतज़ार…मोहब्ब्त। https://youtu.be/aOBlMrmejqk 2) पहली नज़र। https://youtu.be/A_5bLVHS9yo 3) सितमगर हसीना। https://youtu.be/F8TKFt7G4Us 4) अक्सर सोचता हूं तन्हा अंधेरी रातो में कि… https://youtu.be/ElipaWVQOrw 5) धुंधलाता अक्स। https://youtu.be/_tKFIu1onQw 6) एक खेल जिंदगी। https://youtu.be/02TpemeSFsA इत्यादि।

आशा करता हु आपको पसन्द आए।

इ) नज़म, ग़ज़ल और शायरी:: वर्ष 2016-17 से अब तक विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित कई सैकड़ो दर्दभरी नज़म, ग़ज़ल एवं सैकड़ो शायरी। को उन्होंने अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर एवं कुछ को अन्य सोशल मीडिया के समूह में प्रकाशित किया है। जिनका एक संग्रह पुस्तक के रूप में आप सभी प्रियजनो को एक प्रेमभरी भेंट स्वररूप प्रदान कर दिया जाएगा। आशा करता हु आपको पसंद आए। विक्रांत राजलीवाल। उनकी बहुत से रिकॉर्डिड नज़म, ग़ज़ल एव गीतों को आप उनके YouToube चैनल Voice Of Vikrant Rajliwal पर कर उनकी रचनाओं को स्वयं उनकी आवाज़ के साथ देख और सुन कर लुफ्त प्राप्त कर सकते है। उनके चैनल का यूआरएल पता है। https://www.youtube.com/channel/UCs02SBNIYobdmY6Jeq0n73A आशा करता हु आपको पसंद आए।

ई) ह्रदय स्पर्शी काव्य कविताए:: जनवरी 2016 में अपनी प्रथम काव्य कविताओं की पुस्तक “एहसास” के संयोग प्रकाशन(sanyog publication) के द्वारा प्रकाशन के उपरांत। अक्टूबर 2016 से अब तक बहुत सी ह्रदय स्पर्शी काव्य एवं कविताओं की रचना करि तदोपरांत उन्हें अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित किया। उनमे से कुछ काव्य कविताओं की रिकॉर्डिड वीडियो आप उनके YouTube चैनल Voice Of Vikrant Rajliwal पर देख एवं सुन कर उनके काव्य-कविताओं का आनन्द प्राप्त कर सकते है। उनके चैनल का लिंक है। https://www.youtube.com/channel/UCs02SBNIYobdmY6Jeq0n73A आशा करता हु आपको पसंद आए।

उ)”मसखरे”:: “मसखरे” विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक अत्यधिकमनोरंजक व्यंग्यात्मक किस्सा है। जिसको उन्होंने कुछ समय पूर्व ही अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित किया है। व्यंग्यात्मक किस्से “मसखरे” की रिकॉर्डिड वीडियो लिंक इस प्रकार से है। https://youtu.be/LSGHIitR1Bg आशा करता हु आपको पसंद आए।

ऊ) भोंडा।:: वर्ष 2019 में 2 अक्टूबर की रात्रि 10:20 बजे, विक्रांत राजलीवाल जी ने अपनी एक विस्तृत अत्यधिक दिलचस्प एवं मनोरंजक कहानी ‘भोंडा।” (लघु उपन्यास) का अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशन किया है। जिसके शरुआती भूमिया के कुछ अंश इस प्रकार से है कि… नमस्कार प्रिय पाठकों, आज अपनी एक अत्यंत ही दिलचस्प और भावनात्मक प्रेम कहानी “भोंडा।” का आपकी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रथम प्रकाशन करते हुए, मुझ को अत्यधिक हर्ष एवं रोमांच की अनुभूति प्राप्त हो रही है। भोंडा केवल एक कहानी ही भी है बल्कि यह स्वयं के भीतर एक ऐसे भावनात्मक एहसासों को, संजोए हुए है जिसको लिखते समय मैं स्वयं अत्यधिक भावुक हो गया था। … [ 16,335 more words ]
https://vikrantrajliwal.com/2019/10/02/ आशा करता हु आपको पसंद आए।

ए) भोंडा। 2 Upcoming Soon:: विक्रांत राजलीवाल जी द्वारा लिखित उनका प्रथम लघु उपन्यास “भोंडा।” का 2 अक्टूबर 2019 रात्रि 10:20 बजे उनकी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशन के उपरांत, अब भोंडा। 2 का लेखन कार्य प्रारम्भ किया है। जब भी भोंडा। 2 का लेखन कार्य अपने अंजाम तक पहुच जाएगा, उसी क्षण भोंडा। 2 को आपकी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित कर दिया जाएगा। धन्यवाद।

क) आज वर्ष 2016-17 से वर्तमान वर्ष तक, अपनी कई सैकड़ो नज़म, ग़ज़ल, बहुत सी काव्य, कविताओं, गीत, कुछ व्यंग्य किस्से, सैकड़ो शेर, बहुत से सामाजिक, आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक विस्तृत एवं लघु लेखों को आपकी अपनी इस साइट पर लिखने एवं प्रकाशित करने के उपरांत!

ख) एवं सबसे महत्वपूर्ण अपनी बहुत सी विस्तृत एवं लघु नज़म दास्ताँ को लिखने के उपरांत!

ग) एवं 2/10/2019 की रात्रि अपनी विस्तृत (long term), अत्यधिक दिलचस्प एवं रोमांचक प्रेम कहानी “भोंडा।” को आपकी अपनी ब्लॉग साइट https://vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित करने के उपरांत!

घ) आज पुनः मेरे हाथों में मेरी वह अधूरी कहानी आ गई है जिसके 300+ A4 साइज के पृष्ठ (75% कहानी) वर्ष 2016 में लिखने के उपरांत मुझ को कुछ निजी कारणों से उसको रोक कर अपने लॉकर में रखना पड़ा था।

अब मेरा पुरजोर प्रयास रहेगा कि अब मैं अपनी उस अधूरी कहानी जो कि पूर्णतः अति संवेदनशील एवं रोमाचक संवादों सहित है को पूर्ण कर आपको एक ऐसी भेंट उपलब्ध करवा सकूँ। जिसको आप हमेशा अपने एहसासो में महसूस कर सके।

इसके लिए मुझ को आप सभी के आशीर्वाद की अति आवश्यकता रहेगी।

आशा करता हु आप मेरी भावनाओं को समझ सकें।

विक्रांत राजलीवाल।

अपना प्रेम एवं आशीर्वाद आपके अपने मित्र विक्रांत राजलीवाल की ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर यू ही बनाए रखें।

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Watch “नंगे भ्रष्टाचारी ( Poetry by Vikrant Rajliwal )” on YouTube ^read Poerty and Video link^

नंगे भ्रष्टाचारी काव्य कविता के जरिए श्री विक्रांत राजलीवाल ने उन भ्रष्टाचारी व्यक्तियों एव संगठनों पर एक प्रहार करने का प्रयत्न किया है जो आज भी हमारी मातृभूमि भारतवर्ष के उज्ज्वल इतिहास पर अपनी भ्रष्टाचारी प्रवर्ति के जरिए एक कलंक मलते हुए गरीब एवं ईमानदार व्यक्तियोँ का शोषण कर रहे है।

आशा करता हु आप सभी आदरणीयों तक मेरी यानी कि विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित इस महत्वपूर्ण काव्य कविता के भाव पहुच सकें।

जय हिंद।

विक्रांत राजलीवाल।

नंगे भ्रष्टाचारी

नगों से नंगे मिले नंगे होंगे सारे।
नगों को देख नंगे मुस्काए,
भ्रष्ट है नंगे जितने भी जो सारे।।

प्रकाश सत्य से सत्य का कर देगा नंगा, नगों को नग्न है नंगे जितने भी जो सारे।

न्याय सत्य से सत्य का कर देगा न्याय, नगों से पीड़ित है बेबस जितने भी जो सारे।।

नंगे ये नग्न है दलदली भ्रष्टाचार से शिक्षित, बेशर्म जितने भी नंगे जो सारे।

चलेगी लहर सच्चाई की तो मचेगी भगदड़ एक भयानक, खुलेगी पोल नग्नता से नगों की, नंगे है समस्त भ्रष्टाचारी जितने भी जो सारे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
21/11/2018 at 08:47 am

(Republish 8/10/2019 at 8:30pm)

मेरा फ़ेसबुक पेज़ का लिंक पता है।

https://www.facebook.com/vikrantrajliwal85

काव्य कविता नंगे भ्रष्टाचारी। का यूट्यूब वीडियो लिंक है

👉 https://youtu.be/ikJ68o7Eh5g

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🌹 पहली नज़र। (दर्दभरी नज़म दास्ताँ) with My video & link.

नमस्कार प्रिय मित्रों (ह्रदय अज़ीज़ सब्सक्राइबर्स), मैने अपनी प्रकाशित पुस्तक “एहसास” जिसका केंद्र बिंदु हम सभी के सभ्य समाज के कठोर होते भाव व्यवहारों एव उन कुप्रथाओ पर जो आज विज्ञान की आड़ में और भी अधिक फल फूल रही है पर अपनी संवेदनशील काव्य किस्सों के द्वारा एक प्रहार का प्रयास मात्र है कि 25 अत्यधिक संवेदनशील काव्य किस्सों, कविताओं के साथ कुछ दर्दभरी नज़म दास्ताँ भी लिखी थी। जिनमे से लघु एवं अत्यधिक लघु नज़म दास्तानों (पहली नज़र, पैग़ाम ए मोहब्ब्त, सितमगर हसीना, अक्सर सोचता हूं तन्हा अंधेरी रातो में कि…, धुंधलाता अक्स एवं एक खेल जिंदगी, को मैं वर्ष 2017-18 मध्य ही आपकी अपनी इस ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित कर चुका हूं।

एव उन समस्त नज़म दास्ताँ में से मेरी सबसे खास मेरे जीवन की मेरी पहली चार अत्यधिक दर्दभरी नजम दास्ताँ में से पहली तीन दास्ताँ ( एक इंतज़ार…मोहब्ब्त, एक दीवाना और बेगुनाह मोहब्ब्त) को अपने सक्रिय ब्लॉग “दास्ताँ” के तहत प्रकाशित कर चुका है एव जल्द ही मैं अपनी अब तक कि लिखी हुई अंतिम सबसे खास दर्दभरी नज़म दास्ताँ में से एक “मासूम मोहब्ब्त” को प्रकाशित करूँगा।

आज मै अपनी एक लघु दर्दभरी नज़म दास्ताँ “पहली नज़र” को एक बार पुनः प्रकाशित कर रहा हु। परन्तु इस बार कुछ यह कुछ खास है कि मैं अपनी दर्दभरी नज़म दास्ताँ “पहली मोहब्ब्त” के साथ अपने ह्रदय के समीप स्थापित अपने स्वरों के साथ रिकॉर्डिड अपनी वीडियो भी अपलोड कर रहा हु। साथ ही इस बार के पाठन में आपको जो कुछ अलग एव ख़ास प्राप्त है वह यह है कि इस बार टंकण त्रुटियों पर विशेष ध्यान देते हुए उनमे सुधार कर दिया गया है। साथ ही वीडियो को सुन कर भी अब और भी अधिक लुफ्त एवं वास्तविक भाव ज्ञात कर सकते है।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल।

🌹 पहली नज़र।
(एक दर्दभरी दास्ताँ)

👰🏻 पहली नज़र। 

दिखलाती है ज़िन्दगी, हर कदम पर, करीब से अपना रंग।

बतलाती है खून ए ज़िगर कि वो अधूरी दास्ताँ, हर रंग से अपने।।

दे देती है, दर्द कोई बिछुड़ा फिर से, आता है बदल कर रूप सामने, फिर से वो  दर्द।।।

दहलीज है बिछुड़ती जवानी की, आगाज है बेदर्द बुढ़ापे का।

समा है ऐतबार से, महफ़िल है फिर से आबाद, जो एक दीवाने की।।

हो गया एक रोज़, दीदार ए यार, धड़कने ये खो गई।

लौट आईं मोहब्ब्त दिल में खोई आरज़ू कोई जाग गई।।

किया है मज़ाक, ज़िन्दगी ने, ज़िन्दगी में दिन ये कौन सा आया।

दहलीज़ है बुढ़ापे की, बिछुड़े यार से, ये सितम, जिस पर मिलाया।।

एक रोज, एक दम से दीदार ये किस का हुआ।

देखते ही जान गया ये दिल, हा इसी से तो प्यार हुआ।।

एक ज़माने के बाद, ये किस ने नज़रो से नज़रो को मिलाया।

करीब दिल के आकर मेरे, ठहरी ज़िन्दगी से बेजान दिल को धड़काया।।

सितम इस दिल पर हो रहा, तोड़ कर बिजलिया, धड़कनो पर, बेदर्द सावन भी रो रहा।।।

इंतेहा दर्द ए दिल, मोहब्ब्त जो अब हो गई, ज़माने की है 
रुसवाई।

बरस रहे आँख से आँसू, बात है दिल कि दिल को जो दिल ने बतलाई।।

आई है बन कर, सावन की बहार, बे-मौसम ज़िन्दगी मेरी जो बंजर बियाबान।

मुस्कुराहट है लबो पर गुलाबी उसके, जाग गए देख कर, 
करीब से दिल के सब अरमान।।

दर्द है जुदाई का, जख़्म उसके भी जख्मी सिने में।

कहना चाहती है वो भी कुछ, सुनना चाहता हु में भी कुछ।।

कर रहे दीदार दोनों, बिछुड़े जो एक ज़माने से।

सदियों से खमोश लब, बेड़िया अब भी ज़माने से।।

लकीर है  मिटने लगी, वक़्त की यू ही आज जो अचानक से।

याद है उल्फ़त के अब भी वो दिन, बढ़ने लगी धड़कने ज़िन्दगी की जब अचानक से।।

बदला-मौसम, समा बदला, बदल गए सब नज़ारे।

आ जाती है याद ज़िन्दगी, तमाम अधूरी वो बहारे।।

नादां उम्र से नादां धड़कने, नादां थे वो अफ़साने।

हो गए ज़माने से जो, नादां थे वो फ़साने।।

याद है…

याद है अब भी, सावन कि वो बात।

नीरस थी जब ज़िन्दगी, पूरे चाँद की वो रात।।

बेजान मौसम में, एक रोज जान आ गई।

सुन-सान गली महोले कि धड़कने जाग गई।।

तन्हा थे लम्हे, अजीब से जो खामोश, उनसे जो एक अहसास हुआ।

देख कर खुशनुमा मौसम, फिर मुझ को जो विशवास हुआ।।

चारो ओर एक खामोशी सी छा गई।

माहौलें (पड़ोस) में मेरे रहने को एक हूर आ गई।।

एक इत्तफाक किसमत ने मेरे साथ किया।

घर के सामने मेरे, उसने एक घर लिया।।

देख कर उस को, ये दिल धड़क गया।

जाने को करीब उसके, ये मन मचल गया।।

देख कर नज़ारा ए हुस्न, मौसम भी मदहोश हो गया।

हर अदा थी कातिल उसकी, दिल ए दीवाना कही खो गया।।

गिरती थी हुस्न ए शबाब से उसके बेबस इस दिल पर बिजलिया तब।

चलती थी इठला कर जब, भूल जाता था ये दिल भी धड़कना तब।।

कतार घर के सामने, मनचलो की उस के लगने लगी।

करने को दिदार ए हुस्न, जंग उन-में कोई खूनी मचने लगी।।

देख कर नज़ारा, ये बर्बादी का अपनी, मन मेरा कूछ परेशान हुआ।

करता हूं मोहब्ब्त मैं भी उस-से, जान कर हाल ए दिल ये दिल हैरान हुआ।।

करता हूँ दिदार ए हुस्न, नज़रे बचा कर खिड़की से रोज़ अपनी।

जीता हूँ, मरता हूँ, तन्हा, घुट-घुट कर किसमत से रोज़ अपनी।।

नही आती है नींद बेदर्द रातो से दर्द ये आज-कल।

सताती है याद ए दिलरुबा, सितम ये हर-पल।।

दीवाना ए हुस्न ये जहां सारा लगता है उसका।

हर कोई है जलने को आतुर, परवाना ए हुस्न ये जहां सारा लगता है उसका।।

सुर्ख गुलाबी लबो पर निकलती है लगा कर लाली वो जब।

लग जाती है दीवाने उन मनचलो में उसके कोई होड़ तब।।

एक शोर सा मच जाता है भरे बाजार में तब।

छुरिया चल जाती है कत्ल हो जाता है भरे बाजार में तब।।

देख कर नज़ारा ए हुस्न वो मदमस्त उसका, वख्त भी ठहर जाता है।

एक दिदार ए सनम के खातिर, हर कोई इस जहां में मचल जाता है।।

देख लेती है, उठा कर जब भी, मदहोश निगाहें वो अपनी, बेबस है दिल ए दीवाना धड़क से धड़क जो जाता है।

मोहब्ब्त जताने को सनम से अपने ए पाबंदियों वो बेहिंतिया तड़प जाता है।।

न जाने क्यों एक रोज मोहब्ब्त ने रंग अपना दिखलाया।

हुस्न को है इश्क से काम, नाम ए मोहब्ब्त जो दीवाने को बुलाया।।

देख कर नज़दीक से बदन वो क़ातिलाना-हुस्न उसका, 
बुरा हाल था।

शराबी निगाहों से वॉर, वो मनमोहक उसके शारीरिक उभार, जीना अब मेरा दुशवार था।।

धधक रहे थे अंगार नाजुक वो गुलाबी लब उसके।

झुलस रहा था दीवाना, तपिश जो गुलाबी-लबो से हर लम्हा उसके।।

एक रोज नज़रे-चार, अनजाने ही, जो उनसे हो गई।

कर के नज़दीक से दिदार ए हुस्न, धड़कने ए दिवाना जो खो गई।।

वो आए करीब, इस दिल के, वो एक नशा था।

देखा नशीली निगाहों से उसने, उनमे एक नशा था।।

कर रही थी दिदार ए यार जो नज़रे नज़दीक से।

उठा था दर्द ए धड़कन, देखा जो उनको नज़दीक से।।

अक्सर होती है, मुलाकाते उनसे, मुस्कुरा कर आता है हुस्न ए यार वो करीब।

जगा कर आरज़ू, खोई कोई तमन्ना, खो जाता है कसम, फिर वो नसीब।।

अरमान दिल के अब जाग गए, एक ही पल में दीवाना जो जहां सारा पा गए।

खिल उठे महोबत के गुल, गुलिस्तां ए मोहब्ब्त जो रेगिस्तान से दिवाना पा गए।।

मुस्कुराता है देख कर, हर अदा से अल्हड़ वो हुस्न जब।

करता है वॉर, जख़्मी अरमान, बेबस इस दिल पर जब।।

भूल जाता है धड़कना, ठहर जाती है धड़कने ए दिल वही पर जब।

बेजान सी है जो धड़कने, धड़कना चाहती है वो जब।।

लव है खामोश से एक थरकन सी जो उनमे आई, चाहते है कुछ कहना शायद हम दोनों ही जब।

आलम है बेबसी भरा अहसास ए दिल, खामोशी जो साथ अपने लिए, रह जाते है खमोश से हम दोनों ही जब।।

आती है दिल-रुबा वो, होते है दीदार ए यार, बरसते है तीर ए हुस्न, शराबी निगाहों से अब अक्सर।

धड़कता-दिल, धड़काते है हुस्न ए यार, और भी खामोशी से बेदर्दी अब अक्सर।।

होता है इज़हार ए मोहब्ब्त नज़रो से जो दीवाना, वक़्त बे वक़्त जो उनसे सितम अब अक्सर।

करते है गुफ्त-गु, साए में नज़दीक से मोहब्ब्त, एहसास जो उनके अब अक्सर।।

आलम ए बेबसी, वो इज़हार ए मोहब्ब्त, तरसता है सुनने को दीवाना जो अक्सर।

यकीन ए मोहब्ब्त वो ख़्याल ए तन्हाई, सिहर जाता है ख़ौफ़ से दीवाना जो अक्सर।।

दीदार ए यार ये समा ए ऐतबार मिलता है तन्हाई में नसीब से अब अक्सर।

तीर ए मोहब्ब्त ये जख्म ए दिल, लगते है रुसवाई से सरेराह, अब अक्सर।।

नही मालूम है गहराई,  सितमगर ए सनम, काफ़िर उस हसीना के दिल ओ धड़कनो की क्या है दीवाना।

धड़कते-दिल तड़पती धड़कनो को सकूँ एक लम्हा भी वो लेने नही देती, दर्द ए दिल ये दर्द है धड़कनों पर दीवाना ।।

जो है मोहब्ब्त दीवाने से उस को, नाम ए मोहब्ब्त बन्द लबो से ग़ुलाबी वो अपने क्यों बोल नही देती।

जख़्म है दिल के हर जख्मो पर वो मरहम, मोहब्ब्त से अपने, धड़कनो को दिल के सकूँ क्यों नही देती।।

महक जाता है समा, बदलता है रंग, शर्म ओ हया से चेहरे का जो उसके गुलाबी।

पुकारता है दर्द ए दिल, नाम ए मोहब्ब्त वो नाम उसका, देखा जब भी मदहोश निगाहों में जो उसकी शराबी।।

धड़कती जवां धड़कने, उफान एक उनमे आ गया।

यकीन ए दीवाना, सनम के अब वो करीब आ गया।।

किया मज़ाक, ए वख्त जो हाल ए दिल, एक रोज़, धड़कनो से सनम को जब सुनाया।

समझा सनम ने दिल-लगी, ए मुकदर दिल-चिर दीवाने ने
फिर अपना दिखलाया।।

बदला रूप फिज़ाओ ने हालात जो खिलाफ हो गए।

पहले झुके पहलो में वो, फिर लिप्ट के  रो दिए।।

किया इजहार ए दोस्ती, मोहब्ब्त का उसमे कोई नाम नही।

मोहब्ब्त तो है ए दोस्त मग़र, मक्कारी कोई उनमे नही।।

बन कर दोस्त, आती है दिलरुबा, जब भी कोई नज़दीक, 
नज़रो के  सामने।

एक आरज़ू,वो लव्ज़ ए महोबत दब जाते है दिखती है जब भी वो नज़रो के सामने।।

रहता है इंतज़ार, एक एहसास वो पल है मोहब्ब्त, जिस पल उसे भी हो जायगी। 

तड़पेगा-दिल एक रोज़ ए मोहब्ब्त उस सितमगर का, जिस पल मोहब्ब्त उसे भी दीवाने से अपने हो जायगी।।

इंतज़ार ए हुस्न से हुस्न ए दीवाने कई मनचलों का हाल बेहाल होते देखा।

दीदार ए हुस्न से बांधे टक-टकी, नज़रो में अपनी, अंजाम कइयो का बुरा देखा।।

चीर दी है सरे-राह कइयों ने फड़कती नसें, शरीर की अपने, हुस्न ए शबाब के वास्ते।

फोड़ दिए है सरे-राह, कइयो ने बेमतलब सर अपने, आपसी तकरार के वास्ते।।

हाल ए दिल दीवाने का भी, बेहाल नज़र आता है।

देख कर दीवाने ए सनम, मनचले वो चौखट पर उसकी दिल तड़प जाता है।।

मौसम है वीरान बिन दीदार ए सनम, ये कैसी वीरानी।

हालात है खिलाफ, ये दर्द ए मोहब्ब्त ये कैसी ज़िन्दगानी।।

ज़िन्दगी है उजाड़ मेरी किस तन्हाई में खो गई जो।

सनम है सितमगर मेरे, क्या किसी गैर की हो गई वो।।

जख्म ये गहरा, टूटे दिल पर, एक रोज, बेहूदा कैसा पड़ गया।

देखा जो सनम को अपने, न जाने क्यों ये दिल तड़प गया।।

आ रहे थे सनम कहि से शायद कहि पर वो जा रहे थे।

आईना ए महोबत, वो अक्स नज़रो में, किसी गैर का, मोहब्ब्त एक दूसरे से दोनों फरमा  रहे थे।।

गुजर गए न जाने मौसम कितने, कितने ज़माने बीत गए।

तड़प ए दिल, तन्हाइयों से दीवाना, जख्म न जाने टूटे दिल
पर कितने पड़ गए।।

तड़प टूटे-दिल की टूटी धड़कनो से जो अब बर्दाश नही होती।

सताता है ख़्याल ए सनम, बिन सनम दर्द ये ज़िन्दगी, आवाज़ दिल के वीराने से कोई अब नही होती।।

बदमिजाज जो मौसम, एक रोज सरेराह हो गया।

अहसास ए ज़माना, हर कोई यहाँ खो गया।।

वक़्त की लकीर पर एक हादसा जो अब हो गया।

आशिक एक दीवाना जो सनम का, सनम को कहि ले गया।।

तन्हा छोड़ दीवाने को जो तन्हाई में, उड़ गए पंछी महोबत के न जाने कहाँ वो।

आई न याद दीवाने की जो अपने, तन्हा मार गए जो एक दीवाने को बेदर्दी वो।।

करी है महरबानी जो बेबस अपने एक दीवाने पर, खून ए ज़िगर, छोड़ दिया, चौखट पर मेरी तन्हा एक पैगाम।

पड़ा है जख्मी, तन्हा सा वही चोखट पर मेरी, तन्हा सनम का जो आखरी वो एक पैगाम।।

लिपटा है एक गुलाब उस से, काँटे हज़ारो रुसवाई के कई, चुम रहा है बेबसी से धूल चोखट की मेरी, तन्हा सनम का वो एक पैगाम।

टूटे-दिल की टूटी धड़कने, भूल गए जो अपना नाम, ठहर गयीं उखड़ती हर सांस, जाम है रगों का जो बहता उफ़ान।।

काँपते हाथ, थरथराती जुबां, मासूम थे वो अरमान।

पढ़ रहे महबूब का जो अपने, आखरी था वो फरमान।।

चिर दिया इश्क़ ने दिल अपना जो निकाल, नम आँखों से पढ़ कर तन्हा सनम का वो तन्हा एक पैगाम।

हर लव्ज़, वो हर अक्षर थे उसके, सुना रहे हाल ए दिल, दर्द सनम का जो एक दास्ताँ।।

नम आंखों से लिखी है उन्होंने जो इल्तिज़ा एक आख़री।

दर्द ए दिल कर रहे है दर्द बयां, अश्को के उस पर, निसान वो आखरी।।

टूटा जो दिल टूट कर बिखर गए सब अरमान, टूटे इस दिल के जितने थे जो आखरी।

झलक रहा, दर्द ए दिल, दर्द हर लव्ज़ वो अक्षर थे उसके जो आखरी।।

लिखा था खून ए श्याही से दर्द ए दिल वो नम आंखों से उसने दिल का जो अपने हाल।

पढ़ रहा है, दीवाना उसका, ए दिल धड़कनो को अब जरा तू अपने ले सम्भाल।।

हो गए जो दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न अब  मुझ को तुम याद।।

जा रही हूं छोड़ कर, चौखट पर तुम्हारी तन्हा एक पैगाम।

पढ़ लेना तुम उस को, लिपटा हो जिस से टूटा एक गुलाब।।

याद न करना कभी, समझना कोई ख़्वाब।

टूटेगी नींद जब तुम्हारी, टूट जाएगा यह ख़्वाब।।

अलविदा ए यार, आखरी, रखना अपना ख़्याल।

दिख जाएगा जल्द ही ज़माने में, तुम को भी हसीन कोई ख़्वाब।।

करे मोहब्ब्त दिल से जो, देना तुम उसका साथ।

भूल जाना मुझ को तुम, दे देना उस को यह गुलाब।।

जा रही हुं, अब दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न अब मुझ को तुम याद।।

तड़प गया दिल, बिखर गई, टूट कर हर सांस।

पढ़ कर महबूब का अपने, आखरी वो फरमान।।

टूटा जो दिल एक दीवाने का,  उठती है दिल से एक फ़रियाद।

खड़ा है राह ए सनम, अब भी दीवाना, करता है हर लम्हा जो सनम को याद।।

दिल में है मोहब्ब्त उसकी, हर धड़कन में है उसका एक इंतज़ार।

रुकी है ज़िन्दगी, ठहर गयी हर सांस, हर सांस में अब भी है कायम उसका एक एहसास।।

तड़पता दिल, टूटी धड़कने, ले रही है, दीवाना ए सनम से एहसास ए मोहब्ब्त का जो इम्तेहां ।

आरज़ू एक मोहब्ब्त, बेताब है हर सांस, दे-देगा दीवाना, अब भी ए मोहब्ब्त, मोहब्ब्त का हर इम्तेहां।।

जला देगा, सितम ए इश्क, मिटा देगा ए मोहब्ब्त खुद को अब ये दीवाना।

धड़कता दिल, बन्द सीने से जो हुस्न ए यार का अब भी है सनम का अपने वो दीवाना।।

दास्तान ए मोहब्ब्त जख्मी ये दिल जो सरेराह हो गया।

हुआ जो दीदार ए सनम दीवाना ए सनम फिर से कहि जो खो गया।।

तड़प ए दिल, बेबस है बेहिंतिया जो एक दीवाना, अंजाम ए मोहब्ब्त जो अंजाम ए दीवाना दिखता नही।

राह ए सनम, एक रोग है मोहब्ब्त, जो एक आशिकाना, दर्द ए दिल क्यों दर्द ए दीवाना अब मिटता नही।।

दम तोड़ती ये मोहब्ब्त, सुनाती है हर धड़कन से अब भी मोहब्ब्त का मोहब्ब्त से फिर वही तराना।

एहसास ए जुदाई साथ ये दीदार ए सनम, खिले एक अरसे से गुल तो खो गया कहि वीराना।।

धड़कता है दिल, तो धड़कनो से एक आवाज़ होती है।

हर धड़कन नाम ए महबूब दीवाने के साथ होती है।।

इंतज़ार है एक धड़कन, वो राह है सुनी, खड़ा एक ज़माने से जहाँ जो सनम-दीवाना।

आरज़ू है एक अधूरी, थामे है हाथो में अपने अब भी जो गुलाब वो वर्षो पुराना।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
27/08/2019 at 7:45am
(पुनः प्रकाशित अपनी रिकॉर्डिड वीडियो एव youtube लिंक के साथ।)

YouTube video link is mentioned in his.
👉 https://youtu.be/A_5bLVHS9yo

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अवश्य कीजिएगा।

💥 मेरी लेखनी का एक लघु परिचय। ✍️ // 💥 A short introduction to my writing. ✍️

💥Spiritual communicator, Motivational Speaker, Author, Writer, Poet And Thinker.

विक्रांत राजलीवाल।

(समाजिक कार्यकर्ता, कवि, शायर, नज़्मकार, ग़ज़लकार, गीतकार, व्यंग्यकार, लेखक एव नाटककार-कहानीकार-सँवादकार)

1) एहसास प्रकाशित पुस्तक (published Book) : अत्यधिक संवेदनशील काव्य पुस्तक एहसास, जिसका केंद्र बिंदु हम सब के असंवेदनशील होते जा रहे सभ्य समाज पर अपनी काव्य और कविताओं के द्वारा एक प्रहार का प्रयास मात्र है।

Sanyog (संयोग) प्रकाशन घर शहादरा द्वारा प्रकाशित एव ए वन मुद्रक द्वरा प्रिंटिड। प्रकाशन वर्ष जनवरी 2016. प्रकाशित मूल्य 250:00₹ मात्र।

2) My Site: Vikrant Rajliwal
Url address: vikrantrajliwal.com

वर्ष 2016-17 से अब तक सैकड़ो दर्दभरी नज़्म, ग़ज़ल, बहुत सी काव्य-कविताए एव कुछ व्यंग्य किस्से, कुछ एक गीतों के साथ बहुत से विस्तृत समाजिक, आध्यात्मिक एव मनोवैज्ञानिक लेखों के साथ कई प्रकार के सामाजिक एव आध्यात्मिक विचार लिख कर अपनी साइट पर प्रकाशित कर चुके है। जिनकी संख्या आपके प्रेम से दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। एवं20180905_120418 स्वम् की कई नज़्म कविताओं एव लेखों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर चुके है।

3) Youtube channel: Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal पर मेरे द्वारा लिखित मेरी समस्त रचनाओँ जैसे प्रकाशित पुस्तक एहसास से अति संवेदनशील काव्य- कविताए, और मेरी निजी लेखनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित मेरी सैकड़ो नज़्म, ग़ज़ल और बहुत सी काव्य, कविताओँ एव्यंग्य किस्सों को मेरे स्वयं के स्वरों के साथ देखने और सुनने के लिए मेरे YouTube चैनल को अभी Subscribe कीजिए।

👉 आगामी रचनाएँ (Upcoming Creation’s) : अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर सक्रिय अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ श्रृंखला “दास्ताँ” के अंतर्गत चौथी एवं अब तक लिखी गई अंतिम अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ “मासूम मोहब्ब्त” प्रकाशित करि जाएगी।

जल्द ही अपनी ब्लॉग साइट vikranrajliwal.com पर अपनी कुछ लघु कहानियों का प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करूँगा।

👉 साथ ही मैं वर्ष 2016 से एक अत्यंत ही दर्दभरा जीवन के हर रंग को प्रस्तुत करती एक सामाजिक कहानी, एक नाटक पर कार्य कर रहा हु।

💥 इसके साथ ही शायद आप मे से बहुत से महानुभव इस बात से परिचित नही होंगे कि मैं आपका अपना मित्र विक्रांत राजलीवाल वर्ष 2003-04 से नशे से पीड़ित मासूम व्यक्तियों के लिए निःस्वार्थ भाव से सेवा करता आ रहा हु एव स्वम भी कई प्रकार के जटिल उतार चढ़ाव के उपरांत एक शुद्ध रिकवरी को प्राप्त कर सका हु।

यदि आप मुशायरे या कवि सम्मेलन के आयोजक है और आप मेरी सैकड़ो दर्दभरी नज़्म ग़ज़ल शायरी या काव्य कविताओं के द्वारा मेरे कार्यक्रम को बुक करते है तो यकीन मानिए इस प्रकार से आप अपना एक अनमोल योगदान उन मासूमो के लिए सहज ही प्रदान कर सकते है। क्योंकि मेरी कला के कार्यक्रम से होने वाली 100% कमाई नशे से पीड़ित उन गरीब एव बेबस मासूमो के इलाज लिए समर्पित होगी। जिन्होंने अपना जीवन जीने से पूर्व ही नशे के आदि बन कर बर्बाद करना शुरू कर दिया है या बर्बाद कर चुके है।

😇 समाज सेवा: स्वमसेवी नशामुक्ति कार्यक्रम के तहत नशे की गिरफ्त में फंसे नवयुवको एवं व्यक्तियों को एक स्वास्थ्य जीवन को जीने के लिए प्रेरित करता आ रहा हु। स्वमसेवी संस्थाओं एवं स्वयम से जन सम्पर्को के माध्यम द्वारा निशुल्क सेवा भाव से वर्ष 2003 से अब तक।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

मेरासंपर्क सूत्र नीचे अंकित है।

My Whatsapp no: 91+9354948135

(Translated)

One service and one collaboration

Hello Friends, Many of you may not be familiar with the greatness that I have been serving my self-indigenous friends Vikrant Rajliwal with selfless service for innocent people who have been suffering from intoxicants since 2003-04. After a complex fluctuation of type, I could get a pure recovery.

And if you are the organizer of mushere or poet conference or you can book my program with my hundreds of painful najm ghazal shayari or poetic poems and also in your program, believe that in this way you have a valuable contribution They can easily provide for those innocent people. Because 100% earnings from my program will be dedicated to the treatment of those poor and unemployed innocent people who have started wasting or wasted by becoming addicted to drugs before living their lives.

Name: Vikrant Rajliwal

Published book: एहसास (a highly sensitive poetic book inspired by social and humanitarian values) published by Sanyog publication house shahdara. Which was also showcased at the Delhi World Book Fair in the same year 2016.

🎤 Upcoming creations: The story of my fourth and last nazam tales written so far. And a play, a painful story presenting every run of life.

😇 Social service: Swamsevy has been promoting the life of the youth and all the people trapped under the influence of intoxicants as a drug addiction program. Free service charges through Swamsevy institutions from 2003 till now.

Thank you

Vikrant Rajliwal

Hometown: Delhi.

The contact form is displayed below.

My Whatsapp no: 91 + 9354948135

यह है अब तक का मेरे द्वारा सम्पन्न एव आगामी लेखन कार्य, जो आप सभी प्रियजनों के प्रेम एव आशीर्वाद से शीघ्र अति शीघ्र ही सम्म्प्न हो अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हो जाएगा। आप सभी प्रियजन अपना प्रेम एव आशीर्वाद अपने रचनाकार मित्र विक्रांत राजलीवाल पर यू ही बनाए रखे।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल।

🇮🇳15 अगस्त “स्वतँत्रता दिवस” के पवित्र दिन एक संदेश।

🇮🇳 🙏 सबसे पहले तो मैं आप सभी देशवासियों को “स्वतँत्रता दिवस” एवं “रक्षा बंधन” की हार्दिक शुभकामनाएं प्रदान करता हु। और अब बात करता हु मेरी काव्य कविता “राजनीति और धर्म” की जो मेरी प्रकाशित पुस्तक “एहसास” से मानवतावादी भावनाओं से प्रेरित होकर मैने लिखी थी।

पुस्तक एहसास में सामाजिक, आध्यात्मिक एव मानवतावादी भावनाओं से प्रेरित मेरी शुरुआती 25 काव्य कविताएं है जिसका प्रकाशन वर्ष 2016 जनवरी में Sanyog पब्लिकेशन हाउस शहादरा द्वारा किया गया है। एव जिस को दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2016 में भी प्रदर्शित किया गया था। इसके साथ ही देश के जाने माने प्रिंटर्स ए वन प्रिंटर्स द्वरा प्रिंटिड है।

धन्यवाद।
विक्रांत राजलीवाल।

आप मेरी साइट से जुड़ कर मेरे द्वरा लिखित एव प्रकाशित मेरी सैकड़ो रचनाओं के साथ मेरी आगामी रचनाओ के पाठन का आनन्द प्राप्त कर सकते है।

मेरी इस वुडियो का YouTube लिंक है।

मेरी वेबसाइट का लिंक है।
vikrantrajliwal.com

मेरे यूट्यूब चैनल का यूआरएल पता है।
https://www.youtube.com/channel/UCs02SBNIYobdmY6Jeq0n73A

IMG_20190815_072559IMG_20190815_072608

मेरे फेसबुक पेज़ का लिंक है।

https://www.facebook.com/vikrantrajliwal85/

Translated

🇮🇳 🙏 First of all, I extend my heartiest greetings to all of you countrymen on “Independence Day” and “Raksha Bandhan”. And now speaking of my poetic poem “Politics and Religion” which I wrote from my published book “Ehsaas” inspired by humanistic feelings.

The book Awaaz contains 25 of my earliest poems inspired by social, spiritual and humanistic sentiments published by Sanyog Publication House Shahadra in January 2016. Eve which was also showcased at the Delhi World Book Fair 2016. Along with this, one of the famous printers of the country is Printed by A one Printers.

Thank you
Vikrant Rajliwal.

You can get the pleasure of reading my upcoming works along with my hundreds of works written and published by joining my site.

I have a YouTube link to this video.

My website has a link.
vikrantrajliwal.com

My YouTube channel url is

https://www.youtube.com/channel/UCs02SBNIYobdmY6Jeq0n73A

My Facebook page has a link.
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💌 सक्रिय ब्लॉग “दास्ताँ” एवं तथ्य। 🌹✍️

💌 सक्रिय ब्लॉग “दास्ताँ” एवं तथ्य। 🌹✍️

मैंने यानी कि विक्रांत राजलीवाल ने वर्ष 2015 अक्टूबर में हम सब के सभ्य समाज के जटिल और कठोर होते सम्सजिक ढांचे एवं मानवता के प्रति जटिल एवं कठोर होते भाव व्यवहारों पर अपनी 25 अति संवेदनशील कविताओं के द्वारा एक प्रहार करने का एक प्रयास किया था। जिसका एकत्रित रूप मैने पुस्तक एहसास द्वारा Sanyog प्रकाशन घर शहादरा द्वारा प्रकाशित करवाया था। एव जिसका प्रदर्शन वर्ष 2016 के दिल्ली विश्व पुरतक मेला में भी किया गया था।

इसके साथ ही मैंने उसी वर्ष 2015 अक्टूबर से जनवरी 2016 में अपनी प्रथम पुस्तक एहसास के प्रकाशन के दौरान कुछ अत्यंत दर्दभरी शायरी दास्ताँ भी लिखि थी। जिसमे से प्रथम चार नज़म दास्ताँ अत्यधिक विस्तृत एक सम्पूर्ण प्रेम दास्ताँ को अंकित करती है।
1) एक इंतज़ार… महोबत। को मै पहले ही आपकी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित एव YouTube चैनल Vikrant Rajliwal पर अपनी खुद की आवाज़ के साथ रिकार्ड कर के अपलोड कर चुका हूं।

2) एक दीवाना। को जल्द ही प्रकाशित करूँगा।

3) , 4) दास्ताँ भी दर्दवसे भरपूर अत्यंत विस्तृत दास्ताँ है अपने शायद ही अभी मेरी इन शुरुआती चार दस्तानों के जितनी दर्दभरी एवं विस्तृत कोई नज़म दास्ताँ पहले कभी पढ़ी हो। पहली दास्ताँ एक इंतज़ार… महोबत। के प्रकाशन के बाद मेरी दूसरी दर्दभरी नज़म दास्ताँ 2) एक दीवाना। के नाम की सूचना में आपको पहले ही दे चुका हूं। इसके अलावा 3) और 4) संख्या की नज़म दास्ताँ का नाम आपको उचित समय आने पर अवश्य सूचित कर बता दिया जाएगा।

इसके अलावा कुछ छोटी छोटी दस्ताने भी मैंने लिखित थी जिन्हें मैं पहले ही प्रकाशित एव अपनी आवाज़ के साथ रिकार्ड कर अपलोड कर चुका है। उनके नाम इस प्रकार से है कि 5) पहली नज़र 6) पैगाम ए मोहब्बत 7) सितमगर हसीना 8( अक्सर सोचता हूं तन्हा अंधेरी रातो में कई.. 9) एक खेल जिंदगी। 10) धुंधलाता अक्स। इन दर्दभरी दस्तानो बाद मेने कुछ शायरी भी लिखी थी जिन्हें जांचने से पता चला कि यह तो एक नज़म हो गई है जिसके मेने सोशल मीडिया और तीन टुकड़ो में इस प्रकार से प्रकाशित किया 1) मोहब्बत। ( दिख किसी गुलिस्तां में जब भी कोई गुलाब, छूने को पंखुड़ी, लेने को खुशबू …)

2) बेरवा सनम। ( देखा था ख़्वाब कभी दीवाने ने एक)

3) महक ए सनम।( जी रहा है दीवाना याद सनम को करते हुए। मर रहा है बेबसी से नाम ए सनम लेते हुए।।)

🌹👉 उपरोक्त जानकारी आपको बताने का एक ठोस कारण यह है कि आप सभी मेरी प्रकाशित एवं आगामी दर्दभरी दस्तानों के साथ एक करीबी रिश्ता महसूस करते हुए उनसे जुड़ सके। अब जल्द ही अपनी शुरआती दूसरी दर्दभरी नज़म शायरी के रूप में लिखी गई मोहब्बत के दर्द से सरोबार दास्ताँ “एक दीवाना।” को आपके पाठन के लिए प्रकाशित करूँगा।

अब अपने फेसबुक पेज़ Vikrant Rajliwal एव एक अन्य नवीन पेज़ Zindagi Ek Khwaab Hai पेज़ पर मेरा उपनाम Ek Agyat kalam द्वारा जिसका निर्माण मैने क्यों किया इस बात के एहसास को अभी तक मै खुद भी नही जान सका हु। के कुछ शेर सांझा कर रहा हु जिन्हें अभी तक मैं आपके साथ सांझा नही कर सका हु। उम्मीद करता हु आपको पसंद आए।

✍️पेज़ Vikrant Rajliwal पर मेरे वह शेर जिन्हें अपके साथ सांझा ना कर सका इस प्रकार से है कि

वह समझते है कि उन्होंने मेरा क़त्ल कर दिया। कोई बता दे उन्हें जा कर के की अभी साँसे जिंदा है मेरी।

तुम बेशक़ से हो गए हो मुर्दा ए मेरे हम सायों मग़र कुछ उम्मीद अभी भी है बाक़ी तुम्हारे मुर्दा एहसासों में जिंदा जो मेरे एहसासों की गर्मी है।

पूछुंगा एक रोज़ मेरे रब से कि क्यों तूने मुझे हमसफ़र भी बेजान पत्थर से दिए है मुर्दा। जो जिंदा है या मर गए है जीते जी किसे खबर।

बेजान ये एहसास एक रोज़ कर दूंगा जिंदा, जिंदा हर एहसासों की गर्मी अभी बहुत बाकी है कहि जिंदा एहसासों में मेरे।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

Follow my personal blog site vikrantrajliwal.com

✍️पेज़ Zindagi Ek Khwaab Hai पर मेरे द्वारा लिखित कुछ शेर रचना इस प्रकार से है जिन्हें एक संग्रह के रूप में आप स ही के पाठन हेतु प्रकाशित कर रहा हु।

1) कभी देखा है ज़िन्दगी को,बेहद हसीन लगती है जैसे कोई हसीं ख़्वाब अधूरा सा कहि रह गया हो।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक अज्ञात कलम के उपनाम से।

2) 💃 ये जो जिंदगी है ना एक कठपुतली है। यहाँ हर एक रिश्ता दूसरे को खींच कर नचा देता है।

थोड़ी सी भी ढ़ील छोड़ो तभी कोई खीच कर डोर जिंदगी की काट देता है।।

क्यों है कि नही प्यारे।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।एक अज्ञात कलम के उपनाम से।
#V
3) 🌹 उसको शायद आज भी बहुत यक़ीन है ख़ुद पर, नही तो वो क्या कब का बीच राह से लौट ना गया होता।

असर रूह का उसके यक़ीनन रूमानियत भरा ही होगा, हर अल्फ़ाज़ भी तो उसके मदहोश से कर देते है।

हम है कि आज भी इम्तेहां बेदर्दी से उसके एहसासों का एक इम्तेहां आज भी जो लेते है।

और वो है कि हमे फिर भी अपना महबूब कहता है शायद उसे आज भी इंतज़ार है किसी की मोहब्बत का, वर्ना तो कौन हम जैसे संगदिलों पर बहा कर अश्क़ अपने जाया करता है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक अज्ञात कलम के उवणं से।
#VR

4) हवाओं के रुक जाने से सांसे रुक सकती है मग़र जो वो रुक जाए तो जिंदगी रुक सी जाती है।

Hawaon ke ruk jaane se sanse ruk shakti hai magar jo wo ruk jaae toh zindagi ruk si jati hai.

वो ख़ुदा तो नही फ़क़त कई मासूमो को एक ख़्वाब जिंदगी का जिंदगी को जीने के लिए दे जरूर सकता है।

Wo khudaa to nahin fakat kai masumo ko ek khwaab zindagi ka zindagi ko jine ke liye de jarur sakta hai.

यह वो नही उसका रूहानी कोई एक एहसास बोलता है। उसका दिलो को जीत लेने का एक हुनर कोई दिलकश बोलता है।

Yeh wo nahi uaska ruhani koi ek ehsaas bolta hai. Uska dilon ko jeet lene ka ek hunar koi dil kash bolta hai.

तबाह ये दुनियां बेईमान ही सही, क़यामत से खुद ही अनजान जो सही। फ़क़त वो आज भी देखता है ख़्वाब जिंदगी का मासूम मासूमो के लिए, लहू सींचती कलम और बर्बाद ख्वाहिशें साथ लिए।

Tabah ye duniyaa beimaan hi sahi, kayamat se khud hi anjaan jo sahi, fakat wo aaj bhi dekhta hai khwaab zindagi ka masum masumo ke liye, lahu seechti kalam orr barbaad khwahishen sath liye.

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक अज्ञात कलम के उवणं से।
#VR

5) वो आज भी नही समझा कि उसे कितने दिल अपनी धड़कनो को थामे हुए समझने लगे है।

Wo aaj bhi nahin samjha ki use kitane dil apani dhadkano ko Thame huee samjhane lage hai.

देखो ना वो आज भी उन्ही से महोबत करता है हर लम्हा ही जिन्होंने उसकी हर धड़कती धड़कनो को तोड़ने की कोशिश करि है, देखो ना वो आज भी…

Dekho na wo aaj bhi unhin se mohabbat karta hai, har lamha hi jinhone usaki har dhadakti dharkano ko todane ki koshish kari hai, dekho na wo aaj bhi…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक अज्ञात कलम के उपनाम से।

Ek agyat kalam dwara likhit

#VR

6) 💞 कहि कुछ छूट सा रहा है शायद कहि कुछ टूट सा रहा है। ए जिंदगी कहि ये मेरा ख़्वाब तो नही, ए जिंदगी कहि ये मेरा ख़्वाब तो नही…जो अब कहि छूट सा रहा है पूरा होने से पहले ही जो बेदर्दी से टूट रहा है।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक अज्ञात कलम के उवणं से ✍️ #VR

💞 Kahi kuch chutt sa rha hai shayad kahi kuch tut sa rha hai. e zindagi Kahi ye mera khwaab to nahi, e zindagi kahi ye mera khwaab to nahi…Jo ab kahi chutt sa rha hai pura hone se pahale hi jo bedardi se tut rha hai..

Ek Agyat Kalam Dwara Likhit. ✍️ #VR

#VR

यह थे वह कुछ शेर जिन्हें मेने फेसबुक पर प्रकाशित किया था अब आपके लिए एक संग्रह के रूप में प्रकाशित कर रहा हु।

🌹👉 अंत में मैं यानी कि आपका अपना मित्र विक्रांत राजलीवाल आपको यक़ीन देता हूं कि मेरी आगामी दर्दभरी नज़म दास्ताँ “एक दीवाना” को पढ़ कर आप को हक़ीक़त में एक रूमानी शायरी एक दर्द ए महोबत का एहसास जरूर हो जाएगा।
इसी एक यकीन के साथ कि मैं आपके पाठन करने के लिए “एक दीवाना।” को जल्द ही आपकी अपनी इस बल8ग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित कर सकु।

शुक्रिया।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
08/08/2019 at 9:35 pm

दर्द ए जिंदगी।

दर्द जिंदगी का जब हर हद को पार कर जाएगा, ये दीवाना गीत मोहब्बत के तब भी गुनगुनाएगा।

भुला कर हर बेरुखिया ए मोहब्बत जो सितम उनका, हर दर्द ए जिंदगी ये दीवाना सीने से अपने तब लगाएगा।।

मिटते हर निसान जिंदगी के जब सिमट कर मिट जाएंगे, बुझते हर चिरागों को रोशनी ये दीवाना कोई तब दे जाएगा।

हर आरज़ू एक ख़्वाब जिंदगी का जिंदगी से जब रूठ जाएगा, कदम खामोशियों से ये दीवाना ख़ामोशी से ख़ामोश तब हो जाएगा।।

वो जो मसीहा समझते है खुद को सितमगर मुकदर का हमारे, वक़्त एक रोज़ आईना ए हक़ीक़त उन्हें नज़दीक से दिखाएगा।

कत्ल ए एहसासों का करते है बेक़दरी से जो सरेराह वो हमारे, वक़्त लेगा इंतकाम एक रोज ख़ुद उनसे, हर गुनाह उनका उनके जब सामने आजाएगा।।

मुर्दा एहसासों से जिनकी रूह हो गई है मुर्दा, ख़ामोश एहसासों से जिनके पत्थर से एहसास।

दर्द जिंदगी का कर देगा जिंदा उनको हमारा, चीख पड़ेंगे खामोश पत्थर से उनके हर एहसास।।

विक्रांत राजलीवालPhoto_1564922896758 द्वारा लिखित।
04/08/2019 at 6:30 pm

🌹 एक इंतज़ार… महोबत। (दर्दभरी नज़्म श्रंखला दास्ताँ के तहत मेरी पहली नज़्म दास्ताँ) With the video link of my YouTube channel

❣️ मेरी इस दर्दभरी नज़्म दास्ताँ एक इंतज़ार…महोबत। को मैने स्वंय की आवाज़ और अंदाज़ ए बयानगी के साथ रिकॉर्ड कर के आज ही अपने YouTube चैनल Vikrant Rajliwal पर अपने सभी चाहने वालो के लिए अपलोड किया है।

मेरी एक दर्दभरी नज़्म दास्ताँ का स्वयं मेरी आवाज में रिकॉर्डिड मेरी एक नवीनतम वीडियो का लिंक आपकी अपनी इस दर्दभरी नज़्म दास्ताँ के अंत में नीचे अंकित है।

💌 क़िताब ए महोबत के पाक पन्नों पर दर्द, एक दीवाने का लहू जो अब बरस गया।

जख़्मी दिल के ज़ख्मो से तमाम, तेज़ाब कोई जो सरेराह अब बरस गया।।

याद आई बिछुड़े महबूब की जब जब अपने, बेदर्द यह ख़ूनी सावन भी तब तब गरजा बेहिंतिया और टूट कर बरस गया।

देख कर तड़प एक दीवाने की बर्बादी, सीना आसमां का भी बेहिंतिया जो जोर से धड़क गया।।

हो गया मजबूर कुछ इस कदर वो भी, ना जाने बे-मौसम ही वो क्यों जो बरस गया।

देख कर सितम सितमगर का एक ए महोबत, मुर्दा जिस्म में बेजान दिल भी जो तड़प गया।।

लिख रहा हालात ए दिल अरमानों के खून से जज़्बात ए महोबत जो अपने एक दीवाना।

सितम ए महोबत ये टूटती धड़कने, दर्द उखड़ती सांसो से ज़हर रग रग में कर रहा बर्दाश अपने जो एक दीवाना।।

नूर ए सनम से सकूं ए दिल ना जाने गुम है कहा वो सनम मेरा।

वीरानियाँ ये उजड़ता गुलिस्तां पुकारता है नाम ए महोबत नाम सनम का क्यों मेरा।।

दिखता है पल दीवाने को ये मौत का अपनी अब अपने जो नज़दीक।

लगता है लम्हा दीदार ए सनम ये मुलाक़ात का अब उनसे जो नज़दीक।।

मौत को एक दीवाने की इल्ज़ाम ना समझ लेना कोई ए मेरे सनम।

ये ज़िन्दगी ये धड़कती हर धड़कन भी अमानत ए महोबत जो तेरी ए मेरे सनम।।

मौत का मेरी तो एक बहाना है जरूर।

बेजां दिल की हर धड़कनो को अब तेरे धड़काना है जरूर।।

पूछते है नाम ए महोबत रख कर उनकी चौखट पर हम सर जो अपना।

जख़्मी है दिल ए दीवाना बहुत, ढूंढ रहा दिलबर का अपने अब भी जो घर अपना।।

ऐसा क्यों लगता है कि उनकी मदहोश निग़ाहों के वार से हो कर के जख़्मी अब जिंदा हु।

ऐसा क्यों लगता है कि उनके एक दीदार के एक इंतज़ार में हो कर के फ़ना अब जिंदा हु।।

ऐसा लगता है अब तो ये दीवाना सिर्फ उन के ही प्यार से जिंदा है।

ऐसा लगता है अब तो ये दीवाना सिर्फ उन के ही इंतज़ार से जिंदा है।।

तोड़ा है गरूर महोबत का मेरी सनम ने मेरे कई बार।

हर बार लगा दीवाना को कि उन को है सिर्फ उसी से प्यार।।

करते है कोशिश हर बार वो कि मर जाए उन का ये दीवाना।

ना आ पाए नज़दीक उन के कि डर जाए उन से उन का ये दीवाना।।

उनकी इस सँगदिली को भी उन की महोबत कहता है उन का ये दीवाना।

यकीं महोबत का उन को दिलाए कैसे कि महोबत उन से करता है कितनी उनका ये दीवाना।।

दीदार ए सनम करते हुए नज़रो से उनकी मदहोश, क़त्ल हो जाने को जी चाहता है।

रख कर हाथ धड़कते दिल पर अपना, अपनी पाक महोबत उन से जताने को जी चाहता है।।

नही रह सकता दीवाना ये उनका अब उन से दूर, उन को अब अपना बना लेने को जी चाहता है।।।

आती है सामने जब भी वो, ना जाने दर्द ए दिल दीवाने का क्यों बढ़ जाता है।

देख कर हुस्न वो बेबाक़ उसका, बेबस ये दिल ए दीवाना धड़कना क्यों भूल जाता है।।

मदहोश निग़ाहों से अपनी शराबी, कर के क़त्ल ए दीवाना ना जाने वो मुस्कुरा क्यों देती है।

जख़्मी दिल ये दीवाने का कर के सरेराह, ना जाने वो तड़पा क्यों देती है।।

हो गया ये सितम जो दूर अब उन से ये उनका दीवाना, साथ कोई साया अब नज़र मौत का आता है।

करता हु दुआ जब भी हाथ अब अपने उठाए, नाम ए महबूब दीवाने के ख़ामोश लबों पर आता है।।

छूट गया घर बार भी अब जो मेरा, साथ साया भी कोई अब नज़र नही आता।

जी रहा है तन्हा मरते हुए बेदर्द इस ज़माने में अब दीवाना, एक नाम ए सनम के दीवाने को दूसरा कोई नाम अब नही आता।।

कर दे टुकड़े लाख चाहे टूटे इस दिल के अब वो मेरे।

कर दे लाल चाहे लहू से इस जमीं को अब वो मेरे।।

वफ़ा फिर भी उन से दीवाना निभाता रहेगा।

लेते हुए नाम उन का तन्हा जीता और मरता रहेगा।।

आशिक़ इस ज़माने में उन के हजारों दिख जाएंगे।

दीवाना फिर भी सनम मेरे, मुझ सा ढूंढे ना ढूंढ पाएंगे।।

एक रोज़ दिखा देगा दीवाना ये उनका उनको, जलते है परवाने कैसे प्यार में।

एक रोज़ बता देगा दीवाना ये उनका उनको, मरते है दीवाने कैसे इंतज़ार में।।

जला कर खुद को जिंदा ये दीवाना कर देगा रौशन उन का घर आंगन।

जल्द ही बरस पड़ेगा ख़ूनी बूंदों से, वीरान जो महोबत पर, अब यह ख़ूनी सावन।।

रहेगा बेदाग़ फिर भी हमेशा उन का जो पाक दामन, मौत पर एक दीवाने की बरसेगा जब यह ख़ूनी सावन।।।

यकीं है दीवाने का वो लम्हा भी जल्द ज़िन्दगी में आएगा।

हो कर के खुद से मजबूर ये दिल, दीवाना जब नज़दीक सनम के जाएगा।।

तड़पेगी महोबत खुद देख कर अंजाम ए महोबत जो अपनी, कदमो से लिपट कर दीवाने के दीवाने को खुद महोबत जब बुलाएगी।

समझेगी महोबत को जब हो कर वो दिल से अपने मजबूर, आएगी नज़दीक दीवाने के और जान अपनी मुझ पर लुटाएगी।।

हो जाएगी मज़बूर इस कदर वो तड़पते दिल से अपने, तड़पेगी बेहिंतिया और वफ़ा दीवाने से फ़िर निभा पाएगी।।।

महबूब की मदहोश निगाहों से जख़्मी हो जाने में एक नशा है।

चिर दिया सरेराह जो दिल शराबी निगाहों से उन्होंने, उस मे भी एक नशा है।।

महोबत के एक इज़हार के इंतजार में उनकी मर जाने में एक नशा है।

आएंगे मर जाने के बाद भी याद उनको, इस एक एहसास में एक नशा है।।

गुले गुलशन गुले गुलफ़ाम ना सही।

नज़रो में तेरी ख़ास ना तो आम ही सही।।

छीन लिया ए सनम क्यों तूने दीवाने का सकूँ।

माफ़ किया दीवाने ने जा तुझ को मेरा खून।।

ए सनम फिर भी इतना तो रहम करना ही पड़ेगा।

जिंदा धड़कनो को इल्जाम तो कोई देना ही पड़ेगा।।

हुआ कसूर दीवाने से क्या, जो दूर तुम से हो गया।

देने को सकूँ खुद ही खुद से दीवाना तुम को मज़बूर हो गया।।

ख़्वाहिश अब एक ही है बाक़ी जो मेरी मेरे रब से।

ना हो पाए जुदा अब कोई मासूम अपने सनम से।।

ऐसा क्यों लगता है जिंदा सीने में धड़कते दिल पर ख़ंजर कोई ख़ूनी अब मुझ को मार दिया।

प्याला था जो एक ज़हर का, कपकपाते लबो से लगा कर अब हलक से अपने उतार दिया।।

गए जो भूल वो दीवाने को, अब यादों को भी उस की किसी तन्हाई में जो दफना डाला है।

ना भुला पाएगा ये दीवाना उनका उनको कभी, तन्हा इस ज़िन्दगी का एक वही तो सहारा है।।

ऐसा क्यों लगता है तन्हा इस ज़िंदगानी में दीवाने को दीदार ए सनम अब ना हो पाएंगे।

हरे है जो ज़ख्म अभी वो अब कभी भर ना पाएंगे, हरे ही रह जाएंगे।।

हरे हर ज़ख्मो को नासूर अब बना डालूंगा।

गए जो भूल वो मुझ को तो खुद को अब मिटा डालूंगा।।

बेपरवाह सनम की बेपरवाही ने एक दीवाने को जो बेहिंतिया तड़पा दिया।

ख़ामोश थी जो धड़कन ए दीवाना उन को एक उफनता तूफान बना दिया।।

दे कर ज़ख्म ए महोबत क़ातिल अदाओं से अपने, हर ज़ख्म ए दिल को फिर क्यों नासूर बना दिया।

जख़्मी दिल के ज़ख्मो पर दे कर हर बार एक ज़ख्म नया, फिर क्यों उसे पागल बना दिया।।

हर फ़ितरत उन की एक ज़हरीली चाल और हर अदा क़ातिल उन की अब नज़र आती है।

हुस्न वो शबाब उनका एक साजिश कोई दिलकश और महोबत उनकी अब एक ख़्वाब नज़र आती है।।

मज़बूर है परवाना भी चाहत से उनकी, आग ए हुस्न वो दहकती लपटे, जलना लपटों से उनकी अब अपनी उसे जिंदगानी नज़र आती है।।।

ना जाने फेर कर अपनी मदहोश नज़रो को क्यों, क़त्ल बेरहमी से एक दीवाने का सरेराह सनम ने मेरे कर दिया।

छोड़ कर तन्हा वीरानियों में एक दीवाने को क्यों, दिल दहकते अंगारो पर उसका बेदर्दी से सुलगा दिया।।

चाँदनी रात में अक्स ए अमावस्या सा काली रात का एक रोज़ दीवाने ने जो देख लिया।

मदहोश निग़ाहों से उन की बरसते अंगार ए जहनुम से दहकते नफरतों के अंगार, तड़पते दिल की हर टूटी धड़कन को लपटों से उनकी दीवाने ने जो सेह लिया।।

ज़ख्मी दिल के हर जख्मो को नासूर अब बना दिया।

बेपरवाही ने सनम की एक दीवाने को अपने जिंदा जो जला दिया।।

ए मेरे मालिक किसी हुस्न वाले को इतना मगरूर यू इस कदर बेपरवाह तो ना बना।

दिया जो धड़कता दिल तूने उन को, उसे कभी तो एहसास ए महोबत से धड़कना भी सीखा।।

तोड़ के दिल बेदर्दी से दीवाने का अपने, उन्हें यू बेक़दरी से इठलाना तो ना सीखा।

अक्स ए ख़ुदाई हर दिल कि जो धड़कनो में बसता, दिल को किसी मासूम के उन्हें यू ठुकराना तो ना सीखा।।

ऐसा क्यों लगता है जख़्मी दिल के ज़ख्मो पर मरहम ना कोई अब लग पाएगी।

तड़प ये तन्हाइयां दीवाने की कभी कम ना हो पाएंगी, उसे बेहिंतिया अब रुलाएगी।।

ऐसा क्यों लगता है यह ख़ूनी शायरी भी दीवाने के अब अपने किसी काम ना आ पाएगी।

रंग है बेहिंतिया लहू के इसमें जो मेरे, रंग वो अपना फिर भी अब दिखा ना पाएगी।।

दर्द ए दिल दीवाने का है जो, चाह कर भी उसे मिटा ना पाएगी, उसे बेहिंतिया अब तड़पाएगी।

अंगार ए जहनुम बरसते है जो निगाहों से बेपरवाह उनकी शराबी, तड़प ए जुदाई चाह कर भी बेबसी दीवाने की बयाँ ना कर पाएगी, उसे बेहिंतिया अब रुलाएगी।।

दर्द ए दिल जो दर्द ए महोबत धड़कते दिल की तन्हा धड़कनो में अब दफना दिया।

देखा कुरेद कर जब भी अधूरी चाहतो से ज़ख्मो को अपने तो उन्हें फिर से गहरा बना दिया।।

वक़्त ए ज़माने ने ये सितम फिर उन्हें एक रंग नया कोई बेहूदा दे दिया।

कभी मजनू (कैस) तो कभी दीवाना, जो दिलजलों को फिर एक नया कोई नाम दे दिया।।

पूछा पता जब भी महबूब का अपने तो रास्ता हर किसी ने हमे महखाने का जो दिखा दिया।

दे कर सहारा एतबार से खाली हाथों में भरा प्याला शराब का दीवाने के जो थमा दिया।।

गुज़रती है हर शाम ए दीवाना, मह को पीते हुए पास के अब एक महखाने में।

छीलते है हर जख्म ए दीवाना याद सनम को करते हुए पास के अब एक महखाने में।।

नाम ए सनम से खुलती है बोतल अब जो शराब की, दर्द ए महोबत जो जाम ए लहू, अब भी है साथ मेरे।

रुस्वा ए महोबत से तड़पते है दिल अब जो सरेराह ये सितम ए महोबत जो नाम ए सनम, अब भी है साथ मेरे।।

लेते हुए नाम ए सनम एक दीवाना जो अब जाम ए लहू के जाम बनाया करता है।

याद में उन की ए महोबत चिर कर जख़्मी दिल, तड़पते जाम पर लहू अपना फिर उसमें मिलाया करता है।।

आती है तस्वीर ए यार नज़र भरे जाम की गहराई से।

झलकता है दर्द ए दिल जो दीवाना, ख़्याल ए दिलबर की अपनी रुसवाई से।।

बिखर जाती है हिम्मत ए दीवाना थामे हुए है काँपते हाथों से जो फिर भी अपने वो छलकता जाम।

बिखेर देता है नाम ए महोबत वो लेते हुए नाम ए सनम, सूखते हलक में जो अपने वो छलकता जाम।।

देख जाम ए लहू दीवाने को यू पीते हुए, रो पड़ता है तड़पकर अब जो साकी वो मेरा।

दर्द ए दिल झलकता है उसका, जब भी मिलता है यार ए महखाना वो मुझ से साकी जो मेरा।।

रख कर तड़पते दिल पर हाथ अपना, फरमाता है कुछ अब वो मुझ से साकी वो मेरा।।।

ना कर सितम ये ज़ुल्म खुद पर ए दीवाने, दर्द ए दिल की तेरे इंतेहा जो अब हो गई।

देख हाल ए दीवाना सा हाल, ए दीवाने जो तेरा, तड़पते दिल की हर जिंदा धड़कने हर किसी की यहाँ जो खो गई।।

ना कर ग़म कि तेरा महकता ग़ुलाब जो कहि किसी वीराने में जो खो गया।

दर्द ए दिल चुभा कांटा जो धड़कते दिल पर तेरे, तड़प ए जुदाई वो सनम जो कहि तेरा खो गया।।

ठहर कुछ लम्हा तो, देख दरों दीवार ढहा कर जरा, हर गम ए महोबत जो गम कि तेरे।

साथ है साकी हर ग़म ए जिंदगानी देने को अब भी साथ सितम जो धड़कनो पर दिल की तेरे।।

लगा ठोकर धड़कनो से यह तन्हाइयां हर जुल्म ए जिंदगानी, अब भी है महकते महोबत के गुलिस्तां कई जो यहाँ, मौजूद है महकते कई गुलाब जो उन में बाकी।

धड़कता दे ये दिल रुकी हर धड़कती धड़कने, कर ले आबाद ये उजड़ा फिर से गुलिस्तां महोबत का अपना, अब भी है महक ए महोबत सांसो में कहि जो तेरे बाकी।।

लिख दे खून ए श्याही मौजूद है बहती हर जो रगों में तेरे, हर दर्द ए महोबत से कर दर किनार, कोई फिर एक महोबत की सुनहरी दास्ताँ।

क़लम ए महोबत ये दीवानापन, आरज़ू ये यकीं महोबत का महोबत से अब भी ये महोबत की तेरी जो एक हसीं दास्ताँ।।

करें हिम्मत तो क्या पा नही सकता दीवाना, हिम्मत ए हौसले से है जिंदा ये तेरी महोबत की जो हर एक दास्ताँ।।।

सुन कर दर्द साकी का अपने लिए, दर्द दीवाने का फिर से जो तड़प जाता है।

रख कर टूटे दिल पर हाथ अपने, दर्द टूटे दिल का अब दीवाना जो कुछ फ़रमाता है।।

ना कर जिद ए साकी मेरे ए यार ए महखाने, इस दीवाने ने अब काँटो को ही दिल से अपने लगाना है।

बिछुड़ गया ए महोबत जो महबूब मेरा, इस दीवाने ने अब तन्हाइयों से ही महबूब को अपने गले से लगाना है।।

 यार ए महखाना…

ना कर जिद कि जख़्मी दिल के दीवाने सब ज़ख्म तेरे तड़प तड़प कर फट जाए।

देख कर तड़प ये तेरी उखड़ती सांसे, तेरे साकी की धड़कने ना रुक जाए।।

मान ए दोस्त जो मुस्कुराते हुए सर अपना कटवाने को है तैयार।

राह ए महबूब पर खून अपना जो बून्द आखरी भी बहाने को है तैयार।।

ए दोस्त उन को भी नही मिल पाता है महबूब अपना जो सच्चा प्यार।

सितम ये महोबत उन को भी रहता है तहदिल से महबूब अपने का एक आख़री इंतज़ार।।

यकीं है दीवानों को ये क्यों देख कर नज़रो में उनकी वो महोबत पाक।

करेगा उन से जरूर उनका महबूब महोबत का अपनी जो एक इक़रार।।

यकीं है दीवानों को सदियोँ से ये क्यों, जाग जाएगी रूठी तक़दीर करेगी महोबत जब खुद उनका दीदार।।।

यकीं है उन को करेगा उन से भी कभी कोई इज़हार ए प्यार।

लौटेगी एक रोज़ उन के भी बंजर गुलिस्तां में महोबत की बहार।।

मगर ए हुस्न ए दीवाने, हुस्न वालो की हर अदा है निराली।

प्यार-महोबत से हर एक जज़्बात ए दिल उन के है ख़ाली।।

ना कर ए दीवाने इस क़दर किसी हुस्न वाले का इंतज़ार, इस ज़माने में है उनके और भी कई साथी-यार।

ए वक़्त इंतज़ार है उनका अब भी जो तुझे और वो है किसी गैर के साथी-यार।।

ए मेरे यार ए महखाने, ए दीवाने ना कर किसी हुस्न से इस कदर तू प्यार की धड़कती धड़कने टूट जाए और बे-दम सा ये तेरा दम छूट जाए।

जान ये सांसे तो रुकेगी तेरी पर उन से कही कोई तेरा अपना ही ना मर जाए।।

ए दीवाने उस बेपरवाह हुस्न से ना कर तू किसी संगदिल से इस क़दर प्यार।

जान इस ज़माने में और भी है कई तेरे साथी दीवाने जो तेरे यार।।

रहता है हर लम्हा बेबसी से उन्हें तेरा आज भी जो एक इंतज़ार।

आ लौट आ वापस मेरे हम दम मेरे साकी ए दीवाने मेरे यार।।

गुम ना हो जाए कहि तू किसी अँधेरे बियाबान में, कोई चिराग़ भी कही ना रहे बाकी।

आ लौट आ हम प्याला मेरे ए साकी, दे रहे है अवाज़ तुझे तेरे सब संगी-साथी।।

 दर्द ए दिल दर्द ए दीवाना…

सुन कर दर्द से भरी साकी की अपनी वो पुकार, दर्द ए दिल तड़प कर कराह उठता है दीवाना।

दफ़न है हर दर्द ए महोबत महफ़ूज जो सीने में, चिर के जख़्मी दिल उनको अब जो दिखलाता है दीवाना।।

ए मेरे हमदर्द मेरे साकी दर्द ए दिल यू ही दिल से मिटाया नही जाता।

कर के वफ़ा सनम से यू ही सरेराह उसे फिर भुलाया नही जाता।।

ना दे बिखरते अरमानों को हवा मेरे ए मेरे साकी।

सुलगते हर अंगार में आग है मेरे अब भी बहुत बाकी।।

ना छेड़ो दम तोड़ती उम्मीदों का मेरी दिया, दिल ये दीवाने का अभी और जलना है बाकी।।।

लहू की हर एक बूंद से आख़री अपने, नाम ए सनम दीवाना लिखते जाएगा।

आख़री कतरा भी लहू का जिस्म से अपने, नाम ए सनम पर दीवाना अपने बहाएगा।

हुआ क्या कसूर दीवाने से जो तूने भुला डाला उसे।

देनी थी हर ग़ुनाह की सज़ा पर जीते जी तूने मार डाला उसे।।

ना छेड़ो ए मेरे साकी, मेरे टूटे दिल की टूटी धड़कनो के अब वो बेजान तार।

ना सुर है उन में कोई अब बाकी और ना ही बच पाई उन में अब कोई जान।।

ना भड़काऊ अधूरे अरमानों को ज़ख्मी मेरे, इस दीवाने को कोई अब आराम नही।

महबूब से वफ़ा के अलावा अब अपने, इस दीवाने को कोई दूसरा अब काम नही।।

ये माना दीवाने ने कि तुम भी उस के नज़र अपने आते हो।

दे रहे हो सहारा और प्यार से दीवाने को जो थाम रहे हो।।

पर ए मेरे साकी दस्तूर ए महोबत दीवाने को जलना ही होगा।

वफ़ा की है जो सनम से तो दीवाने को अब मरना ही होगा।।

काश वो सितमगर भी दर्द ए दिल दीवाने का जान जाते।

काश वो सितमगर भी आरज़ू ए महोबत हमे अपना कह पाते।।

फ़ना हो कर भी ये दीवाना फिर आज मुस्कुराता।

गुनगुनाता नग़मे महोबत के और दामन में उनके कहि गुम हो जाता।।

हर बात से दीवाना जो उनकी अंजान नही।

यकीं है बेवफ़ा वो नही इस बात से अनजान नही।।

मासूम है दिलबर वो मेरा शायद कुछ मदहोश है।

नशा है जवानी का जोर उस पर, शायद इसीलिए हुस्न से कुछ मगरूर है।।

ग़ुनाह ये उस का इस मे तो नही, शायद ये दीवाना और ये वफ़ा ही क़ाबिल उस के नही।

ग़म है महबूब इसी बात का मेरे, क्यों ये दीवाना और ये वफ़ा उसकी क़ाबिल तेरे नही।।

हुआ क्या ग़ुनाह जो दीवाने से जो सनम ने उसे ठुकरा दिया।

दे कर प्याला ए ज़हर सरेराह जो जीते जी फिर उसे भुला दिया।।

हुआ क्या ग़ुनाह यार से जो ख़ंजर सीने में बेवफ़ाई का सनम ने बेवाफ़ाई से उतार दिया।

क़त्ल बेपरवाह निग़ाहों से धड़कते दिल पर जो दीवाने के वार बेदर्दी से उसने किया।।

एहसास है, नही अंजान ये दीवाना कि तुझ में भी है वफ़ा ए महोबत।

एहसास है, नही बेपरवाह ये परवाना कि तुझ में भी है अरमान ए महोबत।।

दीवाना क्यों वफ़ा के फिर ये तेरी, क़ाबिल तेरे नही।

परवाना क्यों अरमानों के फिर ये तेरे, क़ाबिल महोबत के तेरे नही।।

तोड़ सकती है कैसे दिल एक मासूम का तू अपने दीवाने के।

खेल सकती है कैसे दिल से टूटे तू अपने एक परवाने के।।

सीने में धड़कता दिल क्या पास तेरे नही।

अक्स ए महोबत रूह में तेरे क्या एहसास कोई नही।।

गए नज़दीक जान कर जो दिलबर हम अपना उसे।

क़त्ल ये बेरूखिया छोड़ गए जो बीच मझधार वो मुझे।।

तोड़ कर दिल ए दीवाना सरेराह जा रहे है जो मुस्कुराए।

तोड़ कर दिल वो दिलबर फिर से दीवाने को हैं जो तड़पाए।।

आह! जान एक रोज़ आह ये दिल की टूटे, जख़्मी ना कर दे चिर कर कलेजा तुम्हारा।

जान एक रोज़ बरसाएगा लहू ये जब आसमां, देख कर घबरा ना जाए वक़्त ए कलेजा तब कलेजा तुम्हारा।।

हुआ था एहसास दीवाने को भी कभी एक कि तू भी है महरबान।

हुआ था एहसास दीवाने को भी कभी एक कि तू भी है क़द्रदान।।

क्यों है नसीब अब जिंदगी में मेरे ये जलती श्मशान।

क्यों है नसीब अब गुलिस्तां में मेरे ये बंजर बियाबान।।

खुद ही घायल हु बेबाक़ हुस्न से जो तेरे, इल्जाम अब इसका किस को दु।

खुद ही आशिक़ हु पाक महोबत से जो तेरी, इल्जाम अब इसका किस को दु।।

काश जान सकती हाल ए दिल तू दीवाने का अपने, ख़्याल ए महोबत इस दिल मे दिवाने के ख़्याल ए सनम के तेरे कोई दूसरा ख़्याल नही आया।

हो सकता है फ़ना महोबत के एक इज़हार के इंतजार में तेरे दीवाना तेरा, ए महोबत फिर क्यों देख कर दीवाने को कभी तुझ को दीवाने पर प्यार नही आया।।

अफ़सोस है दीवाने को बहुत तेरे की क्यों प्यार तेरा उसे कभी मिल ना पाया।

हाल ए दिल क्यों सनम को अपने वो अपना कभी समझा ना पाया।।

 एहसास ए दीवाना ये दीवानापन…

देख कर यू दीवाने को अपने हँसना यू खिलखिलाना ठीक नही।

हंसी ये खिल-ख़िलाहट में तेरी नज़र दीवाने को तेरा प्यार आता है।।

आती है जब भी ख्यालों में तू मेरे, तो ख़्याल ये तेरा हमेशा से ही मुझ को बहुत सताता है।।।

ए सनम अब बता दे तू ही कि किस तरह अपनी पाक महोबत के सच्चे इज़हार का तुझ को यकीं दिला पाएगा अब दीवाना।

ए सनम अब बता दे तू ही कि किस तरह से सोई धड़कनो को तेरी बना कर अपना जगा पाएगा अब दीवाना।।

ऐसा क्यों लगता है दीवाने को अब वो मर कर भी महोबत तुझ में वो दिल मे तेरे प्यार ना अपना जगा पाएगा।

अरमान एक दीवाने का आखरी एक ही है अब बाकी, लेकर नाम ए महोबत, नाम ए सनम वो नाम तेरा, चौखट पर तेरी दम अपना तोड़ जाएगा।।

ना होना खफ़ा इस बात से ए रूठे सनम, ये दीवाना तो ख़ामोश नज़रो से करते हुए एक दीदार तेरा खामोशी से दम अपना छोड़ जाएगा।

ले कर नाम ए सनम, नाम तेरा ए महोबत वो सरेराह तेरा दीवाना, भरे इस ज़माने में चाह कर भी बदनाम ना तुझे अब कर पाएगा।।

 दर्द ए दिल एक हक़ीक़त…

हो रही है लाल ग़ुलाब पर मेरे लहू की बहते आज जो बरसात।

हो रही है महबूब की मेरे किसी और से आज पहली जो मुलाक़ात।।

देख कर मंजर ये बर्बादी का अपनी, जिंदा जिस्म में मेरे क्यों मेरी रूह रो रही है।

वो समा वो वक़्त भी अब आ गया, ज़िन्दगी जब मुझ से मेरी बेवफ़ा हो रही है।।

मर भी गया जो आज तो ग़म नही कोई दीवाने को, नही जी सकता दीवाना रुस्वा अब बेदर्द इस ज़माने में।

मरना तो चाहता है कौन इस ज़माने में ए दीवाने, मगर कुछ भी नही बाकी बिन सनम के बेदर्द इस ज़माने में।।

दीवाने को अब भी क्यों सनम का रहता है इंतज़ार।

दीवाने को अब भी क्यों लगता है सनम से उस का होता है इज़हार।।

मासूम है सनम मेरा, बेवाफ़ाई उस मे कोई नही।

घड़ी है शायद ये आखरी उस के अब जो फैसले की।।

खड़े है दरिया ए महोबत के अब भी उस पार जो अब।

उठेगा उफ़ान ए सैलाब जब तो डूब जाएंगे मुसाफ़िर वो तब।।

दे रहे जो साथ एक फ़रेबी का आज जो अब।

देखना एक रोज़ देख बेवफ़ाई एक काफ़िर की बहुत पछताएंगे वो तब।।

दे देगा दग़ा महोबत का सनम को जब भी फ़रेबी कोई, दिख रहा जो सनम को अपना दीवाना अपने क़रीब।

कूद जाएगा नाम ए सनम से आग ए जहनुम में जो, महोबत से सनम की जो ये महोबत का उन की दीवाना उनके क़रीब।।

निभाएगा सितमगर सनम से अपने ये दीवाना उन का फिर भी हर लम्हा साथ।

एहसास ए बेवफ़ाई ले आएगा खिंच कर हर बेवफ़ाई से उन को बाहर या डूब जाएगा साथ उनके ये दीवाना निभाते हुए सनम का अपने साथ।।

खा कर दग़ा किसी मक्कार से आएगी वापस यही पर वो।

तोड़ कर दिल एक दीवाने का एक रोज़ बहुत पछताएंगी वो।।

टूटे दिल को अपने नही जोड़ पाएगी फिर वो।

फ़रेबी महबूब की बेवफ़ाई से तड़पते ही जाएगी फिर वो।।

वफ़ा दीवाने से अपने शायद कर पाएगी तब वो।

साथ दीवाने का अपने शायद निभा पाएगी तब वो।।

टूटेगा दिल जब उस का तो आएगी मेरी याद।

नही बेवफ़ा ये दीवाना दे देगा तब भी वो उसका साथ।।

राह ए सनम पर आख़री दम तक दीवाने को वही है खड़े रहना।

सितमगर पलट भी जाए चाहे देख कर मुझ को मेरे वो, राह ए सनम दीवाने को मगर राह पर उनकी वही है खड़े रहना।।

चिर जर जख़्मी दिल दीवाने ने लहू अपना बहा दिया।

भर कर प्याला लहू से फिर अपने लबो से जो लगा लिया।।

लेते हुए नाम ए सनम हलक से फिर अपने उसे जो उतार दिया।

ज़हर ए महोबत रग रग से फिर जिस्म में अपने जो फैला दिया।।

महोबत ए सनम के अलावा वीरान ज़िंदगानी में ना रहा अब कुछ बाकी।

दीदार ए सनम के अलावा, ख़ामोश नज़रो में नज़ारा ना रहा अब कुछ बाकी।।

नही हिम्मत देने की दर्द दीवाने में सनम को जो अपने।

चाहता है हर दर्द से मर जाने को दीवाना, सनम के जो अपने।।

टुकड़े टुकड़े कर दे चाहे बेबस दिल के अब वो मेरे।

रोक भी दे धड़कने चाहे जिंदा दिल की अब वो मेरे।।

हर टुकड़े पर दीवाने ने दिल के नाम ए महोबत जो नाम ए सनम लिख दिया अपने।

दम तोड़ती महोबत पर दीवाने ने इंतज़ार ए महोबत जो इंतज़ार ए सनम लिख दिया अपने।।

चाहे दीवाना अब मर भी जाएगा।

खुले ज़ख्मो को अब दिल के सील ना पाएगा।।

फट गया खुद ही ज़ख्म मेरा नासूर नासूर बन के।

फट गया खुद ही ज़ख्म मेरा बेअसर हर मरहम को कर के।।

बना लिया पत्थर अब खुद इस दिल को पत्थर होते एहसासों से अपने, इल्जाम इस का अब दु किसे।

जला दिया जिंदा अब खुद जिस्म को जलते एहसासों से अपने, इल्जाम इस का अब दु किसे।।

कहते है आशिक़ वो दीवाने सदियोँ से भी पुराने, होते है एहसास ए महोबत इस ज़माने में अरमान ए पत्थर भी।

कहते ये आशिक़ वो दीवाने सदियोँ से भी पुराने, होते है एहसास ए वफ़ा इस ज़माने में असूल ए पत्थर भी।।

हो गए एहसास जो दीवाने के पत्थर से एहसास, कुछ अरमान उसके उन में एहसास अब भी है जो बाकी।

दम तोड़ने का दामन में सनम के अपने, फ़रमान जो आख़री दीवाने का एक अरमान अब भी है जो बाकी।।

आख़री दम तक राह ए सनम पर इंतज़ार ए सनम से एक इंतज़ार आखरी अब भी है जो बाकी।।।

उम्मीद है इंतज़ार को दीवाने के अब उस के, नही करना होगा अब उस का और इंतज़ार।

करना होगा एक रोज़ महबूब को भी बिछुड़े, दीवाने का अपने एक आखरी दीदार।।

उस लम्हा, उस रोज उस को भी शायद महोबत का एक इकरार अपने दीवाने से हो जाएगा।

चौखट से दीवाने का जब उस की, बेदर्दी से सरेराह जनाज़ा जब रुस्वा हो जाएगा।।

हुस्न और इश्क़ का नही है दूर अब मेल।

या तो पा लेगा दीवाना अब उस को,

नही तो कर देगा ख़त्म यह खेल।।

पड़ा है चौखट पर तन्हा महबूब की दीवाना एक, रख कर सर अपना जो लहू-लुहान।

जख़्मी है दिल उसका और ख़त्म होने को है धड़कती हर धड़कनो में धड़कती जो जान।।

दम तोड़ते दीवाने की एक यही आख़री जो तमन्ना है अब बाकी।

सर है चौखट पर उनके और उनके एक आख़री दीदार की तमन्ना है अब बाकी।।

जिस्म है जख़्मी मेरा, लहू उस का जो अब भी बह रहा।

नाम ए सनम लेते हुए वो लम्हा जो मौत का अपनी ढूंढ रहा।।

ये दम तोड़ती सांसे कर रही है इंतज़ार जो अब भी एक आख़री अपने सनम का।

ये पत्थराई सी नज़रे ढूंढ रही है दीदार जो अब भी एक आखरी अपने सनम का।।

हो पाएगा छूटता दम छूटने से पहले क्या, दीदार ए यार उस को।

मिल पाएगा टूटती धड़कने टूटने से पहले क्या, इज़हार ए यार उस को।।

उम्मीद ए दीवाना अब भी है कायम जो, आएंगे जरूर सनम उसके, टूटता दम उसका छूटने से पहले।

उम्मीद ए दीवाना अब भी है कायम जो, थाम लेंगे जरूर सनम उसके उसको उसकी टूटती सांसो के टूटने से पहले।।

क्या आ पाएंगे करीब दीवाने के वो दीवाने के गुजर (मृत्यु, मौत) जाने से पहले।

क्या दम तोड़ते दिल को धड़का पाएँगे वो दीवाने के दम दीवाने का टूट जाने से पहले।।

देखना है दीवाने को अब करीब आती है वो कब।

दीदार ए सनम से दिल दीवाने का धड़काती है वो कब।।

करता है ये दीवाना अब भी उन से इज़हार ए महोबत जो अपनी, है जो उस के सनम।

करता है ये दीवाना अब भी हर फ़साने से दीदार ए सनम, टूटती धड़कनो में अपने लिए तस्वीर ए सनम।।

वक़्त की चाल पर हम से जो सनम हमारे बेवफ़ा हो गए।

ढूंढता है फिर भी ये दिल उन्हें जो सनम हमारे हमसे बेवफ़ा हो गए।।

मार के जख़्मी दिल पर ख़ंजर ख़ूनी, सनम हमारे जो हम से रूठ गए।।।

टूटे दिल में लिए एक तस्वीर ए यार, पड़ा है चौखट पर सनम के एक दीवाना।

आती है याद जब उसकी, चिर कर दिल, कर लेता है दीदार ए यार उसका दीवाना।।

जख़्मी है दिल ये मेरा, रग रग में उफनता एक तूफान।

खाया है धोखा प्यार का, ना खेलों मुझ से अब तुम मेरी जान।।

सितम ये तेरा देख कर जलजला ज़िन्दगी में दीवाने की जो आ गया।

हो गया जो दूर तुझ से दीवाना, तो चौखट पर तेरी ये जनाजा मेरा जीते जी ही जो आ गया।।

एक आरजू आखरी चौखट पर उस की दम ये अपना तोड़ दूंगा।

आएगी जब वो सामने तो टूटती सांसो को ये अपनी छोड़ दूँगा।।

 पहली महोबत का अपनी, ये अंजाम ना सोचा था।

चौखट पर महबूब की अपने, ये अंजाम ना अपना सोचा था।।

दीदार ए सनम की एक चाह जो आख़री, बदल गई कब इंतज़ार ए सनम में यह मालूम भी ना हो पाया।

भरे संसार मे कब बन गया तमाशा ये दीवाना, एहसास इस बात का उसे एहसास भी न हो पाया।।

आए नही जो सनम वो मेरे, जरूर उन की भी कुछ मजबूरी होगी।

ऐसा क्यों लगता है अब ख़त्म नही उन से कभी, यह दूरी होगी।।

उन को इतना भी नही मुझ से है वास्ता जो… जरूर।

दीवाना शुरू से ही उन का और अब भी देख रहा है रास्ता जो… जरूर।।

नज़रो में अपनी उनका अब भी एक आख़री दीदार लिए बैठे है।

दम तोड़ती धड़कनो से अपनी अब भी एक आखरी उनका इंतज़ार लिए बेठे है।।

कहता है दिल ए दीवाना जो, जल्द ही वो आएंगे जरूर।

लगता है ऐसा, दम तोड़ते अरमानों को वो थाम लेंगे जरूर।।

हो गई है धड़कने भी बेवफ़ा रुकने का जो नाम नही लेती।

इंतज़ार है उनको भी सनम का और वो आराम नही लेती।।

याद है दिलबर का अब भी जो दीवाने को, मासूम वो चेहरा हसीं, उसका जो फ़रेबी।

ज़ख्मी है दिल ये दीवाने का जो उसके, एहसास है हाल ए दीवाने का धड़कनो को क्या उसकी जो फ़रेबी।।

लग गई है भीड़ चारो ओर अब जो मेरे, कोई कहता है मजनूं (कैस) तो कोई फ़रियाद।

पड़ा है ये दीवाना क्यों यहाँ, और कर रहा है शायद किसी संगदिल सनम को अपने याद।।

एक आख़री दीदार ए सनम की चाह से, बन गया है तमाशा अब दीवाना।

कहा है सनम मेरा, एक आख़री सांस से पुकारा है जो अब दीवाना।।

आह! धड़कने दीवाने की सरेराह जो अब तड़पने लगी।

हो कर दूर सनम से अपने बिछुड़े, जो अब टूटने लगी।।

हो गया लाल लहू से दीवाने के चौखट का उसकी वो फ़र्श जो काला।

ले रहा इम्तेहां ए दीवाना, ए महोबत ये वक़्त चौखट पर सर जिस का फ़र्श जो काला।।

आंगन से उस के भी जो तेज़ शोर एक आ रहा।

उस को भी है मालूम शायद, टुटता दम तोड़ने से पहले उसे उसका दीवाना बुला रहा।।

कर दी देर आने में उन्होंने जो बेहिंतिया।
पंछी तो कब का उड़ गया महोबत का
अब तो खाली रह गया है जो पिंजरा।।

 तड़पते एहसास…

महोबत की बिसात पर सनम अब कहि जो खो गया।

टूट गई धड़कन ए दीवाना और अब कहि वो जो सो गया।।

आए नही सनम जो मेरे और दम मेरा जो वही छूट गया।

खुली रह गई आंखे मेरी और पंछी महोबत का जो कहि उड़ गया।।

एक उम्मीद दीदार ए सनम आख़री साथ अपने ले गया।

माट्टी का पुतला था जो माट्टी में ही कहि वो घुल गया।।

एक एहसास जो ख़ामोशी अब चारो ओर छा गई।

देखने को ये हाल ए दीवाना घर से बाहर अब वो क्यों अपने आ गई।।

सच्ची महोबत को दीवाने की अपने क्यों ये हुस्न वाले जान नही पाते।

सच्चे हम दम को वो दीवाने को अपने क्यों ये हुस्न वाले पहचान नही पाते।।

चाहे दम अपना तोड़ भी दे वो सांसे अपनी जो आख़री, महोबत में उनकी महोबत के एक इकरार के इंतज़ार में, फिर भी क्यों दीवाने को अपने अपना वो कह नही पाते।

मिलते है तक़दीर से दीवाने ऐसे बेदर्द इस ज़माने में, एहसास ए महोबत वो महोबत दीवाने की अपने, फिर भी क्यों इस एहसास को ये हुस्न वाले पहचान नही पाते।।

यारों के लबों से…

बिन तेरे ए मेरे यार रो रहा दिल यारो का तेरे, तड़प ए एहसास जो तुझ से कर रहे है अब भी फ़रियाद।

रुकते नही आंखों से पथराई जो उनके बहते हुए ऑंसू, पुकारते है ए रूठे यार वो तुझ को करते हुए अब भी याद।।

ना करना कभी किसी बेपरवाह हुस्न से इस क़दर प्यार कि दिल से मजबूर हो जाओ।

छोड़ कर साथ जिंदगानी का अपनी, अपने यारो से इस क़दर जो दूर हो जाओ।।

मिलती है सच्ची महोबत इस ज़िंदगानी में नसीब से।

मिलता है सच्चा दीदार ए सनम इस ज़िंदगानी में नसीब से।।

ए मेरे यार और भी थे कई मुक़ाम, महोबत के अलावा इस ज़माने में।

एक वो नही था तेरा यार जो बेवफ़ा सनम, तेरे और भी थे कई यार सच्चे इस जमाने मे।।

खो गया ए दीवाने बेपरवाह महोबत के किस अंधेरे बियाबान में अब तू।

रूठ के यारो से अपने ए दीवाने कहा चला गया अब तू।।

काश इस एक एहसास को हमारे तू जान जाता।

काश इस ज़माने में हमे भी तू अपना समझ पाता।।

अब भी है हम जो तेरे यार।

करते है तुझ से जो बेहिंतिया प्यार।।

 रूह ए दीवाना…

तड़प के रो रही रूह ए दीवाना, कर रही किस से अब फ़रियाद।

माना था सनम अपना जिसे, अब भी है किसी गैर के वो साथ।।

होता है एहसास आज ये दर्द ए दीवाना जो एहसास ए रूह ए दीवाने को एक कि पी कर भी हर सैलाब आँसुओ का खारें अनन्त अपने वो प्यासा जो रह गया।

होता है एहसास आज ये एहसास ए रूह ए दीवाना को एहसास एक कि हो कर फ़ना एक बेवफ़ा सनम पर कही कुछ अधूरा सा वो कहि जो रह गया।।

एक बेपरवाह सनम के सितम से गुजर (मर) गया जो ये दीवाना।

गुजर (मर) कर यारो से अपने बहुत दूर हो गया जो ये दीवाना।।

काश वक़्त को बदल सकता जो मैं।

काश जिंदा फिर से हो सकता जो मैं।।

याद है दम दीवाने का छुटा था जब।

आह! भी ना निकल पाई थी उसकी तब।।

डर था दीवाने को यह एहसास शायद, आह से उसकी कहि आह ना सनम की निकल जाए।

भरे ज़माने में सरेराह कहि यू ही बदनाम ना वो हो जाए।।

काश ज़िन्दगी में अपनी ए महोबत उन्हें, एतबार महोबत का पाक अपनी दिला पाता।

काश ज़िन्दगी में अपनी ए महोबत उन्हें, यकीं महोबत का एक एहसास अपना करा पाता।।

तो तक़दीर आज कुछ और होती प्यार की मेरे।

हर हार में जीत फिर आज होती प्यार की मेरे।।

 एहसास…

ए वक़्त मगर दम अपना अब तोड़ चुका जो दीवाना।

चौखट पर उनकी हर सांस आखरी अब छोड़ चुका जो दीवाना।।

चाह कर भी जिंदा ना अब हो पाएगा ये दीवाना।

चाह कर भी इज़हार ए महोबत सनम से ना अब कर पाएगा ये दीवाना।।

दास्ताँ ए महोबत में अपनी दम तोड़ गया अपना दीवाना।

दास्ताँ ए महोबत में अपनी लूट गया अपना दीवाना।।

चाह कर भी कुछ ना कर पाएगा अब दीवाना।

अधूरी महोबत की इस दास्ताँ को अब पूरा ना कर पाएगा दीवाना।।

 पैगाम ए महोबत एक पैगाम आखरी…

”दास्ताँ ए महोबत कभी भी इस ज़माने से ख़त्म ना हो पाएगी।

मौत दीवाने की भी यह दास्ताँ मिटा ना पाएगी।।

हर जन्म में दीदार ए सनम एक ख़्वाहिश आख़री दीवाने की रहेगी।

हर जन्म में चाहत ए सनम एक आरज़ू उसे पा लेने की रहेगी।।

अधूरी महोबत की यह दास्ताँ एक रोज़, अंजाम को आखरी अपने, हा अधूरे प्यार को अपने, पा ही लेगी, पा ही लेगी, पा ही लेगी…”

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

09/04/2019 at 10.40 am
(वीडियो लिंक के साथ 22जुलाई 2019 at 1:25 pm)

👉 निचे अंकित मेरी इस दर्दभरी नज़्म दास्ताँ की रिकॉर्डिड नवीनतम वीडियो का लिंक नीचे अंकित है जिसको छू कर आप मेरी इस दर्दभरी नज़्म दास्ताँ एक इंतज़ार… महोबत। का आपके अपने YouTube चैनल Vikrant Rajliwal पर स्वयं मेरी आवज़ में देख सुन कर मेरी इस दर्दभरी नज़्म दास्ताँ या यह कहना अब अधिक उचित होगा जी आपकी अपनी इस दर्दभरी नज़्म दास्ताँ एक इंतज़ार…महोबत। का लुफ्त उठा सकते है।

वीडियो एक इंतज़ार… महोबत। का वीडियो लिंक नीचे अंकित है।
👉
https://youtu.be/aOBlMrmejqk 💗💗

(वैसे तो मैने बहुत सतर्कता बरती है टाइप करते वख्त फिर भी अगर कहि भूल वश टाइपिंग में कोई त्रुटि ही गई ही तो आपसे क्षमा प्रार्थि हु। एव यकीन रखिएगा उसको जल्द ही सुधार दिया जाएगा)

🙃 “मसखरे” (REBLOG WITH YOUTUBE VIDEO LINK)

एक समय की बात हैं। कुछ मसखरे एक टटू ठेले में सूट बूट पहन कर कहि कार्यक्रम पेश करने को जा रहे थे। नही नही शायद कहि से आ रहे थे। तभी एक मसखरा जिसने शायद कुछ मदिरा पी हुई थी दूसरे मसखरे के पैर पर पैर रखते हुए उसे कोंचते हुए, हँसते मुस्कुराते हुए एक कुटिल मुस्कान बिखेरता हुआ आगे को खिसक जाता है। 

उसकी यह हरकत उस दूसरे मसखरे को जिसने मदिरा तो नही पी थी परन्तु उसे भांग का शौक जरूर था और शायद आज उसने भांग की कई बड़ी बड़ी गोलियां एक साथ अपने हलक से लगा कर निगल भी रखी थी। उसको पहले वाले मसखरे की यह बात या हरकत कतई भी बर्दाश ना हो पाई और वह भी आगे को खिसकते हुए उस शराब के नशे में धुत पहले वाले मसखरे के पैर को अपने भांग के नशे के सरूर में अपने फावड़े जैसे खुदरे पाँव से कुचलने की एक कोशिश करता हैं। और कुचल भी देता है। पर यह क्या हुआ उसी समय उनके उस टटू ठेले का पिछला पहिया जंगल के बीचों बीच, रास्ते के एक गड़े में अटक कर जाम हो जाता हैं। और उस पहिए के अचानचूक रुक जाने से या इसे आप यू भी कह सकते है कि उसके यूं जाम हो जाने से उतपन उस एक जोरदार झटके से उस टटू ठेले में सवार वह समस्त मसखरे धड़ाधड़ लुढ़कते हुए एक दूसरे पर गिरने लगते हैं। और एक भयानक शोर मचाते हुए एक दूसरे के बालों से लेकर चेहरे तक को अपने जग विख्यात नुकीले नाखूनों से नोचने खोचने लगते हैं। और इस नोच खरोंच से उतपन दर्द से वह तमाम मसखरे और भी जोर से चीखने चिलाने लगते है।

तभी उनके उस टाटू ठेले के चालक को, जो अब भी उस टाटू ठेले के उस जाम पहिए को अपनी सम्पूर्ण ताकत के जरिए रास्ते के गढ़े में से बाहर निकालने की एक भरपूर कोशिश कर रहा था और अपनी इस कोशिश में वह थक कर चूर हो चुका था। यहाँ तक कि उसके इस असफल प्रयास से उसका वह तंग पैजामा भी कहि कहि से पीछे की तरफ से उधड़ कर फट गया था। उसको उन मसखरों के इस तरह के बेमतलब के मसखरेपन पर बेहद गुस्सा आ जाता हैं और वह अपनी फ़टी पतलून को संभालते हुए उस टाटू ठेले पर एक झटके से चढ़ जाता है और उन मसखरों से इस तरह के इन कठिन या जटिल हालातों में यू बिन बात ही उनके लड़ने झगड़ने का कारण पूछ बैठता है।

पर यह क्या तभी वह समस्त मसखरे उस पर जोर जोर से चीख़ते चिलाते हुए उसकी ओर बढ़ने लगते है। उन सब के (मसकरो के) इस तरह के अजीब बर्ताव पर वह टाटू ठेले का चालक उन्हें संयम से व्यवहार करने की हिदायत देता है। और उन्हें शांति बनाए रखने का आग्रह करते हुए धीरे धीरे पीछे को हटते हुए उस टाटू ठेले से नीचे उतर जाता है।

अब तो उन समस्त मसखरों का गुस्सा सातवें आसमान तक पहुच जाता है क्योंकि उन विश्व विख्यात प्रसिद्ध मसखरों को उस टाटू ठेले के चालक कि यह बात, यह समझदारीपूर्ण राय किसी बेहद संगीन गुस्ताखी से कम प्रतीत नही होती। और वह आपस में झगड़ना बन्द कर उस टाटू ठेले के चालक को जो अब फिर से अपनी कहि कहि से पीछे से फ़टी पतलून को संभाले हुए अपनी सम्पूर्ण ताकत का इस्तेमाल करते हुए उस टाटू ठेले का पहिया जो कि बीच जंगल के उस रास्ते पर एक गढ़े में धंस कर जाम हो गया था को निकालने का पुनः एक प्रयास कर रहा था। उसको आवाज देकर अपने समीप बुलाते है और जैसे ही वह अपनी उस फ़टी पतलून को सम्भाले हुए कुछ लँगड़ाते हुए कदमो के साथ लड़खड़ाता हुआ उन मसखरों के समीप उपस्थित होता है कि तभी वह मसखरे उसे तुरंत ही झपट कर पकड़ लेते है। और जिस हाथ से वह अपनी कहि कहि से पिछे से फ़टी पतलून को सम्भाले हुए था को खींच कर अलग कर देते है। और उसकी उस कहि कहि से पीछे से फ़टी पतलून के चिथड़े चिथड़े कर के बिखेर देते है।

इतने से भी जब उनका गुस्सा शांत नही होता है तब वह उस टाटू ठेले के चालक को उसके ही टाटू ठेले के उसी पहिए से बांध देते है जो कि रास्ते के एक गढ़े में धंस कर जाम हो गया था। वह भी बिना किसी रस्सी के इस्तेमाल करे, अपनी अपनी पतलून उतार कर, पतलून से सटी एकलौती अपनी अपनी लँगोटी के साथ।

और अंत मे हँसते मुस्कुराते, खिलखिलाते हुए, उस टाटू ठेले के चालक को वही उस घने जंगल मे उस सुनी राह पर छोड़ कर और भी घने जंगल और ऊंचे ऊंचे पर्वतों की ओर अपना नंगा बदन लिए दौड़ लगते हुए दौड़ने लगते है। और वह टाटू ठेले का लगभग अर्ध नगन हो चुका चालक खुद को ठगा सा महसूस करते हुए वही पर बेबसी के साथ बन्धा हुआ उन मसखरों को नंगे बदन से दौड़ लगाते हुए देखता रहा।

अंत में मैं आपका अपना मित्र कवि, शायर एव नाटककार विक्रांत राजलीवाल इतना ही कहना चाहूंगा कि…

ना देना मसखरों को कभी राय कोई नसीहत, तुम नेकी भरी।
ना पूछना कारण, उनसे तुम कभी उनकी किसी भी मसखरी का,
भाग जाएगा वरना बांध कर तुम को भी वो, बिन रस्सी के अपनी एकलौती लँगोटी सा…

समाप्त।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

Republish on vikrantrajliwal.com 09/07/2019 at 12:38 am

👉 🙃 व्यंग्य किस्सा “मसखरे” मेरे द्वारा लिखित एक हास्य व्यंग्य किस्सा है। जिसको आज अपने स्वयं के स्वरों के साथ प्रथम बार अपने YouTube चैनल के माध्यम द्वारा जीवंत रुप देने का प्रयास किया है।

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1) आपकी अपनी ब्लॉग साइट पर प्रकाशित दर्दभरी दास्ताँ “पहली नज़र” का अपने YouTube चैनल Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal पर स्वयं के स्वरों के साथ प्रसारण करूँगा।

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3) अपनी सक्रिय अत्यधिक विस्तृत दर्दभरी नज़्म श्रृंखला दास्ताँ के अंर्तगत अपनी प्रथम (पहली) प्रकाशित दर्दभरी नज़्म दास्ताँ “एक इंतज़ार” का अपने YouTube चैनल पर स्वयं के स्वरों के साथ प्रसारण करूँगा।

4) अपने एक और सक्रिय ब्लॉग एक सत्य। को आगे बढ़ाते हुए स्वयं के जीवन का अत्यंत ही शुष्म अध्ययन करते हुए अंजाम (निष्कर्ष) तक पहुचना एव प्रकाशन करना।

👉 यहाँ आपसे कुछ वार्तालाप अवश्य करना चाहूंगा कि जैसा कि आपको ज्ञात है कि मैं अपने जीवन मैं अत्यधिक व्यवस्था के बावजूद बीते कुछ वर्षों से एक अत्यंत ही विस्तृत नाटक एव कहानी और भी कार्य कर रहा हु हालांकि आज से दो से अढ़ाई वर्ष पूर्व ही मैंने अपनी उस कहानी एव नाटक का लगग 90% कार्य पूर्ण कर लिया था। परन्तु प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के कारण मैं अपनी उस प्रथम कहानी, एक नाटक पर कुछ खास और अधिक कार्य अभी तक नही कर सका हु। परंतु अपने उस अधूरे कार्य को भी आप सभी मित्रजनों एव परिजनों के आशीर्वाद से शीघ्र ही पूर्ण कर दूंगा।

यहाँ मैं आपको सूचित करना चाहूंगा कि बीते कुछ समय से एक विचार बारम्बार मेरे मस्तिक्ष में आ रहा था कि क्यों ना अपनी उस अधूरी कहानी, एक अत्यंत ही विस्तृत दर्दभरे नाटक पर कार्य करते हुए। आप सभी के लिए कुछ मनोरंजक लघु बाल कहानियां लिख कर आपके अपने इस ब्लॉग Vikrant Rajliwal ( Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation’s ) url address https://vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित करि जाए! और उन लघु कहानियों का मैं स्वयं के स्वरों एव कहानी के उन महत्वपूर्ण भावों को स्वयं के स्वरों में पूर्णतः ढालने का प्रयत्न करते हुए आपके अपने YouTube चैनल Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal पर प्रसारित करू।

अंत मे आपसे मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि आप अपने मित्र के कलम एव स्वरों पर विशवास करते हुए एव मुझे अपने उपरोक्त कार्यो में एक सफलता दिलवाने हेतु अपने आशीर्वाद से कृतिज्ञ कर दीजिए। साथ ही मेरी आगामी उन लघु कहानियों के अंतर्गत आप अपने पसन्द के विषय भी कॉमेंट बक्से में दर्ज करवा दीजिए। एव मैं अवश्य ही उन पर भीLogopit_1562038942505 कार्य करने का एक प्रयत्न अवश्य करूँगा।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल।

02/07/2019 at 10:05am