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एक दिवाना।

एक ज़माने से है इंतजार ए महोबत
हर लम्हा है एक तमना दीदार तेरा।

दिल मे धड़कनो से दबाए जा रहे है
हर जुल्म ओ सितम, ए सितमगर तेरा।।

न ले इन्तेहाँ, ये मौसम दीवाने आ अपने
आईने में दिल के है ये अक्स महोबत तेरा।

रुस्वा ये ज़माना, एक ज़माने से, कर रहा है किसको
बेजान जिस्म, ये हाल ए दिवाना, ये धड़कता दिल है तेरा।।

लेखन द्वारा विक्रांत राजलीवाल।

Ek Deewana

Ek zamane se hai intezaar ae mahobat
Har lamha hai ek tammna deedar tera

Dil me dharkano se dabaye ja rhe hai
Har julm o sitam, ae sitamgar tera

Na le imtehan, ye mousam, dewane ka apane
Aaine me dil ke hai ye aksh mahobat tera

Ruswa ye zamana, ek zamane se, kar rha hai kisko
Bejan jism, ye haal ae deewana, ye dhadkta dil hai tera

Lekhan dwara Vikrant Rajliwal

#Hindi Poetry, Shayari & Story Article’s#

 

 

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A painful Hindi love triangle Detailed story with unique diouloges, a great flash. There is a story which is related to three stories and all is incomplete without each other. Please contact if anyone requires… Cont.no. 91+8130675543

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जल्द ही आप सब के बीच।लेखन द्वारा #विक्रांत राजलीवाल।^Hindi Poetry, Shayari & Story Article’s^#

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वर्ष 2016 जनवरी, देल्ही विशव विद्यालय के एक समारोह के दौरान अपनी प्रथम पुस्तक एहसास से अपनी एक कविता से कुछ पनतिया सुनते हुए।

Announcing some pentadia from one of his poems, with its first book, during a celebration of the year 2016, at the Delhi Vishav Vidyalaya.

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एक बदलाव।

युवा, जी हा युवा!!!
युवा जो हर सभ्य समाज का भविष्य कहलाते है। युवा जिसकी शक्ति का लोहा हर ज़माने ने माना है। वही युवा आज हताश और निराश क्यों नज़र आता है। योग्य और योग्यता से परिपूर्ण होते हुए भी वह क्यों मज़बूर है। क्या यह हमारी थरथर हो चुकी या कई दशको से भृष्ट व्यवस्ता की देन है।

आज हर युवा प्रतिभा को तलाश है एक ऐसी व्यवस्ता की यहाँ उसे भी उसकी योग्यता के अनुरूप उचित स्तान प्राप्त हो सके। जहाँ उसके भी कर्म साकार हो सके।

इस जर्जर व्यवस्ता को चलाने वाले ये नही जानते कि आने वाले कल में खुद वह भी और उनके ही कारण खुद उनकी भी नस्ले इस भृष्ट व्यवस्ता का शिकार हो हताश और निराश हो जाएंगी।

आज के युवा की हताशा का सबसे बड़ा कारण है कि आज ऐसे कई तरह के प्रलोभन बाज़ार में मौजूद है जो उनको भृमित कर उनके भविष्य से खिलवाड़ करते हुए नज़र आते है।
और जब हकीकत से उन तमाम युवाओ का सामना होता है तो वह एक दम हताश ओर निराश हो जाते है। कई युवा तो अपने अनमोल जीवन को समाप्त तक करने का विचार बना लेते है और कई अपना जीवन समाप्त भी कर देते है।

आज ज्यादातर लोग केवल मुनाफा कमाने के लिए ही जीवन जी रहे है और इसके लिए वह हर अनैतिक उपाय अपनाने को ततपर नज़र आते है। इस तरह से वह अपने जीवन से ही नही बल्कि सम्पूर्ण सभ्य समाज के भविष्य से खेल रहे है।

इस समस्या का समाधान आज के युवाओं को अपने बुजुर्गों के साथ मिल कर खुद तलाशना है। या फिर वह भी इस प्रकार के भ्र्ष्टाचार से जुड़ कर भ्र्ष्टाचार को बढ़ावा देने। और अपनी आने वाली नस्लो को मजबूर और बेबसी में धकेल देंगे। अगर ऐसा हुआ तो यह वही मिसाल बन जाएगी, जिस डाली पर बैठे थे वही काट दी। फल तो मिल पर ज़हरीला।

यह लड़ाई है कई दशको से कमजोर व्यवस्ता से, यह लड़ाई है खुद से, खुद के लिए, यह लड़ाई है अपनी आने वाली नस्लो के लिए।

जय हिंद।

लेखन द्वारा विक्रांत राजलीवाल।

# Hindi Poetry, Shayari & Story Article’s #

 

एक उंमग।

न देख मूढ़ कर दुबारा, ए वक़्त मिट चुकी जो लकीरे, कदमो से तेरी
उठा कदम, छूने को ये आसमा, ये हवाए, ये फ़िज़ाए अब है तेरी

Ek uamang

N dekh mudh kar dubara, ae wkht mit chuki jo lakire kadmo se teri
Utha kadam, chune ko ye asma, ye hwaae ye fizaae ab hai teri

लेखन द्वारा विक्रांत राजलीवाल।

ज़िन्दगी।

उलझ कर कशमकश-जिंदगी, नफ़रत के तारो से,
न होना लहूलुहान।

खिल उठेगा, चमन महोबत का, ए ज़िंदगी, हाथ ज़िन्दगी का, ले अब थाम।

लेखन द्वारा विक्रांत राजलीवाल

Zindagi

Ualaj kar kashmkash-zindagi, nafrat ke taro se,
N hona lahuluhan

Khial uathega, chaman mahobat ka, ae zindagi, hath zindagi ka, le ab tham

Lekhan dwara Vikrant Rajliwal

Hindi Poetry, Shayari & Story Article’s

ज़िन्दगी।

ज़िन्दगी की मन्ज़िले है हिमालय से उच्ची,
राह-दरख्तों से टकरा कर, रुक न जाना।
चमक-चांदनी है तेरी सितारों से रौशन,
देख अंधेरा, ये रात काली घबरा न जाना।।

लेखन विक्रांत राजलीवाल।

Hindi Poetry, Shayari & Story Article’s

Character. (Translated Hindi to English)

Character character, has a very strange knowledge. Sometimes knowingly and unknowingly, he always bewildered. Yes, here is the subject of knowledge.

Sometimes a person does not even realize that when he speaks only in words, or because of ignorant lust, his precious charismal qualities, when he himself falls due to ignorance or unconscious mind And that’s going to increase.

Nevertheless, if ever, the person is aware of God’s grace, due to the connotation of the enlightenment, or the knowledge of his sleeping enlightenments, the man should realize that on the way he is, the forgiveness, or Due to ignorance, it is going away, this is the path which he would have got ordinary knowledge. Actually walking on this path has resulted in his or her fall.

It seems to me, that in today’s highly occupied society, today’s human beings do not have time left to improve their own character. And in this highly organized society, when man unknowingly turns his character down, and he can not even get the slightest realization of that matter, then there is nothing surprising in it.

Still … will decrease when dark darkness rises, then it will be seen that his character is innocent. Whenever it will be her, and innocent character something, her will be depressed.

It seems to me, that person’s lost character will be restored again.

If the mirror of civilized society is to shine
Not only for myself, but for yourself
Creating a civilized society.

So stop the fall of your character, that is a very horrible thing in which it does not belong to itself, but to yourself.

Then, doing yourself a tax, you own character
Now you, yourself, have to burn yourself.

These values ​​will not be erased either by burning or by getting it.
The more you drink, the more kundan will become.

Everything else is going on, making yourself a character, making life happy. Tax exemptions are good, such a permanent, for generations, the upcoming victim, the character, and himself, have to go on this path.

Truth-non-violence and virtuous qualities, then centuries old. It is not easy to walk on this path, friends, there is corruption everywhere! Today, here is a time of dishonesty.

However, whatever has been done, its character is created, not only himself but also has changed, it is here that every selfless person

The person who is good and character is also the person.
There is a different identity in every society.

Whether it laches, its opposition to it,
Does not decrease brightness and its noble identity

Written by Vikrant Rajlival
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चरित्र।

चरित्र का चरित्र, बहुत ही विचित्र ज्ञान पड़ता है। कभी जान-बूझ कर तो कभी अनजाने ही, वह हमेशा से भृमित करता है। जी साहब, यहाँ ज्ञान का विषय चरित ही है।

कभी-कभी मनुष्य को इस बात का अहसास भी नही हो पाता कि कब बातो ही बातों में, या यूं कहें कि अज्ञान-वश की हुई अठखेलियों के कारण, उसका अनमोल चारीतिक गुण, कब अपने आप ही उसके अज्ञानता या अचेतन मन के कारण पतन की और बढ़ चला है।

फिर भी, अगर कभी, उस मनुष्य पर ईश्वर की कृपा, ज्ञानियों के सानिध्य के कारण, या उसे अपनी सोई हुई ज्ञानिन्द्रियों का ज्ञान हो जाने पर, मनुष्य को इस बात का अहसास हो जाय कि वह जिस राह पर, भूल-वश, या अज्ञानता के कारण, चले जा रहा है, यह राह जो उसे साधारण सी ज्ञान पड़ती थी। असल मे इस राह पर चलते हुए उसका चारित्रिक पतन हुआ है या हो सकता है।

ऐसा लगता है मुझ-को, की आज के इस अत्यंत व्यवस्त समाज मे, आज के मनुष्य के पास अपनो का तो क्या खुद के चरित्र के सुधार हेतु समय शेष नही है। और इस अत्यंत व्यवस्तित समाज मे मनुष्य कब अनजाने ही अपने चरित्र का पतन कर दे, और उसे उस बात का तनिक भी अहसास न हो पाए तो इसमें किंचित मात्र भी हैरत की बात नही है।

फिर भी…घटेगा जब, अंधकार घनघोर, तो दिख जाएगा उसको अपना चरित्र निर्दोष। जब होगा पच्यातप उसे, और निदोष चरित्र कुछ, उसका उदास हो जाएगा।

ऐसा लगता है मुझको, उस मनुष्य का, खोया हुआ चरित्र तब उसे फिर से प्राप्त हो जाएगा।

अगर सभ्य समाज का दर्पण चमकना है
खुद के लिए हि नहीँ, अपनो के लिए भी
सभ्य समाज बनाना है।

तो रोक लो पतन आने-अपने चरित्र का, कि विश है अत्यंत भयंकर जो इसमे, उससे खुद को ही नही, अपनो को भी बचना है।

फिर, खुद का कर निर्माण, तू चरित्र का अपने।
अब तुझे, खुद ही खुद से, जलते जाना है।

ये मान, जल कर भी, मिट न तो पायेगा।
जितना तपेगा, उतना कुंदन बन जायेगा।।

बाकी सब तो बहना है, खुद को बना कर के चरित्रवान, जीवन सुखी बनाना है। कर मिसाल कोई नेक, ऐसी कायम, पीढ़ियों तक, रहे आने वाली पीड़िया, चरित्रवान और खुद भी इस राह पर चलते चले जाना है।

सत्य-अहिंसा और चारित्रिक गुण, तो सदियों से भी पुराना है। इस राह नेकी पर चलना नही आसान है यारो, चारो ओर है भ्र्ष्टाचार! आज-कल यहाँ बेईमानी का ही जमाना है।

फिर भी, जो कर गया, अपने चरित्र जा निर्माण, खुद को ही नही, बदला है उसने यहाँ हर भृष्ट इंसान।

नेक ओर चरित्रवान है जो भी इंसान।
होती है हर समाज मे उसकी अलग एक पहचान।

चाहे लाख करे, उसका कोई विरोध,
नही घटती है उज्जवल शान और उसकी नेक पहचान।

लेखन द्वारा विक्रांत राजलिवाल।
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