Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतन्त्र लेखन-

Poetry, Kavya, Shayari, Sings, Satire, drama & Articles Written by Vikrant Rajliwal

May 19, 2019
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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Feelings

I would like to share the feelings of my heart at this time before the results of the election today. If I did not even share this entire world at this time, then I would probably not be able to forgive myself so that I had heard Modi’s name for the first time before the general elections of 2014, and the opposition and the ruling parties A negative introduction was made available through the media, at that time I had become frightened once in the name of Modi, but by conquering all the challenges Modi G were ruling.

After that, he impressed every moment through his positive active work, not only on me but on our whole world, but through his positive works. So today I do not have fear in their names, but they are easily found to be a pride.

I can write a lot to write but I do not like it that you are related to a particular strategy party, so in the end, only I would like to say that yes, today I can proudly say that I am Gandhi, Nehru and A citizen of the country of Modi Yes I am an Indian

Vandemataram, Vandematram, Vandematram

Jai Hind.

Written by Vikrant Rajliwal

18/05/2016 at 9:25 pm

This is my Hindi-speaking article translated into English language. If I have made a mistake in error, I apologize.

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May 19, 2019
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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ह्रदय एहसास

मैं आज चुनाव के नतीजे आने से पूर्व एक बार को अपने ह्रदय के भाव अवश्य इस संसार से सांझा करना चाहूंगा। जिसको यदि मैने इस समय भी इस समस्त संसार से सांझा नही किया तो शायद मैं स्वम् को कदापि क्षमा ना कर सकूंगा कि हा 2014 आम लोकसभा के चुनावों से पूर्व मोदी जी का नाम मैने प्रथम बार सुना था एव जिस प्रकार विपक्ष एव सत्तारूढ़ पार्टियों ने उनका एक नकारात्मक परिचय मीडिया के द्वारा उपलब्ध करवाया था उससे उस समय मोदी जी के नाम से मैं भी एक बार को भयभीत हो गया था परन्तु समस्त चुनोतियो पर विजय प्राप्त कर मोदी जी सत्तारूढ़ हो गए।

उसके बाद उन्होंने प्रत्येक क्षण अपने सक्रिय कार्यो के द्वारा अपना सकारात्मक प्रभाव डालते हुए ना केवल मुझ पर, भारतवर्ष पर अपितु इस समस्त संसार को अपने सकारात्मक कार्यो के द्वारा प्रभावित किया। जिससे आज मुझ को उनके नाम से भय नही होता अपितु सहज ही एक गर्व का भाव उतपन्न होने लगता है।

लिखने को तो मैं बहुत कुछ लिख सकता हु परन्तु उससे कहि आपको यह ना लगने लगे कि मैं किसी विशेष रणनीति पार्टी से सम्बंधित हु इसीलिए अंत मे केवल मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि हाँ आज मैं गर्व से कह सकता हु कि मैं गांधी, नेहरू और मोदी के देश का नागरिक हु। हां मैं भी भारतीय हु।

वन्देमातरम, वन्देमातरम, वन्देमातरम।

जय हिंद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

18/05/2019 at 9:12 pm

May 18, 2019
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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सुलगते एहसास।

आज फिर से मौसम ने अँगड़ाई ली है बदलते वख्त ने भी वख्त की दुहाई दी है।

मिज़ाज अपना ना बदल देना कोई, देख कर बदलता रंग ए आसमां, रंग अपना ना बदल देना कोई।।

कायम एहसासों से कायम है एहसास जितने, बदलते वख्त से मिटा ना देना तुम कायम एहसास अपने।

असूल ये दुनियादारी के, सिखाए से भी सिखाए जो नही जाते, मिलते है ज़ख्म सीने पर जो सरेराह, वो भुलाए नही जाते।।

रात चाँदनी एक फरेब हो सकती है, धोखा हक़ीक़त का फरेब से कोई खा ना जाना।

होगा सामना हक़ीक़त से जब, निसान फ़रेबी के एहसासों को अपने भुला ना जाना।।

दोस्तों की शक्ल में दुश्मनों से साथ निभाते हुए, वार ख़ंजर के टूटे दिल पर खाते हुए, फरेब से अपनो के टूट ना जाना।।।

हौसला भी देख कर हौसला सितमगरो का अपने ख़ामोश हो जाता है जब।

उठता है तूफ़ान सीने में ख़ामोशी से तो बहुत शोर मचाता है तब।।

पुकारते है नाम क़ातिल का अपने, दहकते अंगारो से दहकते जज़्बात मेरे।

क़त्ल सुलगते एहसासों से अक्सर एहसासों का हो जाता है मेरे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

18/05/2019 at9:55 pmScreenshot_2019-05-18-21-45-33-738_com.google.android.youtube

May 18, 2019
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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Religion and language.

It is true that languages ​​have been often banned in the name of religion since the ages.

  When selfish politics happens, language ends up tempers.

  I wish every language would be independent from selfish politics.

  Everyone gets free freedom and every language is called language only ..

  The relationship between the language of the language is definitely something to understand.

  Truth is or imagination but every language has some deep relation with another language.

  If there is a language to be born then aunt and niece, somebody’s mother is someone else’s daughter.

  The pain of every language makes my heart hurt; when language is spoken by selfish politics in the name of language, languages ​​suffer and die.

Why these situations are created and who promote them and make them young

  Every religion is a real symbol of every language, which is the name of humanity.

  Selfish politicians and atrocities now please, in the name of religion and language, please stop you, all your shop of selfish selfishness …

  Have mercy on the religion and language, the selfish person is selfish, the selfish, the feeling of brotherhood, spreading the fragrance of brotherhood, every realization from every realization, every language that has its own feelings, its realization

  The sign of religion and language is humane, their existence is old even before the seventies, languages ​​speak with love, then blossoms are fraternal flowers, every one of the love which is the flower of mutual brotherhood ..

  Written by Vikrant Rajliwal

  18/05/2019 at 11:10FB_IMG_1539571367978 am

(This is the translation of the Poetry of my Hindi language into the English language. If there is an error in error, due to which the emotion is hurt, then I apologize.)

May 18, 2019
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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जुबां

सत्य है यही सदियोँ से धर्म के नाम पर जुबां अक्सर बट जाती है।

होती है सियासत जब घिनोनी तो जुबां दम अपना तोड़ जाती है।।

काश ये होता कि हर जुबां घिनोनी सियासत से आजाद होती।

मिलती सबको खुली आजादी और हर जुबां भी सिर्फ जुबां होती।।

जुबां का जुबां से रिश्ता नज़र कुछ कुछ तो जरूर आता है।

हक़ीक़त है या फ़साना मगर हर जुबां का दूसरी जुबां से जरूर कुछ गहरा नाता है।।

कोई जुबां बहने होती है तो कोई मौसी और भतीजी, कोई किसी की माँ है तो कोई किसी की बेटी।

हर जुबां का दर्द मेरा कलेजा चिर सा जाता है, होती है जब जुबां से जुबां के नाम पर मतलबी सियासत तो जुबां दम अपना तोड़ जाती है।।

क्यों ये हालात पैदा हो जाते है, कौन इन्हें कर देता है जवान।

हर धर्म, हर जुबां एक निसान हक़ीक़त का है जो इंसानियत का नाम।।

धर्म और जुबां के नाम पर अब कर दो बंद ए सियासतदारों ये घिनोनी सियासत की अपनी दुकान।।।

बख्श दो धर्म और जुबां को मतलबी सियासत से गंदे जो मतलबी अरमान, महकने दो लवजो से लवजो के खिलते हर लव्ज़, हर लव्ज़, हर जुबां के अपने एहसास।

धर्म और जुबां अक्स इंसानियत का, आबाद अस्तित्व उनका सदियों से भी है पुराना, बोलती है जुबां तो खिलते है गुल, हर गुल महोबत का बोलता एक एहसास।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

18/05/2019 at 7:35FB_IMG_1539571367978 am

May 15, 2019
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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एक दर्पण। // A Mirror.

कल तक जो अय्याश थे आज साधु हो गए है।

कल तक जो हाथ बांधे खड़े थे आज उन्ही के हाथों शमशीर है।

कल तक जो पनतियो में प्रतीक्षा से बेठे थे आज वही खुद से शहंशाह हो गए है।

औकात से बाहर जाकर एव खुद को ही शहंशाह समझना भूल हो सकती है उनकी,

परन्तु देख कर एक दिन हक़ीक़त खुद को कहा छुपाएंगे फिर वो,

खुद को कहा छुपाएंगे फिर वो, हा खुद ही खुद की नज़रो से गिर जाएंगे फिर वो,

आए जो कभी सामने, शर्म से कट मर जाएंगे फिर वो, खून के आँसू बहाएंगे फिर वो,

हर जख्म ए एहसासों को अपने नासूर सा पाएंगे फिर वो,

हर दर्द की दवा पाने को हमसे फिर पनतियो में लग जाएंगे वो, फिर पनतियो में लग जाएंगे वो, हा नज़रो से खुद की गिर जाएंगे वो…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

15/05/2019 at 5:40 am

A Mirror.


Till yesterday those who were characterless have become a monk today.

The hands which were standing till yesterday, are in their hands shamsheer.

Those who were waiting for the Queues (Pantiyyo) till yesterday, they themselves have become Ruler (Shanshahsh) today.

It may be forgotten to go out of the form and to consider itself as a kingly ruler,

But seeing a real person hide himself, then they,

They will hide himself, then they himself will fall from his own eyes, then they,

Those who come in front, will cut off the shame, then they will shed blood tears, then they,

Every wound will get a sense of your nerves, then they,

To get the medicine of every pain, we will start again in Queues (Pantiyiyoo), then in Queues (Pantiyoo), they will fall from the eyes, they will fall …

Written by Vikrant Rajliwal (Translated)
15/05/2019 at 5:40 am

May 11, 2019
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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अन्धकार और उजाला

अन्धकार और उजाला काव्य नज़्म रचना मेरी प्रथम प्रकाशित पुस्तक एहसास से है। जिसका प्रकाशन वर्ष 2016 में जनवरी माह में दिल्ली विश्वपुस्तक मेला में संयोग प्रकाशन शहादरा द्वारा किया गया है। इस रचना के माध्यम द्वारा मैने एक नशे से ग्रस्त व्यक्ति के दर्द को अपनी लेखनी के द्वारा व्यक्त करने का एक प्रयास किया है। जिससे आम जनमानस भी उनकी नशे की बीमारी के दर्द को एहसास को समझ सके एव उन्हें एक सहानुभूति देते हुए उनका एक उचित इलाज प्रदान करने में उसकी एव उसके परिवारजनों को अपने अपने सामर्थ द्वारा सहायता प्रदान सकें।

रचनाक अंत मे मेरे यूटयूब चैनल एव स्वम् मेरे स्वरों के द्वारा रिकोडिड मेरी इस दर्दभरी रचना अन्धकार और उजाला का वीडियो लिंक अंकित है। यदि टाइपिंग में भूल वश कोई त्रुटि हो गई हो तो उसके लिए आप सभी प्रियजनो से खेद प्रकट करता हु। एव आश्वाशन देता हूं कि उसेशीघ्र अति शीघ्र ही सुधार दिया जाएगा।

धन्यवाद।

आपका मित्र विक्रांत राजलीवाल


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संयोग प्रकाशन
एच-47 वेस्ट ज्योति नगर,
शहादरा, दिल्ली-110094
फोन न 9711261550

ए-वन प्रिंटर्स द्वारा मुद्रित
प्रथम संस्करण-2016
मूल्य:₹250:00

14) अन्धकार और उजाला

है इंतज़ार मुझे एक उज्ज्वल का,

पर अब कोई उजाला दिखता नही।

गम तो बहुत है जमाने मे,

पर अब मुझे कोई गम नही।।

एक हाथ मे थामे हुए हूँ मैं बोतल शराब की,

अब इस जमाने मे मुझे दूसरा कोई काम नही।

ना दे आवाज़ तू मुझे मेरे से ए साकी,

अब पीने के बाद मेरा कोई नाम नही।।

जब रात बीत जाएगी और छट जाएगा अंधकार,

तब मैं पीना छोड़ दूँगा।

जब हर घाव भर जाएगा

तब मैं पीना छोड़ दूँगा।।

अब तो इंतज़ार रहता है किसी अपने का,

जब वो दिख जाएगा तब मैं जीना छोड़ दूँगा।।।

ग़मों के घुट पीते-पीते मैं पीना सिख गया,

सोचा था मिट जाएंगे हर गम और छट जाएगा अन्धकार।

सील जाएंगे सब खुले घाव और लग जाएगी मरहम।।

पर ए साकी इस शराब की तासीर निराली है।

जितना पीता हूँ मैं इसे यह रात उतनी ही काली है।।

गम का अन्धकार तो ना छट पाया।

घाव है जो उन्हें और भी गहरा पाया।।

गम भरी रात और भी काली क्यों नज़र आती है।

अपने घावों मि गहराई और भी गहरी क्यों नज़र आती है।।

पीने वालों से यह मत पूछे कि वो क्यों पीते है।

अक्सर वे मौत के साए में जिन्दगी जीते है।।

मैं तो कब का मर चुका हूँ ए दोस्त।

अब तो जिंदा होने के लिए पिता हूँ ए दोस्त।।

आजकल नही मिलता हव कहि सहारा मुझे।

अब तो ग़मो ने ही पाला है मुझे।।

बनाने वाले ने क्या चीज बनाई है शराब।

इसको पीने के बाद नही लगता कोई ख़राब।।

तो क्यों ना पीयू मैं भर-भर के प्याले इस शराब के।

जब हर किसी अपने ने डाले है शूल,

मेरे सीने में नफरत और मक्कारी के भाव के।।

ए दोस्त शराब पीने में अब मुझे कोई

खराबी क्यों नज़र नही आती।

ऊनी बर्बादी की अब मुझे कोई निशानी

क्यों नज़र नही आती।।

क्यों कहते है लोग की पीना गलत है।

क्यों कहते है लोग की पिलाना गलत है।।

अजी इसी पीने और पिलाने से ही तो

सिख है कइयों ने गमोक साए

में भी खुशी से जीना।।।

हर दर्द कि यही तो एक दवा नज़र आती है।

घाव तो कई है इस जमाने मे मगर हर घाव कि

दवा यही नज़र आती है।।

क्या गम है जो हो गया मैं बर्बाद।

नही दिया किसी अपने ने मेरा साथ।।

ए मेरे साकी अब तू ही बता की,

क्यों ना पियो मैं यह शराब।

ना घर है मेरा ना कोई परिवार।।

जहाँ भी जाता हूं, वही हो जाता है तिरस्कार।।।

ऐसा एहसास होता है मुझे इस शराब ने ही मुझे-बचाया है।

जो टूट गए थे दिल के तार उन्हें इस ने जोड़ डाला है।।

अब तो बस यही चाहत है बाकी।

साथ रहे मेरा साकी की अभी,

बोतल में और शराब है बाकी।।

जीवन मे अपना तो कोई रहा नही बाकी।

देख कर किनारा सागर में

अब यूँ मुड़ना ना रहा बाकी।।

लगा है घाव जो सीने पर कि अब

उसका भरना ना रहा बाकी।।।

लोग कहते हैं शराबी के सीने में कोई एहसास नही।

मैं कहता हूँ कि उनके सीने में भी दिल है,

कोई पत्थर नही।।

शराबी को जमाने में लोग क्या समझते है,

शराबी को इस बात का कोई गम नही।

वो तो वर्षो पहले मर चुका है

अब जीवन जीने का उसका मन नही।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

प्रकाशित तिथि 11/05/2019 at 10:58am

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&

मेरी इस दर्दभरी रचना अन्धकार और उजाला का वीडियो लिंक है

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