एहसास

💔 दर्द ए दिल की अपने कोई दवा अभी तक जो मुझे मिली नही।

हर जख्म फट गए मेरे बेअसर हर मरहम को कर के खुद ही।।

टूट कर मासूम एहसास हर लम्हा मेरे जो मरते गए; हर लम्हा ही हम टूटे एहसासों से जो टूटते गए।

सितम ज़िंदगी के हंसते हुए हम सहते गए; हर सितम से जिंदगी के सबक कोई नया जो सीखते गए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

19 जनवरी रविवार। समय दोपहर 2:52 बजे

ज़ख्म दिल के जब सील न सके!
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🌹 टूटा गुलाब, बिखुड़ी जो पंखुड़ियां; हर जख्म महोब्बत के नासूर हो गए।
याद में एक सितमगर कि ए दोस्त; हम जीते जी ही जो फ़ना हो गए।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

💗
हम तुम्हें ना पा सकें और तुम हर बार हमारे मासूम एहसासों का कत्ल करते गए।

नही एतबार अब हमें ख़ुद के एहसासों पर शायद, फक्त यकीं एहसासों पर तुमरे हम जो करते गए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

मेरा एक Your qoute पर लिखा गया एक दर्द।

काल चक्र।

चक्र काल से छूट ना कोई पाएगा, प्रत्येक कदम, प्रत्येक श्वास, गुजरता प्रत्येक क्षण, एहसास चक्र काल का करवाएगा।

होनी-अनहोनी, साक्षी कर्म कांड, सहभागी सत्य कर्म साथ-साथ, मृत्यु-जीवन से साक्षात्कार, ध्वनि ह्रदय जो धड़काएगा।।

भावना-प्रेम, अश्रु-क्रोध, चेतन एहसास, स्मृति-विस्मृति, जो साथ साथ, अंधकार में सूर्य नया, चेतना मृत जगाएगा।

राह सत्य पर पथिक अनजान, मंजिल अब अपनी पाएगा, छूट गए जो राही पुराने, स्वयं अब ज्ञान दिशा दिखलाएगा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

13 दिसम्बर 2019 समय प्रातः 10:28 बजे।

राम जन्म। with YouTube link video

सुनिए मेरे यानी कि आपके मित्र विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक भक्तिमय काव्य रचना राम जन्म। आपके अपने यूट्यूब चैनल Voice Of Vikrant Rajliwal पर।

जय श्री राम।

एवं चैनल को सब्सक्राइब अवश्य कीजिएगा।

एक थे राजा बहुत महान।
नही थी पर उनके कोई संतान।।

रहती थी उनको एक चिंता यह भारी,
कैसे बढ़ पाएगा अब उनका महान वंश।

अभी तो है वो जिंदा, चल रही है श्वास उनकी मगर,
क्या आ पाएगा कभी इस धरा पर उनका भी अंश।।

देख राजा को अपने यू चिंतामग्न,
आए एक ऋषि और सोचा एक उपाय।

करके हवन किए उतपन जो उन्होंने कुछ फल।
हुआ सन्तोष कि मिलेगा राजन को अब अपने बल।।

किया शंका का निवारण उन्होंने सबकी,
दिया ज्ञान का फिर जो उन्होंने एक सन्देश।

फल नही है राजन ये कोई मामूली।
खिलेगी इससे सुनी बगिया की हर डाली।।

सुन कर वचन दिव्य अमृत के ज्ञानी ऋषि से,
हुआ सन्तोष उनको अत्यंत, खिल उठा जीवन खाली।।।

अब राजन को कुछ विचार सा जो आया।
फल लेकर ऋषि से वो उनको रानियो को दे आया।।

दिव्य फल पाकर समीप, चारो रानी भी हरषाई थी।
उनके सुने जीवन मे सुगन्ध बहार की जो अब आई थी।।

यह सब था विधान विधि का।
मायाजाल था स्वयं ईष्वर का।।

करने को नाश पाप का, धरा पर अवतार धर्म का आना था।
ये हवन ये फल ये विधान विधि का तो एक बहाना था।।

अब दुष्टो का अंत दूर नही।
अब सन्तो को किसी का डर नही।।

वह दिन भी प्रभु कृपा से जल्द आ गया।
आसमान से जब बादल काला छट गया।।

राम जन्म का दिन अत्यंत ही निराला था।
हर कोई था प्रसन्न और,
प्रसन्ता ने सबकी दुख को मार डाला था।।

किया स्थापित धर्म जो धरा पर, स्थापित आदर्श व्यवहारों से उनके हुआ।
हर बाधा झुक कर छट गई स्वयं, आदर्शो से उनके उदय सवेरा दिव्य हुआ।।

आखिर हाथो उनके ही संहार दुष्टो का हुआ।
खिला पुष्प मर्यादा का एक और उसका विस्तार हुआ।।

नही भूलना चाहिए कभी हमे।
राह दिव्य जो मिली उनसे हमे।।

आदर्श जीवन मर्यादित व्यवहार, धर्म जीवन से मिला उनके जो हमे।
हर बाधा को कर के पार, सयंम जीवन से विजय पताका,
हर्षोल्लास दिया जो हमे।।

आज हज़ारो वर्षो के उपरांत, भूल गया मर्यादा क्यों अपनी आज का स्वार्थी इंसान।
साथ पापी का देकर फैलाया जो भर्ष्टाचार, देख मासूमों निर्दोषों की पीड़ा भी नही जागता क्यों उनका धर्मो ईमान।।

कहा गया वो पुष्प धर्म (ईमानदारी, मर्यादा) का, खिलाया जो श्री राम ने था।
कर अधर्म का नाश पूण्य से, मर्यादा की माटी में, सूर्य एक नया जीवन में सबके जलाया था।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
29/11/2019 at 8:07 pm
(Republish)

🇮🇳 मंत्री जी। (सम्पूर्ण काव्य किस्सा) with my latest YouTube video link.

🇮🇳 मंत्री जी। काव्य किस्सा, एक व्यंग्यात्मक काव्य है। जिसको लिखने एवं रिकार्ड करने का सबसे महत्वपूर्ण कारण, इस संसार के समस्त दरिद्र एवं भ्र्ष्ट राजनीतिक से पीड़ित व्यक्तियों को, एक उचित लाभ पहुचाने का प्रयास मात्र है।

आशा करता हु मंत्री जी को देखने एवं सुननेवाले, आप सभी महानुभव अपने अपने स्तर पर, एक सकरात्मक सहयोग प्रदान करते हुए, इस संसार के समस्त दरिद्रों एव भ्र्ष्ट राजनीतिक से पीड़ित व्यक्तियों को, एक उचित लाभ एव सहानुभति पहुचा सकें।

जय हिन्द।

🙏 पाठन कीजिए मेरे यानी कि विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक काव्य किस्सा मंत्री जी का, एवं काव्य के अंत मे मंत्री जी। की नवीनतम वीडियो लिंक है जिसको छू कर आप काव्य मंत्री जी। जो कि एक व्यंग्यात्मक एवं संदेशात्मक काव्य है का स्वयं मेरे स्वरों के साथ सुनने का आनन्द प्राप्त कर सकते है।

🇮🇳 मंत्री जी। (सम्पूर्ण काव्य किस्सा)

आज ये अजब गज़ब क्या हो गया, ऐसा लगता है कि सूर्य कहि खो गया।

क्योंकि सूर्य तो ऊगा ही नही और पड़ोसी का मुर्गा कुकडु कु बोल गया।।

सुन कर बांग वो कुकडु कु मुर्गे कि मंत्री जी घबरा गए।
अलार्म बजने से पूर्व ही निंद्रा तोड़ उठ कर बैठ गए।।

देख कर हालत उनकी अजीब, उनकी धर्म पत्नी घबरा गई।
वह गई दौड़ कर तुरन्त और बी पी की गोली ले कर आ गई।।

वह बोली ऐसा क्या गज़ब हो गया।
सूर्य तो अभी ऊगा ही नही,
और आपको यह क्या हो गया।।

क्यों कर निंद्रा कच्ची आज आपकी टूट गई।
अलार्म के बजने से पूर्व ही निंद्रा कैसे खुल गई।।

कुछ कहते मंत्री जी इससे पूर्व ही धर्मपत्नी जी ने पसीना उनका पोछ दिया।
दबा कर मंत्री जी के गलफड़े, एक गोली को बी पी की उसमे घुसेड़ दिया।।

मंत्री जी अब कुछ हैरान से थे।
ऐसा हो रहा था प्रतीत कि वह कुछ परेशान से थे।।

अचानक से मंत्री जी कुछ सकपका से गए, वह बोले ऐसी तो कोई भी बात नही।
मुझे मालूम है कि सूर्य अभी ऊगा नही और यह अलार्म भी अभी तक बोला नही।।

न हो तुम परेशान, यह तड़प यह बेचैनी तेरी अति शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी।

माहौल है आज कल रैलियों का चुनावी एव मिलेगी जब राजशाही कुर्सी तो ससुरी नींद फिर से मिल जाएगी।।

नही यह सर्दी या ज़ुकाम मौसमी, यह है सत्ता की भूख,
अतरंगी इन हालातों में निंद्रा कैसे फिर मुझे आ जाएगी।।।

धर्म पत्नी जी आप तो ख़ामख़ा ही सकपका गई हो।

और बिन बात ही बी पी की गोली को ले कर आ गई हो।।

मुझे तो कोई भी परेशानी ऐसी नही और आप ख़ामख़ा डॉक्टर बन कर आ गई हो।

धर्म पत्नी हो आप एक नेता की खेल यह भी है एक अतरंगी, ज्ञात है जो यह आपको तो फिर क्यों आप सकपकाई हो।।

यह सुनते ही धर्मपत्नी जी अब के जो फिर से कुछ सकपाई।
वह आई कुछ समीप और व्यथा व्याकुल ह्रदय कि अपने बताई।।

वह बोली आज क्योंकर मंत्री जी इतनी जल्दी उठ गए हो, यह देख कर मैं कुछ घबराई थी।

देखा जो व्याकुल आपको तो न जाने क्यों बिन बात ही मैं कुछ घबराई और सकपकाई थी।।

कुछ और तो सूजा नही मुझ को मंत्री जी, हड़बड़ाहट में इसलिए ले कर बी पी की गोली आई थी।।।

अब के मंत्री जी जो कुछ मुस्काए।
दे कर ताव नुकीली भद्दी मुछो पर अपनी,
अब वह जो कुछ बतियाए।।

वह बोले तुम अभी तलक हो नादान, दोष इसमें तुम्हारा कोई नही।
आज तलक हो शायद हमसे अंजान, दोष इसमें तुम्हारा कोई नही।।

मैदान में लाल गंज के बड़े, हो हल्ला है आज भारी।
होंगे बड़े बड़े ग़द्दावर मंत्री उपस्थित वहाँ,
लहर गठबंधन की मंच से संचालन कि मेरी ही है आज जिम्मेवारी।।

बीच निंद्रा से मधुर स्वप्न को इसी के वास्ते जो स्वम् ही तोड़ दिया अपने।
न हो हैरान के टूटे हर स्वप्न को साकार प्रिय कर देंगे जरूर आज हम अपने।।

मंत्री जी धर्मपत्नी जी को अभी कुछ समझा ही रहे थे।
व्यथा व्याकुल ह्रदय की अपने अभी उन्हें बता ही रहे थे।।

उसी समय मुर्गे ने पड़ोस के तीव्र बांग अपनी लगा दी।
और समीप रखे अलार्म ने भी अपनी ध्वनि सुना दी।।

हो गया एहसास मंत्री जी को कि हा अब सुबह हो गई थी। क्योंकि पड़ोस के मुर्गे ने बांग और समीप के अलार्म ने ध्वनि अपनी सुना दी थी।।

यह जानते ही मंत्री जी ने अपनी आंखें कुछ फड़फड़ाई और जोरदार एक अंगडाई लगाई।
घुमा कर नाज़ुक कलाइया उन्होंने सुखी हड्डियां जो अपनी फिर कड़कड़ाई।।

सूर्य ऊगा तो फूल सा खिल कर छा गया निल गगन में एक प्रकाश।
खिल उठे मंत्री जी भी फूल के समान किया उन्होंने फिर स्नान।।

पहन कुर्ता खादी का अपना नवीन, देख रहे है किसकी राह।
देख उन्हें हुआ प्रतीत कि जैसे उन्हें अभी भी है कुछ चाह।।

झलक रही है स्वार्थी भद्दे चेहरे पर कुछ बेचैनी सी उनके बढ़ी हुई।
उनको है प्रतीक्षा किसी खास कि शायद, स्थिर है मुद्रा उनकी, स्थिर है बेचैनी सी।।

अपनी इसी बैचेनी में आवाज एक धर्मपत्नी जी को अपनी लगा दी।
तभी हुई दस्तक एक और किसी ने उनके दरवाजे की घण्टी बजा दी।।

आया है भाषण की लेकर के उनकी उनका पी ए एक पर्ची, बात उनको उनके नोकर ने आहिस्ता से यह बता दी।

दौड़ पड़े मंत्री जी सुनते ही यह और पहुच समीप लापरवा पी ए के अपने, कुछ डॉट फटकार उन्होंने उसको जो लगा दी।।

वह बोले नही है तुमको तनिक भी ध्यान, इतना विलंभ से जो अब आते हो।
इतना विलंभ जटिल इन परिस्थितियों में क्यों कर के भला तुम लगाते हो।

उनका पी ए भी निकला टेडी खीर वह तुरन्त अपनी भुल मान गया।
कर के टेडी कानी आँख को एक अपनी, मंत्री जी से वो कुछ बतला गया।।

न हो नाराज मंत्री जी वह बोला कि इस पर्ची में अजब गजब का है भारी बवाल।
इसमें कोरा भाषण ही नही, संवेदनशील भावो का है एक भरा पूरा मकडजाल।।

अपने इस विलंभ के लिए हु मैं महोदय ह्रदय से अपने जो क्षमा प्राथी।
न करें अब आप विलम्ब, कर दीजिए कूच मैदान में कि हर कोई है आपका वहा प्रतिक्षाथि।।

सुन कर पी ए का ऐसा उत्साहवर्धक संवाद अपने मंत्री जी भी उत्साह से भर गए।
ले कर पर्ची अपने पी ए के हाथ से तीखी सी एक नज़र शब्द अक्षरों से दौड़ा गए।।

वह बोले तुम आए विलंभ से क्रोध मुझ को अत्यंत भारी तब हुआ।

कार्य से परन्तु तुम्हारे हर्षित यह मन उपवन अब जो मेरा हुआ।।

खबर मैदान लाल गंज की भी कुछ साथ अपने क्या लाए हो।
या खाली संवाद पर्ची सहित ही कोरे ठूठ से चले आए हो।।

सुनाया मंत्री जी के पी ए ने वास्तविक समस्त फिर हाल कि हो हल्ला है भारी वहाँ।

हर कोई है उत्साहित और सब के सब जनमानस आप के हि है प्रतिषार्थी सिर्फ वहाँ।।

भरा है जन्मांसो से खचाखच मैदान लाल गंज, बची न क्यारी कोई भी रिक्त प्रशंषको से आपके वहाँ।।।

ले कर समस्त परिस्तिथियों का जायज़ा मंत्री जी फिर मुस्काए।
बैठ गाड़ी में लाल बत्ती की अपने मैदान लाल गंज को वो फिर आए।।

सत्य है मैदान लाल गंज में हो हल्ला है आज अत्यंत ही भारी ।
हर कोई है मंत्री जी का प्रतिषार्थी और उनका उत्साह भी है अत्यंत ही भारी।।

आपसी गठबंधन का मंच यह खेल कुछ कुछ नही अत्यंत ही निराला है।
दुध से भरी हंडिया को जैसे कुछ बिलोटनो ने आपस मे ही बाट डाला है।।

ठहरे हुए जल मे मार के राजनीतिक लाठी इस प्रकार से जैसे,
पक्ष में अपने लहर सी कोई उन्होंने चलाई।

सौ चूहे खा कर के देखंगे आज घोटाली,
कौन कौन सी सियानी बिल्ली हज करने को चुनावी आई।।

आए है राज्य राज्य से कई घोटाले बाज भी मंत्री जो पुराने।
हुआ है स्वागत सत्कार अत्यंत मंत्री जी का भी भारी जो अपने।।

इसी धमाचौकड़ी और होहल्ले के मध्य आई मंत्री जी के भाषण संवाद कि बारी।
मंत्री जी है अपने बहुत ही होशियार, स्थान से अपने उन्होंने अपनी आंखे दोनों मुचकाली।।

राजनीतिक इस उखट पटक में मंत्री जी का भरे मंच पर
कुर्ता कुर्सी से उनकी अटक गया।

यू ही उन्होंने आगे को बढ़ना चाहा, तो कुर्ता उनका अकड़ कर के फट गया।।

देख नग्न यू बदन मंत्री जी का अपने खस्ताहाल।
मच गया भरी सभा मे फिर जैसे कोई बबाल।।

ऊपर से था कुर्ता चमकदार जो उनका फट गया।
अंदर से थी बनियान एक उनकी, छिद्र जिसका घिनोना अब सब को दिख गया।।

देख ये आम जनता होले से कुछ मुस्काई।
मंत्री जी की तो जैसे अब शामत सी आई।।

किसी मनचले ने इस पर भी चुटकी ले डाली।
ध्यान है आप का मंत्री जी कहा,
आपके खस्ताहाल कुर्ते ने तो आप कि पोल ही खोल डाली।।

यह सुनते ही घबराई जनता ने फिर से लगाया जो एक ठहाका।
मंत्री जी भी नही थे नादान, फ़टी बनियान के उस छिद्र को उन्होंने हाथों से था अपने ढका।।

फ़टी बनियान, फ़टी किस्मत, फट गया था उनके बुलन्द सितारों का ढ़ोल।
हर कोई लगा रहा था ठहाका जैसे खुल गई हो उनके घोटाले वाली कोई पोल।।

जोड़ कर अपनी हिम्मत समस्त, भरे मंच से उन्होंने फिर एक यह तरकीब लगाई।।
वह बोले कि नही कोई दोष इसमें उनका कि उनके कुर्ते का आस्तीन ही पुराना था।।

इसलिए पाए में कुर्सी के अटक कर उधड़ गया।
स्वम् तो फटा ही ज़ालिम छेद बनियान में भी कर गया।।

तभी नेता जी का एक चमचा मंच से के कूद गया।
उड़ाई थी जिस मनचले ने नेता जी की खिल्ली,
सीधा उस पर ही जाकर गिर गया।।

भाप गए मंत्री जी भी तुरंत समस्त हालात।
निकाल बगल से वादों का अपने पर्चा चुनावी,
शुरू कर दी उन्होंने अपनी बात।।

हर शब्द हर वचन थे बनावटी उनके,
घिनोने मायाजाल हो कोई जैसे।

झलकता छल, दूषित चरित्र, समान फ़टे कुर्ते के नंगापन उनका, कपटी हर भाव हो कोई उनके जैसे।।

भरी हुंकार फ़टे कुर्ते से सीना फिर ताने मंत्री जी जो अपना।
बोले मिटा देंगे दरिद्रता दरिद्र की, कर देंगे चौतरफा विकास अब के हम ऐसा।।

गांव किसी प्रान्त में ढूंढे न ढूंढ पाओंगे, भूखा कोई गरीब कहि फिर तुम नंगा।

लक्ष्य एक है एक ही मुद्दा, रोटी कपड़ा और मकान हम सब का हो अपना।।

हर स्वप्न कर देंगे तुम्हारा हम पूर्ण।
आएंगे जीत कर इस बार बहुमत से जब पूर्ण।।

दिखा कर स्वप्न सुहावने, दिन सुनहरे, पूर्ण एक विकास के।
उतर मंच से, बैठ गाड़ी में अपनी, चले गए मंत्री जी अपने ठाठ से।।

देख चतुराई नेता जी की अपने परेशान जनता जो होले होले से फिर मुस्काई।

चालाकी मंत्री जी कि ये घर पहुच कर, हर किसी ने एक दुज्जे से फिर बतलाई।।

यही सत्य है यही होता है हर बार, चुनावी इम्तेहान, चुनावी प्रक्रिया से पूर्व।

झूठे वादों से चुनावी, ठगी जनता, बेबसी पर अपनी जब मुस्काए।।

और नेता जी भी चालाकी पर अपनी सीना ठोक कर जब इठलाए।।।

क्यों बट जाता है वर्गों में जात पात के देश ये प्यार अपना।

अमीर बन जाता है और अमीर, नसीब पर गरीब के लग जाता है क्यों, भुखमरी, लाचारी, बेबसी से पूर्ण गरीबी का एक ताला।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

15/12/2018 at 22:30

पुनः प्रकाशित नवीनतम वीडियो यूट्यूब वीडियो लिंक के साथ 26 अक्टूबर वर्ष 2019 समय रात्रि 9:20 बजे।

यूट्यूब नवीनतम वीडियो लिंक है।

Watch “🇮🇳 मंत्री जी। ( Mantri ji ) written and Voice by Vikrant Rajliwal” on YouTube

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एहसास

हम लिखते है, हम गाते है, हम गीत खुशियों के गुनगुनाते है।

साथ पल दो पल का नही, ये एहसास ह्रदय से खनखनाते है।।

मौसमो की बारिश नही, ये अश्क़, यादों की एक निशानी है।

हर पल एहसासो को अपने संजोए, हर दर्द, हर दास्ताँ, मोहब्ब्त की एक कहानी है।।

आज फिर से तेरी याद आ गई सितमगर, गुजरे महखाने की गली से होकर जब हम।

गर गुनाह है तेरी याद में मह को पीना, तो ये गुनाह करते हुए मह को पीते जाएंगे अब हम।।

बोतल शराब की एक साथी रह गई बाकी, जो साथी थे हमारे वो साथ छोड़ गए सब के सब।

हर घुट से शराब की जिंदा होते गए हम, जिंदा थी जो सांसे हर घुट से शराब की उन्हें मारते गए हम।।

दर्द और दवा का असर, हमे मालूम नही, हर दवा को ज़हर और हर ज़हर को जिंदगी में शराब से घोलते गए हम।

आज वक़्त पूछता है पता, खुद हमसे हमारा, हम उसको बतलाए तो बतलाए क्या, दो घुट भी शराब की जो पीए नही अभी हम।।

ज़ख्म जिंदगी के हज़ार मिले, हर ज़ख्म एक निशान हक़ीक़त का लगा, हर निशान पर देकर एक निशान नया, हर ज़ख्म को ज़ख्म से अपने मिटाते गए हम।।।

फ़क़त हर ज़ख्म एहसासों का, आज भी ताज़ा है हमारा, हर एहसास करता है बयां, दर्द एहसासो का हमारा, हर दर्द से झलकता है एक एहसास अधूरा हमारा।

एहसास जो अधूरे रह गए, वक़्त की बिसात पर कहि जो खो गए, ढूंढता है आज भी उन एहसासों को, एहसासों में अपने कहि, एहसास अधूरा हमारा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
13/10/2019 at 3:31 pm

Watch “नंगे भ्रष्टाचारी ( Poetry by Vikrant Rajliwal )” on YouTube ^read Poerty and Video link^

नंगे भ्रष्टाचारी काव्य कविता के जरिए श्री विक्रांत राजलीवाल ने उन भ्रष्टाचारी व्यक्तियों एव संगठनों पर एक प्रहार करने का प्रयत्न किया है जो आज भी हमारी मातृभूमि भारतवर्ष के उज्ज्वल इतिहास पर अपनी भ्रष्टाचारी प्रवर्ति के जरिए एक कलंक मलते हुए गरीब एवं ईमानदार व्यक्तियोँ का शोषण कर रहे है।

आशा करता हु आप सभी आदरणीयों तक मेरी यानी कि विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित इस महत्वपूर्ण काव्य कविता के भाव पहुच सकें।

जय हिंद।

विक्रांत राजलीवाल।

नंगे भ्रष्टाचारी

नगों से नंगे मिले नंगे होंगे सारे।
नगों को देख नंगे मुस्काए,
भ्रष्ट है नंगे जितने भी जो सारे।।

प्रकाश सत्य से सत्य का कर देगा नंगा, नगों को नग्न है नंगे जितने भी जो सारे।

न्याय सत्य से सत्य का कर देगा न्याय, नगों से पीड़ित है बेबस जितने भी जो सारे।।

नंगे ये नग्न है दलदली भ्रष्टाचार से शिक्षित, बेशर्म जितने भी नंगे जो सारे।

चलेगी लहर सच्चाई की तो मचेगी भगदड़ एक भयानक, खुलेगी पोल नग्नता से नगों की, नंगे है समस्त भ्रष्टाचारी जितने भी जो सारे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
21/11/2018 at 08:47 am

(Republish 8/10/2019 at 8:30pm)

मेरा फ़ेसबुक पेज़ का लिंक पता है।

काव्य कविता नंगे भ्रष्टाचारी। का यूट्यूब वीडियो लिंक है

👉 https://youtu.be/ikJ68o7Eh5g

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ख़ामोशीया।

ज़िद है उन्हें क़त्ल करने की हमारे और हम एक नज़र मोहब्ब्त, नज़रो में उनकी देखने को तरसते है आज भी।

वो कहते है हमें की भूल जाए हम उनको और हम यक़ीन मोहब्ब्त का अपनी उन्हें दिलाते है आज भी।।

हर हादसा एक सबक जिंदगी का और हर सबक एक ज़ख्म है नासूर हमारा, नासूर हर ज़ख्म एक सौगात जिंदगी की समझते है हम आज भी।

लम्हा लम्हा हर लम्हा साए में मौत के साया जिंदगी का ढूंढते हुए, हर लम्हा जिंदगी को बेहद नज़दीक से देखते जा रहें है हम आज भी।।

हर ख़्वाब जिंदगी का हमारा टूटा हुआ, देखता है ख़्वाब एक हक़ीक़त का एहसास वो ख़्वाब हमारा टूटा हुआ जो आज भी।

तड़प साँसों की तड़पती है बेताब धड़कती धड़कने, हर धड़कती धड़कन एक आह है जिंदगी की हमारे जो आज भी।।

एक राह अंजानी मैं उसका हु मुसाफ़िर, ना साथ है कोई, ना आस पास है कोई, चलता चला जा रहा हु बेहिंतिया मैं आज भी।

तन्हा समा ये बंजर माहौल, दिखाता है अक्स हक़ीक़त का नज़दीक से टूटा एक आईना, दूर तलक है ख़ामोशी आज भी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

21/09/2019 at 11:17 pm

💥 कर्म फल।

दम था बहुत उड़ने का ऊँची उड़ान उसमें, जब जब उड़ना चाहा उसने, तो हर बार आसमान सिमट कर सिमट गया।

टूटे परों में थी जो जान कुछ बाकी, वक़्त की हर चाल पर बच ना सकी, बच गई फिर भी अधूरी जो, वो थी एक ख़्वाहिश, एक ख्वाहिश, एक ख़्वाहिश… एक ख़्वाहिश एक उन्मुक्त उड़ान की, एक आत्मस्वाभिमान भरी पूर्ण एक अधूरी पहचान की!

घाव एहसासो के एहसासो को तोड़ देते है। चक्रव्यूह जीवन का कभी कभी अर्जुन को भी पीछे मोड़ देते है। ज्ञान को अज्ञान और हर अज्ञान एक सार्थी ए पथिक द्वार ज्ञान से मुक्त कर देते है।

सत्य शक्ति का एहसास अब जग को सत्य स्वयं करवाएगा। असत्य सत्य अग्नि से अब बच ना पाएगा। आज और अभी होगा निर्णय, सत्य प्रतिबिंब स्वयं विजय दर्पण से विजय एवं पराजय का दिखलाएगा।

ये सृष्टि, ये ब्रह्मांड, ये अनन्त एहसास, भृम है ये जीवन, ये जीवित प्राण। जीव जीवन से मुक्त है, मुक्त है हर श्वास, मुक्त है हर श्वास। सत्य एवं असत्य दर्पण सत्य एहसासों का, सत्य है जिनके हर एहसास, सत्य है जिनके हर एहसास।

वायु प्राण, अग्नि श्वास, शीतल आत्मज्ञान, रोग द्वेष, पाप एवं पुण्य फल कर्मो का ज्ञान, फल कर्मो का ज्ञान, फ़ल कर्मो का ज्ञान।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

16/09/2019 at 1:30 pmPicsArt_09-16-01.24.36

💥 चेतना। (नवीन काव्य)

हमनें खाया है दगा बहुत एतबार से यारों, दुआ है यही की अब कोई कभी अपनो से दगा ना करें।

जो करें विशवास तो निभा देना उसका साथ, भूल से भी विशवास से किसी के अब कोई कभी घात ना करें।।

हर ज़ख्म जज्बातों के दिल ही नही धड़कनों को भी तोड़ने जब लगें, वार पीठ पर हँसते मुस्कुराते रिश्तों में एक आग सी जब लगाने लगें।

टूटते एहसासों पर सरेराह जब चोट पर चोट लगने लगें, हर रिश्ता एक जहर और हर मरहम नासूर जिंदगी को जब करने लगें।।

गीत सुहाना एक बद्दुआ कोई जब बनने लगें, घात से विशवास पर अपने मासूम परिंदा (राही) बेहिंतिया जब तड़पने लगें।

हर राह जिंदगी की अचानक से सिमट कर जब खत्म होने लगें, हर बढ़ते-सिमटते कदम से राही जाल घिनोने में जब फँसने लगें।।

हर आशा एक निराशा में परिवर्तित जब होने लगें, डोर जीवन की अचानक से छूटते हुए जब टूटने लगें।

एक मृत्यु, एक जीवन, प्रतीक सत्य का मृत्यु जब बनने लगें, विपरीत सत्य से सहमा जीवन, मृत्यु जीवन जब लगने लगें।।

एक निर्णय, एक विचार, कौन सत्य, कौन असत्य, सत्य दबा जहा मृत्यु कोख में मृत्यु सा लाचार।

सत्य, असत्य की अपनी वाणी, स्वाहा सत्य जो एक वाणी, सत्य कोख मृत्यु में जागृत PicsArt_09-14-10.23.41चेतन व्यवहार।।

14/09/2019 at 10:27 pm