निवास स्थान है पाताल लोक अभी हमारा। (छंद काव्य) विक्रांत राजलीवाल।

निवास स्थान है पाताल लोक अभी हमारा, नाम अज्ञात है पता लापता अभी हमारा। मोह माया है मिथ्या जगत जो समस्त ये अनन्त हमारा, लक्ष्य मोक्ष है साधना तप तपस्या, उद्देश्य जीवन का हमारा।। हर कदम है व्यहू चक्र से पीड़ित अभी हमारा, तूणीर रिक्त है  बाणों से, साथ शत्रु की छाया, कोटनीति छल कपट,Continue reading “निवास स्थान है पाताल लोक अभी हमारा। (छंद काव्य) विक्रांत राजलीवाल।”

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नंगे भ्रष्टाचारी काव्य कविता के जरिए श्री विक्रांत राजलीवाल ने उन भ्रष्टाचारी व्यक्तियों एव संगठनों पर एक प्रहार करने का प्रयत्न किया है जो आज भी हमारी मातृभूमि भारतवर्ष के उज्ज्वल इतिहास पर अपनी भ्रष्टाचारी प्रवर्ति के जरिए एक कलंक मलते हुए गरीब एवं ईमानदार व्यक्तियोँ का शोषण कर रहे है। आशा करता हु आपContinue reading “Watch “नंगे भ्रष्टाचारी ( Poetry by Vikrant Rajliwal )” on YouTube ^read Poerty and Video link^”