💥 कर्म फल।

दम था बहुत उड़ने का ऊँची उड़ान उसमें, जब जब उड़ना चाहा उसने, तो हर बार आसमान सिमट कर सिमट गया।

टूटे परों में थी जो जान कुछ बाकी, वक़्त की हर चाल पर बच ना सकी, बच गई फिर भी अधूरी जो, वो थी एक ख़्वाहिश, एक ख्वाहिश, एक ख़्वाहिश… एक ख़्वाहिश एक उन्मुक्त उड़ान की, एक आत्मस्वाभिमान भरी पूर्ण एक अधूरी पहचान की!

घाव एहसासो के एहसासो को तोड़ देते है। चक्रव्यूह जीवन का कभी कभी अर्जुन को भी पीछे मोड़ देते है। ज्ञान को अज्ञान और हर अज्ञान एक सार्थी ए पथिक द्वार ज्ञान से मुक्त कर देते है।

सत्य शक्ति का एहसास अब जग को सत्य स्वयं करवाएगा। असत्य सत्य अग्नि से अब बच ना पाएगा। आज और अभी होगा निर्णय, सत्य प्रतिबिंब स्वयं विजय दर्पण से विजय एवं पराजय का दिखलाएगा।

ये सृष्टि, ये ब्रह्मांड, ये अनन्त एहसास, भृम है ये जीवन, ये जीवित प्राण। जीव जीवन से मुक्त है, मुक्त है हर श्वास, मुक्त है हर श्वास। सत्य एवं असत्य दर्पण सत्य एहसासों का, सत्य है जिनके हर एहसास, सत्य है जिनके हर एहसास।

वायु प्राण, अग्नि श्वास, शीतल आत्मज्ञान, रोग द्वेष, पाप एवं पुण्य फल कर्मो का ज्ञान, फल कर्मो का ज्ञान, फ़ल कर्मो का ज्ञान।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

16/09/2019 at 1:30 pmPicsArt_09-16-01.24.36


💥 चेतना। (नवीन काव्य)

हमनें खाया है दगा बहुत एतबार से यारों, दुआ है यही की अब कोई कभी अपनो से दगा ना करें।

जो करें विशवास तो निभा देना उसका साथ, भूल से भी विशवास से किसी के अब कोई कभी घात ना करें।।

हर ज़ख्म जज्बातों के दिल ही नही धड़कनों को भी तोड़ने जब लगें, वार पीठ पर हँसते मुस्कुराते रिश्तों में एक आग सी जब लगाने लगें।

टूटते एहसासों पर सरेराह जब चोट पर चोट लगने लगें, हर रिश्ता एक जहर और हर मरहम नासूर जिंदगी को जब करने लगें।।

गीत सुहाना एक बद्दुआ कोई जब बनने लगें, घात से विशवास पर अपने मासूम परिंदा (राही) बेहिंतिया जब तड़पने लगें।

हर राह जिंदगी की अचानक से सिमट कर जब खत्म होने लगें, हर बढ़ते-सिमटते कदम से राही जाल घिनोने में जब फँसने लगें।।

हर आशा एक निराशा में परिवर्तित जब होने लगें, डोर जीवन की अचानक से छूटते हुए जब टूटने लगें।

एक मृत्यु, एक जीवन, प्रतीक सत्य का मृत्यु जब बनने लगें, विपरीत सत्य से सहमा जीवन, मृत्यु जीवन जब लगने लगें।।

एक निर्णय, एक विचार, कौन सत्य, कौन असत्य, सत्य दबा जहा मृत्यु कोख में मृत्यु सा लाचार।

सत्य, असत्य की अपनी वाणी, स्वाहा सत्य जो एक वाणी, सत्य कोख मृत्यु में जागृत PicsArt_09-14-10.23.41चेतन व्यवहार।।

14/09/2019 at 10:27 pm

💥 One Truth. 5 (Fifth Blog) A true Experience. (Republish)

💥 One True. 5 (Fifth blog) was (1567045350319trash) deleat by mistake. That is why I am republishing a true Fifth blog.

Now further …

  And I open the door. At that time, I could not understand anything properly in the saroor of Pudia (bhang, dhatura). Yes, still remember so much that maybe I open the door and stand back near the same window and throw out the smoldering cigarette of the pudiya ( bhang, dhatura) that is still there. Yes, remember, after that, two friends of my father, whom I knew well, he come and stand near by me. And some smilingly ask me that there is a strange smoke here. In response to this, I smile and agree with him.

At the same time, he tells me that today is the party Wishky (Madaria) will drink. On hearing this from his mouth, my forehead goes down and a strange restlessness starts happening. Don’t know why? Probably I had no hope of any such thing from him. Then there is a thought that something is wrong but at that time could not even realize at all what could be wrong. Still, stopping my restlessness, I ask him to speak to my father, uncle! because no family member is present there at the time except me on the police quarter. On hearing this from my mouth, he immediately calls my father from mobile and my father also gives his consent that it is okay to have a party. After that, he shows me the shoes and ask whoes is this, seeing my new shoes in their hands, my saroor gets a bit lighter. And I remember that perhaps I had gone from Mandi (Asia’s largest fruit and vegetable market) at Sarur in Pudia to my blood relative (Tau ji) house instead of coming straight police quarter, I remember that I had come to my police quarter wearing old, broken shoes in torn shoes instead of shoes. Right now I was thinking everything that only then one of them says to my uncle that you wear your new shoes, then party. But I tell them that it is not my shoes, this torn shoes is my and now let’s go to the party, Papa has also given permission. And I lock that my policeman quater. After that the three of us get out of that police quarters and stop Uncle Scooter at a distance of about 100 meters and another uncle (whom I call Mausa Ji) who used to live in that police colony is also sit down on the scooter. They sit down and start gearing the previous Uncle Scooter. All of this seemed very strange to me, but I silently sat almost on the Stepney of the scooter. At that time, I did not realize even a little bit that the police colony with which I have a lot of sour and sweet memories of two and a half to three years (2.5 to 3 years), I am seeing it for the last time. And the uncle who was taking us to the party, we sit on his scooter and get out of the police colony quickly.

After some time we cross the red light of the highway and come to Burari road. And I was almost in the same position sitting on the stepny of the scooter thinking that here is our plot (on which we are building and living in the present time), perhaps the party is on the same empty plot today. But when his scooter quickly moves past leaving the turn of the plot, then I wonder what is the matter today and what is the party that Papa has also approved. In that strange state of motion, the four of us on the scooter and I were sitting on the stepney at the back, thinking that only then the scooter stops on one side of an empty deserted road.

The rest from the next blog.

Written by Vikrant Rajliwal.
Republishing date is 14/09/2019 at 6:35 pm

If there has been any error in my translation, please check with Hindi blog. Sorry for your inconvenience.

💥 सत्य कर्म। (नवीन काव्य-कविता।)

सत्य भृम ले जान ए पथिक, लक्ष्य स्वयं झुकते नही, पथ ए पथिक सरलता से जीवन में स्वयं तुम्हारे।

ज्ञान अज्ञान ये भाव ए पथिक, लक्ष्य स्वयं आएंगे चलकर, बांधे हाथ सरलता से निकट स्वंय तुम्हारे।।

विजय तिलक भाग्य में तुम्हारे, भृम विजय स्वयं ही मिल जाएगी, आ कर निकट सरलता से स्वयं तुम्हारे।

कर्म, कुकर्म प्रतिद्वंद्वी पथ सत्य पर विजय पराजय, भृम विजय कुकर्मो से सत्य पर होगी स्थापित स्वयं तुम्हारे।।

हो ज्ञात सत्य ए पथिक अज्ञानी, पथ कठिन ये बाधाए दिशा हर ओर, इम्तेहां जीवन के ये सरल नही।

श्वास श्वास जागृत जीवन, पग पग घायल प्राण पथिक, मात्र सोच से हो जाए साकार ये वो स्वप्न नही।।

तप, त्याग, आदर्श ये जीवन के महान, नियम, अनुशाशन ब्रह्मचर्य कर स्थापित ए पथिक जीवन मे अपने तू दिव्य ज्ञान।

कर पालन संयम, चेतन इंद्रिया, कर्म योग सबसे महान, द्वेष, मोह, माया सब मिथ्या, कर्म से हो कर्म का सिर्फ संज्ञान।।

दिव्य आत्मा, साथ परमात्मा, योग योगी का एक अनुष्ठान, अमृत वाणी, शीतल चित्त, स्थिर आत्मशांति एक वरदान।

जन्म, मृत्यु, पीड़ा, प्रसन्ता, क्षणिक लोक मृत्यु के समस्त भाव, सत्य कर्म से सत्य स्थापित, सत्य है पथिक ये दिव्य ज्ञान।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
12/09/2019 at 12:12PicsArt_09-12-12.01.52 pm

🌹 अश्क़। (एक दर्द भरी प्यारी सी सौगात के साथ)

ये अश्क़ है दिवाने (विक्रांत राजलीवाल।) के जो करते है बयां दर्द मोहब्ब्त का मोहब्ब्त से मेरे। हर दर्द से छलकता है अश्क़ मोहब्ब्त का मोहब्ब्त से मेरे।।
आज अपनी इस नज़म को एक दर्द भरी प्यारी सी सौगात के साथ आप सभी मित्रों के लिए पुनः प्रकाशित कर रहा हु। जिसमे आपको दर्द ए दिल को बयां करती हुई कुछ और पँक्तियों को पढ़ने का आनन्द एक लुफ्त प्राप्त हो सकें। तो पेश ए ख़िदमत है आपकी अपनी नज़म 🌹 अश्क़। (एक दर्द भरी प्यारी सी सौगात के साथ)

🌹 अश्क़।

मोहब्ब्त से कायल है मोहब्ब्त से महबूब की वो अपने, लम्हा लम्हा मर्ज़ ए मोहब्ब्त से घायल है मोहब्ब्त से महबूब की वो अपने।

देखता है सूरत ए यार बेहद नज़दीक से वो अपने, करता है मोहब्ब्त, महबूब को बेहद नज़दीक से वो अपने।।

हुस्न के वार से इश्क़ तड़प जाता है बेहिंतिया, उठ उठ कर सर्द रातो में ज़ख्मो को कुरेद देता है वो अपने बेहिंतिया।

उसकी मदहोश आँखें उसके दर्दो को बयाँ करती है, हर दर्द से उसके, उसका दीवाना तड़प जाता है आज भी बेहिंतिया।।

चिर के दिल ख़ंजर से ज़हरीले अपना, फैला दिया ज़हर रग रग में नाम ए मोहब्ब्त बेवफाई उसकी, है जो आज भी बहुत ज़हरीला।

पहुचाता है सकूँ जख्मों को मेरे, हर एक ज़ख्म नया, कर देता है जिंदा, ज़हर झूठी मोहब्ब्त का उसकी, है जो आज भी बहुत ज़हरीला।।

हर वफ़ा से उसकी फ़रेब कोई झलक कर दिख जाता है आज भी जो उसका।

हर वफ़ा से आज भी है कायल दीवाना, ज़हर मोहब्ब्त का कर के बर्दाश उसका।।

ज़ख्म जो दिल के कभी भर ना सके, हर ज़ख्मो को मान कर एक सौगात उसकी, हम जो कभी मर ना सके।

एहसास मिटा कर भी उसका हम जो उसको कभी भुला ना सके, मासूम चेहरे से सरेराह हम आज भी उसके नक़ाब फ़रेबी जो उठा ना सके।।

नाम मोहब्ब्त का मोहब्ब्त से लेते है उनकी, आज भी हम ए दिवाने।

हर राज मोहब्ब्त के बैठे है छुपा कर मोहब्ब्त से उनके, आज भी हम ए दिवाने।।

अक्स मोहब्ब्त का उनकी मिटता नही, आज भी टूटे दिल से जो ए दिवाने।

हर अक्स मोहब्ब्त का है बेनाम एक टूटा आईना उनकी, आज भी जो ए दिवाने।।

हर असूल ए मोहब्ब्त को निभाते हुए, हर दर्द ए दिल दर्द जो मोहब्ब्त का उनकी दिल से टूटे अपने छुपाते हुए।

कर गया बर्दाश हर दर्द मोहब्ब्त का दर्द मेरा, हर दर्द एक ज़ख्म दिल का बन गया नासूर, बयान फ़रेब उनका करते हुए।

बर्दाश नही दर्द ये दिल का, धड़कता दिल सीने में अब हमें,
धड़कती हर धड़कन सुनाती है फ़रेबी हर दास्ताँ ए मोहब्ब्त जो उनकी।

हर दर्द एक दास्ताँ जो अश्क़ है मोहब्ब्त का, छलकता दर्द, हर एहसास ए मोहब्ब्त सरेराह, आज भी फ़रेबी मोहब्ब्त से जो उनकी।।

उनकी वो मासूम अदाएं, मदहोश शराबी निगाहें, आज भी आ जाती है याद जो, हर एक बात उनकी सबक जिंदगी का बन गया छलकता अश्क़ जो हर एक दर्द मेरा।

हर दर्द जो एक सबक बन गए, जिंदगी को जीने का जिंदा एक हर्फ़ बन गए, किताब ए मोहब्ब्त है दास्ताँ ए जिंदगी, हर दास्ताँ करती है बयां, अश्क़ जो एक दर्द मेरा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

5/09/2019 at 11:05 am1567654951010

💥 सत्य। // 💥 Truth.

🕯️ दुसरो के गुणों को एव स्वंय के अवगुणों को जो स्वीकार करने की क्षमता रखता है वास्तव में वही स्वयं के प्रति एक ईमानदारी का व्यवहार बरतता है।

यदि आप सत्य को स्वीकार नही कर सकते तो शीघ्र ही सत्य की दिव्य अग्नि की तपिस से आपकी अन्तर्रात्मा आपको निरन्तर तपाते हुए जीते जी ही भस्म कर देगी।

अपने कुकर्मो के भीषण प्रभाव द्वारा दुखी होते हुए जब आप आत्मग्लानि की भावनाओं से पूर्णतः भर जाएंगे तो आपको आवश्यकता होगी उस दिव्य सत्य की जो आपको अपनी दिव्यता के प्रभाव द्वारा हर प्रकार की आत्मग्लानि की भावनाओ से मुक्त कर आपका उद्धार कर सकें।

यदि आप के ह्रदय एहसासों में किसी योग्य व्यक्ति के लिए किंचित मात्र भी सम्मान का भाव नही उपजता है या सृष्टि के द्वारा किसी योग्य गुरु एवं मार्गदर्शक के सत्यकर्मो की अनदेखी हो जाती है तो ज्ञात रहे इस सृष्टि का दुर्भाग्य किसी भयंकर विनाश के साथ उनके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

1/09/2019 at 6:50 pm


💥 Truth.

🕯️ The one who has the ability to accept the qualities of others and the Demerits of the self, in fact he behaves in an honest manner towards himself.

If you cannot accept the truth, then soon your soul will devour you with a constant heat while living with the heat of the divine fire of truth.

Being saddened by the horrific effects of your misdeeds , when you are completely filled with feelings of self-aggrandizement, you will need that divine truth which can save you by freeing you from all kinds of gulity through the influence of your divinity.

If feelings of respect do not arise in your heart feeling for a worthy person or if the honorable persons of this world ignore the truths of a worthy mentor and a worthy guide, So be aware that the misfortune of this entire world is knocking at their door with some terrible destruction.

Written by Vikrant Rajliwal.
1/09/2019/ at 6:50 pm1567086169529

💥 सत्य। // 💥 Truth.

🕯️ जिस सड़क पर आप अपने जीवन के प्रारम्भ से एक दौड़ लगते हुए दौड़ते जा रहे है ना प्रियजनों! इस जीवन मार्ग पर आपकी सांसे तो टूट सकती है परंतु आपकी यह दौड़ नही रुक सकती!

जब तक आपको आपकी उस दिव्यता का अनुभव प्राप्त नही हो जाता जिस के साथ ईष्वर ने आपकी सांसो में जीवन प्राणों को फूंक कर आपको दिव्य बनाया था।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

1/09/2019 at 2:10 pm

💥 Truth.

🕯️ Dear loved ones, on the road you are running continuously from the beginning of your life, running a race. Your breath may be broken on this path of life, but your race cannot stop.

  Until you get to experience your divinity with which God made you divine by blowing life into your breath.

  Written by Vikrant Rajliwal.

1/09/2019 at 2:10 pm1567086169529

🕯️ अपने दिव्य व्यक्त्वि के विपरीत किया गया हर समझौता स्वयं आपको आपकी प्रत्येक उपलब्धियों को नकारते हुए आपकी अंतरात्मा में एक आत्मग्लानि की भावना सहज ही उतपन कर देगा।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

🕯️ Every compromise made against your divine person, by denying you every one of your achievements, will instill a feeling of self-ignorance in your conscience.

Written by Vikrant Rajliwal.

🕯️ यदि आप अपने मानव जीवन में एक अलौकिक आत्मशांति के साथ सकूँ से जीवन व्यतीत करना चाहते है तो केवल सभ्य साहित्य का ही पाठन करें। यहाँ सभ्य साहित्य से मेरा तातपर्य है कि जिस साहित्य के पाठन के उपरांत आपके चंचल चित्त परवर्ती में किसी के लिए किंचित मात्र भी द्वेष या मलिन भाव व्यवहारों के लिए कोई भी स्थान शेष ना रहें।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

🕯️ If you want to live with a supernatural self-peace in your human life, then only read decent literature. I mean here with decent literature that after reading the literature, in your fickle mind, there is no room left for anyone for even a little bit of malice or sloppy behavior.

Written by Vikrant Rajliwal.

31/08/2019 at 8:45 am

💥 सत्य। // 💥 Truth.

यदि आप सर्वप्रथम स्वयं के विकास के लिए कोई सकरात्मक प्रयत्न नही करते है तो आप शीघ्र ही पतन को प्राप्त हो जाएंगे। एवं जब आपका आपके व्यक्त्वि का पतन हो जाएगा। तब आपके जीवन मे प्रारंभ होता है गृह कलेश।

इसके साथ ही समाज एव परिवार के जन मानस आप के ऊपर एक तिरस्कार की उंगली उठाते हुए आपको आपके पतन का दोषी सिद्ध कर देते है।

इसीलिए सर्वप्रथम आपका आपके लिए यह नैतिक कर्तव्य बन जाता है कि आप सर्वप्रथम स्वयं के विकास के लिए एक सकरात्मक प्रयास करें। एव अपने व्यक्त्वि का एक शश्क्त उज्ज्वल निर्माण करें। जिसके उपरांत आपका परिवार सहज ही आपको वह मान सम्मान देना प्रारम्भ कर देगा जिसके आप योग्य है।

इसके साथ ही समाज एव परिवार के जन मानस आपके प्रत्येक सकरात्मक सत्कर्मों को स्वीकारते हुए सहज ही आपको आपके भूतकालीन कुकर्मो के लिए क्षमा कर देते है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

29/08/2019 at 7:10 pm


💥 Truth.

If you do not make any positive effort for your own development first, then you will soon get the downfall. And when your person collapses. Then the family affliction begins in your happy life.

  At the same time, the people’s of the society and family member’s raise a contempt finger on you and prove you guilty of your downfall.

  That is why it becomes your moral duty for you to first make a positive effort for your own development. And make your person a powerful brighter. After which your family will start giving you the respect you deserve.

  With this, the people’s of the society and family, while accepting each of your positive actions, easily forgives you for your past deeds.

  Written by Vikrant Rajliwal.
29/08/2019 at 7:10 pm

If there is any error in my translation, then I apologize for your inconvenience.1567086169529

💥 एक सत्य। 5 (पांचवा ब्लॉग) एक सत्य अनुभव।

अब आगे…

और मैं दरवाजा खोल देता हूँ। उस समय पुड़िया के सरूर में मुझ को ठीक से कुछ समझ में नही आ रहा था। हा फिर भी इतना अवश्य याद है कि शायद मैं दरवाज़ा खोल कर वापस उसी खिड़की के समीप आ कर खड़ा हो जाता हूं और अब भी वहा मौजूद उस पुड़िया की सुलगती सिगरेट को बुझा कर बाहर फेंक देता हूं। हा याद है उसके बाद मेरे समीप मेरे पापा के दो मित्र, जिन्हें मैं अच्छे से जानता था आ कर खड़े हो जाते है। और कुछ मुस्कुराते हुए मुझ से पूछते है कि यहाँ तो अज़ीब सा धुंआ है। इसके उत्तर में मैं भी मुस्कुरा कर उनसे सहमत हो जाता हूं।

ठीक उसी समय वह मुझ से कहते है कि आज पार्टी है विश्कि (मदरिया) पीएंगे। उनके मुंह से यह सुनते ही मेरा माथा कुछ ठनक जाता है और एक अजीब सी बैचेनी होने लगती है। पता नही क्यों? शायद मुझ को उनसे ऐसी किसी बात की कोई उम्मीद ना थी इसीलिए। फिर एक ख्याल आता है कि कहि कुछ तो गड़बड़ है पर उस समय तनिक भर भी एहसास नही हो सका कि आखिर क्या गड़बड़ हो सकती है। फिर भी अपनी उस बेचैनी को रोकते हुए मैं उनसे कहता हूं कि अंकल क्या मैं अपने पापा से बात कर लूं क्यों कि क्वाटर पर मेरे सिवाय कोई भी परिवार का सदस्य उस समय वहाँ मौजूद नही है। मेरे मुंह से इतना सुनते ही वह तुरंत पापा को मोबाइल से कॉल कर देते है और मेरे पापा भी अपनी सहमति दे देते है कि ठीक है पार्टी कर लो। उसके बाद वह मुझ को शायद जूते दिखाते हुए पूछते है कि यह किसके है उनके पास अपने नए जूते देख कर मेरा सरूर कुछ हलका हो जाता है। और मुझ को स्मरण होता है कि शायद मैं पुड़िया के सरूर में मंडी (एशिया की सबसे बड़ी फल एवं सब्जी मंडी) से सीधे अपने पुलिसिया क्वाटर पर आने की बजाए अपने रक्त सम्बंधित रिश्तेदार (ताऊ जी) के घर चला गया था और वहाँ अपने नए जूते छोड़ कर एक फ़टे पुराने चिथड़े के समान जूतों को पहन कर पुड़िया के सरूर में पुलिसिया क्वाटर पर आया था। अभी मैं यह सब कुछ सोच ही रहा था कि तभी उनमे से एक अंकल कहते है कि यह अपने जूते पहन लो फिर पार्टी करते है। परन्तु मैं उनसे कहता हूं कि यह मेरे जूते नही है यह फ़टे चिथड़े वाले जूते ही मेरे है और अब चलते है पार्टी करने को, पापा ने भी इजाज़त प्रदान कर दी है। और मैं अपने उस पुलिसिया क्वाटर को लॉक लगा देता हूं। उसके उपरांत हम तीनों उस पुलिसिया क्वाटर से बाहर को निकल जाते है और लगभग 100 मीटर की दूरी पर अंकल स्कूटर को रोक देते है और एक और अंकल ( जिन्हें मैं मौसा जी कहता हूं)जो वही उस पुलिस कालोनी में रहते थे वह भी स्कूटर पर बैठ जाते है और पहले वाले अंकल स्कूटर को स्टार्ट कर गेयर लगा देते है। यह सब कुछ मुझ को अत्यंत ही अजीब सा लग रहा था परन्तु मैं खामोशी से लगभग स्कूटर की स्टेपनी के ऊपर को हो कर बैठा रहता हूं। उस समय मुझ को तनिक भर भी इस बात का एहसास नही था कि जिस पुलिस कालोनी से मेरी ढाई से तीन वर्ष की (2.5 से 3 वर्ष) बहुत सी खट्टी और मीठी यादे जुड़ी है उसको उस समय मैं अंतिम बार देख रहा हु। और जो अंकल हमें पार्टी करने के लिए ले जा रहे थे वह हमे अपने उस स्कूटर पर बैठा कर उस पुलिस कालोनी से तेज़ी से बाहर की ओर निकल जाते है।

कुछ ही समय के उपरांत हम हाइवे की रेड लाइट को पार कर बुराड़ी रोड पर आ जाते है। और मैं उसी अवस्था मे लगभग स्कूटर की आधी स्टेपनी पर किसी तरह से बैठा हुआ सोच रहा था कि यहाँ तो हमारा प्लाट है ( जिस पर हम मकान बना कर वर्तमान समय में निवास कर रहे है) शायद वही खाली प्लाट पर पार्टी है आज। परन्तु जब उनका स्कूटर तेज़ी से प्लाट के मोड़ को पीछे छोड़ते हुए आगे को निकल जाता है तब मैं सोचता हूं कि आज क्या बात है और यह किस बात की पार्टी है जिसकी इजाजत पापा ने भी प्रदान कर दी है। उस अज़ीब सी अवस्था मे उस तेज़ी से चलते हुए स्कूटर पर हम चार व्यक्ति और मैं सबसे पीछे को लगभग स्टेपनी पर बैठा हुआ यही सोच विचार कर रहा था कि तभी स्कूटर एकदम से एक खाली सुनसान सड़क के एक ओर को रुक जाता है।

शेष अगले क्रम से।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
28/08/2019 at 9:25 pm 1567006942685