एक सत्य अनुभव।

आज मुझ से मुझ को समीप से जानने एवं समझने वाला कोई व्यक्ति जब  पुछता है कि आप के भीतर जो एक सकरात्मक परिवर्तन देखने को प्राप्त हो रहा है उसके पीछे वास्तविक कारण क्या है? तब मैं उनसे यही कहना चाहूंगा कि वर्ष 2000 में जब मैं 15 या 16 वर्ष का था तब मैंने अपने पिताजी से संपर्क कर उन्हें सूचित किया कि मेरी तबियत खराब है एवं राह में मैने उनसे वास्तविकता बतलाई कि मुझ को किसी ने सिगरेट में कुछ भर कर पिला दिया है। और ऐसा बहुत समय से हो रहा है। तब मेरे पिता जी मुझ पर अत्यंत क्रोधित हो गए। और उन्होंने मुझ से उसी क्रोधित स्वरों के साथ कहा कि यह सब डॉक्टर को बतइयो!


यहाँ सबसे अहम प्रथम विषय यह है कि मैं आपका अपना मित्र उस अबोध उम्र में सत्य स्वीकार कर, स्वयं हर प्रकार के हानिकारक प्रदार्थों से मुक्त होने के लिए इच्छूक था। एवं दूसरा सबसे अहम विषय यह है कि उस समय मेरी वास्तविक स्थिति को समझ सकने का ज्ञान स्वयं मुझ को एवं मेरे परिवारजनों को भी उबलब्ध नही था। इसी कारण अज्ञानता के कारण ना चाहते हुए भी मैं घर में कैद हो कर रहा गया। स्वास्थ्य तो क्या प्राप्त होता मेरा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य भी अत्यधिक विकृत होता गया।  इसी अज्ञानता के कारण मुझ को कई प्रकार की शारिरिक एवं मानसिक चोटें भी लगी। जिनके दर्द को शायद मैं चाह कर भी बयां ना कर सकूँ।

तदोपरांत मेरे पिताजी ने कई हकीमों, तांत्रिकों एवं हॉस्पिटल से मुझ को स्वस्थ्य वृद्धि हेतु इलाज मुहैया करवाया। परन्तु सब व्यर्थता को प्राप्त हुए। अंततः वर्ष 2004 मैं मुझ को पुनर्वासकेन्द्र मै भर्ती करवाया गया। जहाँ बहुत से जटिल एवं कठोर परिणामो को झेलने हुए मुझ को जो ज्ञान प्राप्त हो रहा था उससे मुझ को एहसास हुआ कि हा इसी की तो मुझ को अत्यंत आवश्यकता थी और अब भी है! परन्तु इस प्रकार से एक कैदी की भांति, दण्डनात्मक परिस्थितियों में, इस प्रकार एक पिंजरे के पंछी की भांति डर के माहौल में शायद मैं स्वास्थ्य को प्राप्त ना कर सकूँ। जबकि वहाँ के समस्त जटिल एवं कठोर परिणामो को नज़रंदाज़ करते हुए, जो दिव्य ज्ञान मुझ को प्राप्त हो रहा था बस वही तो जीवन है।


एवं कैदी सी की स्थिति को ना चाहते हुए भी स्वीकारते हुए, एक गुलाम कि भाँति अपने जीवन के दिव्य ज्ञान को मैं अपनाता रहा। परन्तु आज 15 वर्षो के उपरांत दिसम्बर वर्ष 2019 में मैं यह कह सकता हु की वह दिव्य ज्ञान जिसकी मुझ को वर्ष 2000 में 15 या 16 वर्ष की उम्र में अत्यधिक आवश्यकता थी। जिस अनजान मार्ग को सत्य के द्वारा मैंने स्वयं के लिए स्वयं ही चुना था। एक अस्वतंत्र एवं जोरजबरदस्ती के माहौल में मेरे जीवन मे  कार्य ना कर सका। परन्तु इसका तातपर्य यह नही की वह दिव्य ज्ञान मेरे जीवन मे व्यर्थ सिद्ध हुआ। अपितु एक स्वतंत्र माहौल में  आज में बिना किसी बन्धन के, एक आत्मस्वीकृति के साथ स्वयं के स्वतंत्र एवं सकरात्मक प्रयासो के साथ 28 महीने 5 दिनों से हर प्रकार के हानिकारक व्यसनों से मुक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के उपरांत, एक रचनात्मक लेखनी के द्वारा साहित्य की सेवा कर रहा हु।

इसीलिए यदि मेरे जीवन में एक सकरात्मक परिवर्तन आ सकता है तो तो आप या आपके परिजन या वह बालक जो व्यसनों की गिरफ्त में फंसे हुए है, उनके जीवन मे भी एक सकरात्मक परिवतर्न अवश्य उतपन हो सकता है। एवं वह मुझ से भी बहुत अच्छा कार्य कर सकते है। बस उन्हें आवश्यकता है तो उनकी समस्याओं को समीप से समझ सकने वाले एक ऐसे योग्य व्यक्ति एवं मित्र की जो उन्हें एवं उनकी समस्याओं को समझते हुए उनकी सहायता कर सके।


विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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एक सत्य।

अपने भूतकाल में क्या क्या कुकर्म किए थे! यह इस संसार के लिए इतना अधिक महत्व नही रखता, जितना कि आपके वर्तमान काल मे किए गए सत्यकर्म।

इसीलिए अपने भूतकाल की अज्ञानता को स्वीकारते हुए, जो मनुष्य अपने वर्तमान काल मे अपनी इंद्रियों को जागृत करते हुए, सत्यकर्म करते है वह वास्तविकता में प्रेम एवं सहानुभूति के पात्र होते है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखीत।

3 नवम्बर वर्ष 2019 समय प्रातः 7:48 बजे