सत्य।

आज मेरा ह्रदय कुछ आहात है कुछ स्वयं के टूटते एहसासों से और कुछ…

जब एक सत्य एहसास बेमाना सा सिद्ध होते हुए स्वयं के होने पर स्वयं से ही घृणा करने को मजबूर हो जाए; तब हर दिशा से एक गूंज सम्पूर्ण ब्रह्मांड को झंझोर कर रख देगी।

जब जब ऐसा होता है तब तब उन समस्त दुराचारियो का जो उस सत्य के दोषी होते है का अंत स्वयं सत्य के द्वारा अत्यंत ही भयावह रूप से सहज ही हो जाता है।

फिर भी यदि कोई दुराचारी अपने अंत से पूर्व अपने कुकर्मों को सत्य के समीप स्वीकारले तो उसे उस भयावह पीड़ा से मुक्ति भी सहज ही प्राप्त हो जाती है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

विक्रांत राजलीवाल।
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🕊️ एक सत्य। (सत्य अनुभव) #संग्रह 1 से 6 ब्लॉग्स#👥

एक 17 वर्षीय अबोध युवक जब रिएबीटेशन सेंटर में भर्ती हो जाता है। एवं हर गुजरते लम्हों के साथ उसे उसके जीवन के वह प्रत्येक वाक्य एक एक करके स्मरण होने लगते है। जिनके प्रभाव से उसके जीवन मे एक अचूक परिवर्तन सहज ही आ गए। जिनमे से कुछ परिवर्तन सकरात्मक हो सकते है एव उनमें से कुछ परिवर्तन नकरात्मक भी हो सकते है। क्या आप जानते है कि वह 17 वर्षीय अबोध युवक जिसने अपने जीवन की कच्ची उम्र में जीवन की अत्यधिक जटिल परिस्थितियों का ना केवल दृढ़ता से सामना किया अपितु उन पर विजय प्राप्त करते हुए अपने जीवन को एक सकरात्मक दिशा भी प्रदान करि, कौन है? जी हाँ आपने सही पहचाना वह कोई और नही अपितु आपका परम् मित्र साहित्यकार विक्रांत राजलीवाल ही है।

आज भी मुझको अपने जीवन के वह क्षण अत्यधिक समीप से स्मरण हो जाते है जिन्हें मैं चाहकर भी विस्मृत नही कर सका हु। आज मैं जो जीवन जी रहा हु यह कभी एक स्वप्न के सम्मान प्रतीत होता था। एक ऐसा स्वप्न जिसे मेने रिएबीटेशन में कदम रखते ही जान लिया था या यह कहना अधिक उचित होगा कि जब मुझ को इस बात का एहसास हुआ कि मैं अब रिएबीटेशन में अपने जीवन के एक अनन्त सुधारात्मक मार्ग पर आ खड़ा हुआ हूं। आज भी वह दिन मेरी स्मृति में ज्यूँ का त्युं बना हुआ है। उस दिन ने भी और दिनों के सम्मान ही मेरे जीवन मे अपने आगमन की एक दस्तक दी थी। और उस दिन भी मैं और दिनों के सम्मान ही अत्यधिक ऊर्जा का एहसास कर रहा था। परन्तु वह दिन वास्तविकता में और दिनों से पूर्णतः विपरीत सिद्ध होते हुए मेरे जीवन को हमेशा के लिए परिवर्तित करने वाला था।

उस दिन को स्मरण करते हुए यहाँ मैं अपनी कुछ पनतियो को अंकित करना चाहूंगा जिन्हें मेने कल ट्विटर एव अन्य सोशल मीडिया पर पर लिखा था कि… ये दिल है कि आज भी जो खुद से ही खुद की एक बग़ावत की चाहत रखता है।
और हम है कि जो आज भी हर बग़ावत को इस दिल से मिटा देना चाहते है।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

07/06/2019

Even today, this heart keeps a desire for a rebellion of itself.
And we still want to erase every rebellion with this heart.

Written by Vikrant Rajliwal
07/06/2019
Soponser by vikrantrajliwal.com

सत्य है मित्रो आज भी कई बार मेरे ह्रदय में यह विचार आ जाता है कि बस! अब बहुत हो चुका अब और नही। हा अब और नही सह सकता। मगर मेरे जीवन के स्वम के संघर्ष के अनुभव एव उन अनुभवों से प्राप्त ज्ञान मुझे आज भी इस गुस्ताखी की कोई भी एक अनुमति प्रदान नही करते है। यही तो जीवन है

कि हम कैसे अपने गुरुजनों से प्राप्त मार्गदर्शन एव अपने स्वयं की जीवन की जटिल परिस्थितियों पर प्राप्त विजय को अपने अज्ञान के कारण यू ही नही मिटा सकते या अपने जीवन के अत्यधित जटिल संघर्ष को तुच्छ साबित करते हुए उन्हें अपने जीवन से विस्मृत नही कर सकते है। खैर मैं आपको बता रहा था कि कैसे किसी दिन आपका जीवन बिना किसी खास चेतावनी के आपके जीवन को पूर्णतः परिवर्तित कर सकता है। ऐसा ही एक दिन मेरे जीवन मे भी आया था जब मेरा साधारण सा जीवन एकदम से बदल गया।

याद ह जब…

अक्सर मुझ से जब भी कोई पूछता है कि आपके जीवन में आप कि अब तक की सबसे अहम उपलब्धि कौन सी है? तो मैं उन से सिर्फ इतना ही कहता हूं कि आज भी मैं जिंदा हु और मेरा दिल एक स्वास्थ्य रूप से निष्पाप भाव से धड़क रहा है ना जो, यही है मेरे जीवन की अब तक कि सबसे अहम उपलब्धि।

आप सोच रहे होंगे यह कैसे? तो मैं आपको बता दु कि यह आपके लिए सहज हो सकता है परन्तु मेरे लिए यह कभी भी इतना सहज नही रहा। एक अबोध बालक (17 वर्षीय) जब सुधार के मार्ग को स्वम् अपनी इच्छा से चुनता है एव उस मार्ग पर अनेक प्रकार की जटिल परिस्थितियों से जब उसका सामना होता है तो सच कहता हु मित्रों एक बार को धड़कता दिल भी अपनी धड़कनो को भूल जाता है। सुधार के मार्ग पर मानव जीवन के सद्व्यवहार एव दुर्व्यवहार के बीच के अति महिम अंतर को समझते हुए स्वम् के व्यवहारों से हर प्रकार के दुर्व्यवहारों को अपने नेक विचारो एव दृढ़ जीवन संघर्ष के द्वारा सद्व्यवहार में परिवर्तित करने का एक प्रयास करना।

यद्यपि आपको ज्ञात है कि वर्तमान में हर चिर परिचित व्यक्ति चाहे वह आपके परिवार के सदस्य हु या जिन गुरुजनों से अपने सुधार के मार्ग को जाना या समझा है आपको आपके भूतकालीन व्यवहारों से जांचते हुए आपके वर्तमान कालीन सुधारात्मक कार्य को नकारते हुए आपके व्यक्तित्व को एक शंका कि दृष्टि से सहज ही देखेंगे। ऐसे जटिल परिस्थितियों का सामना करते हुए सुधार के मार्ग पर संघर्षमय रहते हुए नितप्रति दिन कदम दर कदम स्वम् को संभालते हुए जीवन के सहज मार्गो पर भी जटिलता का सामना करते हुए जीवन के प्रति प्रगतिशील बने रहना सच मे मित्रों इतना सहज कभी भी नही रहा।

याद है… वह सुबह भी उतनी ही परिचित और ऊर्जावान थी जितनी कि अन्य किसी दिन की सुबह होती थी। उस दिवस भी सुबह उठते ही सर्वप्रथम जो एक एहसास हुआ था वही एहसास अन्य किसी भी दिन की सबुह से कदापि कुछ अगल नही था। सुबह आंख खुलते ही सर्वप्रथम जो एक एहसास हुआ वह था कि हा आज भी में बीते कुछ दिनों के समान स्वम् के अनुशाशन के विपरीत अखाड़े या स्टेडियम में जाने के लिए सुबह के 3:10 बजे ना उठते हुए सुबह के 7:00 बजे उठा हु। और अब मैं पहले के समान स्वाथ्य एव उतनी शक्ति महसूस नही कर पा रहा हु अपितु अब मैं किसी पुराने खंडर के समान कुछ कुछ जर्जर सा होता जा रहा हु। आज भी सुबह उठते ही मैं आत्ममंथन कर रहा था कि जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा और मैं पुनः सुबह 3:10 बजे उठ कर पुनः अपने जीवन मे एक अनुशाशन स्थापित करते हुए अखाड़े जाना आरम्भ कर दूँगा। हा आज का यह विचार कई मायनों में कुछ अगल था क्योंकि अभी कुछ दिन पूर्व ही मेरी मुलाकात अक्समात ही अपने गुरुजी (कोच) जी से हुई थी और उन्होंने मुझको पुनः अखाड़े में आने के लिए प्रेरित भी किया था। इस किस्से की दास्तां भी सही समय पर आपसे अवश्य बताऊंगा कि जो मेरे जीवन का पहला सकरात्मक सत्य एव सकरात्मक परिवर्तन था, है और हमेशा ही रहेगा।

खैर जो भी हो प्रकृति को शायद आज कुछ और ही मंजूर था। उपरोक्त एहसासों का मंथन करते हुए मैने अपने बिस्तर को त्याग कर अपने दैनिक दिनचर्या की शुरुआत करि। सर्वप्रथम उस दिन मैने अपनी जेब की तलाशी करि कि कुछ रुपए ही मिल जाए। परन्तु फिर अक्समात ही ध्यान आया कि बीते कुछ महीनों से मैने एक रुपया भी तो अपने परिजनों से नही लिया। फिर आज क्यों मुझमें इतनी बैचेनी उतपन हो गई थी। इस बात का स्वम् मुझ को भी कोई एहसास नही था। तुरन्त ही मैंने अपने पिताजी की जेब से कुछ सो रुपए यानी कि 100 रुपए निकाल लिए। जी हां अपने सही ही समझा मैने अपने पिताजी की अनुमति के बिना ही उनकी जेब से सो रुपए यानी कि 100 रुपए निकल कर अपनी जेब मे रख लिए और उनके एव अपनी माताजी जी जो कि दिल्ली पुलिस में दरोगा है के दफ्तर जाने कि प्रतीक्षा करने लगा। और कुछ समय के उपरांत वह अपने अपने दफ्तर के किए रवाना भी हो गए। तदुपरांत मैने भी स्नानादि कर के अपने जूते के फीते कस लिए और बिना कुछ सोचे समझे अपने सरकारी पुलिसया क्वाटर से बाहर की ओर प्रस्थान कर लिया।

आज मुझे शायद कुछ अधिक ही बैचेनी महसूस हो रही थी और बारम्बार ही कुछ दिन पूर्व की अपने अखाड़े के गुरु सी हुई वार्तालाप का सहज ही स्मरण हुए जा रहा था। और उसी बेसुधी में मैं निरन्तर तेज़ कदमो से चले जा रहा था। जैसे कि उस मार्ग को मैं अपने सरकारी पुलिसया क्वाटर से ही तय कर के निकला हुआ हूं। और कुछ ही पलों के उपरांत में नजदीक के बस स्टॉप पर पहुच गया। फिर…

जारी है…
(3)
फिर…कुछ ही क्षणों के उपरांत मैं नज़दीक के बस स्टॉप पर पहुच जाता हूं। वहा बस स्टैंड के ठीक बाई ओर कुछ गज़ की दूरी पर वह पवित्र अखाड़ा था जहाँ में कुछ समय पूर्व तक प्रातः काल 3:35 मिनट पर एक टूटे जाल से होते हुए स्टेडियम में दाखिल हो जाता था। और आज इस समय इस प्रकार से इन अत्यन्त ही अजीबो गरीब हालातों में अपने पूज्य पिताजी के पतलून से 100₹ निकाल कर मंडी जाने के लिए बस का इंतज़ार कर रहा था। यह सब महसूस करते हुए मेरी सांसो में कुछ अजीब सी एक घुटन महसूस हो रही थी। कि तभी एक निजी बस ठीक मेरे सामने तेज़ी से हार्न बजाते हुए बस स्टॉप पर रुक गई। और मैंने बस का नम्बर देखा जो अब तो मुझ को ठीक प्रकार से ज्ञात नही परन्तु उस समय उस बस के नम्बर को देखते ही मैं जान गया था कि हा यह बस मंडी से होते हुए ही मंडी के समीप से ही गुजरेगी। बस फिर क्या था मैं तुरन्त ही एक क्षण भी गवाए सीधा बस के पिछले दरवाजे से होते हुए उस बस पर सवार हो गया। और तुरंत ही उस बस के पिछले दरवाजे से अगले दरवाजे के समीप पहुचते हुए उस बस के अगले दरवाजे के समीप एक ओर को खड़ा हो गया।

अभी मैं कुछ सोच ही रहा था कि तभी उस बस के कंडक्टर ने एक ओर से एक जोरदार आवाज लगा दी कि “टिकट” उस कड़क आवाज को सुनते ही मुझे कुछ वास्तविकता का अभ्यास हुआ और मैं आहिस्ता से चलते हुए उस बस के कंडक्टर के समीप पहुचा और उससे मंडी की टिकट काटने को कहा। कुछ ही देर में वह बस मंडी के समीप पहुचने वाली थी और मैने उस बस के कंडक्टर से अपने बकाया रुपए वसूल करें और अपने कमीज की जेब मे रख लिए। तभी वह बस भी एक जोरदार हार्न बजाते हुए मंडी के मुख्य द्वार के समीप बने बस स्टॉप पर एक झटके के साथ रुक गई। मैं उस बस के रुकने से पूर्व ही चलती बस से मंडी के मुख्य द्वार के सामने उस बस से निचे को कूद गया। बस से नीचे कूदते ही हर बार की तरह ( जितनी बार भी मैं मंडी को आया था ) मेरा ह्रदय एक बार को जोर से धड़क गया और मैने मंडी के ठीक विपरीत दिशा में एक नज़र दौड़ाई जहाँ हमारे कुछ रक्त सम्बंधिक्त नज़दीकी रिश्तेदार रहते है। फिर बिना एक क्षण भी गवाए मैं सीधा मंडी के मुख्य द्वार से होता हुआ मंडी के भीतर प्रवेश कर जाता हूं।

उस समय मुझ को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो वहां (मंडी) हर एक व्यक्ति को यह अच्छे से ज्ञात है कि मैं यहाँ  क्यों आया हु और कहा जा रहा हु अभी मैं अपने इन एहसासों से झूझ ही रहा था कि तभी मेरे पीछे से एक ट्रक की जोरदार हार्न की एक तीव्र ध्वनि सुनाई देती है। उस तीव्र ध्वनि को सुनते ही मुझ को एक बार पुनः यह एहसास हो गया कि मैं कहा खड़ा हूँ और कहा जा रहा हु। अपने मस्तिक्ष में ऐसे ही कई प्रकार के सवालों से जूझते हुए में उस सब्जी मंडी से गुजरते हुए मंडी के दूसरी ओर पहुच जाता हूं जहाँ समीप की झोपड़पट्टी के समीप की एक दीवार को कुछ मनचलों में तोड़ दिया था। उस टूटी दीवार से होते हुए में उस मंडी को पार कर जाता हूं और दूसरी ओर एक खुली सड़क पर आ कर खड़ा हो जाता हूं। आज मुझ को यहाँ सब कुछ अत्यंत ही अलग प्रकार का महसूस हो रहा था। कि तभी कुछ दूरी पर कुछ नौजवान और अधेड़ उम्र के चिलमची और उनके समीप गिलासियो पर सट्टा लगते हुए कुछ अन्य चिलमचियो का एक समूह मुझ को दिखाई दिया। तभी ना जाने क्यों में बिना एक क्षण गवाए उनके समीप पहुच कर खड़ा हो जाता हूं कि तभी…

शेष अगले ब्लॉग से।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
14/07/2019 at 1:55pm

एक सत्य। 4

अब तक आपने जाना कि कैसे वर्ष 2003-04 में एक कच्ची उम्र से गुजरते हुए कैसे एक दिन मेरे तुच्छ से जीवन मे एक महत्वपूर्ण परिवतर्न आया और उस दिन का प्रारम्भ कैसे और किन विचारों के साथ हुआ। एवं किस प्रकार मैं अपने पुलिसिया सरकारी क्वाटर से निकल कर मंडी (एशिया की सबसे बड़ी फल एवं सब्जी मंडी) से गुजरते हुए एक टूटी दीवार से मंडी के पार सड़क के किनारे बैठे कुछ चिलमची और उनके समीप गिलसियो पर सट्टा लगाते कुछ अन्य चिलमचियो के समीप जा कर खड़ा हो गया और तभी..

अब आगे।

और तभी एक ओर से एक आवाज़ आई कि सट्टा लगाना है क्या? यह सुनते ही मैं उनसे दूर चला जाता हूं कि एक चिलमची मेरे पीछे पीछे कुछ कदम आते हुए मुझ को रुकने को कहता है और पूछता है कि पुड़िया चाहिए क्या? उसके मुंह से यह सुनते ही मैने उस को ऊपर से नीचे तक एक पुलिसिया अंदाज़ में घूरा और उससे कहा कि कितने की है। मेरे मुंह से यह सुनते ही उसके चेहरे पर एक हर्ष की लहर दौड़ गई और वह बोला पहले एक कश लगाऊ फिर देखना और हम वही रेल की पटरी पर बैठ कर कश लगाते है और पहले ही कश में मुझ को ज्ञात हो गया कि भाई यह तो कोई बबाल लिए हुए है। और मैंने उससे तीन पुड़िया नशा  ले लिया और वापसी के लिए उसी टूटी दीवार से होते हुए मंडी (एशिया की सबसे बड़ी फल सब्जी की मंडी) के भीतर प्रवेश कर जाता हूं और हर बढ़ते कदम से मेरी दृष्टि के सामने के नजारे और स्वर तेज़ और तेज़ और मेरा नशा तीव्र और तीव्र होता गया। उसके बाद का मुझ को ठीक ठीक कुछ स्मरण नही की उस भृमित अवस्था से किस प्रकार मैं अपने सरकरी पुलिसिया क्वाटर पर वापस पहुच पाया। लेकिन इतना अवश्य स्मरण है कि अपने उस पुलिसिया क्वाटर पर पहुच कर मैंने उस भृमित अवस्था मे सूखते कंठ से व्याकुल होते हुए दरवाजे पर एक जोरदार लात जमाई थी।

कुछ  क्षणों के उपरांत मुझ को ज्ञात हुआ कि मै तो ताला लगा कर गया था और अपनी जेब से चाबी निकाल कर मैं ताला खोल देता हूं और पुलिसिया क्वाटर के भीतर प्रवेश कर जाता हूं। अपने क्वाटर के भीतर प्रवेश करते ही मैं दरवाजे की साकल मूंद कर एक ठंडी बोतल फ्रिज से निकल कर एक ही घुट में आधी खाली कर देता हूं। अब मुझ को कुछ कुछ होश और उखड़ी सांसो पर कुछ काबू प्राप्त होता है। और मैं विचार करता हु अपनी बीती हुई रात्रि ( last night) के बारे में कि मैने क्या कुछ बबाल मचाया था। जो कि अत्यंत ही भयानक था इस बारे में भी आपको बताऊंगा मगर अभी नही उचित समय पर आगामी ब्लॉग्स में किसी एक के द्वारा। यह सब सोचते हुए मैं अपनी जेब से पुड़िया की एक सिगरेट निकाल कर अपने चौथी मंजिल के उस पुलिसिया क्वाटर की एक खिड़की के समीप खड़े हो कर बाहर का नज़ारा लेता हूं और एक झटके के साथ उस पुड़िया की सिगरेट को ज्वलित कर अत्यंत ही जोर से कश लगा देता हूं। कि ठीक उसी समय क्वाटर की डोर बेल बज उठती है। और मैं सोच में पड़ जाता हूं कि इस समय कौन आया होगा। यह सोचते हुए मै एक से दो कश और लगा देता हूं कि तभी एक बार पुनः डोर बेल बज उठती है। और मैं आहिस्ता आहिस्ता से दरवाजे के समीप पहुच कर दरवाज़े की तीसरी आंख से बहार को झांकता हु पर पुड़िया के कश से अब मुझ को पुनः भृम सा होने लगा था। मुझ को बाहर कुछ ठीक से नज़र नही आता और मै दरवाज़ा खोल देता हूं।

शेष अगले क्रम से…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

💥 एक सत्य। 5 (पांचवा ब्लॉग) एक सत्य अनुभव।

अब आगे…

  और मैं दरवाजा खोल देता हूँ। उस समय पुड़िया के सरूर में मुझ को ठीक से कुछ समझ में नही आ रहा था। हा फिर भी इतना अवश्य याद है कि शायद मैं दरवाज़ा खोल कर वापस उसी खिड़की के समीप आ कर खड़ा हो जाता हूं और अब भी वहा मौजूद उस पुड़िया की सुलगती सिगरेट को बुझा कर बाहर फेंक देता हूं। हा याद है उसके बाद मेरे समीप मेरे पापा के दो मित्र, जिन्हें मैं अच्छे से जानता था आ कर खड़े हो जाते है। और कुछ मुस्कुराते हुए मुझ से पूछते है कि यहाँ तो अज़ीब सा धुंआ है। इसके उत्तर में मैं भी मुस्कुरा कर उनसे सहमत हो जाता हूं।

ठीक उसी समय यह मुझ से कहते है कि आज पार्टी है विश्कि (मदरिया) पीएंगे। उनके मुंह से यह सुनते ही मेरा माथा कुछ ठनक जाता है और एक अजीब सी बैचेनी होने लगती है। पता नही क्यों? शायद मुझ को उनसे ऐसी किसी बात की कोई उम्मीद ना थी इसीलिए। फिर एक ख्याल आता है कि कहि कुछ तो गड़बड़ है पर उस समय तनिक भर भी एहसास नही हो सका कि आखिर क्या गड़बड़ हो सकती है। फिर भी अपनी उस बेचैनी को रोकते हुए मैं उनसे कहता हूं कि अंकल क्या मैं अपने पापा से बात कर लूं क्यों कि क्वाटर पर मेरे सिवाय कोई भी परिवार का सदस्य उस समय वहाँ मौजूद नही है। मेरे मुंह से इतना सुनते ही वह तुरंत पापा को मोबाइल से कॉल कर देते है और मेरे पापा भी अपनी सहमति दे देते है कि ठीक है पार्टी कर लो। उसके बाद वह मुझ को शायद जूते दिखाते हुए पूछते है कि यह किसके है उनके पास अपने नए जूते देख कर मेरा सरूर कुछ हलका हो जाता है। और मुझ को स्मरण होता है कि शायद मैं पुड़िया के सरूर में मंडी (एशिया की सबसे बड़ी फल एवं सब्जी मंडी) से सीधे अपने पुलिसिया क्वाटर पर आने की बजाए अपने रक्त सम्बंधित रिश्तेदार (ताऊ जी) के घर चला गया था और वहाँ अपने नए जूते छोड़ कर एक फ़टे पुराने चिथड़े के समान जूतों को पहन कर पुड़िया के सरूर में पुलिसिया क्वाटर पर आया था। अभी मैं यह सब कुछ सोच ही रहा था कि तभी उनमे से एक अंकल कहते है कि यह अपने जूते पहन लो फिर पार्टी करते है। परन्तु मैं उनसे कहता हूं कि यह मेरे जूते नही है यह फ़टे चिथड़े वाले जूते ही मेरे है और अब चलते है पार्टी करने को, पापा ने भी इजाज़त प्रदान कर दी है। और मैं अपने उस पुलिसिया क्वाटर को लॉक लगा देता हूं। उसके उपरांत हम तीनों उस पुलिसिया क्वाटर से बाहर को निकल जाते है और लगभग 100 मीटर की दूरी पर अंकल स्कूटर को रोक देते है और एक और अंकल ( जिन्हें मैं मौसा जी कहता हूं)जो वही उस पुलिस कालोनी में रहते थे वह भी स्कूटर पर बैठ जाते है और पहले वाले अंकल स्कूटर को स्टार्ट कर गेयर लगा देते है। यह सब कुछ मुझ को अत्यंत ही अजीब सा लग रहा था परन्तु मैं खामोशी से लगभग स्कूटर की स्टेपनी के ऊपर को हो कर बैठा रहता हूं। उस समय मुझ को तनिक भर भी इस बात का एहसास नही था कि जिस पुलिस कालोनी से मेरी ढाई से तीन वर्ष की (2.5 से 3 वर्ष) बहुत सी खट्टी और मीठी यादे जुड़ी है उसको उस समय मैं अंतिम बार देख रहा हु। और जो अंकल हमें पार्टी करने के लिए ले जा रहे थे वह हमे अपने उस स्कूटर पर बैठा कर उस पुलिस कालोनी से तेज़ी से बाहर की ओर निकल जाते है।

कुछ ही समय के उपरांत हम हाइवे की रेड लाइट को पार कर बुराड़ी रोड पर आ जाते है। और मैं उसी अवस्था मे लगभग स्कूटर की आधी स्टेपनी पर किसी तरह से बैठा हुआ सोच रहा था कि यहाँ तो हमारा प्लाट है ( जिस पर हम मकान बना कर वर्तमान समय में निवास कर रहे है) शायद वही खाली प्लाट पर पार्टी है आज। परन्तु जब उनका स्कूटर तेज़ी से प्लाट के मोड़ को पीछे छोड़ते हुए आगे को निकल जाता है तब मैं सोचता हूं कि आज क्या बात है और यह किस बात की पार्टी है जिसकी इजाजत पापा ने भी प्रदान कर दी है। उस अज़ीब सी अवस्था मे उस तेज़ी से चलते हुए स्कूटर पर हम चार व्यक्ति और मैं सबसे पीछे को लगभग स्टेपनी पर बैठा हुआ यही सोच विचार कर रहा था कि तभी स्कूटर एकदम से एक खाली सुनसान सड़क के एक ओर को रोक जाता है।

शेष अगले क्रम से।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
28/08/2019 at <img src=”https://vikrantrajliwal.files.wordpress.com/2019/08/1567006942685.png” alt=”1567006942685″ width=”1080″ height=”1453″ class=”alignnone size-full wp-image-5045″/>

अब आगे…

स्कूटर के एक सुनसान सड़क पर, एक तरफ खाली स्थान पर रुकते ही, हम एक, एक कर के सभी जन स्कूटर से उतर कर सड़क के किनारे खड़े हो जाते है। तदोपरांत प्रथम अंकल एक्स, (काल्पनिक नाम) लगभग 50 मीटर की दूरी पर स्थित, एक ऑफिस को देखते हुए कहते है कि वह रहा ऑफिस, आओ वही चलते है। उनके इतना कहते ही मुझे विशवास हो गया कि उस ऑफिस में ही आज पार्टी है और वहाँ पहले से ही दौर ए शराब के जाम की महफ़िल सजी हुई होगी। यह विचार करते ही मैं अत्यंत ही उत्साह से उनके साथ उस ऑफिस की ओर चल देता हूं। परन्तु वहाँ पहुँच कर मेरा माथा कुछ ठनक जाता है। वहाँ एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति सुकेश शोन्थि (काल्पनिक नाम) कुर्सी पर बैठे हुए थे।  हमे देखते ही वह मुस्कुराते हुए हमारा स्वागत करते है। और उसके आस पास कुछ सभ्य से दिखाई देते हए अन्य व्यक्ति भी खड़े थे। हम ऑफिस में प्रवेश करते हुए उनके सामने की कुर्सी पर विराजमान हो जाते है। हमारे कुर्सी पर बैठते ही वह अधेड़ उम्र के व्यक्ति मुस्कुराते हुए मुझ से पूछते है कि क्या मुझ को जानते हो? मुझे यह सब कुछ अत्यंत ही अज़ीब से महसूस हो रहा था। अपनी उस बेचैनी पर किसी प्रकार नियन्त्रण करते हुए मैं उनसे अत्यन्त ही सहज भाव से कहता हूं कि नही! मैं आपको नही जानता। तब वह मुझ से पूछते है कि सिगरेट या शराब पीते हो। उनके इस प्रकार के वार्तालाप से मेरी छुपी हुई बेचैनी कुछ कुछ प्रकट होने लगी। उस समय मैं यह नही समझ पा रहा था कि वह मुझ से ऐसा प्रश्न क्यों पूछ रहे है। जब हम यहाँ पार्टी करने आए है तो जाहिर है कि शराब पिएंगे ही, फिर वह ऐसा अज़ीब व्यवहार क्यों कर रहे है। इन सभी विचारो से झुझते हुए तब मैं उनसे कहता हु की हा पिता हु। मंगवा लीजिए। मेरे इतना कहते ही अंकल एक्स कुर्सी से खड़े हो जाते है एवं उनके साथ ही अंकल वाई (मौसा जी) और मैं भी अपनी अपनी कुर्सी से खड़े होते हुए ऑफिस से बाहर निकल जाते है। फिर जहा अंकल एक्स ने अपना स्कूटर खड़ा किया था ठीक वही आकर एक बन्द दरवाजे के समीप खड़े हो जाते है। तब अंकल एकस मुझ से कहते है कि विक्की (मेरा पेट नाम) आओ अंदर चलते है। उनके इतना कहते ही मुझ को ऐसा लग की हा अब पार्टी शुरू होने वाली है। और मैं उनके पीछे जैसे ही मुड़ा तभी अंकल वाई (मौसा जी) ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बहुत ही आत्मविश्वास के साथ जोर देते हुए, मुझ से कहा कि विक्की अंदर मत जाइओ। यही मेरे पास खड़ा रहे। अंकल वाई (मौसा जी) जो कि दिल्ली पुलिस विभाग में कार्य करते है। उनके इस प्रकार के अज़ीब व्यवहार से मुझ को अत्यंत ही हैरानी हुई। उस समय मुझ को किंचित मात्र भी एहसास नही हो सका कि वह मुझ से ऐसा क्यों कह रहे है। तभी अंकल एक्स एक आवाज़ लगाते हुए कहते है कि विक्की आ जा। और मैं अंकल वाई (मौसा जी) से कहता हूं कि कुछ नही होगा आ जाओ अंदर ही पार्टी है। इतना कहते हुए मैं अंकल एक्स के साथ उस बन्द दरवाजे से होते हुए अंदर घुस जाता हूं।

उस समय मुझ को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उस बन्द दरवाजे के पीछे अवश्य ही शराब और नशे का कोई रंगारंग कार्यक्रम चल रहा होगा या ऐसा ही कोई रंग रंगीला कार्यक्रम आज अवश्य ही होने को है। तभी तो ऐसे सुनसान एवं ख़ुफ़िया स्थान पर हम पार्टी करने के लिए आज इस प्रकार से स्कूटर पर बैठ कर आए है। मैं तो लगभग स्टेपनी पर बैठ कर वहा पहुचा था। परन्तु जैसे ही मैं उस बन्द दरवाजे से होते हुए भीतर  प्रवेश करता हु, तो मेरे होश ओ हवास उड़ जाते है। उस बन्द दरवाजे के अंदर प्रवेश करते ही मेरी नज़रो के सामने मेरी हम उम्र नोजवान लड़को एवं कुछ मुश्तण्डो की तरह दिखाई देने वाले जवान लड़को कि एक पूरी फ़ौज थी। उन्हें देख कर प्रथम विचार मुझ यही आया था कि यह जरूर कोई बच्चा जेल है। और आज यही पार्टी करने के लिए हम आए है। इस एक एहसास के साथ अंकल एक्स के पीछे पीछे मैं उस बन्द दरवाजे से होते हुए समीप के एक कमरे में प्रवेश कर जाता हु। जहाँ एक बिस्तर और कुछ अन्य छूट पुट सा साज समान मौजूद था। उस कमरे मैं प्रवेश करते ही मुझ को ऐसा लगा कि हा यही वह स्थान है जहाँ पार्टी होगी। अंकल एक्स और मैं उस कमरे में मौजूद बैठने लायक एकमात्र स्थान उस बिस्तर पर बैठ जाते है। तब अंकल एक्स कहते है कि अपने जूते उतार कर आराम से बैठ जाओ, मैं अभी आता हूं। उनके इतना कहते ही मुझ को ऐसा एहसास हुआ कि जरूर वह अंकल वाई (मौसा जी) को बुलाने के साथ ही पार्टी कि व्यवस्था करने के लिए गए है। उनके जाने के उपरांत, मैं लगभव पांच मिनट तक, वैसे ही बैठा रहा तदोपरांत मैं अपनी जुराबें उतार कर एक बीड़ी सुलगाते हुए, उस बिस्तर पर बहुत ही इत्मीनान से लेट जाता हूं। उसी समय एक कमजोर शरीर का एक व्यक्ति अत्यंत ही साधारण से कपड़ो में उस कमरे के भीतर प्रवेश करता है। वह मुझ को देख कर ना जाने क्यों मुस्कुरा रहा था। मैं उससे कुछ कहता उससे पूर्व ही वह उस कमरे में पोचा लगाना प्रारम्भ कर देता है। तब मैं उसी प्रकार से लेटे हुए उससे कहता हूं कि जिन अंकल एक्स के साथ मैं अंदर आया था वह कहा है? मेरे इतना कहते ही वह बिना एक क्षण भी गवाए मुस्कुराते हुए कहता है कि वह तो गए!

उस समय उसके कहने का क्या मतलब था! वह मेरी समझ मे नही आ रहा था। लगभग पांच से दस मिनट या कुछ समय तक मैं तन्हा उस कमरे के भीतर लेता हुआ, उस व्यक्ति के द्वारा कह गए उन शब्दों को समझने का प्रयास करता रहा कि वह तो गए। अचानक से एक झटके के साथ उस कमरे के भीतर मेरे पिता की उम्र का एक पहलवान के जेसा दिखाई देने वाला, बाड़ी बिल्डर व्यक्ति और उसके साथ कुछ अन्य हट्टे कट्टे युवा प्रवेश करते है। उन्हें इस प्रकार से उस कमरे के भीतर प्रवेश करते देख, मुझे कुछ हैरानी हुई। परंतु मैं उसी प्रकार से लेटा रहा। वह सभी व्यक्ति मेरे समीप ही आ कर खड़े हो जाते है तब मैं उठ कर बैठ जाता हूं एवं उनसे कहता हूं कि अंकल एक्स कहा है? तब वह भी उस प्रथम व्यक्ति के समान ही मुझ से कहते है कि वह तो गए। उनके इतना कहते ही मैं अपनी जुराबें पहनना प्रारम्भ कर देता हूं। वह मुझ से कुछ कह रहे थे परन्तु उनकी उस बात को सुनकर कि वह तो गए। मेरा रोम रोम जलते हुए अंगार के समान जलने लगा था। और मुझे उनके किसी भी शब्द को सुनने में अब कोई भी दिलचसबी नही थी। अपनी जुराबें पहनने के उपरांत अब में अपने जूते पहन कर खड़ा हो जाता हूं। अब हम सब एक दूसरे के आमने सामने अड़ कर खड़े थे। उस समय मेरा रोम रोम क्रोध से ज्वलित था और वह सब अब भी मेरी ओर देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। मुझ को यह सब कुछ अत्यंत ही अज़ीब सा प्रतीत ही रहा था। इसी अजीबो गरीब मनोस्थिति के साथ मैं उनसे कहता हूं कि मुझ को बाहर जाना है। तभी एक हटा कट्टा मुस्टंडा युवक उस कमरे का पर्दा हटा कर अंदर देखते हुए मुझ को घूरता है। तभी मुझ को वह दृश्य जो मैने उस बन्द दरवाज़े के भीतर प्रवेश करते हुए देखा था एक बार पुनः दिखाई देता है कि यहाँ ऐसे बहुत से मुस्टंडे मौजूद गए।

अकस्मात ही मुझ को एहसास होता है कि मैं बहुत ही बुरी तरह यहाँ फंस गया हूं। कुछ देर तक उस बाड़ी बिल्डर अंकल की उम्र के उस व्यक्ति को क्रोध से घूरने के उपरांत में उनके बाजू से उस कमरे के बाहर निलने का प्रयास करता हु। तब वह उसी प्रकार से मुस्कुराते हुए कहते है कि अब आप बाहर नही जा सकते हो। वह सब अब भी निरन्तर मुस्कुरा रहे थे जिससे मैं अब कुछ सहज महसूस कर रहा था। परन्तु अपनी उस सहजता को छुपाते हुए मैं उसी प्रकार से बाहर जाने के लिए कहता हूं। फिर वह बिना एक क्षण भी गवाए अपने समीप खड़े एक मुस्टंडे की तरह दिखाई देने वाले मेरे हम उम्र नवयुवक से वह कहते है कि सर्चिंग लो। उनके ऐसा कहते ही वह सर्चिंग के लिए आगे बढ़ता है परन्तु मैं उसको एक ओर को हटा कर कहता हूं कि मेरे पास कुछ भी नही है। तब वह बाड़ी बिल्डर की तरह दिखाई देने वाले महोदय स्वयँ सर्चिंग प्रारम्भ कर देते है। सर्वप्रथम वह कमीज की जेब तलाशते है परंतु उन्हें वहा कुछ भी प्राप्त नही होता। तब मैं उन्हें कहता हूं कि मैने कहा था ना कि मेरे पास कुछ नही है। तब वह मेरी पेंट की जेब तलाशी करते है अचानक ही उनके चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ जाती है और उन्हें एक पुड़िया प्राप्त हो जाती है। तब मैं उनसे कहता हूं अब आपको पुड़िया मिल गई ना। अब मुझ को बाहर जाने दीजिए। परन्तु वह अपनी सर्चिंग जारी रखते हुए एक और पुड़िया की प्राप्ति करते हुए पुनः मुस्कुराते है। तब मैं उनसे कहता हूं कि बस यही पुड़िया थी अब और नही है। अब मुझ को बाहर जाने दीजिए। परन्तु वह उसी प्रकार से अपनी सर्चिंग जारी रखते हुए तीसरी और अंतिम पुड़िया भी प्राप्त कर लेते है। मैं एक बार और उनसे कहता हूं कि अब यह आखरी पुड़िया थी और यह सब मेरी पुड़िया नही है। किसी ने मुझ को रखने के लिए पकड़ाई थी। कुछ क्षण और सर्चिंग के उपरांत उन्हें अब यकीन हो जाता है कि मैं सत्य कह रहा था। तब वह मुझ से कहते है कि अब तुम्हें यहीं रहना है। यह सुनते ही मैं भी उनकी ओर मुस्कुराते हुए स्वयँ पर एक नियन्त्रण रखते हुए कहता हूं कि ऐसा कैसे हो सकता है! मुझ को तो अभी जाना है। तब वह महोदय अत्यंत ही सहज भाव से कहते है कि यह नशा मुक्ति केंद्र है। एवं अब आपको यही रहना होगा। उनके मुंह से यह सुनते ही मेरे रग रग में एक बार पुनः क्रोध की अग्नि ज्वलित हो उठती है। परंतु उस स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए, मैं एक मौन धारण कर लेता हूं।

तब वह एक युवक शाक़िर (काल्पनिक नाम) को कहते है कि इनका फैमली के साथ इंट्रोडक्शन (पहचान) करवा आओ। उस समय मुझ को ऐसा लगा कि मेरे माता जी और पिता जी यहाँ मौजूद है एवं मुझ को यहाँ रखने से पूर्व एक बार उनसे मेरा वार्तालाव करवाने के लिए ले जा रहे है। यदि ऐसा हुआ तो मैं आज और अभी यहाँ से बाहर निकल जाऊंगा क्यों कि यह अभी मुझे जानते नही है कि मैं कितना खूंखार एवं मेनोप्लेटिड हो सकता हु। मैं अभी यह सब कुछ विचार कर ही रहा था कि तभी शाक़िर मेरे समीप आ कर मुझ से कहता है कि आओ फैमली से इंट्रोडक्शन कर लेते है। वहाँ पहुच कर आप क्या कहोंगें? कुछ क्षण की ख़ामोशी के उपरांत वह मुझ को पुनः समझाते हुए कहता है कि तुम्हारा क्या नाम है? मैं जी विक्की। तब वह कहता है कि ऐसे मत बोलना, कहना मेरा नाम है नशेबाज विक्की। उसके मुँह से यह सुनते ही मुझ को ऐसा लग की वह मेरा मजाक बनाने को कोशिश कर रहा है। फिर मैं उसके पीछे पीछे समीप के एक बन्द पर्दे के पीछे मौजूद हॉल में प्रवेश कर जाता हूं।

शेष अगले ब्लॉग से…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

21 अक्टूबर 2019 समय दोपहर 2:28 बजे।

(पुनः प्रकाशित प्रथम बार एक संग्रह के रूप में आज 12 फरवरी 2020 रात्रि 12:51 बजे

शीघ्र ही आगामी ब्लॉग एक सत्य। 7 को प्रकाशित किया जाएगा।

एक सत्य। (सत्य सनुभव ब्लॉग संग्रह 1 से 6 ब्लॉग्स)
book my motivation poetry and speech show .

🕊️ कुछ अनकहे से एहसास।/ 🕊️ Realize something untold.

मेरे साथ मेरे जीवन संघर्ष में जुड़े हुए आप सभी मित्रजनों का मैं हार्दिक अभिवंदन करता हु।

आज मैं आपसे कुछ यूं ही ऐसे एहसासों को साँझा करना चाहूंगा जिनकी और कभी किसी का ध्यान नही जाता है जैसे जब आप एक अपरिपक्व उम्र में 16 वर्ष में अपने परिवार के मुखिया यानी कि अपने पिताजी से अपने स्वास्थ्य सुधार हेतु सहायता मांगते है फिर कई प्रकार के वेद, हकीमो, एवं हसपताल के इलाज से वह थक हार कर, आपको ऐसी जगह भेजने पर विवश हो जाते है जिसके बारे में सोचते हुए भी सामान्य जन भय से काँपने लगते हैं जैसे (नशा मुक्ति केंद्र) फिर आप वहाँ कई प्रकार के जटिल परिणामों को झेलकर बाहर आते है। एक ऐसी जगह (नशा मुक्ति केंद्र) से बाहर निकलते है जिसके बारे में सोचते हुए भी सामान्य जन काँपने लगते है। और वह भी ऐसे स्थान पर जहाँ अपने पहले किसी को नही देखा होता।

उस अनजान माहौल में एक ऐसे स्थान पर जहाँ आपका कोई भी पूर्व जानने वाला मित्र या परिचित नही होता। वहाँ आपको स्वयं को संभालते हुए, सर्वप्रथम स्वयं के उन अनजाने से एहसासों से झुझते होता है जो आपको प्रत्येक क्षण एक भय का एहसास करवाते है। फिर अपने उस परिवार का सामना करना होता है जिन्होंने किन्ही कारणों से विवश हो कर आपको उस जगह (नशा मुक्ति केंद्र ) में भर्ती करवाना पड़ा। उसके बाद आपको प्रत्येक क्षण उस स्थान का एहसास होता है जहाँ से आप कई प्रकार की असहनीय प्रताड़ना को झेल कर बाहर आए है। तदोपरांत आप को एहसास होता है वास्तविकता का कि इस सब एहसासों के साथ ही आपको अब सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए, इसी एक पहचान के साथ संघर्ष करते हुए, स्वयं को सभ्य समाज में स्थापित करने का एक कठिन प्रयास करते रहना है। जहाँ आप के ऊपर उस समय कोई भी विशवास नही करता या करना चाहता। क्यों कि…?

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

🕊️ Realize something untold. Translated.

लेखक एवं कवि विक्रांत राजलीवाल।

I express my heartfelt appreciation to all of your friends associated with me in my life struggle.

Today I would like to share with you some such experiences which are never taken care of, like when you are 16 years old at the age of 16, when you ask the head of your family, ie your father for help in improving your health, then many types Due to the treatment of Vedas, Hakimo, and Hastapal, he is exhausted and forced to send you to such a place, which even after thinking about it, the common people tremble with fear. Ase (Rehabilitation Center) then you come out Jelkar complex results There are several types. Out of a place (de-addiction center), the ordinary people start trembling while thinking about it. And that too in a place where nobody would have seen anyone before.

In that unknown environment, in a place where none of your former friends or acquaintances are known. There, while handling yourself, first of all you are unaware of those unconscious feelings which make you feel a fear every moment. Then you have to face your family who for some reason forced you to get admitted to that place (de-addiction center). After that each moment you realize the place from where you have come out after facing many kinds of unbearable torture. Then you realize the reality that with all these realizations, you have to keep trying hard to establish yourself in a civilized society, while living your whole life, struggling with this same identity. Where no one believes or wants to do that over you at that time. Why that …?

Written by Vikrant Rajliwal.

💥 सत्य। (रेपब्लिशेड)

VIKRANT RAJLIWAL WRITING POETRY, SHAYRI, STORY, ARTICLES, BLOG’S AND WEBSITE’S

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Posted on
JANUARY 14, 2020 #repost #share

💥 सत्य।

by Voice Of Vikrant Rajliwal ( My Writing, My Blogs & My Voice).In Anecdote, Article , लेख।, अध्यात्मितकता, दास्तान, विचार, शिक्षा, Blog, Education, Feelings, Information, Spirituality, Thought.Leave a Commenton 💥 सत्य।

आज की मेरी यह पोस्ट उन मासूम बच्चों एव नवयुवकों को समर्पित है; जो आज भी किसी ना किसी हानिकारक व्यसन की चपेट में फंस कर, अपने जीवन को बर्बाद किए जा रहे है या जो अब किसी हानिकारन व्यसन का सेवन तो नही कर रहे, परन्तु उन्हें अपने जीवन मे प्रगति करने के लिए कुछ दिशा निर्देश नही प्राप्त हो रहे है।

मैं विक्रांत राजलीवाल भी अपने बच्चपन में 14 से 16 वर्ष की आयु में अज्ञानवश कई हानिकारक व्यसन का सेवन कर लिया था। एवं 16 वर्ष की आयु में मैने अपने पिताजी से सहायता मांगी और उन्हें अपनी वास्तविक मनोस्थिति से अवगत करवाया; तदोपरांत कई वेद, हकीमों, तांत्रिकों और हस्पताल के इलाज से थक हार कर अंत मे मुझ को नारकोटिक्स एनॉनिमस के कार्यक्रम से जुड़ने का एक अवसर प्राप्त हुआ। परंतु इसे किस्मत की अनहोनी कहे यह भाग्य का लेखा कि मुझ को नारकोटिक्स एनॉनिमस का कार्यक्रम एक बंधक अवस्ता में प्राप्त हुआ एवं जहाँ आप के प्रत्येक मनोभवो को आपकी चाल या वहाँ से मुक्ति हेतु कोई घिनोनी सजिक के रूप में ही देखा जाता है। जो आपके सकरात्मक एहसास को इस प्रकार से कुचल देता है कि जैसे आपका स्वयं का कोई वजूद ही ना हु। और आपको ऐसा एहसास होता है मानो सरेराह आपके मासूम व्यक्त्विक का बलात्कार किया जा रहा हु और आपकी सहायता हेतु कोई भी ईमानदार व्यक्तित्व वहाँ उपस्थित ना हु। उस समय मेरे साथ वहाँ समाज के छठे हुए अपराधि जो अपने गुनाह की सजा जेल कारावास के रूप में कठोर दंड भुगत चुके थे। के मध्य प्राप्त हुआ। जिनमे से अधिकतर मेरी ही हम उम्र के 17 से 19 वर्ष के हु थे।

मैंने वहाँ डिस्चार्ज प्राप्त किया एवं 13 महीनों तक उनके साथ जुड़ा रहा। तदोपरांत मैंने सोचा कि अब पढ़ाई करनी चाहिए। जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने मुझ को घर जाने की इजाजत रद्द कर दी। उस स्थिति में भय के मारे मैं उनके ऑफिस से भागा, और तुरन्त पकड़ा भी गया। जिसके दंड स्वरूप मुझ को पुनः एक अंदर रस्सियो से बांध कर डाल दिया गया। और भी कई प्रकार की यातना झेलने के उपरांत। जिसमे सबसे घातक थी रस्सियों के मध्य बंधक अवस्था मे एक अन्य साइको पेशेंट के जरिए बिजली की तारो से करंट लगाने का एक घिनोना प्रयास को अंजाम देना। उस अवस्था में मेरी समीप के एक मित्र में उसको पकड़ कर मेरी जान बचाई। खैर ऐसे ही बहुत यातनाओं को फेस कर के मेरा पुनः डिस्चार्ज हुआ।

अब जिस स्थिति मैं था उस स्थिति में दो मार्ग मेरे समुख थे प्रथम क्रोध वश पुनः नशा करते हुए जीवन को बर्बाद कर दु या स्वयं को साक्षर कर के स्वयं के स्वप्न IAS की परीक्षा को उतरीं करने का एक कठोर एवं जटिल मार्ग पर चलने की हिम्मत दिखा सकु। जिससे मुझ में वह समर्थ आ सके कि मैं भविष्य में कई मासूम बच्चों एव नवयुवकों की सहायता प्रदान कर सकूँ। तो मैंने द्वितीय मार्ग को चुना एवं 10वी से ग्रेजुएशन तक साक्षर होने एवं ज्ञान अर्जित करने के लिए मेने प्रयास किया। इसी दौरान मेने एक वर्षीय कम्प्यूटर कार्यक्रम के साथ ताइपिंग भी सीखी। कोचिंग करि। एवं असिस्टेंट कमंडेड से लेखक IAS तक कि परीक्षा को फेस करा। अंततः सरस्वती माँ की कृपा हुई और वर्ष 2016 में सामाजिक एवं मानवता की भवनाओं से प्रेरित अपनी प्रथम काव्य एवं कविताओं की पुस्तक प्रकाशित हुई। और वर्ष 2017 में मैने अपना प्रथम ब्लॉग बनाया और अपने ब्लॉग के साथ सोशल मीडिया पर भी लिखता रहा हु। और अब सक्रिय हु।

अंत में मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि…

🕊️ ए मासूम परिंदों देखेगा यह सम्पूर्ण संसार तुम्हारी अनन्त उड़ान को। मसल कर रख दु हर विपरीत परिस्थितियों एव हालातो को; कि दिखा सकूँ जो अकेले ही चलते चले जाने की हिम्मत तो मान जो कारवाँ हमें ना मिल सका उसे तुम अवश्य पा जाओंगे, उसे तुम अवश्य पा जाओंगे हा उसे तुम अवश्य पा जाओंगे।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक सत्य।

दिल्ली विश्विद्यालय के फेकल्टी ऑफ लॉ में वर्ष 2018 के दौरान वार्षिक खेल महोत्सव में काव्य एवं नज़म का सुनाते हुए।

💥 सत्य।

आज की मेरी यह पोस्ट उन मासूम बच्चों एव नवयुवकों को समर्पित है; जो आज भी किसी ना किसी हानिकारक व्यसन की चपेट में फंस कर, अपने जीवन को बर्बाद किए जा रहे है या जो अब किसी हानिकारन व्यसन का सेवन तो नही कर रहे, परन्तु उन्हें अपने जीवन मे प्रगति करने के लिए कुछ दिशा निर्देश नही प्राप्त हो रहे है।

मैं विक्रांत राजलीवाल भी अपने बच्चपन में 14 से 16 वर्ष की आयु में अज्ञानवश कई हानिकारक व्यसन का सेवन कर लिया था। एवं 16 वर्ष की आयु में मैने अपने पिताजी से सहायता मांगी और उन्हें अपनी वास्तविक मनोस्थिति से अवगत करवाया; तदोपरांत कई वेद, हकीमों, तांत्रिकों और हस्पताल के इलाज से थक हार कर अंत मे मुझ को नारकोटिक्स एनॉनिमस के कार्यक्रम से जुड़ने का एक अवसर प्राप्त हुआ। परंतु इसे किस्मत की अनहोनी कहे यह भाग्य का लेखा कि मुझ को नारकोटिक्स एनॉनिमस का कार्यक्रम एक बंधक अवस्ता में प्राप्त हुआ एवं जहाँ आप के प्रत्येक मनोभवो को आपकी चाल या वहाँ से मुक्ति हेतु कोई घिनोनी सजिक के रूप में ही देखा जाता है। जो आपके सकरात्मक एहसास को इस प्रकार से कुचल देता है कि जैसे आपका स्वयं का कोई वजूद ही ना हु। और आपको ऐसा एहसास होता है मानो सरेराह आपके मासूम व्यक्त्विक का बलात्कार किया जा रहा हु और आपकी सहायता हेतु कोई भी ईमानदार व्यक्तित्व वहाँ उपस्थित ना हु। उस समय मेरे साथ वहाँ समाज के छठे हुए अपराधि जो अपने गुनाह की सजा जेल कारावास के रूप में कठोर दंड भुगत चुके थे। के मध्य प्राप्त हुआ। जिनमे से अधिकतर मेरी ही हम उम्र के 17 से 19 वर्ष के हु थे।

मैंने वहाँ डिस्चार्ज प्राप्त किया एवं 13 महीनों तक उनके साथ जुड़ा रहा। तदोपरांत मैंने सोचा कि अब पढ़ाई करनी चाहिए। जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने मुझ को घर जाने की इजाजत रद्द कर दी। उस स्थिति में भय के मारे मैं उनके ऑफिस से भागा, और तुरन्त पकड़ा भी गया। जिसके दंड स्वरूप मुझ को पुनः एक अंदर रस्सियो से बांध कर डाल दिया गया। और भी कई प्रकार की यातना झेलने के उपरांत। जिसमे सबसे घातक थी रस्सियों के मध्य बंधक अवस्था मे एक अन्य साइको पेशेंट के जरिए बिजली की तारो से करंट लगाने का एक घिनोना प्रयास को अंजाम देना। उस अवस्था में मेरी समीप के एक मित्र में उसको पकड़ कर मेरी जान बचाई। खैर ऐसे ही बहुत यातनाओं को फेस कर के मेरा पुनः डिस्चार्ज हुआ।

अब जिस स्थिति मैं था उस स्थिति में दो मार्ग मेरे समुख थे प्रथम क्रोध वश पुनः नशा करते हुए जीवन को बर्बाद कर दु या स्वयं को साक्षर कर के स्वयं के स्वप्न IAS की परीक्षा को उतरीं करने का एक कठोर एवं जटिल मार्ग पर चलने की हिम्मत दिखा सकु। जिससे मुझ में वह समर्थ आ सके कि मैं भविष्य में कई मासूम बच्चों एव नवयुवकों की सहायता प्रदान कर सकूँ। तो मैंने द्वितीय मार्ग को चुना एवं 10वी से ग्रेजुएशन तक साक्षर होने एवं ज्ञान अर्जित करने के लिए मेने प्रयास किया। इसी दौरान मेने एक वर्षीय कम्प्यूटर कार्यक्रम के साथ ताइपिंग भी सीखी। कोचिंग करि। एवं असिस्टेंट कमंडेड से लेखक IAS तक कि परीक्षा को फेस करा। अंततः सरस्वती माँ की कृपा हुई और वर्ष 2016 में सामाजिक एवं मानवता की भवनाओं से प्रेरित अपनी प्रथम काव्य एवं कविताओं की पुस्तक प्रकाशित हुई। और वर्ष 2017 में मैने अपना प्रथम ब्लॉग बनाया और अपने ब्लॉग के साथ सोशल मीडिया पर भी लिखता रहा हु। और अब सक्रिय हु।

अंत में मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि…

🕊️ ए मासूम परिंदों देखेगा यह सम्पूर्ण संसार तुम्हारी अनन्त उड़ान को। मसल कर रख दु हर विपरीत परिस्थितियों एव हालातो को; कि दिखा सकूँ जो अकेले ही चलते चले जाने की हिम्मत तो मान जो कारवाँ हमें ना मिल सका उसे तुम अवश्य पा जाओंगे, उसे तुम अवश्य पा जाओंगे हा उसे तुम अवश्य पा जाओंगे।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक सत्य।

दिल्ली विश्विद्यालय के फेकल्टी ऑफ लॉ के वार्षिक खेल महोत्सव के दौरान काव्य पाठन करते हुए।

खामोश एहसास।

भूतकालीन जीवन के कर्मों पर लगा कलंक; अपने जिस्म में बहते हुए लहू के आखरी कतरो से भी जब मिटा ना सके। हर बढ़ते कदम से खुद को जब हम और भी तन्हा महसूस करते गए।। हर आँसू बेमाने और ये ज़िंदगी, ये साँसे, ये धड़कती हर धड़कने इल्जाम कोई बेहूदा सा सिद्ध होने लगे।

आज दिल और रात स्वयं को सुधार के मार्ग पर किसी प्रकार स्थिर रखते हुए। जिंदगी के प्रत्येक क्षण सत्य का सामना करते हुए। गैरो की क्या बात करू खुद अपनो से झूझते हुए। अनजान चेहरों के समक्ष, अंजान माहौल में अपने जीवन पर लगे कलंक को धोते हुए। जब हिम्मत टूट जाती है। जिन्दगी खुद जिन्दगी को ठोकर मारने पर विवश हो जाती है। तब भी स्वयं को किसी प्रकार से सम्भालते हुए।

ऐसे निर्मोही कठोर मार्ग पर सत्य को थामे हुए; साक्षरता को अपना एक मित्र, और अपनी रचनाओं को अपना जीवन मानते हुए। चले जा रहा हु; हर कदम से स्वयं के समीप और अपनो से दूर हुए जा रहा हु। आदत नही अपना दुख बयां करने की फिर भी हर इल्जाम को बेदर्द जिंदगी के ख़ामोशी से सहता जा रहा हु। हा मैं एक रचनाकार हु जो अपनी कलम से अपने जीवन के कलंक को मिटाने का एक असफल प्रत्यन करते हुए बस जीवन को जिए जा रहा हु; हा बस जिए जा रहा हु; हा बस जिए जा रहा हु।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

एक सत्य अनुभव।

आज मुझ से मुझ को समीप से जानने एवं समझने वाला कोई व्यक्ति जब  पुछता है कि आप के भीतर जो एक सकरात्मक परिवर्तन देखने को प्राप्त हो रहा है उसके पीछे वास्तविक कारण क्या है? तब मैं उनसे यही कहना चाहूंगा कि वर्ष 2000 में जब मैं 15 या 16 वर्ष का था तब मैंने अपने पिताजी से संपर्क कर उन्हें सूचित किया कि मेरी तबियत खराब है एवं राह में मैने उनसे वास्तविकता बतलाई कि मुझ को किसी ने सिगरेट में कुछ भर कर पिला दिया है। और ऐसा बहुत समय से हो रहा है। तब मेरे पिता जी मुझ पर अत्यंत क्रोधित हो गए। और उन्होंने मुझ से उसी क्रोधित स्वरों के साथ कहा कि यह सब डॉक्टर को बतइयो!


यहाँ सबसे अहम प्रथम विषय यह है कि मैं आपका अपना मित्र उस अबोध उम्र में सत्य स्वीकार कर, स्वयं हर प्रकार के हानिकारक प्रदार्थों से मुक्त होने के लिए इच्छूक था। एवं दूसरा सबसे अहम विषय यह है कि उस समय मेरी वास्तविक स्थिति को समझ सकने का ज्ञान स्वयं मुझ को एवं मेरे परिवारजनों को भी उबलब्ध नही था। इसी कारण अज्ञानता के कारण ना चाहते हुए भी मैं घर में कैद हो कर रहा गया। स्वास्थ्य तो क्या प्राप्त होता मेरा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य भी अत्यधिक विकृत होता गया।  इसी अज्ञानता के कारण मुझ को कई प्रकार की शारिरिक एवं मानसिक चोटें भी लगी। जिनके दर्द को शायद मैं चाह कर भी बयां ना कर सकूँ।

तदोपरांत मेरे पिताजी ने कई हकीमों, तांत्रिकों एवं हॉस्पिटल से मुझ को स्वस्थ्य वृद्धि हेतु इलाज मुहैया करवाया। परन्तु सब व्यर्थता को प्राप्त हुए। अंततः वर्ष 2004 मैं मुझ को पुनर्वासकेन्द्र मै भर्ती करवाया गया। जहाँ बहुत से जटिल एवं कठोर परिणामो को झेलने हुए मुझ को जो ज्ञान प्राप्त हो रहा था उससे मुझ को एहसास हुआ कि हा इसी की तो मुझ को अत्यंत आवश्यकता थी और अब भी है! परन्तु इस प्रकार से एक कैदी की भांति, दण्डनात्मक परिस्थितियों में, इस प्रकार एक पिंजरे के पंछी की भांति डर के माहौल में शायद मैं स्वास्थ्य को प्राप्त ना कर सकूँ। जबकि वहाँ के समस्त जटिल एवं कठोर परिणामो को नज़रंदाज़ करते हुए, जो दिव्य ज्ञान मुझ को प्राप्त हो रहा था बस वही तो जीवन है।


एवं कैदी सी की स्थिति को ना चाहते हुए भी स्वीकारते हुए, एक गुलाम कि भाँति अपने जीवन के दिव्य ज्ञान को मैं अपनाता रहा। परन्तु आज 15 वर्षो के उपरांत दिसम्बर वर्ष 2019 में मैं यह कह सकता हु की वह दिव्य ज्ञान जिसकी मुझ को वर्ष 2000 में 15 या 16 वर्ष की उम्र में अत्यधिक आवश्यकता थी। जिस अनजान मार्ग को सत्य के द्वारा मैंने स्वयं के लिए स्वयं ही चुना था। एक अस्वतंत्र एवं जोरजबरदस्ती के माहौल में मेरे जीवन मे  कार्य ना कर सका। परन्तु इसका तातपर्य यह नही की वह दिव्य ज्ञान मेरे जीवन मे व्यर्थ सिद्ध हुआ। अपितु एक स्वतंत्र माहौल में  आज में बिना किसी बन्धन के, एक आत्मस्वीकृति के साथ स्वयं के स्वतंत्र एवं सकरात्मक प्रयासो के साथ 28 महीने 5 दिनों से हर प्रकार के हानिकारक व्यसनों से मुक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के उपरांत, एक रचनात्मक लेखनी के द्वारा साहित्य की सेवा कर रहा हु।

इसीलिए यदि मेरे जीवन में एक सकरात्मक परिवर्तन आ सकता है तो तो आप या आपके परिजन या वह बालक जो व्यसनों की गिरफ्त में फंसे हुए है, उनके जीवन मे भी एक सकरात्मक परिवतर्न अवश्य उतपन हो सकता है। एवं वह मुझ से भी बहुत अच्छा कार्य कर सकते है। बस उन्हें आवश्यकता है तो उनकी समस्याओं को समीप से समझ सकने वाले एक ऐसे योग्य व्यक्ति एवं मित्र की जो उन्हें एवं उनकी समस्याओं को समझते हुए उनकी सहायता कर सके।


विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

💥 सत्य स्वीकार। / 💥 Accept The Truth.

स्वयं को सबसे ख़ास समझते हुए अपने जीवन के हादसों को नकारना! कि मैं तो सबसे अलग हु मेरे साथ ऐसा कैसे हो सकता है। मेरी तो कोई भी ग़लती नही है। फिर मेरे साथ ऐसा कैसे हो सकता है? नही, नही मैं बिल्कुल सही हु, ऐसा तो हुआ है या नही हुआ है, मुझ को पता ही नही! अपने जीवन की समस्याओं को अस्वीकार करते हुए हमेशा ही मैं भागता रहा हु। और आज भी स्वयं को सबसे ख़ास या महत्वपूर्ण मानते हुए वास्तविकता को स्वीकार ना करू! तो मैं अपने जीवन को एक ऐसी क्रूर नरकाग्नि में स्वयं के द्वारा ना चाहते हुए भी स्वयं अपने जीवन को झुलसा दूंगा।

इसीलिए सर्वप्रथम मैं यह स्वीकार करता हु कि मैं भी एक पूर्णतः सामान्य जन के समान प्रसन्ता एवं आत्मशांति का हकदार हु। इसीलिए आज मैं अपने जीवन के उन सभी हादसों और समस्याओं को स्वीकारते हुए अपने स्वयं के विकास एवं आत्मशांति के प्रति ईमानदारी पूर्वक व्यवहार करता हु।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

Accept The Truth.

Considering myself to be the most special, denying the accidents of my life, how can I be so different with me. There is no mistake of mine. How can this happen to me then? No, no, I am absolutely right, whether this has happened or not, I do not know! I have always been running away while rejecting the problems of my life. And even today, considering myself as the most special or important person and not accepting the reality, I will scorch my life in a cruel inferno fire even without wanting to by myself.

That is why, first of all, I accept that I am entitled to happiness and self-peace like a normal person. That is why today I accept all those accidents and problems in my life and behave honestly for my own development and self-peace.

Thank you

Written by Vikrant Rajliwal.

💥 कर्म एवं कर्मफल। / 💥 Karma And Karma.

यदि आप स्वयं में सकरात्मक बदलाव उतपन्न करते हुए अपने जीवन में आत्मशांति का अनुभव प्राप्त करना चाहते है, तो आज और अभी से किसी भी एक महान व्यक्त्वि के व्यक्ति के जीवन अनुशाशन, एवं विचारों का अनुसरण करना प्रारंभ कर दीजिए।

इस प्रकार से आप पाएंगे कि कुछ समय के उपरांत आप नकल से असल को प्राप्त हो जाएंगे। क्योंकि मात्र सोचने से हम मनुष्यों के जीवन मे कोई भी सकरात्मक बदलाव उतपन्न नही हो सकेगा। इसके लिये हमें सकरात्मकता का अनुसरण करते हुए नकल से असल तक पहुचना ही पड़ेगा।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
23 अक्टूबर, 2019 समय 10:57 am

💥 Karma And Karma. (Translated)

If you want to get a sense of self-peace in your life by creating a positive change in yourself, then start following the life, discipline and thoughts of any one great person today and now.

In this way you will find that after some time you will get the real one by copying. Because just thinking, we will not be able to create any positive change in our human life. For this, following the positiveness, we have to reach from imitation to the real.

Thank you.

Written by Vikrant Rajliwal.

23 October, 2019 time 10:57 am