🎻 एक दर्द। (दर्दभरी नज़म) *पुनः प्रकाशित*

नही आती है नींद दीवाने को क्यों आज-कल।

विक्रांत राजलीवाल।

भूल गया है रंगीन हर ख़्वाब वो क्यों आज-कल।।

हो गया है खुद से ही बेगाना वो क्यों आज-कल।

रह गया है तन्हा भरे संसार में वो क्यों आज-कल।।

लेता है रुसवा बेदर्द रातो में नाम वो किसका आज-कल।

तड़पता है देख हाल ए दीवाना सा वो अपना आज-कल।।

ढूंढता है निसान ए महोबत, ए दर्द ए जुदाई इन काली श्याह रातो में वो किसके आज-कल।

पूछता है सवाल ए महोबत, मांगता है जवाब ए हक़ीक़त, आईने से टूटे वो किसके आज-कल।।

क्यों है इंतज़ार अब भी उसे, दर्द यह अवमस्या की रात,  ख्वाहिश है एक आखरी दीदार ए पूनम का वो एक चाँद।

क्यों है टूटती हर उम्मीद, अब भी उसे एक आरज़ू आखरी, यक़ीन है एक दर्द महोबत, अहसास ए धड़कन, उसकी हर एक बात।। विक्रांत राजलीवाल द्वरा लिखित।

Rachnakar Vikrant Rajliwal “Creation’s”

Source of publication
(Republish vikrantrajliwal.com)

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👥 एहसास ए पत्थर। With YouTube Link Video.

आज कल हम पत्थरों में रहते है, उजड़ा जो गुलिस्तां हमारा तो अब हम पथरो में रहते है।

करते है मुलाकाते पथरो से अक्सर, खो गया जो जलसा हमारा तो अब हम मुलाकाते पथरो से करते है।।

उम्मीद है शायद ये पत्थर कभी तो धड़केंगे, अहसास ए महोबत के अहसासों से शायद वह भी कभी तो तड़पेंगे।

दिल जो अब पत्थर हो गए, अहसास न जाने कहा खो गए, ये ख़ामोशीया है सितम उनका, हर सितम से अपने कभी तो ये पत्थर पिंघलेंगे।।

खड़ा है अब भी राह ए उम्मीदी से दीवाना, तलाश ए दरार दिख जाएगी दरार जब कोई, वॉर ए महोबत से कर देगा चूर चूर हर अहसास ए पथर को ये दीवाना।

हर दिल है ये जो पत्थर, निशां ए बेबसी से जो जख्मी, जख्म ए दिल हर अहसासों पर मरहम अपने, लगा जाएगा जल्द ही कोई ये दीवाना।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

17/03/2018 at 07:34 am
(Republish)

पुनः प्रकाशित 11 फरवरी रात्रि 12:21 बजे।

YouTube Link is mentioned in below.

एहसास ए पत्थर।

🍂 दर्द ए जुदाई गाना। (with YouTube Live Performance video)

मेरा प्रथम गीत; दृश्य इस प्रकार से है कि एक प्रेमी युगल बिछुड़ रहा है या बुछुड़ जाते है और वह प्रेमी युगल एक दर्द भरी पुकार से तड़पते हुए करहा उठते है। (पुनः प्रकाशित)

रुक रुक रुक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

महोबत को तेरी भुला न सकेंगे।

न जिंदा रहे सकेंगे न हम मर सकेंगे।।

दर्द ए दिल तुझ से दुआ हम करेंगे।

आईने में दिल के तुझ को देखा करेंगे।।

रुक रुक रुक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

आ आ आ आ आ ए दिल-रुबा।

न जा जा जा जा जा तू है कहा।।

यादो को तेरी मिटा न सकेंगे।

न मिल हम सके तो हर लम्हा रोआ करेंगे।।

दर्द ए जुदाई दूर तुझ से तन्हा तड़पा करेंगे।

ज़ख्मो को दिल के हम कुरेदा करेंगे।।

रुक रुक रूक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

ज़ख्मो को दिल के सी न हम सकेंगे।

न दवा हम करेंगे न उनको भर सकेंगे।।

फिज़ाओ में सुनी, तन्हाइयो में अक्सर।

यादो में अपनी, दुआओ में अक्सर।।

तड़प ए दिल दिल कि गहराइयो में फिर भी, मिला हम करेंगे…ए प्रिया।

जागती आखो से अपने, अधूरे ख्वाबो में फिर भी, तुझ को पूजा करेंगे…ए प्रिया।

रुक रुक रुक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish at vikrantrajliwal.com)

YouTube Live Video link is mentioned in below.

एहसास। (ग़ज़ल)

हम लिखते है, हम गाते है, हम गीत खुशियों के गुनगुनाते है।

साथ पल दो पल का नही, ये एहसास ह्रदय से खनखनाते है।।

मौसमो की बारिश नही, ये अश्क़, यादों की एक निशानी है।

हर पल एहसासो को अपने संजोए, हर दर्द, हर दास्ताँ, मोहब्ब्त की एक कहानी है।।

आज फिर से तेरी याद आ गई सितमगर, गुजरे महखाने की गली से होकर जब हम।

गर गुनाह है तेरी याद में मह को पीना, तो ये गुनाह करते हुए मह को पीते जाएंगे अब हम।।

बोतल शराब की एक साथी रह गई बाकी, जो साथी थे हमारे वो साथ छोड़ गए सब के सब।

हर घुट से शराब की जिंदा होते गए हम, जिंदा थी जो सांसे हर घुट से शराब की उन्हें मारते गए हम।।

दर्द और दवा का असर, हमे मालूम नही, हर दवा को ज़हर और हर ज़हर को जिंदगी में शराब से घोलते गए हम।

आज वक़्त पूछता है पता, खुद हमसे हमारा, हम उसको बतलाए तो बतलाए क्या, दो घुट भी शराब की जो पीए नही अभी हम।।

ज़ख्म जिंदगी के हज़ार मिले, हर ज़ख्म एक निशान हक़ीक़त का लगा, हर निशान पर देकर एक निशान नया, हर ज़ख्म को ज़ख्म से अपने मिटाते गए हम।।।

फ़क़त हर ज़ख्म एहसासों का, आज भी ताज़ा है हमारा, हर एहसास करता है बयां, दर्द एहसासो का हमारा, हर दर्द से झलकता है एक एहसास अधूरा हमारा।

एहसास जो अधूरे रह गए, वक़्त की बिसात पर कहि जो खो गए, ढूंढता है आज भी उन एहसासों को, एहसासों में अपने कहि, एहसास अधूरा हमारा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
13/10/2019 at 3:31 pm

Published on vikrantrajliwal.com

(पुनः प्रकाशित। 7/02/2020 सांझ 4:37 बजे।)

एक लेखक, कवि, शायर, नाटककार, व्यंग्यकार, उपन्यासकार, कहानीकार, गीतकार, ग़ज़लकार एवं ब्लॉगर।

दर्द ए जिंदगी। (पुनः प्रकाशित)

जब खाई शिखस्त हमनें, अपनो के हाथों ही खाई, नही पाए पहचान जो हाथ वो खंजर उतारा दिल मे बेदर्दी से जो गया।

हो कर बेपरवाह ज़िन्दगी से, सलूख ज़िन्दगी के हम सीखते रहे, जान हर सलूख जिंदगी के, जान जिंदगी की निकलती रही।।

दर्द हर हक़ीक़त का करते रहे जान कर भी नज़रंदाज़ हम जिनकी, सितम ये के एतबार बेवफ़ाई पर उनकी हम जो करते रहे।

धूल थी चश्मे पर फ़रेब कि उनके हमारे और हम थे नादां इस कदर की बिन बात ही आँखों को अपनी जो मलते रहे।।

हर आह को टूटी सांसो से अपने दबाए, हर ख़ुशी से हो कर अंजान, बेरूखिया जमाने की हम जो झेलते रहे।

हर अंजाम बरबादियों का लगा कर सीने से अपने, बर्बाद खामोशियों से अक्सर हम जो होते रहे।।

हर दर्द ए ज़िन्दगी को जान कर अपना, अश्क़ बहाती है आँखे, अश्क़ अक्सर नम आँखों से अपने हम जो छुपाते रहे।

बहे गए अश्क़ सरेराह फ़िर भी कई, जिन अश्को को नम आँखों मे अपनी, हम कभी जो छुपा ना सके।।

टूटे दिल की उखड़ती सांसे और दर्द तड़पती धड़कनो का वो अपने, बंद जुबां से हर दर्द को खामोशी से अक्सर हम जो दबाते रहे।

हर दर्द ए ज़िंदगी हर दर्द ए दवा को हमारे बेअसर करते रहे, और हर दर्द से एक दास्ताँ ज़िन्दगी की अपनी हम जो लिखते रहे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
28/05/2019 at5:20 pm

(पुनः प्रकाशित)

विक्रांत राजलीवाल जी के कलम से।

काल चक्र।

चक्र काल से छूट ना कोई पाएगा, प्रत्येक कदम, प्रत्येक श्वास, गुजरता प्रत्येक क्षण, एहसास चक्र काल का करवाएगा।

होनी-अनहोनी, साक्षी कर्म कांड, सहभागी सत्य कर्म साथ-साथ, मृत्यु-जीवन से साक्षात्कार, ध्वनि ह्रदय जो धड़काएगा।।

भावना-प्रेम, अश्रु-क्रोध, चेतन एहसास, स्मृति-विस्मृति, जो साथ साथ, अंधकार में सूर्य नया, चेतना मृत जगाएगा।

राह सत्य पर पथिक अनजान, मंजिल अब अपनी पाएगा, छूट गए जो राही पुराने, स्वयं अब ज्ञान दिशा दिखलाएगा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

13 दिसम्बर 2019 समय प्रातः 10:28 बजे।

एहसास ए ज़िन्दगी। With YouTube Video Link.

रुक गए है जो लम्हे, ठहर गयी ये जिंदगी, 
टूट गया जो राही, जुड़ती अब किसी उम्मीद के साथ।

छूट गए है जो साथ, धुंधला गए जो अक्स, 
नजरो से छलकते, हर पैमानों के साथ।।

उड़ते हौसलो से एक उम्मीद, रुकी सांसो से, छीलते जख़्म, 
हर ज़ख्म नासूर है मेरे, घुटती हर उम्मीद के साथ।

एक निसान, दर्द ए ज़िन्दगी, दब गई जो चाहते, 
दम तोड़ते  अक्षर, जलती किताब, टूटती अपनी कलम के साथ।।

एक पथ है अंधेरे से कायम, टूटे कदम, चल रहा एक राही,
हर कदम से दबाए है साए कई, उठे जो ज़हरीले काटो के साथ।

हर आह से मिला है जख़्म ए दिल, आईना ए हकीकत, लगा जो ख़ंजर जख्मों पर मेरे, मासूम अहसासों के साथ।।

क़लम तड़पती है मेरी, अश्क ए श्याही, हाल ए दिल करते है बयां, 
साए जिंदगी के, बैठे जो राही मेरी कब्र के साथ।

चल रही है सांसे, बेरुखिया जो खुद से, चटका जो आईना ए दिल,
जख़्म रूह पर मेरे, टूटी अपनी कलम के साथ।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
(Republish at vikrantrajliwal.com)

YouTube Video Link is https://youtu.be/RX9_9T9X_Ec

दर्द ए मोहब्ब्त। With वाच “दर्द ए मोहब्ब्त। ( विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एवं ओरसरित। )” on YouTube

हो गया हैं फ़ना, एक दीवाना जो कहि,
सनम से अपने, बिछुड़ जाने के बाद।

बिखर गयी हैं चाहते, अश्क़ जख्मो पर जो कहि,
टूट गयी सांसे, दिल उसका टूट जाने के बाद।।

हो गया है दफ़न, परत समय कि में जो कही,
रह गए निसान ए इश्क़ बाकी, उसके चले जाने के बाद।

जल गयी है चिता, मासूम-अरमानो की उस के जो कहि,
एक अहसास ये जुदाई, बाकी ये चीखती तन्हाई, उसके खो जाने के बाद।।

एहसास है धड़कनो को, खामोश धड़कनो का, ज़ुल्म धड़कनो पर उस के जो कहि,
सो गया जो मुसाफ़िर, राह ए महोबत, अपनी लूट जाने के बाद।

चाहत हैं ज़िन्दगी, मजबूरी अब भी ये महोबत, चल रही  जो जिंदगी जो कहि,
उखड़ रही जो सांसे, एक दर्द बन्द सीने में कहि, धड़कने 
उस की रुक जाने के बाद।।

विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।
(Publish at vikrantrajliwal.com)

क़त्ल ए एहसास। With YouTube video link.

नशा है फ़िज़ाओं में आज, बहकी-बहकी सी सांसे, कुछ-कुछ मदहोश सी है।

साथी है साथ में आज, उफ़ान ए धड़कन, अंजाम ए हक़ीक़त, हैरानी सी है।।

रास्ते है साथ में आज, तलाश ए हौसले, मंजिले कुछ-कुछ अंजान सी है।

जशन है साथ माहौल में आज, निसान ए उदासी, अब भी मेरे साथ सी है।।

आरज़ू है साथ मे आज, अक्स ए जुदाई, पहेलु में खुशियां, धड़कने फिर भी हैरान सी है।

अल्फ़ाज़ है साथ रूह में आज, ख़ामोश ये जुबां, कत्ल ए एहसास, कलम मेरी दम तोड़ने को है।।

कलम है हाथ मे आज, नासूर ए जख़्म, खून ए श्याही, फड़कती हर एक नब्ज़, गुम सी है।

यक़ीन है साथ साए में आज, उदास ये लम्हे, इंतज़ार अब भी सांसो में, हर साया साथ छोड़ने को हैं।।

विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।

शायरी।

🌹 आज भी दिखती है बोतल शराब की, होती है महसूस वो सुगंध उसकी समीप अपने जैसे बहार की।

जी हाँ मोहब्ब्त है आज भी मुझ को सुर्ख लहू के रंग सी, बेटी जो अंगूर की, वो है मोहब्ब्त पहली मेरी, बोतल शराब की, बोतल शराब की, बोतल शराब की।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।