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विक्रांत राजलीवाल।

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🇮🇳 मंत्री जी। (सम्पूर्ण काव्य किस्सा) with my latest YouTube video link.

🇮🇳 मंत्री जी। काव्य किस्सा, एक व्यंग्यात्मक काव्य है। जिसको लिखने एवं रिकार्ड करने का सबसे महत्वपूर्ण कारण, इस संसार के समस्त दरिद्र एवं भ्र्ष्ट राजनीतिक से पीड़ित व्यक्तियों को, एक उचित लाभ पहुचाने का प्रयास मात्र है।

आशा करता हु मंत्री जी को देखने एवं सुननेवाले, आप सभी महानुभव अपने अपने स्तर पर, एक सकरात्मक सहयोग प्रदान करते हुए, इस संसार के समस्त दरिद्रों एव भ्र्ष्ट राजनीतिक से पीड़ित व्यक्तियों को, एक उचित लाभ एव सहानुभति पहुचा सकें।

जय हिन्द।

🙏 पाठन कीजिए मेरे यानी कि विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक काव्य किस्सा मंत्री जी का, एवं काव्य के अंत मे मंत्री जी। की नवीनतम वीडियो लिंक है जिसको छू कर आप काव्य मंत्री जी। जो कि एक व्यंग्यात्मक एवं संदेशात्मक काव्य है का स्वयं मेरे स्वरों के साथ सुनने का आनन्द प्राप्त कर सकते है।

🇮🇳 मंत्री जी। (सम्पूर्ण काव्य किस्सा)

आज ये अजब गज़ब क्या हो गया, ऐसा लगता है कि सूर्य कहि खो गया।

क्योंकि सूर्य तो ऊगा ही नही और पड़ोसी का मुर्गा कुकडु कु बोल गया।।

सुन कर बांग वो कुकडु कु मुर्गे कि मंत्री जी घबरा गए।
अलार्म बजने से पूर्व ही निंद्रा तोड़ उठ कर बैठ गए।।

देख कर हालत उनकी अजीब, उनकी धर्म पत्नी घबरा गई।
वह गई दौड़ कर तुरन्त और बी पी की गोली ले कर आ गई।।

वह बोली ऐसा क्या गज़ब हो गया।
सूर्य तो अभी ऊगा ही नही,
और आपको यह क्या हो गया।।

क्यों कर निंद्रा कच्ची आज आपकी टूट गई।
अलार्म के बजने से पूर्व ही निंद्रा कैसे खुल गई।।

कुछ कहते मंत्री जी इससे पूर्व ही धर्मपत्नी जी ने पसीना उनका पोछ दिया।
दबा कर मंत्री जी के गलफड़े, एक गोली को बी पी की उसमे घुसेड़ दिया।।

मंत्री जी अब कुछ हैरान से थे।
ऐसा हो रहा था प्रतीत कि वह कुछ परेशान से थे।।

अचानक से मंत्री जी कुछ सकपका से गए, वह बोले ऐसी तो कोई भी बात नही।
मुझे मालूम है कि सूर्य अभी ऊगा नही और यह अलार्म भी अभी तक बोला नही।।

न हो तुम परेशान, यह तड़प यह बेचैनी तेरी अति शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी।

माहौल है आज कल रैलियों का चुनावी एव मिलेगी जब राजशाही कुर्सी तो ससुरी नींद फिर से मिल जाएगी।।

नही यह सर्दी या ज़ुकाम मौसमी, यह है सत्ता की भूख,
अतरंगी इन हालातों में निंद्रा कैसे फिर मुझे आ जाएगी।।।

धर्म पत्नी जी आप तो ख़ामख़ा ही सकपका गई हो।

और बिन बात ही बी पी की गोली को ले कर आ गई हो।।

मुझे तो कोई भी परेशानी ऐसी नही और आप ख़ामख़ा डॉक्टर बन कर आ गई हो।

धर्म पत्नी हो आप एक नेता की खेल यह भी है एक अतरंगी, ज्ञात है जो यह आपको तो फिर क्यों आप सकपकाई हो।।

यह सुनते ही धर्मपत्नी जी अब के जो फिर से कुछ सकपाई।
वह आई कुछ समीप और व्यथा व्याकुल ह्रदय कि अपने बताई।।

वह बोली आज क्योंकर मंत्री जी इतनी जल्दी उठ गए हो, यह देख कर मैं कुछ घबराई थी।

देखा जो व्याकुल आपको तो न जाने क्यों बिन बात ही मैं कुछ घबराई और सकपकाई थी।।

कुछ और तो सूजा नही मुझ को मंत्री जी, हड़बड़ाहट में इसलिए ले कर बी पी की गोली आई थी।।।

अब के मंत्री जी जो कुछ मुस्काए।
दे कर ताव नुकीली भद्दी मुछो पर अपनी,
अब वह जो कुछ बतियाए।।

वह बोले तुम अभी तलक हो नादान, दोष इसमें तुम्हारा कोई नही।
आज तलक हो शायद हमसे अंजान, दोष इसमें तुम्हारा कोई नही।।

मैदान में लाल गंज के बड़े, हो हल्ला है आज भारी।
होंगे बड़े बड़े ग़द्दावर मंत्री उपस्थित वहाँ,
लहर गठबंधन की मंच से संचालन कि मेरी ही है आज जिम्मेवारी।।

बीच निंद्रा से मधुर स्वप्न को इसी के वास्ते जो स्वम् ही तोड़ दिया अपने।
न हो हैरान के टूटे हर स्वप्न को साकार प्रिय कर देंगे जरूर आज हम अपने।।

मंत्री जी धर्मपत्नी जी को अभी कुछ समझा ही रहे थे।
व्यथा व्याकुल ह्रदय की अपने अभी उन्हें बता ही रहे थे।।

उसी समय मुर्गे ने पड़ोस के तीव्र बांग अपनी लगा दी।
और समीप रखे अलार्म ने भी अपनी ध्वनि सुना दी।।

हो गया एहसास मंत्री जी को कि हा अब सुबह हो गई थी। क्योंकि पड़ोस के मुर्गे ने बांग और समीप के अलार्म ने ध्वनि अपनी सुना दी थी।।

यह जानते ही मंत्री जी ने अपनी आंखें कुछ फड़फड़ाई और जोरदार एक अंगडाई लगाई।
घुमा कर नाज़ुक कलाइया उन्होंने सुखी हड्डियां जो अपनी फिर कड़कड़ाई।।

सूर्य ऊगा तो फूल सा खिल कर छा गया निल गगन में एक प्रकाश।
खिल उठे मंत्री जी भी फूल के समान किया उन्होंने फिर स्नान।।

पहन कुर्ता खादी का अपना नवीन, देख रहे है किसकी राह।
देख उन्हें हुआ प्रतीत कि जैसे उन्हें अभी भी है कुछ चाह।।

झलक रही है स्वार्थी भद्दे चेहरे पर कुछ बेचैनी सी उनके बढ़ी हुई।
उनको है प्रतीक्षा किसी खास कि शायद, स्थिर है मुद्रा उनकी, स्थिर है बेचैनी सी।।

अपनी इसी बैचेनी में आवाज एक धर्मपत्नी जी को अपनी लगा दी।
तभी हुई दस्तक एक और किसी ने उनके दरवाजे की घण्टी बजा दी।।

आया है भाषण की लेकर के उनकी उनका पी ए एक पर्ची, बात उनको उनके नोकर ने आहिस्ता से यह बता दी।

दौड़ पड़े मंत्री जी सुनते ही यह और पहुच समीप लापरवा पी ए के अपने, कुछ डॉट फटकार उन्होंने उसको जो लगा दी।।

वह बोले नही है तुमको तनिक भी ध्यान, इतना विलंभ से जो अब आते हो।
इतना विलंभ जटिल इन परिस्थितियों में क्यों कर के भला तुम लगाते हो।

उनका पी ए भी निकला टेडी खीर वह तुरन्त अपनी भुल मान गया।
कर के टेडी कानी आँख को एक अपनी, मंत्री जी से वो कुछ बतला गया।।

न हो नाराज मंत्री जी वह बोला कि इस पर्ची में अजब गजब का है भारी बवाल।
इसमें कोरा भाषण ही नही, संवेदनशील भावो का है एक भरा पूरा मकडजाल।।

अपने इस विलंभ के लिए हु मैं महोदय ह्रदय से अपने जो क्षमा प्राथी।
न करें अब आप विलम्ब, कर दीजिए कूच मैदान में कि हर कोई है आपका वहा प्रतिक्षाथि।।

सुन कर पी ए का ऐसा उत्साहवर्धक संवाद अपने मंत्री जी भी उत्साह से भर गए।
ले कर पर्ची अपने पी ए के हाथ से तीखी सी एक नज़र शब्द अक्षरों से दौड़ा गए।।

वह बोले तुम आए विलंभ से क्रोध मुझ को अत्यंत भारी तब हुआ।

कार्य से परन्तु तुम्हारे हर्षित यह मन उपवन अब जो मेरा हुआ।।

खबर मैदान लाल गंज की भी कुछ साथ अपने क्या लाए हो।
या खाली संवाद पर्ची सहित ही कोरे ठूठ से चले आए हो।।

सुनाया मंत्री जी के पी ए ने वास्तविक समस्त फिर हाल कि हो हल्ला है भारी वहाँ।

हर कोई है उत्साहित और सब के सब जनमानस आप के हि है प्रतिषार्थी सिर्फ वहाँ।।

भरा है जन्मांसो से खचाखच मैदान लाल गंज, बची न क्यारी कोई भी रिक्त प्रशंषको से आपके वहाँ।।।

ले कर समस्त परिस्तिथियों का जायज़ा मंत्री जी फिर मुस्काए।
बैठ गाड़ी में लाल बत्ती की अपने मैदान लाल गंज को वो फिर आए।।

सत्य है मैदान लाल गंज में हो हल्ला है आज अत्यंत ही भारी ।
हर कोई है मंत्री जी का प्रतिषार्थी और उनका उत्साह भी है अत्यंत ही भारी।।

आपसी गठबंधन का मंच यह खेल कुछ कुछ नही अत्यंत ही निराला है।
दुध से भरी हंडिया को जैसे कुछ बिलोटनो ने आपस मे ही बाट डाला है।।

ठहरे हुए जल मे मार के राजनीतिक लाठी इस प्रकार से जैसे,
पक्ष में अपने लहर सी कोई उन्होंने चलाई।

सौ चूहे खा कर के देखंगे आज घोटाली,
कौन कौन सी सियानी बिल्ली हज करने को चुनावी आई।।

आए है राज्य राज्य से कई घोटाले बाज भी मंत्री जो पुराने।
हुआ है स्वागत सत्कार अत्यंत मंत्री जी का भी भारी जो अपने।।

इसी धमाचौकड़ी और होहल्ले के मध्य आई मंत्री जी के भाषण संवाद कि बारी।
मंत्री जी है अपने बहुत ही होशियार, स्थान से अपने उन्होंने अपनी आंखे दोनों मुचकाली।।

राजनीतिक इस उखट पटक में मंत्री जी का भरे मंच पर
कुर्ता कुर्सी से उनकी अटक गया।

यू ही उन्होंने आगे को बढ़ना चाहा, तो कुर्ता उनका अकड़ कर के फट गया।।

देख नग्न यू बदन मंत्री जी का अपने खस्ताहाल।
मच गया भरी सभा मे फिर जैसे कोई बबाल।।

ऊपर से था कुर्ता चमकदार जो उनका फट गया।
अंदर से थी बनियान एक उनकी, छिद्र जिसका घिनोना अब सब को दिख गया।।

देख ये आम जनता होले से कुछ मुस्काई।
मंत्री जी की तो जैसे अब शामत सी आई।।

किसी मनचले ने इस पर भी चुटकी ले डाली।
ध्यान है आप का मंत्री जी कहा,
आपके खस्ताहाल कुर्ते ने तो आप कि पोल ही खोल डाली।।

यह सुनते ही घबराई जनता ने फिर से लगाया जो एक ठहाका।
मंत्री जी भी नही थे नादान, फ़टी बनियान के उस छिद्र को उन्होंने हाथों से था अपने ढका।।

फ़टी बनियान, फ़टी किस्मत, फट गया था उनके बुलन्द सितारों का ढ़ोल।
हर कोई लगा रहा था ठहाका जैसे खुल गई हो उनके घोटाले वाली कोई पोल।।

जोड़ कर अपनी हिम्मत समस्त, भरे मंच से उन्होंने फिर एक यह तरकीब लगाई।।
वह बोले कि नही कोई दोष इसमें उनका कि उनके कुर्ते का आस्तीन ही पुराना था।।

इसलिए पाए में कुर्सी के अटक कर उधड़ गया।
स्वम् तो फटा ही ज़ालिम छेद बनियान में भी कर गया।।

तभी नेता जी का एक चमचा मंच से के कूद गया।
उड़ाई थी जिस मनचले ने नेता जी की खिल्ली,
सीधा उस पर ही जाकर गिर गया।।

भाप गए मंत्री जी भी तुरंत समस्त हालात।
निकाल बगल से वादों का अपने पर्चा चुनावी,
शुरू कर दी उन्होंने अपनी बात।।

हर शब्द हर वचन थे बनावटी उनके,
घिनोने मायाजाल हो कोई जैसे।

झलकता छल, दूषित चरित्र, समान फ़टे कुर्ते के नंगापन उनका, कपटी हर भाव हो कोई उनके जैसे।।

भरी हुंकार फ़टे कुर्ते से सीना फिर ताने मंत्री जी जो अपना।
बोले मिटा देंगे दरिद्रता दरिद्र की, कर देंगे चौतरफा विकास अब के हम ऐसा।।

गांव किसी प्रान्त में ढूंढे न ढूंढ पाओंगे, भूखा कोई गरीब कहि फिर तुम नंगा।

लक्ष्य एक है एक ही मुद्दा, रोटी कपड़ा और मकान हम सब का हो अपना।।

हर स्वप्न कर देंगे तुम्हारा हम पूर्ण।
आएंगे जीत कर इस बार बहुमत से जब पूर्ण।।

दिखा कर स्वप्न सुहावने, दिन सुनहरे, पूर्ण एक विकास के।
उतर मंच से, बैठ गाड़ी में अपनी, चले गए मंत्री जी अपने ठाठ से।।

देख चतुराई नेता जी की अपने परेशान जनता जो होले होले से फिर मुस्काई।

चालाकी मंत्री जी कि ये घर पहुच कर, हर किसी ने एक दुज्जे से फिर बतलाई।।

यही सत्य है यही होता है हर बार, चुनावी इम्तेहान, चुनावी प्रक्रिया से पूर्व।

झूठे वादों से चुनावी, ठगी जनता, बेबसी पर अपनी जब मुस्काए।।

और नेता जी भी चालाकी पर अपनी सीना ठोक कर जब इठलाए।।।

क्यों बट जाता है वर्गों में जात पात के देश ये प्यार अपना।

अमीर बन जाता है और अमीर, नसीब पर गरीब के लग जाता है क्यों, भुखमरी, लाचारी, बेबसी से पूर्ण गरीबी का एक ताला।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

15/12/2018 at 22:30

पुनः प्रकाशित नवीनतम वीडियो यूट्यूब वीडियो लिंक के साथ 26 अक्टूबर वर्ष 2019 समय रात्रि 9:20 बजे।

यूट्यूब नवीनतम वीडियो लिंक है।

Watch “🇮🇳 मंत्री जी। ( Mantri ji ) written and Voice by Vikrant Rajliwal” on YouTube

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एहसास

हम लिखते है, हम गाते है, हम गीत खुशियों के गुनगुनाते है।

साथ पल दो पल का नही, ये एहसास ह्रदय से खनखनाते है।।

मौसमो की बारिश नही, ये अश्क़, यादों की एक निशानी है।

हर पल एहसासो को अपने संजोए, हर दर्द, हर दास्ताँ, मोहब्ब्त की एक कहानी है।।

आज फिर से तेरी याद आ गई सितमगर, गुजरे महखाने की गली से होकर जब हम।

गर गुनाह है तेरी याद में मह को पीना, तो ये गुनाह करते हुए मह को पीते जाएंगे अब हम।।

बोतल शराब की एक साथी रह गई बाकी, जो साथी थे हमारे वो साथ छोड़ गए सब के सब।

हर घुट से शराब की जिंदा होते गए हम, जिंदा थी जो सांसे हर घुट से शराब की उन्हें मारते गए हम।।

दर्द और दवा का असर, हमे मालूम नही, हर दवा को ज़हर और हर ज़हर को जिंदगी में शराब से घोलते गए हम।

आज वक़्त पूछता है पता, खुद हमसे हमारा, हम उसको बतलाए तो बतलाए क्या, दो घुट भी शराब की जो पीए नही अभी हम।।

ज़ख्म जिंदगी के हज़ार मिले, हर ज़ख्म एक निशान हक़ीक़त का लगा, हर निशान पर देकर एक निशान नया, हर ज़ख्म को ज़ख्म से अपने मिटाते गए हम।।।

फ़क़त हर ज़ख्म एहसासों का, आज भी ताज़ा है हमारा, हर एहसास करता है बयां, दर्द एहसासो का हमारा, हर दर्द से झलकता है एक एहसास अधूरा हमारा।

एहसास जो अधूरे रह गए, वक़्त की बिसात पर कहि जो खो गए, ढूंढता है आज भी उन एहसासों को, एहसासों में अपने कहि, एहसास अधूरा हमारा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
13/10/2019 at 3:31 pm

भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए)

नमस्कार प्रिय पाठकों, आज अपनी एक अत्यंत ही दिलचस्प और भावनात्मक प्रेम कहानी “भोंडा।” का आपकी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रथम प्रकाशन करते हुए, मुझ को अत्यधिक हर्ष एवं रोमांच की अनुभूति प्राप्त हो रही है। भोंडा केवल एक कहानी ही भी है बल्कि यह स्वयं के भीतर एक ऐसे भावनात्मक एहसासों को, संजोए हुए है जिसको लिखते समय मैं स्वयं अत्यधिक भावुक हो गया था।

अब आपका अधिक समय ना लेते हुए मैं यानी कि आपका अपना मित्र इतना ही कहना चाहूंगा कि “भोंडा सिर्फ एक कहानी ही नही है अपितु यह एक ऐसे सत्य को दर्शाती है जिसे अक्सर बहुत से युवाओं ने अनादि काल से विभिन्न प्रकार से महसूस किया है और ना जाने कब तक वह भोंडा के ही भांति उन एहसासो को महसूस करते रहेंगे।”

आशा करता हु आपको मेरी यह कहानी बल्कि अब यह कहना अधिक उचित होगा कि आपको आपकी अपनी यह कहानी “भोंडा।” अवश्य पसन्द आएगी।

विक्रांत राजलीवाल।

(अब प्रस्तुत है “भोंडा।” का प्रथम प्रकाशन।)

भोंडा। (एक कहानी जो दिल को छू जाए)

यह किस्सा है बहुत ही ख़ास, नही है कोई वाक्या साधारण सा या आम। सदियों से भी पुराना एक किस्सा है ये महान। सुनाया था नानी ने मेरी, जो थी बचपन से ही मेरे जीवन की ज्योति एक जान। हर एक वाक्या दिलचस्प इस किस्से का आज भी है यू का त्युं मुझ को जो याद।

याद है कि…

यह किस्सा उस जमाने का है जब आज की दुनिया की तरह तड़क और भड़क नही हुआ करती थी। इसका मतलब यह नही की, उस जमाने में कोई तड़क और भड़क हुआ ही नही करती थी। मेरे कहना का तातपर्य यह है कि उस जमाने की तड़क और भड़क आज के जमाने से बेहद भिन्न प्रकार की हुआ करती थी। वह जमाना था साहब, जब दुनिया में राजा और महाराजाओ का, एक छत्र शाशन हुआ करता था। ऐसा ही एक तड़कता और भड़कता राज शाही राज्य था हैरान गंज। हैरान गंज राज्य अपने नाम के अनुरूप ही, अत्यधिक सुंदर प्राकृतिक दृश्यों से सुशोभित होकर, समस्त जग को हैरान किए हुए था। हैरान गंज राज्य का मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य देख कर, हर एक व्यक्ति की आँखे, आचार्य से चकाचोंध हुए बिना, नही रह पाती थी। ऐसा था वह राज्यों में राज्य, राज शाही हैरान गंज। बहुत ही शाही और भव्य था राज्य हैरान गंज। भव्य आलीशान भवन, साफ-सुधरी, चौड़ी-चौड़ी, सड़के, सुंदर बाग बग़ीचे एवं नगर के एक ओर से छल छल, कल कल करके बहती हुई हैरान गंज की मशहूर गुलाबी दरिया।

एक ओर राज शाही हैरान गंज भव्यता और ऐश्वर्य का एक जीता जागता प्रतीक था। तो वही दूसरी ओर नगर से कुछ दूरी पर, एक सुनसान से कोने पर, जहा हैरान गंज राज्य की सिमा समाप्त होती थी। एक सुनसान सी मलिन बस्ती भी सब को हैरान किए हुए थी। वैसे तो हैरान गंज की उस शाही भव्यता से, उस मलिन बस्ती का दूर दूर तक, कुछ भी सम्बन्ध नही था। फिर भी थी तो वह भी हैरान गंज राज्य का ही एक अटूट हिस्सा। यहाँ आप यह विचार कर रहे होंगे कि इस मलिन बस्ती में कौन रहता होगा? तो यहाँ मैं आपको बता दु की इस मलिन बस्ती में रहने वाले लोग भी कुछ आम नही थे क्यों कि उनके बिना शायद हैरान गंज राज्य की अर्थव्यवस्था का पहिया ही जाम हो जाए। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हु क्योंकि इस मलिन बस्ती में रहते थे कुछ हाथ के कारीगर, मजदूर और सेवक स्तर के, वह कामगार और मजदूर वर्ग के व्यक्ति जो हैरान गंज के, सुख सम्पन व्यक्तियों की रात और दिन ख़िदमत करते थे। उनकी झूठन उठाते थे और खाते भी थे। इन्ही कुछ दरिद्र मजदूरों में हरिहर नाम का एक मोची भी अपनी एक छोटी सी टूटी फूटी झोपड़ी में अपने 12 वर्षीय पुत्र भोंडा के साथ निवास करता था। भोंडा! जी हां भोंडा, अत्यंत ही सुंदर बालक था भोंडा। स्वर्ण के समान उज्वल रंग रूप और कृष्ण कन्हिया के समान कजरारे कंटीले श्याम नयन। उसके उन नीले रंग के सुंदर श्याम नयनो को देख कर, हर कोई यही कहता था कि अवश्य ही भोंडा के शरीर मे किसी राज शाही परिवार के वंशज का ही लहू दौड़ता होगा? अन्यथा कहा काला कलूटा हरिहर दरिद्र मोचि और कहा यह स्वर्ण के समान सुंदर सजीला बालक भोंडा। ऐसी भयंकर दरिद्रता में भी क्या गज़ब का आकर्षण रखता था अपना भोंडा। वैसे तो हर कोई ही भोंडा को अत्यंत ही प्रेम और दुलार करता था। परन्तु हरिहर मोचि को फिर भी रात और दिन भोंडा की ही चिंता सताए रहती थी। बिन माँ का बालक जो था बेचारा भोंडा।

एक रोज़ की बात है उस रोज़ भी सूरज अन्य दिनों के समान ही पूर्व से ही उदय हुआ था। परन्तु आज यह क्या हुआ? उस दिन अचानक ही नीले आसमां का रंग बदल कर, लाल लहू के समान हो गया और बिजली की तेज गर्ज के साथ मूसलाधार वर्षा ने सम्पूर्ण हैरान गंज राज्य को हैरान कर दिया था। अकस्मात से बदलते हुए इस भयंकर मौसम को देख कर, भोंडा अत्यंत ही भयभीत होते हुए, अपने उस टूटे से झोंपड़े में एक ओर को, कोने में दुबक कर बैठ गया और अपने पिता हरिहर मोचि के काम से वापस आने की प्रतीक्षा करने लगा। वही दूसरी ओर भोंडा का वृद्ध पिता हरिहर मोचि उस मूसलाधार वर्षा में किसी प्रकार से भीगते-भगाते हुए, अपने झोंपड़े तक पहुच जाता है। एवं अपने पुत्र भोंडा को एक आवाज लगाते हुए कहता है कि “भोंडा अरे ओ भोंडा। कहा है तू जल्दी से दरवाजा खोल, देख मैं हु तेरा बापू।” अपने बापू की आवाज़ सुनते ही, अपने झोंपड़े के भीतर एक कोने में दुबके हुए, भयभीत भोंडा को अब कुछ हौसला सा प्राप्त होता है। और वह फुर्ती से दौड़ कर, अपने उस टूटे फूटे से झोंपड़े का वह टूटा सा द्वार खोल देता है। भोंडा के द्वारा वह बन्द द्वार खोलते ही, इस भयंकर मौसम की मूसलाधार वर्षा की मार से पूरी तरह भीग चुका वृद्ध हरिहर मोचि, तुरन्त ही अपनी टूटी खटिया को पकड़ कर उस पर इस प्रकार से पसर जाता है कि मानो, अब वह उस टूटी खटिया पर से कभी उठेगा ही नही।

अपनी पिता ही ऐसी विकट स्थिति को देख कर, भोंडा कुछ घबरा जाता है और अपने वृद्ध पिता हरिहर की उस टूटी खटिया के समीप पहुच कर आहिस्ता से कहता है कि “पिता जी, पिता जी। आप ठीक तो है ना!” भोंडा के कई बार पुकारने पर भी जब हरिहर कोई जबाब नही देता, तो भोंडा भय के मारे तीव्र स्वर से रूदन करने लगता है। इस प्रकार से रोते-रोते, वह उस टूटी खटिया के समीप बैठे हुए ही, वही पर थक कर, भूखे पेट ही सो जाता है। अगले दिन प्रातः काल जब भोंडा की निंद्रा टूटती है। तो वह देखता है कि उसका पिता हरिहर मोचि, अब भी उसी विकट अवस्था में निस्तेज सा, अपनी टूटी खटिया पर बेसुध सा पड़ा हुआ है। कुछ देर अपने पिता को एकचित्त देखने के उपरांत, भोंडा आहिस्ता आहिस्ता अपने पिता के समीप पहुच जाता है। एवं आहिस्ता से एक आवाज़ लगा कर, अपने पिता को पुकारता है। परन्तु अब भी हरिहर, भोंडा की किसी भी पुकार का, जब कोई भी उत्तर नही देता। तब भोंडा पुनः जोर जोर से रोने और बिलखने लगता है। रात्रि के उस भयंकर तूफान के उपरांत, भोंडा के रोने एवं बिलखने का वह अत्यंत ही तीव्र स्वर, प्रातः कालीन शांत वातावरण में दूर तक गूँज उठता है। भोंडा के रुदन का वह तीव्र स्वर सुनकर, आस पास के बहुत से दरिद्र मजदूर जैसे कि बिसना लौहार, काटू नाई और खोटा कुम्हार आदि! उसके उस टूटे-फूटे से झोंपड़े के बाहर एकत्रित हो जाते है। और सभी एक साथ एक स्वर से आवाज लगते है कि “अरे भोंडा! क्या हो गया? क्यों सुबह-सुबह, गला फाड़ कर रो रहा है? हरिहर, ओ हरिहर, कहा हो भाई?” अपने पड़ोसियों की आवाज सुन कर भोंडा अचानक ही अपना रोना बन्द कर देता है। और फुर्ती के साथ, अपने झोपड़े से बाहर निकलते हुए अत्यंत ही दुखी होते हुए कहता है कि देखना काका बापू कुछ बोलता ही नही है। मैं कब से उसको पुकार लगा रहा हु और वह है कि सुनता ही नही है। कुछ बोलता ही नही है। भोंडा के मुख से यह सुनते ही झोपड़े के बाहर एकत्रित सभी मजदूर वर्ग के वह व्यक्ति, उसकी उस टूटी-फूटी सी झोपड़ी के भीतर प्रवेश कर जाते है और हरिहर के समीप पहुँच कर उस को उठाने का प्रयत्न करते है। परंतु हरिहर अब भी पहले की ही भांति निस्तेज सा अपनी आंखों को मूंदे वैसे ही निस्तेज सा पड़ा रहा। तब काटू नाई, जिसे नव्ज़ देखने का ज्ञान भी प्राप्त था। वह हरिहर की नव्ज़ देखता है और तुरन्त ही उसको ज्ञात हो जाता है कि हरिहर अब इस नश्वर संसार को छोड़ कर, स्वर्ग को सिधार चुका है। हरिहर की मृत्यु के बारे में जानकर काटू नाई एक दृष्टि चारों ओर घुमा कर देखता है। और अंत मैं उसकी नज़र भोंडा पर आ कर टिक जाती है। बहुत समय तक वह कुछ भावुक ह्रदय से भोंडा को देखता रहा। इस दौरान वह अब भी अपने बाए हाथ में मृत हरिहर की उस बेजान सी नव्ज़ को थामे हुए था! जो अब अपना दम तोड़ चुकी थी। तभी बिसना लौहार कुछ कह उठता है कि क्या हुआ काटू! तुम इस प्रकार से शांत क्यों हो गए हु? आखिर क्या बात है कुछ तो कहो। तब काटू अपनी उस ह्रदय को चीरती हुई चुपी को तोड़ते हुए सब को बताता है कि “हरिहर अब नही रहा। वह इस नश्वर संसार और हम सभी को छोड़ कर, स्वर्ग सिधार चुका है।” यह सुनते ही उस टूटे झोंपड़े में उपस्थित सभी व्यक्तियों पर जैसे कोई बिजली सी चोंध कर गिर जाती है। यह सुनते ही 12 वर्षीय बालक भोंडा दहाड़े मार मार कर, रोने और बिलखने लगता है। भोंडा को इस प्रकार से रोते और बिलखते हुए देख कर बिसना लौहार, काटू नाई और खोटा कुम्हार का ह्रदय, भोंडा की उस अत्यंत ही असहनीय पीड़ा से पीड़ित होते हुए फटने सा लगता है। तभी बिसना लौहार आगे को बढ़ते हुए, अत्यंत ही दुखी स्वर से रोते हुए भोंडा को चुप कराने का एक प्रयास करता है। परन्तु सब व्यर्थ सिद्ध हो जाता है। उस दिन भोंडा इस कठोर संसार मे एक दम से तन्हा और बेबस सा हो जाता है।

भोंडा को मृत हरिहर के समीप छोड़ कर बिसना, काटू और खोटा उनके उस टूटे-फूटे, झोपड़े से बाहर निकल जाते है। और भोंडा वही पर उसी अत्यंत ही भावुक अवस्था में बहुत समय तक तन्हा रोता और बिलखता रहा। तभी खोटा कुम्हार की एक आवाज़ आती है “भोंडा, बेटा भोंडा, अब शांत भी हो जाऊ, देखो अब तुमारे पिता जी का अंतिम संस्कार भी करना है।” इतना कहते हुए खोटा कुछ आगे को बढ़ते हुए भोंडा के सर पर अपना ममताभरा हाथ रख कर उसको चुप कराता है। तब आस पड़ोस के सभी जानकर दरिद्र मजदूर, भोंडा के मृत पिता हरिहर की अर्थी को कंधा दे कर, समीप के एक खाली मैदान में फूंक आते है। अब तो जैसे भोंडा के ऊपर वास्तव में कोई बिजली सी चोंध कर गिर जाती है। कुछ ही क्षणों के उपरांत, उस को इस बात का एहसास भी हो जाता है कि इस भरे संसार मे अब वह कितना अकेला और लाचार हो गया है। उस रात्रि को भोंडा के काटू काका दो सुखी रोटी और एक सूखे अचार की डली भोंडा को खाने के लिए दे देते है। जिसको खाने के उपरांत, भोंडा ना जाने कब डरा हुआ सा, सहमा हुआ सा, निंद्रा को प्राप्त हो जाता है। इस बात का उसको भी कोई एहसास ना हो सका। अगले दिन तड़के सवेरे ही भोंडा अचानक से घबरा कर अपनी निंद्रा तोड़ कर, उठ बैठ जाता है। फिर सर्वप्रथम उसकी दृष्टि अपने समीप की उस टूटी खटिया पर पड़ती है! जिस पर कल तक उसका मृत पिता हरिहर विश्राम किया करता था। परन्तु आज वह बिल्कुल रिक्त थी। जिसे देख कर भोंडा पुनः कुछ भावुक हो जाता है। और ना चाहते हुए भी उसके दोनों नयनो से अश्रु की धारा फुट कर बहने लगती है। ऐसी ही दुखद मनोवस्था से, वह अपने मृत पिता की जीवित स्मृतियों के साथ, वही उस टूटी खटिया के सिरहाने बैठ कर अत्यंत ही दुखद अवस्था में रोने लगता है। भोंडा को वहाँ बैठे-बैठे, सुबह से साँझ हो जाती है और फिर रात्रि। और वह अब भी ठीक उसी स्थान पर, उसी प्रकार से भावुक अवस्था में बैठा हुआ है। लगभग अर्धरात्रि को भोंडा की नींद भूख की व्याकुलता के कारण टूटी जाती है। और वह अपने उस टूटे-फूटे, झोपड़े से बाहर निकल कर पड़ोस के झोपड़ों की ओर निहारने लगता है। जैसे कि अभी वहा से कोई उसके लिए भोजन की सजी थाली को लेकर आने वाला हो! परन्तु उस बिन माँ और बाप के बेसहारा अनाथ बालक “भोंडा” के लिए भोजन की थाली के साथ कोई ना आया और थक हार कर भोंडा पुनः अपने मृत पिता की उस टूटी खटिया के सिरहाने बैठ कर भीगें नयनों के साथ, एक अजीब से भावनात्मक मनोभावों सहित मूर्च्छा को प्राप्त हो जाता है।

अगली प्रातः भोंडा की वह मूर्च्छा स्वतः कुछ हल्की होती है। तदोपरांत वह अपने झोपड़े के एक कोने में रखे हुए, पानी के घड़े से एक हांडी जल के द्वारा अपने भूखे और प्यासे कंठ को तर करते हुए, अपने झोंपड़े से बाहर की ओर निकल जाता है। अपने झोपड़े से बाहर निकल कर वह अपने पड़ोस के काका बिरसा, काटू और खोटा के झोपड़ों के समीप आ कर बैठ जाता है। कुछ समय उपरांत जब सूरज पूरी तरह से उदय हो कर नीले आसमान पर छा जाता है। तब आस पड़ोस के कुछ अन्य झोपड़ों से कुछ अन्य दरिद्र मजदूर व्यक्ति बाहर निकलते है। जो भोंडा को इस प्रकार से वहाँ बैठा देख कर, सहज ही भोंडा के समीप आ कर, उससे उसका हाल चाल पूछते है। उनमे से एक दरिद्र मजदूर भीखू लकड़हारा, उसको खाने के लिए रात की कुछ सूखी रोटियां भी दे देता है। उन सुखी हुई रोटियों को खाते हुए, उन दरिद्रों के आभार स्वरूप, भोंडा की आँखों से अश्रु की धारा फुट कर बह निकलती है। फिर उसको पता चलता है कि उसके जानकर तीनो काका बिरसा, काटू और खाटु पड़ोस के एक शहर में एक बहुत ही मशहूर जलसे के दौरान, मजदूरी करने के लिए गए है। अब तो भोंडा के पैरों तले की जमीन ही खिसख जाती है। और वह पुनः अपने मृत पिता की उस टूटी खटिया के सिरहाने बैठ कर, अत्यंत ही दयनीय अवस्था में, एक ख़ामोशी के साथ, अपने आँसुओ को ना चाहते हुए भी बहाने लगता है।

इस प्रकार भोंडा को अपने मृत पिता की उस टूटी खटिया के सिरहाने भूख और प्यास से व्याकुल अवस्था में रोते और बिलखते हुए, एक अनजाने भय से भयभीत होते हुए, आज पूरे दो दिन और लगभग दो रात व्यतीत होने वाले है। भोंडा अब भी एक अजीब से विकृत मनोवस्था में, वही उस टूटी खटिया के सिरहाने, अर्धमूर्छित सा पड़ा हुआ है। सूरज अभी तक उदय नही हुआ है और आसमान में अभी भी बहुत से टिमटिमाते हुए तारे टिमटिमा रहे है। पूर्व प्रातः कालीन उस वातावरण में एक अजीब सी शांति, हर दिशा छाई हुई है। अरे यह क्या हुआ? मैंने ऐसा तो नही सोचा था। यह क्या गज़ब हो गया प्रभु? क्या यह अपना भोंडा है? अरे हा, यह तो अपना भोंडा ही है। तभी अकस्मात कुछ ऐसा घटित होता है जिसके बारे में मैंने भी कभी कुछ नही सोचा था कि कभी ऐसा भी कुछ घटित होगा? आज की सुबह वास्तव में कुछ अलग थी। नही, नही, बल्कि बहुत अलग थी। लगभग दो दिन और रात्रि से भूखा और प्यासा 11 या 12 वर्षीय बालक भोंडा अपने टूटे से झोंपड़े में अपने मृत पिता की टूटी खटिया के सिरहाने बैठे हुए बेसुध सा पड़ा हुआ था। फिर अकस्मात ही यह क्या घटित हुआ? अगली प्रातः सूर्य उगने से पूर्व ही, भोंडा एक झटके के साथ खड़ा हो जाता है। और अपने उस टूटे झोंपड़े से बाहर निकल कर पड़ोस के झोपड़े के समीप रखे हुए एक घड़े से कुछ जल ग्रहण करता है। भूख के मारे उसकी अंतड़िया अब भी अत्यंत ही व्याकुल थी।

आज दो दिनों से भूखा भोंडा कुछ अजीब सी मनोस्थिति में दिखाई दे रहा था। इस दयनीय अवस्था में वह पड़ोस के एक झोपड़े के समीप रखे घड़े से अपनी प्यास की तृप्ति कर पुनः अपने झोपड़े में प्रवेश कर जाता है। तदोपरांत वह चारो ओर एक अजीब सी बेचैनी के साथ कुछ देख रहा है। अकस्मात ही जैसे उसके शरीर मे कुछ बिजली सी कौंध जाती है। और वह फुर्ती से अपने मृत पिता की बांगी लाठी को अपने दाए हाथ मे थाम कर, अपने उस टूटे झोपड़े से बाहर को परस्थान कर जाता है। भोंडा तेज़, तेज़ कदमो के साथ, समीप की उसी श्मशान के मैदान की ओर चल देता है। जहाँ उसके मृत पिता हरिहर मोचि का अंतिम संस्कार सम्पन हुआ था। कुछ ही क्षणों के उपरांत भोंडा ठीक उसी स्थान पर खड़ा हुआ था। जहा उसके मृत पिता हरिहर की चिता को उसने अंतिम विदाई द्वारा मुखाग्नि दी थी। वहाँ पहुँच कर भोंडा इस प्रकार से देख रहा था कि मानो, उसके मृत पिता हरिहर की चिता अब भी वहा धधक रही हो।

शायद उसके व्यकुल ह्रदय में या उसके उन ख़ामोश एहसासों में किसी ख़ामोशी के साथ। कुछ क्षण उसी प्रकार से मौन अवस्था मे भोंडा वही खड़ा रहा। फिर अचानक ही उसकी दृष्टि अपने कदमो से कुछ दूरी पर स्थित एक मिट्टी के पुराने कटोरे पर टिक जाती है। वह कुछ क्षणों तक एकचित्त हो कर उसको देखता रहा। फिर अचानक ही वह उसे उठा कर अपने बाए हाथ मे थाम कर, शहर की ओर चल देता है। लगभग आधे घण्टे के उपरांत वह भव्य नगर हैरान गंज के बीचों बीच स्थित हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक पर अपने एक हाथ मे अपने मृत पिता हरिहर की बांगी लाठी और दूसरे हाथ मे श्मशान का वही टूटा फूटा सा पुराना कटोरा थामे हुए, अपने सुंदर श्याम नयनो को मूंदे खड़ा हो जाता है। उसी दिन से उस शाही राज्य हैरान गंज को, अपनी भव्यता में बढ़ोतरी करने के लिए, एक सुंदर, सजीला और श्याम नयन “भोंडा” नामक एक और भिखारी प्राप्त हो जाता है।

आज उस घटना को घटित हुए लगभग चार वर्ष हो चुके है। इन चार वर्षों के उपरांत वह अनाथ बालक 12 वर्षीय भोंडा, अब एक सन्दर सजीला नवयुवक हो गया है। नवयुवक भोंडा अब हैरान गंज का एक मशहूर व्यक्ति बन गया है। हैरान गंज राज्य का हर छोटा और बड़ा व्यक्ति उसको उसके नाम से जानता है। अब आप यही विचार कर रहे होंगे कि आखिरकार भोंडा ने इन चार वर्षों में ऐसा क्या कारनामा कर दिया, जो वह भव्य और शाही नगर हैरान गंज का एक मशहूर व्यक्ति बन गया। क्या वह कोई साहूकार या राजनेता तो नही बन गया? तो यहाँ मैं आपको सूचित कर दु कि भोंडा ना तो कोई धनी साहूकार या चालक राजनेता है। अपितू वह आज भी एक भिखारी के सम्मान ही हैरान गंज राज्य में धनी व्यक्तियोँ के द्वारा प्राप्त दान से ही अपना जीवन यापन करता है। फिर वह मशहूर व्यक्ति कैसे हो सकता है?

वैसे तो भोंडा आज भी भिक्षा के सहारे ही जीवन यापन करता है। फिर हर छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा व्यक्ति उसको उसको नाम से कैसे जान सकता है? इसके पीछे भी एक कारण है। प्रथम तो भोंडा का स्वर्ण के समान उज्ज्वल रंग रूप, उस पर उसके सुंदर श्याम नयन और इन सभी पर भारी भोंडा की वह सुरीली काठ की बाँसुरी का जादुई स्वर, जिसको वह भव्य हैरान गंज नगर के उस मशहूर फव्वारा चौक पर खड़े होकर, प्रतिदिन बिना किसी अवकाश के, अपनी काठ की बांसुरी में, अपने गुलाबी होठो से फूक कर प्रवाहित करते हुए, हर राहगीर को अपना ग़ुलाम बना देता है। भोंडा को देख कर कोई भी यह नही कह सकता कि यह एक भिखारी होगा। इसके विपरीत उसको देख कर एक राज शाही परिवार के शाही खून के वंशज की सी अनुभूति सहज ही प्राप्त हो जाती है।

हैरान गंज राज्य के प्रतिष्ठित व्यक्ति, प्रतिदिन भोंडा की उस सुरीली बांसुरी के, उन मंत्रमुग्ध कर देने वाले जादुई स्वरों को सुनने के लिए, खासतौर पर फव्वारा चौक पर आते है। एवं भोंडा को प्रतिदिन बहुत से शाही खाद्य प्रदार्थ एवं दक्षिणा सहज ही प्राप्त हो जाती है। कहने को तो भोंडा एक भिखारी ही था परन्तु एक अरसे से उसने किसी के सामने भीख के लिए अपने हाथ नही फैलाए। बल्कि अब तो वह इतना मशहूर हो गया था कि उसकी उस सुरीली बाँसुरी के उन जादुई स्वरों को सुन कर, राज शाही भव्य नगर हैरान गंज के सम्पन्न व्यक्ति बिना उसके कुछ कहे ही, उसके सामने बहुत सी वस्तुओं को दान या भेंट स्वरूप सहज ही रख देते है। भोंडा भी उनकी ओर कुछ खास ध्यान दिए बिना, एक मधुर मुस्कान के साथ, अपनी उस काठ की बांसुरी से, अपने मंत्रमुग्ध कर देने वाले जादुई स्वरों का जादू हर दिशा में प्रवाहित कर देता है। यदि आप भोंडा से पूछेंगे तो वह अपने आप को एक कलाकार ही कहेगा। आखिर ऐसा हो भी क्यों ना? भोंडा की उस काठ की बाँसुरी के वो मधुर स्वर एक बार भूले से भी कोई सुन ले, तो स्वप्न में भी भुलाए ना भूल पाए।

एक रोज़ नवयुवक भोंडा प्रतिदिन के समान ही प्रातः कालीन सूर्य के उदय होने से पूर्व ही अपनी निंद्रा तोड़ कर, उठ बैठता है। तदोपरांत वह स्नानादि से निर्वरित हो कर, अपने मृत पिता की वह बांगी लाठी, जिस पर अब उसने चमड़े का एक चमकदार पत्ता चडवा दिया था। अपने एक हाथ में थाम कर और अपनी कमर से अपनी काठ की बाँसुरी को बांध कर, वह श्मशान का अपना वही पुराना कटोरा, अपने दूसरे हाथ में थामे हुए, भव्य हैरान गंज की ओर प्रस्थान कर जाता है। परन्तु आज का दिन अन्य दिनों से कई मायनों में अगल था। आज भोंडा को स्थान, स्थान पर, भव्य सजावट का कार्य करते हुए मजदूर एवं रंग रोगन करते हुए कई स्थानीय कलाकार दिखाई दे रहे है। हर बढ़ते कदम से भोंडा को राज शाही के भव्य लश्कर मूल्यवान वस्तुओं और मूल्यवान साज़ो समान (नगर को सज़ाने हेतु मूल्यवान वस्तुएं) को लाते और ले जाते हुए दिखाई दे रहे है। आज से भव्य नगर हैरान गंज तक पहुँचने का मुख्य मार्ग, आम जनता के लिए, बंद कर दिया गया था। इसीलिए भोंडा को आज हैरान गंज राज्य के घने सुंदर वन से होकर, भव्य हैरान गंज राज्य तक पहुचने हेतु, मिलो मील चल कर जाना पड़ रहा था। सुंदर वन से गुजरते हुए, भोंडा यही विचार कर रहा था कि आज ऐसा क्या महत्वपूर्ण है? जो नगर तक पहुँचने वाले मुख्य मार्ग को इस प्रकार मूल्यवान वस्तुओं से सजाया जा रहा है। परन्तु वास्तविक आचर्य या वास्तविक हैरानी तो हैरान गंज पहुच कर भोंडा को होने वाली थी। भोंडा हैरान गंज पहुँचकर हैरान होता, उससे पहले एक आचर्य भोंडा को हैरान करने हेतु, हैरान गंज के सुंदर वन में बहुत ही शांति से उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

भोंडा ने अभी लगभग आधा ही मार्ग तय किया होगा की अचानक से, अपने विचारो में मगन भोंडा को राह के एक पत्थर द्वारा टकराने से जोरदार ठोकर लग जाती है। जिससे वह लुढ़कता हुआ एक खड़ी ढलान पर गिर जाता है। इस प्रकार से लुढ़कते हुए, वह एक ओर को धड़ाम से गिर जाता है। भोंडा अभी अपने घावों को सहला ही रहा था कि तभी उसकी दृष्टि समीप ही एक मिट्टी के छोटे से टीले पर पड़ जाती है। जिसकी ज़ोरदार रगड़ से भोंडा की कोहनी कुछ छिल सी गई थी। और भोंडा के इस प्रकार तीव्र गति से लुढ़कते के परिणाम स्वरूप, वह छोटा सा मिट्टी का टीला, कुछ तड़क कर टूट सा गया था। जिसे देख कर भोंडा के उन सुंदर श्याम नीले नयनो में अकस्मात ही एक चमक उतपन्न हो जाती है। भोंडा अब एकटक उस टूटे हुए टीले की ओर निहार रहा था। ना जाने कितने समय तक, वह यू ही अपने श्याम नयनो की उस अद्भुत चमक के साथ, उस तड़क कर टूटे हुए मिट्टी के टीले को देखता रहा? फिर अकस्मात ही वह हड़बड़ाहट पूर्वक इधर उधर देखने लगता है और फुर्ती के साथ उस टूटे हुए टीले को अपने मृत पिता की बांगी लाठी से तोड़ने लगता है। भोंडा अपने लगातार प्रचंड प्रहारों से कुछ ही क्षणों के उपरांत उस पुराने मिट्टी के टीले को, तोड़ कर खंड खंड करते हुए बिखर देता है। तभी उसकी दृष्टि के समक्ष होता है मिट्टी से ढका हुआ एक कटोरा। जिसके एक हिस्से से उभरती हुई एक दिव्य अलौकिक चमक से घायल भोंडा की आँखों मे भी एक दिव्य अलौकिक चमक उतपन्न हो गई थी। अब भोंडा बिना एक क्षण भी गवाए, उस मिट्टी से ढके वजनदार कटोरे को, अपने कुर्ते से साफ करना प्रारम्भ कर देता है। जिससे वह मिट्टी से ढका हुआ कटोरा, सम्पूर्ण रूप से साफ होकर, एक दिव्य चमक से चमचमा उठता है। उसी के साथ भोंडा को प्राप्त होता है रत्न जड़ित, एक चमचमाता हुआ स्वर्ण कटोरा।

उस रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे को देख कर, भोंडा को ना जाने क्या विचार आता है कि वह उसी क्षण तीव्र गति के साथ चलते हुए, अपने टूटे झोपड़े की दिशा की ओर वापस मुड़ जाता है। जिसको अब उस ने अत्यंत ही मजबूत मिट्टी के झोपड़ीनुमा मकान में परिवर्तित कर दिया था। भोंडा अब भी तीव्र गति से अपने कदमो के द्वारा चलता ही जा रहा है। फिर अकस्मात ही वह अपनी दिशा परिवर्तित कर समीप के मैदान की ओर मुड़ जाता है। आज भोंडा एक अजीब सी मनोस्थिति के साथ समीप के मैदान में ठीक उसी स्थान पर खड़ा हुआ है। जहाँ उसके मृत पिता हरिहर का कुछ वर्षों पूर्व अंतिम संस्कार किया गया था। भोंडा के उन शयम नयनो में अब भी एक दिव्य चमक थी। किसे मालूम कि वह उस रत्न जड़ित स्वर्ण के बने हुए कटोरे की थी या किसी अन्य मनोभाव से उतपन्न हुए मनोभावों का कोई प्रभाव था। भोंडा अकस्मात ही अत्यधिक भावुक हो जाता है और तीव्र स्वर से रुदन करते हुए बिलखते लगता है। ऐसे ही रीते और बिलखते हुए भोंडा उस स्थान की खुदाई करना प्रारम्भ कर देता है। जहाँ उसके मृत पिता हरिहर का अंतिम संस्कार सम्पन हुआ था। लगभग दस से पंद्रह मिनट की खुदाई के उपराँत भोंडा अपनी बगल से इसी शमशान के मैदान से पाप्त, अपना वही वर्षो पुराना कटोरा, निकाल कर, दृष्टि भर निहारते हुए, उसे उस गहरे गढ्ढे में दफना देता है। परन्तु वह अब भी ना जाने क्यों? उसी प्रकार से एक अजीब सी विकृत मनोस्थिति के साथ, तीव्र स्वर से रुदन करते हुए, बिलखता जा रहा है। ना जाने कितने समय तक भोंडा उसी अज़ीब सी विकृत मनोस्थिति में, वहाँ उस श्मशान के मैदान में, अपने मृत पिता को याद करते हुए, रोता और बिलखता रहा। अब लगभग अर्धरात्रि का समय हो गया था। और भोंडा अब भी वही उस शमशाम के मैदान ने उसी प्रकार से घुटने के बल बैठा हुआ मातम बना रहा था। भोंडा के समीप ही तीन अन्य मृत दरिद्र व्यक्तियों की चिता अब भी धड़कते हुए जल रही थी। तभी भोंडा अपने बाए हाथ से अपने बहते हुए अश्रुओं को पोछते हुए, एक गहरी श्वास को छोड़ते हुए, उठ कर खड़ा हो जाता है। कुछ क्षण भोंडा एक शांत भाव से मौन खड़े रहने के उपरांत, वापस अपने झोपड़े की ओर मुड़ने से पूर्व, वह एक बार उस स्थान की मिट्टी को छू कर, अपने माथे से लगा लेता है। जहाँ उसके मृत पिता हरिहर का अंतिम संस्कार हुआ था। और अब जहा श्मशान का वही वर्षो पुराना कटोरा भी दफ़न था। जो उसको यही से कुछ वर्ष पूर्व अपने पिता की मृत्योपरांत प्राप्त हुआ था।

आज की रात्रि वास्तव में अत्यधिक लम्बी और बेचैनी से भरी हुई, सिद्ध होने वाली थी। इधर भोंडा अपने झोपड़े में एक बेचैन सी अवस्था के साथ, तन्हा ना जाने किन विचारो में मग्न था। ऐसे ही विचारमग्न अवस्था में ना जाने कब, उसकी आँख लग गई और उसको एक गहरी निंद्रा ने अपने आगोश में ले लिया। इस का उसको एहसास भी नही हो पाया। अगली प्रातः भोंडा प्रतिदिन के समान ही सूर्य के उगने से पूर्व ही जाग जाता है। और समीप के घड़े से एक हांडी जल द्वारा अपने सूखे कंठ को तर कर देता है। तदोपरांत वह श्मशान की मिट्टी से ढके हुए अपने रत्न जड़ित स्वर्ण के कटोरे को उठा कर चूमता है। आज भोंडा के उन सुंदर श्याम नयनो में एक अजीब सा उत्साह दिखाई दे रहा है। बिना एक क्षण भी गवाए, भोंडा अपनी पतली कमर से अपनी काठ की बांसुरी को बांध कर, अपने मृत पिता हरिहर की उस बांगी लाठी को अपने दाए हाथ में थाम लेता है और बाए हाथ में श्मशान की मिट्टी से ढका हुआ, रत्न जड़ित सवर्ण कटोरा। आज भोंडा की चाल में एक अज़ीब सी तीव्रता थी। आज भी हैरान गंज तक पहुँचने वाले मुख्य द्वार को आम जनता के लिए बंद कर दिया गया था। इसीलिए भोंडा आज भी हैरान गंज के घने सुंदर वन से होता हुआ, मुख्य नगर तक पहुचने का प्रयास कर रहा है। परन्तु आज भोंडा के उत्साह में दोगुनी वृद्धि दिखाई दे रही है। प्रथम तो अपने रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे के की प्राप्ति से उत्पन्न उत्साह से, जो कल अनजाने ही श्मशान की मिट्टी से तरबदर हो, स्वंय ही लिप गया था। जिसकी मिट्टी भोंडा ने जान बुझ कर अभी तक नही हटाई थी। जिससे किसी को उसके रत्न जड़ित सवर्ण कटोरे के बारे में कोई सुराग ना प्राप्त हो सके। दूसरा उत्साह वृद्धि का विषय था भव्य नगर हैरान गंज के मुख्य मार्ग की भव्य साज़ सज्जा, जिसके विषय में विचार करते ही उसके ह्रदय की ध्वनियां, स्वयं ही तीव्र हो जाती थी। इस प्रकार अनेक प्रकार के मनोभावों से गुजरते हुए, कुछ ही क्षणों के उपरांत, भोंडा हैरान गंज के मुख्य मार्ग के समीप पहुच जाता है और सहज ही हैरान गंज शहर में प्रवेश भी कर जाता है।

आज भव्य हैरान गंज में स्थान स्थान पर भव्य साज़ो सजावट का कार्य तीव्र गति से सक्रिय था। जिसे देखने के उपरांत, हैरान गंज का हर एक व्यक्ति, अत्यधिक उत्साहित हो रहा था। भोंडा भी इस जगमगाहट से पूर्ण भव्य साज़ सजावट को देख कर अत्यधिक उत्साहित हो गया था। जो अभी पूर्ण भी ना हो पाई थी। बिना एक क्षण भी गवाए अति उत्साहित भोंडा, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक पर, अपने मृत पिता की बांगी लाठी को थामे, श्मशान की मिट्टी से ढ़के हुए, उस रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे के साथ खड़ा हो जाता है। हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक पर, अपना स्थान ग्रहण करने के उपरांत, भोंडा अपनी पतली कमर से काठ की बाँसुरी निकाल कर, एक मनोहरी धुन फूंकते हुए उसको हर दिशा में प्रवाहित कर देता है। अभी भोंडा ने अपनी काठ की बांसुरी को फूंकना प्रारम्भ ही किया था कि उसके इर्द गिर्द उसके प्रसंशकों की एक अच्छी खासी भीड़ एकत्रित हो जाती है। फिर क्या था देखते ही देखते, स्वादिष्ट पकवानों एवं कई हैरान गंजी टके (हैरान गंज की मुद्रा) उसको सहज ही प्राप्त हो जाते है। जिन्हें एकत्रित करने के उपरांत, वह अपने झोपड़े की ओर, मुड़ने ही वाला था कि तभी, उसके समीप ही बैठे हुए बिरजू पनवाड़ी ने उसको एक आवाज़ लगा कर रोक दिया। भोंडा के रुकते ही वह बहुत ही सहजतापूर्ण भाव द्वारा भोंडा से कहता है कि क्यों भाई भोंडा! चल दिए। आज फिर से तुमने अपनी काठ की बाँसुरी फूंकी और देखते ही देखते बहुत सी मूल्यवान वस्तुए एवं स्वादिष्ठ खाद्य प्रदार्थ तुम्हें सहज ही किसी पुरस्कार के समान प्राप्त हो गए। मैं कहता हूं कि जब तुम्हारा जादू हैरान गंज के इन सम्पन्न व्यक्तियो के सर माथे पर चढ़ कर बोलता है। तो तुम कुछ समय तक और क्यों नही! अपनी इस काठ की बांसुरी से उन्हें बाबला बना कर लूट लेते? बिरजू पनवाड़ी के मुँह से यह सुनते ही भोंडा कुछ मुस्कुरा कर कहता है कि नही भाई बिरजू, मनुष्य को जीतने की आवश्यकता हो उसको उतने ही पैर पसारने चाहिए। अन्यथा स्वार्थी मनुष्य ना घर के रहते है और ना ही गुलाबी दरिया (गुलाबी दरिया हैरान गंज राज्य की भव्यता को चार चांद लगती हुई हैरान गंज की एक मशहूर दरिया) के ग़ुलाबी घाट के। समझे कुछ या पुनः समझाओ।

यह सुन कर बिरजू सहज ही मुस्कुरा कर कहता है कि सत्य है भोंडा भाई, तुम सत्य ही कहते हो। तभी तो तुम कुछ ही वर्षो में इतने मशहूर हो गए हो, आज सैकड़ो व्यक्ति तुम को तुम्हारे नाम से जानते और मानते है। एक हम है कि जिसने सम्पूर्ण उम्र हैरान गंज के हर आम से लेकर खास व्यक्ति को पान और सुपारी खिलाते हुए, व्यतीत कर दी। पर ना तो हम तुम्हारे समान मशहूर हो सकें और ना ही तुम्हारे समान ऐसा उज्ज्वल व्यक्तित्व ही बना सके। ईष्वर तुम्हारे ऊपर अपनी कृप्या दृष्टि ऐसे ही बनाए रखें। बिरजू पनवाड़ी के मुँह से यह अनमोल वचन सुन कर, भोंडा अत्यंत ही हर्षोउत्साहित हो जाता है। इसी उत्साह में, वह बिरजू से, सहज ही पूछ बैठता है कि एक बात तो बताओ काका, आज कल हैरान गंज में ये इतनी साज़ सजावट किसलिए हो रही है? भोंडा के पूछने पर बिरजू के चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ जाती है। और वह कहता है कि भोंडा भाई (सम्मानपूर्वक) क्या तुम को नही पता? आज एक दशक के उपरांत पुनः हैरान गंज राज्य में एक राज शाही जलसे (कार्निवल) का आयोजन, राज शाही (हैरान गंज का शाही परिवार) की ओर से करवाया जा रहा है। ऐसा हो भी क्यों ना! कई दशक के उपरांत राज शाही परिवार में एक जीवित उत्तराधिकारी ने जो जन्म लिया है। बिरजू के द्वारा भोंडा को हैरान गंज की इस भव्य साज सजावट का सम्पूर्ण ब्यौरा प्राप्त हो जाता है।

कुछ क्षण रुक कर बिरजू पुनः भोंडा को कुछ बताता है कि अभी तुम देखना भोंडा, कुछ ही दिनो के उपरांत कैसे कई पड़ोसी राज्यो के रंग रंगीले कलाकार एवं फ़नकारों का यहा (हैरान गंज) मेला सा लग जाएगा। सुना है इस बार के भव्य जलसे में कई विदेशी सुंदरियां भी अपने अपने नृत्य का प्रदर्शन करने वाली है। भोंडा तुम स्वंय को जरा सम्भाल कर रखना, कहि कोई विदेशी सुंदरी तुम्हारा ह्रदय ही ना चुरा कर ले जाए। मैने सुना है बहुत ही गज़ब की सुंदरियां होती है वह विदेशी नृत्यांगनाए। अपने बिरजू काका के मुह से यह सुनते ही भोंडा कुछ शरमा सा जाता है। इस प्रकार से उसके उस स्वर्ण के समान उज्ज्वल मुख का रंग शर्मो हया से लाल और फिर कुछ कुछ गुलाबी, गुलाबी सा हो जाता है। अब तो भोंडा प्रतिदिन ही तड़के तलक स्नानादि से निर्वरित हो कर, अपनी हैसियत से कुछ अधिक ही साफ सुथरे कपडे पहन कर, अपने झोंपड़े से हैरान गंज को परस्थान कर जाता है। जैसे कि यह शाही जलसा उसी के लिए राजशाहियों ने आयोजित किया हो और वह विदेशी कलाकार भी उसी के लिए ही हैरान गंज में आने वाले है। धीरे धीरे सम्पूर्ण हैरान गंज पर इस भव्य जलसे का असर हावी होने लगता है। कई नवयुवकों ने तो अब दिन में तीन से चार बार दण्ड और बैठक लगानी प्रारंभ भी कर दी है। जिससे उन विदेशी कलाकारों को उनका वह ह्रष्ट पुष्ट शरीर किसी भी प्रकार से, कही से भी, तनिक भर भी कमजोर ना लगने पाए। खास तौर पर उन विदेशी, स्वर्ग की अप्सराओँ के समान सुंदर सुंदर नृत्यांगनाओं को। अब तो अपना भोंडा भी किसी बांके नवयुवक से कम ज्ञात नही पड़ता था। आज कल भोंडा ने कई नवीन प्रकार की मनोहरी बांसुरी की धुनों को फूंकना प्रारम्भ कर दिया था। जिससे उन विदेशी कलाकारों को भी स्मरण रहे कि हैरान गंज राज्य में भी ऐसे कई कलाकार निवास करते है जो उनसे किसी भी प्रकार कम नही है। भीतर ही भीतर भोंडा को भी, उन विदेशी, स्वर्ग की अप्सराओं के समान, सुंदर सुंदर नृत्यांगनाओं के समक्ष, अपनी बाँसुरी के उन नवीन स्वरों को सुना कर, उन्हें अपनी और आकर्षित करने की एक धुन सी सवार थी। इसी कारण से अब वह सुबह से सांझ तक, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारे चौक से हिलता भी ना था। कहा तो केवल कुछ घण्टो के एक प्रयास मात्र से अनेक वस्तुओं की प्राप्ति और आत्मसंतुष्टि का ज्ञान देने वाला भोंडा, स्वयं भी आत्मसन्तुष्ट ही रहता था। और कहा अब सुबह से सांझ तक, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक से अपनी उस सुंदर काठ की बांसुरी से, वह नवीन नवीन स्वरों का रियाज़ करता है। खैर आज कल तो हर एक बालक, नोजवान, युवा और वृद्ध व्यक्ति को एक ही धुन सवार थी कि यह भव्य जलसा कब प्रारम्भ होगा? और इस स्वर्ग के समान सुंदर साज़ सजावट के बीच वह विदेशी कलाकार कब आएंगे? खास तौर पर वह स्वर्ग की अप्सराओं के समान सुंदर सुंदर नृत्यांगए (विदेशी सुंदर नृत्यांगए) जो अपने मदमस्त यौवन से हर किसी को अपना दास बनाने की एक क्षमता रखती है।

सत्य है आज कल हैरान गंज में एक नवीन ऊर्जा का प्रवाह देखने को प्राप्त हो रहा था। हर एक व्यक्ति, बच्चे से वृद्ध तक, हर किसी के मुख पर एक अज़ीब सी उतेजना देखने को प्राप्त हो रही थी। ऐसा हो भी क्यों ना? आज कई दशकों वर्ष उपरांत एक बार पुनः राज शाही ने एक भव्य जलसे का आयोजन जो किया था। कई नवयुवको एवं बालको के लिए यह शाही जलसा एक नवीन विषय था। जिसका किस्सा अक्सर वह अपने बुज़ुर्गो एवं अनुभवी व्यक्तियों से सुनते आए थे कि कैसे कभी प्रत्येक वर्ष हैरान गंज राज्य में, राज शाही की ओर से, अत्यधिक भव्य जलसे का आयोजन किया जाता था। हर ओर सुंदर, सुंदर साज़ सजावट, रंग बिरंगा, साज़ो समान, अनेको अनेक प्रकार के राज शाही स्वादिष्ठ पकवानों की आम जनता के खाने पीने हेतु मुफ्त वितरण हुआ करता था। और उन विदेशी कलाकारों का तो कहना ही क्या? ख़ास तौर पर वह विदेशी स्वर्ग की अप्सराओँ के समान सुंदर सुंदर नृत्यांगए। आज वही नवयुवक और बालक उन्ही बुजुर्गों एवं अनुभवी व्यक्तियोँ के साथ, वही सब कुछ होता हुआ स्वयं देख रहे थे। इस एक अलौकिक एहसास को शायद मैं भी अपने शब्दों से बयां ना कर सकूँ। भोंडा के लिए तो यह बिल्कुल ही नवीन विषय था क्योंकि उसके पास अन्य नवयुवको एवं बालको के समान इस भव्य जलसे का किस्से सुनाने वाला ना तो कोई बुजुर्ग था और ना ही कोई अनुभवी व्यक्ति। अब तो उसका कोई जीवित पारिवारिक सदस्य भी शेष नही था। फिर भी भोंडा अत्यंत ही उत्साहित नज़र आ रहा था। आज कल तो प्रातः काल से सांझ होने तक, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक पर, बहुत से धन संपदा से संम्पन धनी व्यक्ति, उसकी काठ की बाँसुरी से प्रवाहित होती उन नवीन धुनों को सुनने का आनन्द प्राप्त करने के हेतु, वहा उपस्थित होने लगे थे। और भोंडा को ना चाहते हुए भी उसकी आवश्यकता से कहि अधिक खाद्य सामग्री एवं हैरान गंजी टका (हैरान गंज की मुद्रा) प्राप्त हो जाते थे। जिन्हें वह अपनी उस दरिद्रों की बस्ती के उन दरिद्र व्यक्तियों में बाट कर, उनकी दरिद्रता को कुछ राहत पहुचने का एक प्रयास कर देता था।

इस प्रकार से लगभग एक से डेढ़ हफ्ते का समय व्यतीत हो जाता है और हैरान गंज की साज़ सजावट भी पूर्ण हो जाती है। इसी के साथ हैरान गंज राज्य में आगमन होता है! एक भव्य जलसे का और अब हर ओर राज शाही घोड़ सवार, रंग बिरंगी पोशाकों में चहलकदमी करते हुए, दिखाई देने लग जाते है। समय बेसमय राज शाही के, बड़े बड़े उन मशहूर ढोल एवं नगाड़ो का वह तीव्र स्वर, अब अक्सर ही सुनाई दे जाता था। ऐसे ही एक दिन भोंडा हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक, जो अब सबके आकर्षण का केंद्र था पर खड़ा हुआ अपनी काठ की बांसुरी से नवीन, नवीन, मनोहरी जादुई स्वरों को फूक कर, हर एक राहगीर का मनोरंजन कर रहा था। तभी एक अज़ीब सा शोर उसके कानों में सुनाई देता है कि आ गए, आ गए, वह वेदशी कलाकार आ गए। देखो कैसे रंग बिरेंगी पोशाके है और इसी के साथ राज शाही के वह बड़े बड़े, मशहूर ढोल और नगाड़ो की गूंज से सम्पूर्ण हैरान गंज पुनः गूंज उठता है। इससे पहले की कोई कुछ समझ पाता, देखते ही देखते कुछ ही क्षणों के उपरांत, हैरान गंज राज्य में वेदशी कलाकारों की पहली रंग बिरंगी झांखि प्रेवश करती है। उसके पीछे दूसरी, फिर तीसरी, और यह सिलसिला, बहुत समय तक, यू ही चलता रहा। ऐसी रंग बिरंगी झाखिया देख कर, भोंडा के दोनों श्याम नयन, हैरानी से खुले के खुले ही रह गए। और वह उन झांकियों के पीछे, पीछे, राज शाही के मेहमानखाने तक चला जाता है। जहाँ राज शाही के शाही वंशजो द्वारा उन विदेशी कलाकारों के ठहरने की बहुत ही सुंदर शाही व्यवस्था का प्रबंध किया गया था। तभी एक राज शाही घुड़सवार भोंडा को रोक देता है और उसको फटकार लगाते हुए कहता है कि “अरे लड़के कहा जा रहा है? देखता नही, यहा से राज शाही का शाही बाड़ा (राज शाही मेहमानखाना) प्रारंभ होता है। चल भाग जा यहाँ से, नही तो तुझ को अभी अपने घोड़े के खुरों से रौंद कर, तेरी चटनी बना दूंगा। चल भाग यहा से।” उस राज शाही घोड़ सवार की लताड़ से, भोंडा भय के मारे, उल्टे कदमो से वापस लौट आता है। उस दिन हैरान गंज के समस्त बच्चे, बूढ़े और जवानों सहित, अपने नवयुवक भोंडा का भी विदेशी कलाकारों के आगमन का इंतजार समाप्त हो जाता है।

इसी हर्षोल्लास के बीच भोंडा, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक से, अपने झोपड़े के लिए प्रस्थान करने ही वाला था कि तभी राज शाही के, वह बड़े बड़े, मशहूर ढ़ोल और नगाड़ों की तीव्र ध्वनि की गूंज से, सम्पूर्ण हैरान गंज, एक बार पुनः गूंज उठता है और एक राज शाही सन्देशक, ऊंचे ऊंचे स्वरों के साथ, हैरान गंज राज्य में राज शाही की ओर से, राज शाही जलसे के प्रारम्भ का ऐलान कर देता है कि सुनो, सुनो, सुनो, हैरान गंज के हर आम और खास को, राज शाही की ओर से, सूचित किया जाता है कि कल से लेकर आगामी पन्द्रह दिनों तक, हैरान गंज में राज शाही की ओर से एक शाही जलसे के प्रारम्भ का ऐलान किया जाता है। आप अभी को ज्ञात रहे कि इस भव्य शाही जलसे का सम्पूर्ण खर्ज, राज शाही की ओर से वहन किया जाएगा। उस राज शाही सन्देशक के द्वारा राज शाही जलसे के प्रारम्भ की सूचना प्राप्त करते ही, सम्पूर्ण हैरान गंज, बहुत समय तक हैरान गंज के नागरिकों के द्वारा उतपन्न, एक अज़ीब से हो हल्ले से गूंजता रहा। तदोपरांत समस्त हैरान गंज के नागरिक, थक हार कर, अपने अपने घर को प्रस्थान कर जाते है। आखिर कल से हैरान गंज का, वह मशहूर राज शाही जलसे का आयोजन, एक बार पुनः राज शाही की ओर से, हर आम और खास व्यक्ति के लिए, प्रारम्भ जो होने वाला था। अपना भोंडा भी, आज की अपनी समस्त कमाई को समेट कर, अपने झोपड़े के लिए परस्थान कर जाता है। आज रात्रि भोंडा को ना जाने क्यों निंद्रा ही नही आ रही थी? नही तो कहा भोंडा, प्रत्येक रात्रि को अपनी खटिया पर लेटते ही किसी खेतिहर महजूर की भांति, धड़ाम से एक गहरी निंद्रा में खो जाता है था। परन्तु आज! आज की बात कुछ अलग है। आज तो भोंडा जागते हुए ही उन सुंदर सुंदर विदेशी नृत्यांगनाओं के मधुर, मधुर, स्वप्नों में खोए जा रहा था। इस प्रकार जागृत नयनो से स्वप्न देखते, देखते, ना जाने कब उसकी आँखें लग जाती है और वह सम्पूर्ण दिन की भाग दौड़ से थका हुआ, निंद्रा को प्राप्त हो जाता है। अगली प्रातः भोंडा एक झटके के साथ अपनी खटिया से उठ बैठता है और जोर जोर से आवाज़ लगते हुए, कह उठता है कि कहा है! कहा है वह स्वर्ग की अप्सराओँ के समान सुंदर, सुंदर नृत्यांगए? ए घोड्सवार तुम मुझ को यू ही नही रोक सकते। हट जाओ, हट जाओ, अन्यथा आज यहाँ बबाल हो जाएगा। हट जाओ, हट जाओ, हट जाओ! इस अज़ीब सी बेचैनी के साथ, भोंडा एक हड़बड़ाहट के साथ, अपने स्वप्न से बाहर आ कर लगभग चीख उठता है। कुछ क्षण ऐसे ही बेचैन अवस्था के साथ वह अपनी खटिया पर बैठा रहा। फिर उसको वास्तविकता का ज्ञान होता है और वह समीप के घड़े से एक हांडी जल ग्रहण करते हुए, कुछ अंजुली भर जल अपनी आँखों पर दे मरता है। उसी समय पड़ोस का एक मुर्गा ज़ोरदार बांग लगाते हुए, भोंडा को सूचित करता है कि आज तुम मुझ से पराजित हो गए हो। आज मैं तुम से पहले ही जाग गया हूं भोंडा भाई। मुर्गे की बांग सुनते ही, भोंडा को एहसास होता है कि आज कई वर्षों के उपरांत, उसको इतनी गहरी निंद्रा आई थी।

आज राज शाही भव्य नगर हैरान गंज में राह शाही जलसे का प्रथम दिवस था और तड़के तलक ही लगभग सम्पूर्ण हैरान गंज के व्यक्ति, सज, धज कर, हैरान गंज की उन चौड़ी, चौड़ी, सजी, धजी सड़को पर, राज शाही जलसे का आनंद प्राप्त करने के लिए, अपने अपने घरों से बाहर निकल आए थे। अब यह राज शाही जलसा, यू ही निरन्तर, पन्द्रह दिनों तक, रात और दिन, अपनी रौनक, हैरान गंज में बिखरने वाला था। इधर भोंडा भी अपने झोपड़े से, अपने साज़ो समान के साथ, हैरान गंज राज्य की ओर, मुख्य मार्ग जो अब आम जनता के लिए, खोल दिया गया है से होते हुए, उत्साहपूर्वक चलता चला जा रहा है। आज हैरान गंज में हर ओर धूम सी मची हुई है। हर एक व्यक्ति चाहे वह आम हो या ख़ास, अत्यधिक उत्साहित नज़र आ रहा है। कई नवयुवक बालक अपनी अपनी टोली बना कर, हैरान गंज में धूम मचा रहे थे। भोंडा भी हैरान गंज पहुच कर, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक पर, अपना स्थान ले चुका है। आज भोंडा को ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो, वह स्वर्ग लोक के साक्षात दर्शन कर रहा हो। इतना सुंदर माहौल और ऐसी साज़ो सज़ा के बारे में, ना तो उसने आज से पूर्व कभी सुना था और ना ही कभी, कोई ऐसा अद्भुत दृश्य देखा ही था। सांझ होते, होते, कई विदेशी कलाकार भी, हैरान गंज की सड़कों पर, चहलकदमी करते हुए, दिखाई देने लगे थे। उन्हें देख कर हर कोई, अत्यधिक उत्साहित नज़र आ रहा था। परन्तु यदि कोई उन विदेशी कलाकारों से, उनके उत्साह का कारण पूछे, तो वह यही कहते कि यह कौन नवयुक है! जो स्वयं जितना सुंदर और सजीला है। उतने ही मधुर स्वर, वह अपनी काठ की बाँसुरी से, प्रवाहित कर रहा है। आज सांझ को हैरान गंज के व्यक्ति ही नही, बल्कि कई विदेशी कलाकार भी अपने, अपने, जमघट बनाए हुए, भोंडा की उस काठ की बांसुरी के, वह मधुर मधुर स्वर सुनते हुए, मंत्रमुग्ध हुए जा रहे थे। परन्तु भोंडा इस बात से अंजान, कृष्ण मुद्रा बनाए हुए, श्री कृष्ण की भांति, अपने श्याम नयनो को मूंदे हुए, अपनी उस काठ की बाँसुरी से, जादुई स्वरों को, निरन्तर हर दिशा में प्रवाहित किए जा रहा है। बहुत समय तक, वह ऐसे ही अपनी उस काठ की बाँसुरी से, उन जादुई स्वरों को प्रवाहित करता रहा। फिर अचानक से वह रुक कर, अपने बन्द श्याम नयनो को खोल देता है। तब भोंडा के इर्द गिर्द एकत्रित, समस्त व्यक्ति, जिनमे वह विदेशी कलाकार भी सम्मलित थे। अपने दोने हाथो से थाप लगाते हुए, भोंडा का उत्साहवर्धन करते है।

यह सब देख कर, भोंडा अत्यधिक उत्साहित हो जाता है। उसी समय उसकी दृष्टि, उन विदेशी कलाकारों के, एक जमघट में, मुस्कुराती हुई रोज़नलो पर, पड़कर वही ठहर जाती है। रोज़नलो जो बहुत देर से, मंत्रमुग्ध हो कर, भोंडा की जादुई बाँसुरी से, प्रवाहित होते हुए उन मनोहर स्वरों को, सुन रही थी। जिन्हें भोंडा किसी जादूगर के समान ही अपने ग़ुलाबी अधरों के द्वारा फूक कर उतपन्न कर हर दिशा प्रवाहित कर रहा था। भोंडा के उन सुंदर श्याम नयनो को देख कर, उनमे ही कहि खो जाती है। ऐसी ही कुछ मनोस्थिति, भोंडा की भी थी। वह दोनों इस समस्त संसार से बेखबर होते हुए, ना जाने कितने समय तक, यू ही बिना अपनी पलको को झपकाए, एक दूसरे के उन मनमोहक नयनो में देखते रहे। मानो उस समय यह सारा संसार ही रुक कर स्थिर हो गया था। और स्थिर हो गई थी इस संसार की समस्त वार्तालाप। अब तो भोंडा को ना तो दिन का चैन ही प्राप्त हो पा रहा था और ना ही रात्रि को उसको निंद्रा ही आ रही थी। उसको ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो उस स्वप्न सुंदरी के वह मदहोश करते हुए कजरारे नशीले नयन, उसके प्राण ले कर ही दम लेंगे। उधर रोज़नलो की सहेलियां भी, उसकी चुटकी ले रही थी कि सुना है आज कल, हमारी रोज़नलो, हर किसी राह चलते फ़क़ीर से, दिललगी करने लगी है। जिसके प्रतिउत्तर में रोज़नलो केवल मुस्कुरा देती है और कहती है कि ऐसे तो कोई भी हालात, मालूम नही होते। शायद तुम को, दिललगी की, आदत हो गई है। रोज़नलो के इतना कहते ही रोज़नलो के साथ, साथ उसकी समस्त सहेलियां, हँसते हुए, खिखिलाते हुए, राज शाही के सुंदर शाही बाग, बगीचे में दौड़ने लगती है।

वहाँ हैरान गंज में राज शाही जलसे की अगली शाम को भी, भोंडा हैरान गंज के, उस मशहूर फव्वारा चौक, जिसके फव्वारे से अब रंग, बिरंगा जल, उछाल मरता हुआ, सम्पूर्ण हैरान गंज को हैरान किए हुए था पर खड़ा हुआ, अपनी काठ की बांसुरी से, अत्यंत ही मधुर, मधुर, नवीन, नवीन स्वरों को, फूक कर, राज शाही जलसे में शिरकत करते हुए, समस्त सैलानियों को, मंत्रमुग्ध किए जा रहा था। आज भी जैसे ही वह, अपने श्याम नयनो को खोलता है कि तभी, विदेशी कलाकारों के, एक जमावड़े में से, रोज़नलो अपनी मदहोश शराबी निग़ाहों से, भोंडा के उन श्याम नयनो में देखते हुए, अपने चेहरे के एक बेहद महीन, रेशमी कपडे के नकाब से, मुस्कुरा रही थी। ऐसे ही प्रत्येक शाम को भोंडा, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक से, अपनी काठ की बांसुरी से, मनोहरी धुन छेड़ देता है और रोज़नलो उसी प्रकार मंत्रमुग्ध हो कर, भोंडा के उन जादुई स्वरों को सुनने के लिए, वहा आती है। तदोपरांत भोंडा, जब अपने उन श्याम नयनो को, खोल कर देखता, तो सामने रोज़नलो की, मदहोश कर देने वाली, उन्ही खूबसूरत शराबी निग़ाहों को, अपनी ओर देखते हुए पाता।

फिर एक सांझ को कुछ अज़ीब सा हुआ! जिसकी ना तो भोंडा ने कभी कोई कल्पना करि थी और ना ही रोज़नलो ने ही ऐसा कुछ कभी घटित होगा! यह सोचा था। आज हैरान गंज के उस, राज शाही जलसे की भव्य रौनक और धूम धड़ाके को, पूरे 11 या 12 दिन हो चले थे और भोंडा आज भी, अपनी हैसियत से बढ़कर, सुंदर पोशाक पहने हुए, हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक, जिससे अब राज शाही जलसे के दौरान, रंग बिरंगा जल, उछाल मारता हुआ निकलता था पर खड़ा हुआ, अपनी काठ की बांसुरी से, अत्यंत ही मनमोहक जादुई स्वरों को फूक रहा था। जिसको सुनकर हर सैलानियों का ह्रदय, चिर कर बस यही कह रहा था कि बस! अब ये दर्द, ये जादुई स्वरों का जादू और नही साह जाता। वाह भोंडा वाह! क्या खूब रंग जमाया है। मान गए भोंडा! भई वाह। और वही एक ओर विदेशी कलाकारों के, एक जमावड़े में, बेहद हसीन और कमसिन काया रोज़नलो भी, भोंडा के उन जादुई स्वरों से मंत्रमुग्ध हो रही थी। अभी जलसा अपने पूरे शबाब पर था कि तभी एक ओर से, एक तीव्र शोर, हर दिशा गूंज उठता है कि मारो मारो, पकड़ो पकड़ो, मार दे साले को, पकड़ साले को, गर्दन तोड़ इसकी। फव्वारा चौक के समीप ही, नवयुवको की दो टोलियों में, एक विदेशी कलाकार, सुंदरी नृत्यांगना को लेकर, आपस मे एक ख़ूनी झड़प, प्रारम्भ हो गई थी। अचानक इस प्रकार के शोर शराबे से, वहाँ एक भगदड़ सी मच जाती है और भोंडा के समीप एकत्रित समस्त सैलानी, वहाँ से दूसरी ओर जलसे का आनन्द प्राप्त करने हेतु, परस्थान कर जाते है। बाबरा भोंडा अब भी अपनी काठ की उस बाँसुरी से जादुई स्वरों को, अपने दोनों श्याम नयनो को मूंदे, फूंके जा रहा था, बस फुके ही जा रहा था। जब कि उस के इर्द गिर्द एकत्रित समस्त सैलानी, झगड़े की भगदड़ से बचने हेतु, दूसरी ओर जलसे का आनन्द प्राप्त करने के लिए परस्थान कर गए थे। यदि वहाँ कोई था तो केवल और केवल, सुंदर रोज़नलो और बाँसुरी बजाता हुआ अपना भोंडा। जो अब भी किसी बाबरे प्रेमी की भांति, अपने बाँसुरी से मनोहर जादुई स्वरों को फूंके जा रहा था। तभी आसमान में, एक तेज़ गर्जना के साथ, मूसलाधार वर्षा की बौछार, प्रारम्भ होने लगती है। परन्तु भोंडा अब भी अपनी बाँसुरी से, जादुई स्वरों को फूक रहा था और अपने इस दीवानेपन में, वह यह भी भूल गया था कि उसके पास जो कटोरा है! वह रत्नजड़ित स्वर्ण कटोरा है। जिस पर वर्षा की बौछार होने से, उसके रत्नजड़ित स्वर्ण का वह सुनहरा रंग, कई जगह से, खुल कर सामने आ गया था। परन्तु इस समय वहाँ सिर्फ रोज़नलो ही मौजूद थी। जिसने भोंडा के उस रत्नजड़ित स्वर्ण कटोरे का राज जान लिया था और वह आहिस्ता, आहिस्ता से भोंडा के समीप पहुचती है। तभी भोंडा अपने सुंदर श्याम नयनो को खोल देता है। और उसके ठीक सामने होती है बेहद हसीन रोज़नलो।

रोज़नलो को अपने इतने समीप देख कर, भोंडा के होशोहवास, कहि खो जाते है। इससे पहले की वह कुछ समझ पाता, रोज़नलो अपने उन गुलाब की पंखुड़ियों के सामान सुंदर एवं रसीले अधरों को, भोंडा के उन कपकपाते हुए अधरों पर, रख देती है। और ना जाने कब तक, वह उसी मुद्रा में उसी प्रकार से, एक दूसरे के समीप, एक दूसरे के अधरों से अधरों को मिलाए, अत्यंत ही समीप से एक दूसरे को समझने का प्रयास करते रहे। तभी एक बार पुनः, नवयुवको की उन बदमाश टोलियो के, झगड़े का स्वर हर दिशा गूंज उठता है और रोज़नलो अपने रेशमी वस्त्रों में से, एक पर्चा भोंडा के हाथों में थमाते हुए, बिना कुछ कहे ही वहाँ से चली जाती है। जाते समय रोज़नलो की उन मदहोश निग़ाहों ने, भोंडा पर ऐसा जादू किया कि वह ना जाने कब तक, यू ही किसी मूर्त के समान स्थिर अवस्था मे, वहाँ खड़ा रहा, फिर अचानक ही भोंडा को कुछ चेतना आती है और वह अपने उस रत्नजड़ित स्वर्ण कटोरे, समेत उस गुलाबी पर्चे को, जिसे रोज़नलो ने उसके हाथों में थमा दिया था को अपने, थैले में रख देता है। तदोपरांत भोंडा एक अज़ीब से उत्साह के साथ अपने झोपड़े की ओर परस्थान कर जाता है। आज भोंडा की जन्मोजन्म पुरानी, कोई अधूरी ख़्वाहिश, बिन मांगे ही पूर्ण हो गई थी। भोंडा अब अपने झोंपड़े के भीतर प्रवेश कर चुका है। परन्तु उसको अब भी विशवास नही हो रहा कि आज उस विदेशी, स्वर्ग की अप्सरा के समान सुंदर हसीना ने उसके अधरों को, अपने कोमल और रसीले अधरों से, स्वयं ही चुम कर, उसकी व्याकुल आत्मा को अंदर तक तृप्त कर दिया है। फिर अकस्मात ही भोंडा को कुछ स्मरण होता है और वह अपने थैले में से, उस गुलाबी पर्चे को निकाल कर, अत्यंत ही प्रेम भरी भावना के साथ, देखते हुए चुम लेता है। जिस पर उस विदेशी हसीना का एक चित्र अंकित था। इस प्रकार बारम्बार, उस विदेशी हसीना के, उस चित्र को चूमते हुए, भोंडा उसके चित्र को अपने सीने से लगा कर, अपने बेचैन धड़कते हुए दिल के समीप रख कर, अपनी खटिया पर लेट जाता है। इस प्रकार से भोंडा सम्पूर्ण रात्रि, उस गुलाबी पर्चे को अपने सीने से लगाए हुए, अपनी खटिया पर लेटा रहा। जिसे रोज़नलो ने जाते समय, उसके हाथों में थमा दिया था। आज भोंडा को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे उसकी सुनी दुनिया को, मोहब्ब्त की हसीन ख़ुशबू ने, महका कर गुलज़ार कर दिया है। और भोंडा सम्पुर्ण रात्रि एक प्रेम भरी बेचैनी के साथ, सकूँ से प्रेम की सांसे भरता रहा।

वही दूसरी ओर राज शाही के मेहमानखाने में, रोज़नलो की सखियां, उसके साथ अटखेलियां करते हुए, उसको छेड़ रही थी कि वाह रोज़नलो वाह! मान गए हम, आज तो तुम ने कमाल ही कर दिया। तुम से हमें ऐसी तो कोई भी उम्मीद ना थी! अपनी सखियों के मुंह से यह सुनते ही, रोज़नलो कुछ बेचैन सी होते हुए, कहती है कि तुम्हारा इस प्रकार से, व्यंग्य करने का तातपर्य क्या है सखी! रोज़नलो को यू अंजान बनते देख, उसकी सखियां पुनः कुछ अठखेली करते हुए, कहती है कि ना, ना, रोज़नलो हमने तो कुछ भी ना कहा। तुम ने तो बेवजह ही, अपने गुलाबी अधरों को दबा लिया है। इतना कहते हुए रोजनालो की सभी सखियां, हंसती मुस्कुराती हुई, समीप के एक रेशमी गलीचे पर लेट जाती है। अपनी सखियों की इस प्रकार की अटखेलियों से, रोज़नलो कुछ लज्जा से शरमा जाती है। अगली दिन भोंडा, प्रातः काल से पूर्व ही, राज शाही जलसे में शामिल हो जाता है। और हैरान गंज के उस मशहूर फव्वारा चौक पर, बैठ कर रोज़नलो की प्रतीक्षा करने लगता है। इस प्रकार भोंडा को रोज़नलो की प्रतीक्षा करते हुए, प्रातः काल से दोपहर, फिर दोपहर से सांझ हो जाती है। परन्तु आज रोज़नलो का दूर, दूर तक, कहि कुछ अता पता नही लग रहा था। आज प्रातः काल से सांझ होने तक, ना जाने कितने ही राहगीर सैलानियों ने, भोंडा से उसकी उस काठ की बाँसुरी से, वह जादुई स्वरों को फूंकने का आग्रह किया! जिनका सम्पूर्ण हैरान गंज कायल था। परन्तु भोंडा एक दिवाने की भांति गुमसुम सा, एक ओर को बैठा रहा और अब जबकि आसमान में रात्रि के तारे टीम टमाने लगे है! तो भोंडा को अब भी सिर्फ रोज़नलो का ही इंतज़ार है। जैसे वह अभी उसके सामने प्रकट हो कर, उसके उन बेचैन अधरों को, अपने गुलाबी रसीले अधरों से, चुम कर तृप्त कर देगी। परन्तु आज रोज़नलो नही आई और भोंडा को उसके प्रेम भरे दर्शन प्राप्त नही हो सके। तभी भोंडा अपने कुर्ते की जेब से वह ग़ुलाबी पर्चा, जो रोज़नलो ने कल, उसके हाथों में थमा दिया था को निकाल कर, अत्यंत ही करुणामय भावों से उसको देखने लगता है। उस ग़ुलाबी पर्चे को देखते हुए, उसकी आँखों से अश्रु की धारा बहते हुए, उस ग़ुलाबी पर्चें को भिगोकर, उस पर भोंडा के प्रेमस्वरूप, मोहब्ब्त के निशान, छोड़ देते है।

वहाँ से कुछ ही दूरी पर भोंडा का मित्र बिरजू पनवाड़ी, यह सब कुछ बहुत ही ध्यान से देख रहा था। भोंडा की इस प्रकार से दयनीय स्थिति देख कर, उसको अत्यंत ही पीड़ा हो रही थी। तभी वह भोंडा की ओर चलते हुए, उसके समीप आ कर, खड़ा हो जाता है और वह भोंडा से इस प्रकार दुःखी हो कर, अपने अश्रुओं को, बहाने का कारण पूछता है। बिरजू के सहानुभूति पूर्ण वचनों को सुन कर, भोंडा को कुछ धीरज बंधता है और वह बिरजू को अब तक का समस्त हाल ए दिल कह सुनाता है। जिसे सुन कर बिरजू कहता है कि भोंडा तुम सचमुच, अत्यंत ही भाग्यशाली हो। अन्यथा उन विदेशी सुंदरियों के इर्द गिर्द, उनके हुस्न से आकर्षित हो कर, चक्कर लगाते हुए, मैं कई साहूकारों और नवयुवको को आजकल प्रतिदिन ही देखता हूं। परन्तु वह किसी पर घास बराबर ध्यान भी नही देती। यदि तुम सत्य कह रहे हो! तो तुम सचमुच अत्यंत ही भाग्यशाही ही कहलाओगे। तभी बनवारी दुखी भोंडा के हाथों से, उस गुलाबी पर्चे को, अपने हाथों में थाम कर समीप से देखता है। तदोपरांत वह अत्यंत ही उत्साहित होते हुए कहता है कि भोंडा तुम तो सचमुझ ही अत्यंत भाग्यशाली हो। जानते हो यह क्या है?

बिरजू के मुख से यह सुनते ही, भोंडा अत्यंत ही सहज भाव से, कहता है कि “नही, मुझ को नही पता, क्या यह प्रेम पत्र है?” भोंडा के मासूमियत भरे स्वरों को सुन कर, बिरजू कुछ मुस्कुराता हुए, भोंडा को बताता है कि यह राज शाही के, उस शाही नृत्य के भव्य कार्यक्रम का, प्रथम श्रेणी का प्रवेश पत्र है। जिसके द्वारा तुम राज शाही के उस शाही नृत्य के कार्यक्रम को, अत्यंत ही समीप से देख सकते हो। जिसके लिए वह स्वर्ग की अप्सराओँ के समान सुंदर, सुंदर विदेशी नृत्यांगए, हैरान गंज के इस राज शाही जलसे में, शिरकत करने के लिए आई है। बिरजू के द्वारा यह जानकारी प्राप्त करते ही, भोंडा अत्यंत ही हर्षोउत्साहित हो उठता है। और वह बिरजू से कहता है कि सत्य, तुम सत्य कह रहे हो बिरजू! तभी बिरजू इसका उत्तर देते हुए, कहता है कि हा भई हा, मैं सत्य कह रहा हु। भला मैं तुम से कभी असत्य वचन बोल सकता हु। इतना सुनते ही भोंडा बिरजू को, अपने गले से लगा कर, भावनात्मक अश्रु बहाने लगता है। तदोपरांत वह बिरजू से अलविदा लेते हुए, स्नानादि करके एक नवीन पोशाक पहन कर, राज शाही के उस शाही नृत्य के, कार्यक्रम के स्थान की ओर चल देता है। जिसके विषय में बिरजू ने उसको बताया था। भोंडा अब अत्यधिक उत्साहित दिखाई दे रहा है और वह विचार कर रहा था कि जब वह रोज़नलो से भेंट करेगा, तो उससे बहुत सी वार्तालाप करेगा। वह उससे झगड़ा भी करेगा और उससे पूछेगा की वह आज उसकी बाँसुरी की धुन को, सुनने के लिए क्यों नही आई! परन्तु वास्तविकता तो यह थी कि अंदर ही अंदर भोंडा कुछ भयभीत हो रहा था। उसको यह विचार बारम्बार सताए जा रहा था कि यदि उसको, राज शाही के शाही सैनिकों ने, राज शाही के उस शाही नृत्य के कार्यक्रम में, प्रवेश करने से रोक दिया! तो उसका क्या होगा। कहि वह उसको मरेंगे, पिटेंगे तो नही। इन्ही सब विचारो की उधेड़बुन के साथ, भोंडा एक अज़ीब सी मनोस्थिति के साथ, राज शाही के शाही नृत्य के कार्यक्रम में रोज़नलो से भेंट करने हेतु, अंधाधुंध चले जा रहा था और कुछ ही क्षणों के उपरांत, भोंडा उस राज शाही के शाही नृत्य के शाही कार्यक्रम के प्रवेश द्वार पर, पहुच कर रुक जाता है।

वह एक असमंजस में है कि वह यहा तक तो आ गया है परन्तु राज शाही के शाही नृत्य के कार्यक्रम के उस प्रवेश द्वार के भीतर प्रवेश करने का, उसको अब भी कोई हौसला प्राप्त नही हो रहा है। तभी राज शाही के शाही नृत्य के भव्य कार्यक्रम के प्रवेश द्वार पर तैनात, एक शाही दरबान, भोंडा से इस प्रकार वहाँ हैरान परेशान होने का कारण पूछता है। तब भोंडा उसको वह ग़ुलाबी पर्चा जो वास्तव मे एक प्रथम श्रेणी का प्रवेश पत्र (टिकट) था। दिखाते हुए कहता है कि यह देखो भाई! क्या यही वह विदेशी नृत्यांगए, अपने नृत्य का प्रदर्शन करती है। भोंडा के पास प्रथम श्रेणी का प्रवेश पत्र देख कर, पहले तो वह दरबान, कुछ हैरान होता है। तदोपरांत कुछ मुस्कुराते हुए कहता है कि “श्री मान अपने अत्यधिक विलम्भ कर दिया है क्योंकि कार्यक्रम तो बहुत समय पूर्व से प्रारंभ हो कर, अब अपने चरम पर है। आइए, आइए श्री मान।” और वह मुस्कुराते हुए प्रवेश द्वार को खोल देता है। जिसके उपरांत भोंडा अत्यधिक उत्साह के साथ, उस राज शाही के भव्य प्रवेश द्वार से होते हुए, भीतर प्रवेश कर जाता है।

उस भव्य प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश करने के उपरांत, भोंडा अभी मुश्किल से, कुछ कदम ही चला होगा कि उसके कानों में राज शाही के उस भव्य कार्यक्रम के, हर्षोउल्लास से भरे हुए स्वर, गूंज उठे। जैसे, जैसे वह आगे की ओर बढ़ रहा था! वैसे, वैसे उसके ह्रदय की धड़कने, तेज़ और तेज़, बहुत तेज़ होती जा रही थी। कुछ ही कदमो के इंतज़ार के उपरांत, भोंडा उस आलीशान भव्य शाही दरबार मे प्रवेश कर जाता है। जहाँ राज शाही नृत्य का कार्यक्रम अपने चरम पर पहुँचते हुए, हर किसी को मंत्रमुग्ध किए हुए था। भोंडा अभी भी अपने बैठने के लिए स्थान की तलाश कर रहा था कि तभी भीतरी द्वार का एक शाही दरबान, भोंडा के प्रवेश पत्र को देख कर, उसको बताता है कि यह प्रथम श्रेणी का प्रवेश पत्र है। इसीलिए आप बाजू के गलियारे से होते हुए, प्रथम पंती के तीसरे स्थान पर विराजमान हो कर, इस शाही नृत्य के भव्य कार्यक्रम का आनन्द प्राप्त करें। भीतरी द्वार के दरबान के दिशा निर्देश अनुसार, भोंडा बाजू के गलियारें से होता हुआ, प्रथम पंती के तीसरे स्थान की और चल देता है। जैसे, जैसे भोंडा प्रथम श्रेणी की प्रथम पंती के, अपने तीसरे स्थान की ओर बढ़ रहा है, वैसे, वैसे, उसको इस राज शाही के भव्य कार्यक्रम की चकाचौंध कर देनी वाली, साज़ सजावट का एहसास होना, प्रारम्भ हो जाता है। हर बढ़ते कदम से इस शाही कार्यक्रम की भव्यता, पूर्व से कही अधिक ज्ञात होने लगी है। इसके साथ ही सामने के उस आलीशान भव्य मंच के दृश्य, अब पहले से कही अधिक भव्य और स्पष्ट दिखाई देने लगे है। भोंडा जैसे जैसे आगे की ओर बढ़ रहा है। वैसे, वैसे उसके कानों में इस राज शाही भव्य नृत्य कार्यक्रम के, मधुर संगीत के स्वरों का, एक अनोखा सा जादू , उसके मस्तिक्ष पर हावी होने लगा है। हर बढ़ते कदम से सामने के दृश्य पूर्व से कही अधिक रंगीन और संगीत कहि अधिक मधुर और तीव्र होता जा रहा है। अब भोंडा प्रथम श्रेणी की प्रथम पंती के अपने तीसरे स्थान पर, सहज ही विराजमान हो जाता है। जहाँ उसके प्रवेश पत्र की संख्या के साथ और बड़े बड़े अक्षरों में उसका नाम अंकित था “भोंडा”।

भोंडा किसी प्रकार से अपने उतेजित ह्रदय की धड़कती ध्वनियों को थामे हुए, कार्यक्रम देखना प्रारम्भ कर देता है। उसको अब भी विशवास नही हो रहा कि वह आज यहाँ राज शाही के इस भव्य नृत्य कार्यक्रम में, यू इस प्रकार से प्रथम श्रेणी की पंती में बैठ कर, इस प्रकार से, इस भव्य शाही कार्यक्रम का आनन्द प्राप्त कर रहा है। तभी भोंड़ा को रोज़नलो का विचार आता है कि रोज़नलो, वह कहा होगी! क्या वो भी यहा नृत्य करेगी? अभी भोंडा, यह सब कुछ विचार कर ही रहा था कि तभी संगीत की धुन बदल कर, कुछ अत्यधिक उतेजित हो जाती है और हर दिशा में एक ही स्वर “रोज़नलो, रोज़नलो, रोज़नलो…रोज़नलो! गूंज उठता है। उसी समय आज के, इस भव्य नृत्य कार्यक्रम के, सबसे अहम भाग का प्रारंभ होता है। जिसके लिए वहाँ सभी रसिया लोग, उपस्थित हुए थे। उस भव्य नृत्य कार्यक्रम के, सबसे अहम भाग के, प्रारंभ होते ही, भोंडा देखता है कि रोज़नलो एक अत्यंत ही कामुक और शाही पोशाक पहने हुए, मंच पर अपनी पतली सुनहरी कमर के, ज़ोरदार लटकों झटकों से, हर किसी के ह्रदय को चिर कर रख देती है। रोज़नलो, उस अत्यधित उतेजित कर देने वाले, उस संगीत की धुन पर, ऐसे नृत्य कर रही है जैसे कि वह कोई ज़हरीली नागिन हो। भोंडा की दृष्टि के ठीक सामने, रोज़नलो अपना अत्यधिक कामुकता से भरा, नृत्य प्रस्तुत कर रही है और जिस संगीत पर, वह अपने जलवे बिखेर रही थी! वह भोंडा के कानों में, किसी ज़हर के समान घुलते हुए, उसकी रग रग में समाए जा रहा था। तभी भोंडा के समक्ष, एक राज शाही सेवक हाथो में, रंगीन राज शाही मदिरा से भरे जाम की तश्तरी लिए, उससे मदिरा पान का आग्रह करता है और भोंडा, जिसने आज तक कभी कोई एक पान भी नही चखा था। जिसने आज तक चिलम या हुक्के का एक कश भी नही लगाया था। आज वह रोज़नलो के उस कामुक नृत्य से, अत्यधिक आहात हुए, एक के बाद एक, मदिरा के कई भरे जाम, खाली कर देता है।

अब यह राज शाही, भव्य नृत्य कार्यक्रम, अपने अँतिम पड़ाव पर पँहुचते हुए, अपनी कामुकता एवं भव्यता के चरम सीमा तक पहुचते हुए, हर किसी को नाचने और गुनगुनाने के लिए, स्वतः ही विवश किए हुए था। उधर मंच पर, रोज़नलो भी अपने, कामुक नृत्य के चरम पर थी। इधर भोंडा भी, पहले से कही अधिक, आहात हो चुका था। भोंडा के कानों में, वह कामुक संगीत, जिस पर रोज़नलो, अत्यधिक कामुकता के साथ, नृत्य कर रही थी। किसी पिंघले हुए, शिशे के समान, समाए जा रहा था। अब अकस्मात ही उस शाही नृत्य दरबार मे, एक मदहोशी सी छा जाती है। और भोंडा भी मदिरा के सरूर में, वह कामुक संगीत, जो कुछ समय पूर्व तक, उसको आहात किए हुए था। तीव्र स्वर से गुनगुनाना प्रारम्भ कर देता है कि “जलवा, जलवा, शहर में आया है जलवा जलवा, देखले तू जलवा, जलवा, हुस्न है, इश्क है, और ये जलवा, जलवा, शहर में आया है, जलवा, जलवा। ना मोहब्बते, ना आरज़ू, ना कोई ख्वाहिशें, बस है यहा, ये जलवा, जलवा, हुस्न है, इश्क है, और ये जलवा, जलवा। आशिके, हुस्न का, फूटता फवार, ये जलवा, जलवा।”।

तभी भव्य मंच पर, एक रेशमी रंगीन पर्दा, गिर कर, आज के इस भव्य राज शाही नृत्य कार्यक्रम के, समापन की घोषणा, कर देता है। परन्तु भोंडा अभी भी, शाही मदिरा के सरूर में, एक तीव्र स्वर से, वही संगीत गुनगुनाए जा रहा था कि “जलवा, जलवा, शहर में आया है जलवा, जलवा” नवयुवक भोंडा की ऐसी स्थिति, देख कर, भीतरी दरबानों में से एक, भोंडा के समीप पहुच कर, उसको सहारा देते हुए, निकास द्वार से, बाहर की ओर, जाने के लिए कहता है और भोंडा अब भी “जलवा, जलवा, शहर में आया है, जलवा, जलवा, हुस्न है, इश्क है, और ये, जलवा, जलवा” तदोपरांत अचानक ही, भोंडा मदिरा के सरूर में, उस राज शाही दरबान को, एक ओर धकेल देता है और उसकी जुबान पर, अब भी वह स्वर थे कि “जलवा, जलवा, शहर में आया है, जलवा, जलवा, देखले तू, जलवा, जलवा”। भोंडा की इस गुस्ताखी पर, राज शाही दरबान, अपना हाथ उठा कर, मदिरा के सरूर में धुत, भोंडा को सबक सिखाने ही वाला था कि ठीक उसी समय, कोई उसके उस उठे हुए हाथ को, पीछे से पकड़ कर झटक देता है। जैसे ही वह राज शाही के, भीतरी द्वार का दरबान, पलट कर देखता है! तो उसके होश उड़ जाते है। क्यों कि उसके उस उठे हुए हाथ को, झटकने वाले हाथ, किसी और के नही, बल्कि स्वयं राज शाही नृत्यांगना, अत्यंत ही आकर्षित एवं सुंदरी, रोज़नलो के थे। रोज़नलो को इस प्रकार से, अपने समीप खड़ा देख कर, वह भीतरी द्वार का दरबान, पसीने पसीने हो जाता है और बिना कुछ कहे, अपने दोनों हाथों को, बहुत ही अदब के साथ, बांधकर, अपने सर को झुकाए, एक ओर ख़ामोश सा खड़ा हो जाता है। भोंडा की ऐसी अज़ीब सी, विकृत स्थिति को देख कर, रोज़नलो, उस भीतरी द्वार के दरबान को, कहती है कि “ए दरबान मेरे वचन को अब जरा ध्यानपूर्वक सुनना। देखो! साहब को मेरे पीछे पीछे, मेरे कक्ष तक ले कर आओ। हा, ध्यान रहे! इन्हें किंचित मात्र भी, समस्या ना उतपन होने पाए। यह हमारे, बहुत ही महत्वपूर्ण अथिति है। इस प्रकार वह भीतरी द्वार का दरबान, रोज़नलो के वचन अनुसार, राज शाही मदिरा के नशे में धुत, भोंडा को किसी प्रकार सहारा देते हुए, रोज़नलो के उस राज शाही मेहमानखाने के, भव्य कक्ष में छोड़ कर, बाहर की ओर परस्थान कर जाता है।

भोंडा अब भी नशे में धुत, मदहोश अवस्था मे, वही संगीत गुनगुनाए जा रहा था कि “जलवा, जलवा, शहर में आया है, जलवा, जलवा, देखले तू, जलवा, जलवा, हुस्न है, इश्क़ है और ये, जलवा, जलवा। तभी भोंडा को एक ज़ोरदार हिचकी आती है। उस हिचकी के साथ ही वह, रोज़नलो के उस राज शाही मेहमानखाने के, भव्य कक्ष के उस मख़मली बिस्तर पर, बेसुध को कर गिर जाता है। रोज़नलो, आहिस्ता से नशे में धुत भोंडा के समीप आती है और उसको पुकारते हुए चेतना दिलाने का, एक पुरज़ोर प्रयास करती है। परन्तु रोज़नलो के हर एक प्रयत्न के उपरांत भी, जब भोंडा को चेतना नही आती, तो रोज़नलो, उस भव्य राज शाही कक्ष की वह रंगीन रौशनी, एक फूंक से बुझा कर अँधेरा देती है। अगली प्रातः जब भोंडा को कुछ चेतना आती है! तो वह स्वयं को, एक आलीशान महल के समान, सुंदर कक्ष में, बिल्कुल नग्न अवस्था में, एक मख़मली चादर से ढका हुआ पाता है। वास्तविक हैरानी, तो उसको तब होती है! जब वह अत्यधिक आकर्षित, रूप सौंदर्य की मल्लिका, रोज़नलो को भी बिल्कुल अपनी बगल में, एकदम नग्न अवस्था में सोता हुआ पाता है। इससे पहले की भोंडा कुछ समझ पाता, रोज़नलो उसी नग्न अवस्था में, भोंडा को अपने प्रेम भरे आलिंगन में जकड़ लेती है और उसको अत्यंत ही प्रेम से चुम्बन करते हुए, कहती है कि सुप्रभात डार्लिंग। तुम, हमको बहुत अच्छा लगता है। रात को तुम ने कितना हंगामा किया, तुम को कुछ होश भी नही है। हम कितना डर गया था। रोज़नलो, भोंडा को अभी भी, अपने प्रेम भरे आलिंगन में, उसी प्रकार नग्न अवस्था के साथ, जकड़े हुए थी और भोंडा के तो जैसे प्राण पखेरू ही उड़ गए थे। इस नग्न अवस्था में भोंडा, शर्म से लाल होते हुए, उस रेशमी बिस्तर में सिमटता हुआ, जमीन में गढ़े जा रहा था और उसने लज्जा से, अपने दोनों नयनों को अत्यधिक जोर से मूंद लिया था।

तभी रोज़नलो उसी प्रकार से उस नग्न अवस्था में ही, बिस्तर से बाहर निकलते हुए, उस रेशमी चादर को खींच कर, भोंड़ा के नग्न बदन से अगल करते हुए, स्वयं के नग्न बदन पर लपेट लेती है। रोज़नलो की इस हरक़त से, भोंडा शर्म से पानी पानी हो जाता है और दौड़ कर एक रेशमी पर्दे के, पीछे छुप जाता है। भोंडा को इस प्रकार से शर्माता हुआ देख कर, रोज़नलो की हंसी छूट जाती है और वह भोंडा को उसके कपडे पकड़ाते हुए, अत्यंत ही प्रेम भरे स्वर से कहती है कि लीजिए पहन लीजिए। हम अभी आते है तुम को बहुत शर्म आता है डार्लिंग। इतना कह कर रोज़नलो एक दूसरे रेशमी महिम जालीदार पर्दे के पीछे, अपने वस्त्रों को पहनते हुए, भोंडा से कहती है कि हम तो तुम्हारा नाम भी नही पूछा। रोज़नलो के इतना कहते ही, नवयुक भोंडा, पर्दे के पीछे से अपने कपड़े पहन कर, बाहर निकलते हुए कहता है कि जी “भोंडा” भोंडा नाम है मेरा। तभी रोज़नलो उस अर्धनग्न अवस्था मे, उस महीन पर्दे के पीछे से बाहर आते हुए, कहती है कि “ओह भोंडा” कितना सुंदर नाम है तुम्हारा। रोज़नलो को इस प्रकार से उस अर्धनग्न अवस्था मे देख कर, भोंडा पुनः शर्म से लाल, होने लगता है। भोंडा को पुनः इस प्रकार से शर्माते हुए, देख कर, रोज़नलो कहती है कि “भोंडा” तुम अब क्यों शर्माता है? कल रात्रि को तुम ने कितना मदिरा पी लिया था! तुम को कुछ चेतना भी नही था। हम तुम को सहारा दे कर, अपने इस कक्ष में लाया और तुमने, हमारे साथ! इतना कहते हए, रोज़नलो रोने लगती है। रोज़नलो को इस प्रकार से रोता हुआ देख कर, भोंडा कुछ घबरा जाता है और वह रोज़नलो के उस अर्धनग्न, अत्यधिक आकर्षित, कामुक, मख़मली बदन को, अपनी दोनों मजबूत भुजाओं से थाम कर, अत्यधिक प्रेमपूर्वक कहता है कि कृपया आप रोए नही रोज़नलो। भोंडा के इतना कहते ही रोज़नलो अपनी मदहोश कर

कर देने वाली उन नशीली निग़ाहों से, अत्यधिक प्रेम के साथ, भोंडा के उन श्याम नयनों में देखते हुए, कहती है कि भोंडा तुम को हमारा नाम कैसे पता है! हम तो अभी तक तुम को अपना नाम नही बताया। तदोपरांत भोंडा, अर्धनग्न रोज़नलो के अत्यधिक सौंदर्य से परिपूर्ण, मख़मली बदन को उसी प्रकार से अपनी मजबूत भुजाओं में थामे हुए, कहता है कि आपका नाम तो आज हैरान गंज के हर बालक की जुबान पर है रोज़नलो। भोंडा के इतना कहते ही रोज़नलो भोंडा को अपनी रेशमी बाहों में जकड़ कर, एक बार पुनः उस रेशमी, मख़मली बिस्तर पर ले जाती है और एक बार पुनः दिन के उजाले में रोज़नलो और भोंडा का प्रेम आलिंगन अपने चरम पर पहुँच जाता है। तदोपरांत रोज़नलो उसी नग्न अवस्था मे किसी विषधारी नागिन के समान ही मासूम भोंडा से लिपटे हुए, कहती है कि हम तुम से विवाह सम्पन्न करेगा भोंडा। रोज़नलो के उस हसीन मुख से यह वचन सुनने के उपरांत भी भोंडा को विशवास नही होता कि यह सब कुछ, उसके साथ वास्तविकता में घटित हो रहा है। कुछ क्षण स्वयं को शांतचित रखने का एक असफल प्रयास करने के उपरांत, भोंडा एक गम्भीर स्वर द्वारा रोज़नलो से कहता है कि मैं तो अत्यधिक दरिद्र हु रोज़नलो। फिर तुम मुझ से विवाह कैसे कर सकती हो?

भोंडा को इस प्रकार से घबराता हुआ, देख कर, रोज़नलो अत्यंत ही प्रेम भरे स्वर से कहती है विचार लीजिए और उसके बाद ही आप अपना जबाब, हमको बताना भोंडा। आज शाम को हम, तुम्हें हैरान गंज के गुलाबी दरिया के घाट पर मिलने को आएगा। ध्यान रहे भोंडा! हम तुमारे इस नगर में कल तक ही रहेगा, इसके उपरांत हम को फतेह गंज के राज शाही दरबार में अपना नृत्य प्रस्तुत करके, अपने देश को चला जाएगा। तुम समझ रहा है ना भोंडा! हम तुम से क्या वचन कहता है। हम कल हमेशा के लिए चला जाएगा। इतना कहते हुए रोज़नलो अत्यधिक भावुक हो जाती है और उसकी उन शराबी निग़ाहों से अश्रु बहने लगते है। जिन्हें देख कर भोंडा भी भावुक होते हुए, कहता है कि रोज़नलो तुम रोओ मत। हम आज शाम को गुलाबी दरिया के घाट पर अवश्य मिलेंगे। परन्तु अभी के लिए तुम कृपया रोओ मत। देखो नही तो मैं भी रो दुंगा। भोंड़ा के इतना कहते ही रोज़नलो, अपने गुलाबी हसीन चेहरे से, किसी अनमोल मोती रत्न के समान, उन स्थिर अश्रुओं की बूंदों को पोंछ देती है और अत्यंत ही प्रेम भरे स्वर से कहती है कि भोंडा तुम हमको प्यार करता है। इतना कहते हुए रोज़नलो, भावुक हो चुके भोंडा के अधरों पर अपने ग़ुलाबी रसीले अधरों से एक अत्यंत ही भावनात्मक चुम्बन कर देती है। ना जाने कितने समय तक भोंडा और रोज़नलो उसी प्रकार अपने अधरों से अधरों को मिलाए, उस रेशमी बिस्तर पर नग्न बदन लिए हुए, एक अलौकिक दिव्य स्वरूप के साथ, एक दूसरे से लिपटे रहे। तदोपरांत भोंडा अपने वस्त्रो को ठीककरने के उपरांत, रोज़नलो से सांझ के समय गुलाबी दरिया के घाट पर, अपने उसी स्वरूप के साथ, भेंट करने का वचन देते हुए! जिस स्वरूप में उसका प्रथम बार रोज़नलो से आमना-सामना हुआ था। भोंडा द्वार से बाहर को परस्थान कर जाता है।

आज भोंडा अत्यधिक उत्साहित है क्यों कि जिस विदेशी स्वर्ग की अप्सरा के समान सुंदर सुंदरी को, एक दृष्टि भर निहारना भी, किसी को नसीब नही था। आज वह भोंडा पर इस प्रकार से महरबान हो कर, अपना ह्रदय हार चुकी है कि आज सांझ को, वह उससे विवाह की वार्तालाप करने हेतु, एकांत में गुलाबी दरिया के घाट पर, भेंट करने के लिए, आने वाली है। रोज़नलो से विदा लेकर भोंडा सीधे अपने झोपड़े पर पहुचता है और स्नानादि करने के उपरांत, रोज़नलो के साथ सांझ के उस प्रेम भरे मिलन के विषय में विचार करते हुए, अत्यधिक उत्साहित हो जाता है। खैर किसी प्रकार से बेचैन भोंडा का दिन व्यतीत हो जाता है और वह सांझ के समय एक राज शाही धनी के समान सज धज कर, अपनी पतली कमर में अपनी सुंदर काठ की बाँसुरी को लपेट लेता है। इसके बाद भोंडा अपने बाए हाथ मे, अपने मृत पिता हरिहर की बांगी लाठी और दाए हाथ मे अपने रत्न जड़ित सवर्ण कटोरे को, जिसे भोंडा ने पुनः अपने मृत पिता के दाह संस्कार के स्थान पर, उसी शमसजन की मिट्टी से लिप कर ढक दिया था! को थामे हुए अत्यधिक हसीन कमसिन काया रोज़नलो से भेंट करने के लिए, हैरान गंज की एकलौती उस मशहूर गुलाबी दरिया के घाट की ओर परस्थान कर जाता है।

उधर रोज़नलो भी सज धज कर, स्वर्ग की किसी अफसरा से भी अधिक सुंदर और कामुक प्रतीत हो रही है। रोज़नलो को इस प्रकार से श्रृंगार करते हुए, देख कर, उसकी सखिया उससे कहती है कि आज किस पर अपने इस क़ातिलाना हुस्न की बिजली गिराने के लिए, सज धज रही हो रोज़नलो! इसके प्रतिउत्तर में रोज़नलो सिर्फ इतना ही कहती है कि आज कोई अपना धड़कता सीना चिर कर, उसके कदमो में अपना धड़कता ह्रदय रखने वाला है। रोज़नलो के मुख से यह शब्द सुनते ही, उसकी सभी सखिया कुछ गम्भीर होते हुए, भय से काँपने लगती है। तदोपरांत अत्यंत ही सुंदर रोज़नलो, हैरान गंज के मशहूर ग़ुलाबी दरिया के घाट पर, अपने क़ातिलाना हुस्न के दीवाने, पागल प्रेमी भोंडा से एक अत्यंत ही दिलचस्प भेंट करने के लिए, एक राज शाही पालकी में बैठ कर, उस राज शाही महमखाने से परस्थान कर जाती है। दूसरी ओर ग़ुलाबी दरिया के घाट पर, भोंडा समय से पूर्व ही एक बेचैन अवस्था मे चहल कदमी करते हुए! बारम्बार ग़ुलाबी दरिया के घाट पर घाट के प्रवेश द्वार पर, अपनी बेचैन दृष्टि को टिकाए हुए है कि रोज़नलो अब आई और अब आई! बहुत देर तक रोज़नलो कि राह देखते के उपरांत भी जब रोज़नलो कहि दिखाई नही देती, तो भोंडा कुछ भावनात्मक रूप से टूटते हुए, गुलाबी दरिया के घाट पर, अपने घुटनों के बल पर बैठ जाता है कि तभी रोज़नलो हैरान गंज के उस मशहूर गुलाबी दरिया के घाट पर, मुख्य द्वार से सजी-धजी हुई, किसी स्वर्ग की अफसरा के समान ही अकस्मात से, भोंडा के समुख प्रकट हो जाती है। रोज़नलो को अकस्मात ही यू अपनी बेचैन दृष्टि के समुख देख कर, उदास भोंडा अत्यधिक उत्साहित हो कर, रोज़नलो का एक प्रेम भरी मुसकान के साथ स्वागत करता है और रोज़नलो भी आगे को बढ़ते हुए भोंडा को अपने नर्म, मुलायम सीने से लगते हुए, उसके व्याकुल ह्रदय को कुछ शांति का अनुभव प्रदान करवाती है। रोज़नलो एवं भोंडा बहुत समय तक, यू ही एक दूसरे को अपने प्रेमभरे आलिंगन में जकड़े हुए, हैरान गंज के उस मशहूर गुलाबी दरिया के घाट पर एक दूसरे से प्रेम जताते रहे।

तदोपरांत रोज़नलो एक प्रेम भरे स्वर से भोंडा को कहती है कि वह उसको बहुत अच्छा लगता है। खास तौर पर उसकी वह बांगी लाठी और वह मिट्टी से लीपा हुआ कटोरा। इतना कहते हुए रोज़नलो, अपने उस प्रेम भरे आलिंगन से, भोंडा को रिहा करते हुए, भोंडा के उस शमशाम की मिट्टी से लिपे हुए, रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे के समीप, अपने इठलाती हुई चाल चलते हुए, पहुच जाती है। एवं बिना एक क्षण भी गवाए, वह उस स्वर्ण कटोरे को उठाते हुए, कहती है ओह! भोंडा तुम भी कितना ना समझ है। देखो तो तुम्हारा यह सुंदर कटोरा, कितना मेला दिखता है, क्या तुम इसे कभी साफ नही करता है! इतना कहते हुए, रोज़नलो अपना रेशनी दुपट्टा, उस रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे पर, आहिस्ता से फेरते हुए, उसे साफ करने लगती है। यह देख कर भोंडा कुछ घबरा जाता है और वह लगभग चीखते हुए, रोज़नलो की ओर बढ़ता है कि नही, नही, रोज़नलो, ऐसा मत करो! परन्तु अब काफ़ी विलम्भ हो चुका था क्यों कि रोज़नलो के उस रेशमी दुपट्टे से, उस रत्न जड़ित सवर्ण कटोरे पर लिपि गई श्मशान की मिट्टी, अब पूर्णतः साफ हो कर दूर हो चुकी है। जिससे अब उस रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे का वह दिव्य स्वरूप, उस चांदनी रात में एक सूर्य की भांति, खिल कर सामने आ गया है।

जिसकी उस दिव्य आभा को, भोंडा अब रोज़नलो की उन मदहोश कर देने वाली, नशीली निग़ाहों में स्पष्ट रूप से देख सकता था। भोंडा की मनोस्थिति को रोज़नलो, तुरन्त ही भांप जाती है और वह उससे अंजान बनते हुए, कहती है कि भोंडा यह कटोरा तो अत्यंत ही अद्भुत और दिव्य लगता है। तुम इस के विषय में हम से छुपाया क्यों? रोज़नलो के उस हसीन गुलाबी अधरों से यह सुनते ही, भोंडा स्वयं को कुछ लज्जित सा महसूस करते हुए, अपने उन श्याम नयनो को रोज़नलो की नशीली शराबी निग़ाहों के समीप लाते हुए, अत्यंत ही प्रेम से कहता है कि ऐसी तो कोई भी बात नही है रोज़नलो। तुम्हें इस विषय में शीघ्र ही मैं सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करने ही वाला था। परन्तु प्रभु की कृप्या देखो, मेरे बताने से पूर्व ही तूमको, इसके विषय में स्वतः ही जानकारी प्राप्त हो गई। यह सुनते ही रोज़नलो, भोंडा को पुनः अपने प्रेम भरे आलिंगन में जकड़ते हुए, कहती है कि ओह! भोंडा तुम हम को कितना प्यार करता है। अब हम तुमारे बिना एक क्षण भी जीवित नही बचने पाएगा। हम अभी तुम्हारे साथ विवाह को सम्पन करेगा भोंडा। यह सुनते ही भोंडा कुछ अत्यधिक उतेजना से कंपकपाने लगता है और वह कुछ कह पाता इससे पूर्व ही भोंडा के उन कंपकपाते हुए, सूखे अधरों पर रोज़नलो अपने गुलाब की पँखडियो के समान रसीले, कंपकपाते हुए अधरों को रख देती है। रोज़नलो और भोंडा न जाने कितने समय तक, उस चांदनी रात्रि में उसी प्रकार से, हैरान गंज के उस मशहूर ग़ुलाबी दरिया के घाट पर, एक दूसरे को अपने प्रेम भरे आलिंगन में जकड़े हुए, अपने अधरों से एक दूसरे के अधरों को मिलाए, प्रेम से चूमते रहे।

तदोपरांत रोज़नलो, भोंडा के उन श्याम नयनो में, अपनी नशीले निग़ाहों से देखते हुए, अत्यंत ही गम्भीरता से कुछ कहती है कि भोंडा! तुम को यह इतना सुंदर कटोरा, कहा से प्राप्त हुआ है? क्या तुम हमको बताएगा! तब भोंडा अत्यधिक भावुकता से रोज़नलो के हसीन मख़मली सुनहरे बदन को, अपनी मजबूत भुजाओं में, उसी प्रकार से थामे हुए, रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे का सम्पूर्ण किस्सा, रोज़नलो के समक्ष जाहिर कर देता है। भोंडा से उस रत्न जड़ित सवर्ण कटोरे की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के उपरांत, रोज़नलो अत्यधिक सहानुभूति और अपनापन दिखाते हुए, भोंडा से कहती है कि भोंडा हमारी आँखों में देखो और हमारी बात को बहुत ही ध्यान से सुनना, हम को तुम्हारा बहुत ही चिंता होती है। रोज़नलो कि उन हसीन गुलाबी लबों से, अपने लिए सहानुभूति और अपनेपन के स्वरों को सुन कर, भोंडा अत्यंत ही भावुक हो जाता है और वह भी कुछ भावुकता भरे स्वर से कहता है कि कहो रोज़नलो क्या बात है! तुम निसंकोच अपने ह्रदय के एहसासो को मुझ से कह सकती हो। तुम्हे किस बात की चिंता सताए जा रही है! कह दो रोज़नलो। भोंडा के इस प्रकार से प्रेमपूर्वक आग्रह करने पर, रोज़नलो कुछ गम्भीर स्वरों के साथ, पुनः कुछ कहती है कि भोंडा हम तुम से बहुत प्यार करता है। कुछ क्षण मौन रहने के उपरांत वह पुनः भोंडा से कहती है कि जब से हम तुमारे देश हैरान गंज में आया है! तुम्हारा जैसा सुंदर, संस्कारी और ह्रष्टपुष्ट नवयुवक, हमने अभी तक नही देखा है। ईष्वर साक्षी है कि अब हम दोनों प्रेम आलिंगन द्वारा शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक रूप से एक हो चुके है भोंडा। इसीलिए हम तुम को कहता है कि हम को तुम्हारा बहुत चिंता होता है। यदि कोई इस मूल्यवान स्वर्ण के कटोरे को, तुम्हारे पास से चुरा लिया या तुम्हारे उज्वल व्यक्तिव पर, इस मूल्यवान सवर्ण के कटोरा को चोरी करने का इल्जाम लगा कर, तुम को कैद करवा दिया। तो हमारा क्या होगा भोंडा! हम सत्य कहता है भोंडा, हम मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। नही, नही, हम ऐसा नही होने देगा भोंडा। तुम अभी इस स्वर्ण के कटोरा को हमे दे दो और हम इसको अपना मजबूत तिजोरी में सुरक्षित रख देगा। तुम समझ रहा है ना भोंडा! हम तुम से क्या कह रहा है। हम तुम से कल इसी समय यही मिलने के लिए आएगा और उसी समय हम तुम्हारे साथ, विवाह भी सम्पन करेगा भोंडा। इतना कह कर रोज़नलो भोंडा के सूखे अधरों पर अपने गुलाबी मुलायम अधरों को रख कर, एक प्रेम भरा चुम्बन कर देती है। भोंडा भी आगे को बढ़ते हुए, रोज़नलो के हसीन नक्कासीदार गठीले बदन को, अपनी मजबूत भुजाओं में जकड़ लेता है और अत्यधिक भावुकता से उस रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे को, सहज ही रोज़नलो के सपुर्द्ध कर देता है।

इस प्रकार से रोज़नलो के प्रेम भरा आलिंगन, मनमोहक क़ातिल अदाओं और अपनेपन से परिपूर्ण स्वरों को सुनकर, भोंडा को उस पर पूर्णतः विशवास हो जाता है कि कल वह उससे मिलने के लिए, अवश्य ही आएगी और जैसा कि उसने कहा है कि वह कल ही उसके साथ, विवाह भी सम्पन करेगी। रोज़नलो का अपने प्रति अपनेपन की भवनाओं से प्रभाविक होकर, भोंडा उसके सुरक्षित हाथों में, अपना रत्न जड़ित सवर्ण कटोरे को सपुर्द्ध कर, अपने झोंपड़े पर लौट आता है। आज की रात्रि भोंडा को अत्यधिक रोमांच से भरी हुई ज्ञात हो रही है और वह निरन्तर अपने झोपड़े से बाहर निकल कर, उस निर्मल चाँदनी रात में, उस पुर्णिमा के पूर्ण चाँद को देख कर, एक प्रेमी कवि के समान ही, अपनी प्रेमिका की आकृति को, उसमे बनाए और मिटाए जा रहा है। इस प्रकार से भोंडा सम्पूर्ण रात्रि, खुले आसमां में अपनी प्रेमिका रोज़नलो को याद करते हुए, पूर्णिमा के पूर्ण चाँद के साथ, अटखेलियां करता रहा। भोंडा की ऐसी दीवानगी से भरी मनोस्थिति देख कर, आपके अपने कवि एवं लेखक मित्र विक्रांत राजलीवाल जी ने क्या खूब लिखा है कि “चाँद रात में चाँद देखने जो गए, चाँद की कसम चांदनी की कसम, चाँद तो दिखा नही, चांदनी में ही हम जो कसका गए।” फिर ना जाने कब भोंडा को निंद्रा आ जाती है! उसको इस का एहसास भी ना हो पाया।

प्रत्येक दिन तड़के तलक, प्रातः कालीन सूर्य के उगने से पूर्व ही, जो भोंडा अपनी निंद्रा त्याग कर, खटिया से उठ कर बैठ जाता था। आज वह दोपहर तक, रोज़नलो के प्रेम भरे स्वप्न देखते हुए, गहरी निंद्रा की गिरफ्त में सोता रहा। फिर अचानक से उसकी निंद्रा टूटती है और वह हड़बड़ाहट से रोज़नलो का नाम पुकारते हुए, उठ बेठता है। उधर सम्पूर्ण हैरान गंज में राज शाही जलसे की चकाचौंध कर देनी वाली रौनक और चहल पहल, आज अपने चरम सीमा तक पहुच गई थी। ऐसा हो भी क्यों ना! आज राज शाही जलसे का अंतिम दिवस जो था। ईधर अपने झोंपड़े में अर्धचेतन भोंडा, अभी कुछ समझ पाता इससे पूर्व ही उसका एकमात्र मित्र बिरजू पनवाड़ी जिसे भोंडा कभी कभी भावुक होते हुए काका कह कर भी सम्बोधित कर देता था, भोंडा की झोपड़ी के बाहर पहुँचकर उसको आवाज़ लगाते हुए, उसको पुकारता है कि भोंडा, अरे कहा हो भाई! आज दिखे ही नही। कुछ क्षण रुकने के उपरांत वह पुनः आवाज़ लगते हुए कि भोंडा! कहा हो भाई भोंडा। इस प्रकार से अकस्मात ही अपने एकलौते मित्र बिरजू पनवाड़ी की आवाज़ सुन कर, भोंडा को कुछ आशचर्य होता है और वह अपने झोपड़े के भीतर से ही, बिरजू को प्रतिउत्तर देते हुए कहता है कि हा भाई बिरजू! मैं भीतर ही हु आ जाओ। इतना सुनते ही बिरजू पनवाड़ी, भोंडा के झोपड़े के भीतर, प्रवेश कर जाता है और झोंपड़े के भीतर प्रवेश करते हुए, वह कुछ नाराजगी के स्वरों के साथ, कहता है कि भोंडा भाई, आज तुम दिखे ही नही। क्या अभी तक निंद्रा में ही मगन थे! देखो बाहर सांझ होने को आई है और तुम राज शाही जलसे के अंतिम दिन इस प्रकार से कैसे निंद्रा में चूर हो सकते हो? चलो आज भव्य जलसे में हम दोनों एक साथ बहुत धूम मचाएंगे। बिरजू के मुख से यह सुनते ही, भोंडा दौड़ कर अपने झोपड़े से बाहर निकल कर, ऊपर आसमान की ओर देखता है। जहा सूर्य में अभी भी कुछ चमक शेष थी। जिससे भोंडा को एहसास होता है कि सत्य ही आज वह अत्यधिक समय तक, निंद्रा में चूर होकर सोता रहा है। अकस्मात ही उसको, रोज़नलो से अपनी, आज सांझ को होने वाली भेंट का एहसास हो आता है और वह हड़बड़ाहट पूर्वक बिरजू से कहता है कि बिरजू भाई, तुम जाओ और राज शाही के भव्य शाही जलसे के अंतिम दिन का, भरपुर आनन्द प्राप्त करो। मुझ को आज अत्यंत ही आवश्यक कार्य से, कही ओर किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति से, भेंट करने को जाना है।

इस प्रकार से बिरजू को अलविदा करने के उपरांत नवयुक भोंडा शीघ्र ही स्नानादि कर के एक नई चमकदार पोषक को पहन कर अपने एक हाथ में अपने मृत पिता हरिहर की बांगी लाठी को थामे हुए जैसे ही अपने रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरे को उठाने के लिए झुकता है तो भोंडा उसको वहा से नदारत पाता है फिर अकस्मात ही उसको स्मरण होता है कि वह रत्न जड़ित स्वर्ण कटोरा तो रोज़नलो ने अपने पास सुरक्षित रखने हेतु कल उससे ले लिया था। तभी भोंडा बिना एक क्षण भी व्यर्थ किए, अपने पैरों में एक जुड़ी नवीन जूतियां पहन कर, रोज़नलो से भेंट करने हेतु, अपने झोपड़े से बाहर की ओर परस्थान कर, हैरान गंज के शाही जलसे की भव्य रौनक से चकाचोंध सड़को से होते हुए, हैरान गंज के मशहूर गुलाबी दरिया की ओर चल पड़ता है। कुछ ही क्षणों के उपरांत भोंडा अपने एक हाथ में हैरान गंज का मशहूर शाही ग़ुलाब जिसको उसने भव्य जलसे से गुजरने के दौरान एक पुष्पों की दुकान से नकद हैरान गंजी 3 टके के मोल पर खरीदा था को थामे हुए गुलाबी दरिया के घाट पर आहिस्ता आहिस्ता से टहलते हुए, रोज़नलो का इंतजार कर रहा है। हर गुजरते लम्हे से भोंडा के दिल की धडकती धड़कने तेज़ और तेज़, बहुत तेज़ धड़कने लगती है। इस प्रकार से भोंडा लगभग समुपर्ण रात्रि घाट पर अपनी प्रेमिका रोज़नलो का इंतज़ार करता रहा और अब आसमां में केवल सुबह का तारा टिमटिमाते हुए शेष रह गया है और भोंडा अब भी रोज़नलो का इंतज़ार कर रहा है। परन्तु सब व्यर्थ है क्योंकि रोज़नलो नही आती और अचानक ही भोंडा की वह बेचैनी एक अज़ीब से दीवानेपन में परिवर्तित हो जाती है और वह ना चाहते हुए भी स्वयं को विशवास नही दिला पा रहा है कि रोज़नलो नही आई। फिर अचानक ही भोंडा एक ज़ोरदार चीख के साथ रोज़नलो का नाम पुकारता है कि “रोज़नलो” और अत्यंत ही दुखद अवस्था मे अपने घुटने के बल बैठ कर रोने लगता है। भोंडा के इस प्रकार से विलाप करते हुए उसके हाथों में उस शाही गुलाब के टुकड़े, टुकड़े हो कर, उसकी सुर्ख ग़ुलाबी पंखुड़ियां हैरान गंज की उस मशहूर ग़ुलाबी दरिया के घाट पर बिखर जाते है।

उसी समय भोंडा का एकलौता मित्र बिरजू पनवाड़ी वहाँ उपस्थित हो जाता है और वह भोंडा को किसी प्रकार से संभालने का प्रयत्न करता है। परन्तु भोंडा अब भी रोते हुए केवल रोज़नलो का नाम दोहराए जा रहा था कि “रोज़नलो, रोज़नलो तुम कहाँ हो तुम रोज़नलो।” तब बिरजू उसको बताता है कि वह विदेशी कलाकार तो कब के हैरान गंज से परस्थान कर चुके है यदि मुझ को पहले पता होता कि तुम आज यहाँ दरिया के घाट पर उस विदेशी हसीना रोज़नलो से भेंट करने की बात कह रहे हो, तो यकीन मानो मैं तुम्हे उसी समय सूचित कर देता कि वह तो कब की अपने डेरे के साथ, हैरान गंज से परस्थान कर चुकी है। बिरजू के मुँह से ऐसे कठोर वचन सुन कर भोंडा का ह्रदय उसकी धडकती हर ध्वनियों से चिर सा जाता है और वह अत्यधिक क्रोधिक होते हुए बिरजू का गला पकड़ लेता है। उसी क्रोध की अवस्था मे वह बिरजू से कहता है कि बिरजू ईष्वर के लिए ख़ामोश हो जाओ, अन्यथा आज मैं तुम्हे जान से मार दूंगा। तुम्हारी इतनी हिम्मत की तुम मेरी रोज़नलो के लिए ऐसी बेवफ़ाई से भरी घिनोनी बात कहो और इसी क्रोध में भोंडा बिरजू को एक चमाट जड़ देता है। परन्तु बिरजू जो कि भोंडा का एक मात्र घनिष्ट मित्र होने के नाते अब भी अत्यंत शांत नज़र आ रहा था। अब वह भी भावुक होते हुए एक अत्यंत ही भावुक स्वर के साथ भोंडा से पुनः अपनी बात को दोहराता है कि भोंडा शांत हो जाओ भाई। मैं तुम से असत्य क्यों कहूँगा। मेरा विशवास करो भोंडा मैं सत्य कह रहा हु। बिरजू के इस प्रकार के वचन सुन कर भोंडा अब कुछ और अधिक भावुक अवस्था को प्राप्त हो जाता है और बिरजू को एक ओर को धकेल कर दीवानों की भाँति “रोज़नलो, रोज़नलो” पुकारता हुआ राज शाही के शाही बाड़े यानी कि मेहमानखाने की ओर दौड़ने लगता है। इस समय सम्पूर्ण हैरान गंज में राज शाही जलसे के समयावधि समाप्त हो चुकी थी। इसीलिए हर और भोंडा को केवल बुझे हुए चिराग़ और राख से ढके हुए सुलगते अंगार ही दिख रहे थे और वह उसी विकृत मनोस्थिति के साथ दीवानों के भांति दौड़ता जा रहा है। तेज़, और तेज़ बहुत तेज़! बस दौड़ता ही जा रहा है। कुछ ही क्षणों के उपरांत भोंडा अब राज शाही के शाही बाड़े के उस भव्य द्वार (मेहमानखाने के प्रवेश द्वार) तक पहुच जाता है।

जहा उसको राज शाही के शाही मेहमानखाने के प्रवेश द्वार पर तैनात एक शाही दरबान रोक देता है और भोंडा को एक लताड़ लगाते हुए कहता है कि अरे ठहरो! इस प्रकार से दौड़ते हुए किधर जा रहा है। तब भोंडा उस शाही दरबान से कहता है कि “रोज़नलो मुझ को रोज़नलो से भेंट करनी है कृपया तुम रोज़नलो को बता दु की तुम्हारा भोंडा आया है। रोज़नलो तुम कहाँ हु।” भोंडा को इस प्रकार से रोते और बिलखते हुए देख कर वह शाही दरबान भोंडा से कहता है कि कौन रोज़नलो! कहि तुम उन शाही दरबार की बेहद हसीन नृत्यांगनाओ के विषय में तो बात नही कर रहे हो। उस राज शाही के शाही मेहमानखाने के द्वार पर तैनात उस शाही दरबान के मुख से यह सुनते ही भोंडा कुछ उत्साहित होते हुए कहता है कि हा, हा भाई मैं उनके ही विषय में बात कर रहा हु। कहा है मेरी रोज़नलो! तुम मेरी रोज़नलो को बुलाओ ना, वह कहा है कुछ तो बताओ? भोंडा की दीवानों के भांति ऐसी विकृत मनोस्थिति देख कर, उस शाही दरबान को कुछ दुःख होता है और वह भोंडा के उन झुकें हुए कंधों पर अपना सहानुभूति से भरा हाथ रख कर उससे कुछ कहता है कि भाई तुम तो अभी नवयुवक हो फिर तुम कैसे उन क़ाफ़िर हसीनाओं के मकड़जाल में फंस गए। उन्हें यहाँ से परस्थान किए हुए अब पूरे आठ पहर गुज़रने को है। (लगभग एक सम्पूर्ण दिन) और तुम अब भी उन्हें किसी दिवाने की भांति पुकार रहे हो। जाओ भाई अपने घर को जाओ, भला ये क़ाफ़िर हसीनाएं किसी की हुई है! उस राज शाही दरबान के मुख से यह सब हालात जानकर भोंडा को अब विशवास होने लगता है कि रोज़नलो अब हैरान गंज से ही नही, अपितु उसके जीवन से भी परस्थान कर चुकी है।

रोज़नलो की हक़ीक़त को जान कर भोंडा अत्यधिक दुखी होते हुए टूट सा जाता है और अचानक ही वह अपने बहते हुए अश्रुओं को पोछते हुए, उस अज़ीब सी विकृत मनोस्थिति के साथ ही अपने झोपड़े पर लौट आता है। उसी समय प्रातः कालीन सूर्य उगते हुए अपनी सुनहरी आभा को हर दिशा में बिखेरना प्रारम्भ कर देता है और भोंडा समीप

के घड़े से एक हांडी जल निकालने के लिए उसमे हांडी को जैसे ही घूमता है तो उसको ज्ञात होता है कि घड़ा आज बिल्कुल रिक्त है। तब भोंडा अपने मृत पिता की उस बांगी लाठी को उठा कर, उस अजीबोगरीब विकृत सी मनोस्थिति के साथ ही अपने झोपड़े से बाहर की ओर प्रस्थान कर जाता है।

कुछ क्षणों के उपरांत भोंडा समीप के उसी शमशाम के मैदान में ठीक उसी स्थान पर एक अजीबोग़रीब विकृत सी मनोस्थिति के साथ खड़ा हुआ है! जहा उसके मृत पिता हरिहर का अंतिम संस्कार सम्पन्न हुआ था। अचानक ही भोंडा ज़ोर ज़ोर से चीखते हुए अपने मृत पिता के अंतिम संस्कार वाले स्थान पर, उनकी उस बांगी लाठी से खुदाई करना प्रारंभ कर देता है और वह अब भी उसी प्रकार से एक अजीबोगरीब विकृत मनोस्थिति के साथ रोता हुआ चीखता जा रहा है। कुछ ही क्षणों की खुदाई के उपरांत वह अपने हाथों को रोक देता है। इसके साथ ही उसका चीखना भी बंद हो जाता है। भोंडा अब अपने दोनों हाथों से उस खुदाई वाले स्थान पर कुछ टटोलने लगता है और अचानक ही उसके हाथ किसी वस्तु से टकरा कर रुक जाते है। और वह बहुत ही आहिस्ता से उस वस्तु को अपने दोनों हाथो से उठाते हुए अपने चेहरे के समीप ला कर देखता है। फिर अचानक ही एक अत्यंत जोरदार चीख उसके मुंह से निकलती है कि “बाबा” तुम कहा हु बाबा! ये दुनिया अच्छी नही है बाबा। इतना कहते हुए भोंडा पुनः जोर जोर से रोते हुए, चीखने लगता है। और उसके मुंह से निरन्तर यही स्वर निकल रहे थे कि “बाबा” वापस आ जाओ बाबा। ये दुनिया अच्छी नही है। ये दुनिया अच्छी नही है हा बाबा! ये दुनियां अच्छी नही…हैं।

आज भोंडा हक़ीक़त में भावनात्मक रूप से टूट कर अंदर ही अंदर, खंड, खंड होते हुए बिखर चुका था। और इसके साथ ही इस निष्ठुर संसार के एक और कटु सत्य से उसका अत्यंत ही समीप से एक परिचय हुआ था। जिसे अक्सर हम “बेवाफ़ाई” कहते है।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

प्रथम प्रकाशन की तारीख 2 आकटुबर, वर्ष 2019 एवं समय 10:20 pm (सांझा कीजिए)

💏 मासूम मोहब्ब्त। (चौथी दर्दभरी दास्ताँ)

नमस्कार प्रिय पाठकों एवं मित्रों, आपके अपने मित्र विक्रांत राजलीवाल (स्वयं) जी के द्वारा लिखित उनकी दर्दभरी नज़म दास्ताँ “मासूम मोहब्ब्त।” का रचना कार्य उन्होंने वर्ष 2015-16 में अपनी प्रकाशित अत्यधिक संवेदनशील काव्य पुस्तक “एहसास” एवं अपनी पूर्व प्रकाशित दास्तानों के साथ ही किया था।

“मासूम मोहब्ब्त।” मेरे (विक्रांत राजलीवाल) द्वारा लिखित अब तक कि मेरी समस्त नज़म दस्तानों में से अंतिम दर्दभरी नज़म दास्ताँ है एवं “मासूम मोहब्ब्त।” मेरे ह्रदय में अपना एक ख़ास स्थान रखती है। उम्मीद है आपको मेरी यह दर्दभरी दास्ताँ पसन्द आ आए।

आपका मित्र विक्रांत राजलीवाल।

💏 मासूम मोहब्ब्त। (चौथी दास्ताँ।)

दर्द ए दिल को दे कोई जमीं फिर अपने दिवाने।

ये महकता गुलिस्तां, ये खुला आसमां, ये सारा जहां है तेरा दीवाने।।

दीदार ए सनम जो अधूरी हर मुलाक़ात है उनसे दीवाने।

ये ख़्वाब ए मोहब्ब्त, ये प्यासी सांसे, ये धड़कता दिल है तेरा दीवाने।।

दर्द ए दिल ये दर्द ए मोहब्ब्त अब कम ना हो पाएगी।

हर मोड़ जिंदगी मोहब्ब्त की एक नई दास्ताँ अब दोहराएगी।।

दौड़ रही है श्याही जो बन के लहू बदन में रग-रग के जो तेरे।

हर दर्द ए दिल बन कर मोहब्ब्त जल्द ही जो बरस जाएगा, तन्हा पन्नों पर जिंदगी के जो तेरे।।

रह गई मोहब्ब्त की जो अधूरी तेरी दास्ताँ, दीवाना कोई फिर से उसे जरूर दोहराएगा।

दे देगा शायद अंजाम उसे वो आखरी, दर्द ए दिल दिवाने का शायद फिर फ़ना हो जाएगा।।

तन्हा काली रातों में इत्तफाक से जो आ जाए कभी हसीन ख़्वाब।

आ जाती है तड़पाने दिल वो मेरा, बन कर सुर्ख ग़ुलाबी महकता कोई ख़्वाब।।

एक नही ऐसा कई बार हुआ है।

धड़कते दिल पर जब वार हुस्न का हुआ है।।

बंजर जमीं पर अरमानों की खिलता है जब भी कोई ग़ुलाब।

बन कर सितमगर अपना ही फेक देता है तब वहाँ कोई तेज़ाब।।

बन कर वहाँ कोई साया काला, खिलती मोहब्ब्त का दम घोट देता है।

मार कर ख़ूनी ख़ंजर हर चाल मोहब्ब्त पर वो, बगिया मोहब्ब्त की महकने से पहले ही उजाड़ देता है।।

कभी कभी कुछ अपने भी सितमगर का काम करते है।

जिंदा मौत मोहब्ब्त को दे देने की एक जिंदा मिसाल बनते है।।

हैरान है अब भी दीवाना बेहिंतिया, सब कुछ कैसे वो भांप लेते है।

वो वक़्त, वो हसीन समा, वो मिजाज़ ए मौसम क्या वो नाप लेते है।।

आकर के बीच मे दीवानों के क्यों दीवानों को मार देते है।

मोहब्ब्त की पहली मुलाक़ात को कैसे एक आख़री अंजाम देते है।।

पहली मुलाक़ात को क्यों आख़री बना जाते है।

हसीन उन पलों में कोई हड्डी हलक में अटका जाते है।।

सही करते है या ग़लत वो लोग ये वो ही जानते है।

दम तोड़ती मोहब्ब्त की उस पल मिसाल जहनुम की बनते है।।

जानता नही ये कोई, तड़पा है मोहब्ब्त में दीवाना जो उनकी पल पल।

मिलता है दीदार उनका नसीब से, जला है दीवाना उनके लिए हर पल।।

“एक पल वो हर पल याद आता है।
वो मासूम एहसास, वो मासूम ख्याल,
आज भी बहुत सताता है।”

हम दोनों के उस हालात पर खुद मोहब्ब्त भी रोई थी।

फट गया था कलेजा आसमां का भी, धड़कती धड़कने हमारी जब खोई थी।।

बेदर्द ज़माने को आता नही रहम मोहब्ब्त के दीवानों पर।

हर चाल जो क़ामयाब बेदर्द सी उनकी, नाज है बहुत उन्हें इस बात पर।।

बेदर्द जिंदगी में दिवाने की नसीब से मुलाकाते कुछ हूरों से आई थी।

ऐसा लगा उस लम्हा दीवानों को जैसे बंजर रेगिस्तान में कोई हसीन बाहार आई थी।।

यक़ीन अब भी नही की कैसे मोहब्ब्त अंजाने ही महरबान हो सकती है।

हुस्न ए शबाब वो नादानियां उनकी, कैसे अंजाने ही हसीन कोई सौगात मिल सकती है।।

याद है तक़दीर का आज भी अपनी हर एक वो वाक्या।

हर जीत को हार में बदलते देखने का बेदर्द हर एक वो वाक्या।।

एक नही ऐसा हुआ है कई बार, जीते जी जब मार गया हमे हर एक वो वाक्या।

दिखा कर चाँद हथेली पर कर दिया मज़बूर इस क़दर से की लूट कर ले गया मुझे हर एक वो वाक्या।।

आते है हालात जिंदगी में ऐसे कभी कभी, हो जाता है फ़ना ख़ुद ही जब मोहब्ब्त का वाक्या।

दे कर दर्द ए मोहब्ब्त अधूरा सा कोई, छोड़ जाता है तड़पता जब मोहब्ब्त का वाक्या।।

जख़्मी है दिल मेरा उन अधूरी मुलाकातों से आज तलक।

तन्हा है जिंदगी मेरी उन अधूरे एहसासों से आज तलक।।

मोहब्ब्त जब खुद मोहब्ब्त का इज़हार करने वाली थी।

मोहब्ब्त जब ख़ुद इश्क से मिलने वाली थी।।

फिर क्यों दे कर प्याला जहर का कोई अपना ही हमे, जुदा कर जाता है।

कर के क़त्ल उस मोहब्ब्त की पहली मुलाक़ात का, किसी पँछी की तरह वही पर मंडराता है।।

देख कर साया सितमगर का, वो हुस्न भी घबराता है।

दिल की बात दिल मे दबाए, क़त्ल हर अरमानो का कर वो कहि खो जाता है।।

वो दिलकश खुशनुमा मौसम वो हसीन पल फिर लौट कर ना आए।

खड़ा है दीवाना अब भी वही राह पर, वो हुस्न वाले फिर लौट कर ना आए।।

हक़ीक़त है ज़माने में मिलता है नसीब से किसी हूर का प्यार।

रहता है ज़माने में हर किसी को उनका हमेशा से हमेशा ही इंतज़ार।।

वो चाह, वो जनून दिवाने में भी जाग जाता है।

होता है दीदार जब किसी हूर का तो दिल धड़क जाता है।।

दिल ये पाक-साफ है दिवाने का, शायद कुछ परेशान है।

हर बार की अधूरी उन मुलाकातों से शायद कुछ हैरान है।।

हुआ है एहसास कई बार की दोनों जहां अब पा जाएंगे।

लो वह वक़्त भी आ गया, दीवाना जब मोहब्ब्त को जान जाएंगे।।

हैरान है दीवाना क्यों अंजाम तक नही वो पहुच पाता।

हर बार भरी महफ़िल में कैसे खुद को तन्हा ही है वो पाता।।

वो ज़ालिम सितमगर मोहब्ब्त के क्यों एहसास ए मोहब्ब्त को समझ नही पाते।

ये हसीन लम्हे, ये धड़कते एहसास, जिंदगी में मोहब्ब्त के फुर्सत से ही नसीब होते।।

एक नही ऐसा हुआ है दिवाने कई बार।

कई हूरो को जब एकदम से हुआ है दिवाने से जब प्यार।।

नसीब से होती है मोहब्ब्त ख़ुद मोहब्ब्त पर ए दिवाने महरबान।

हार जाती है दिल दिवाने पर अपना, हूर जब सरेराह कोई,

लुटाती है कदमो पर दिवाने के अपने फिर वो अपनी जान।।

कोई हसीना जब अचानक ही महरबान हो जाती है।

दिखा कर आईना ए मोहब्ब्त निग़ाहों से मदहोश, दिल को थाम लेती है।।

बुला लेती है खुद ही दिवाने को वो अपने करीब।

चाहती है देना मोहब्ब्त की सौगात, बैठा कर वो अपने करीब।।

देखा जो नशीली निग़ाहों में उनकी अजीब सा उनमे एक नशा था।

देख तो रही थी वो नज़रो से दर्द मग़र दिल मे दिवाने के हो रहा था।

एक दम से अज़ीब से जो हालात हो गए।

देख साया एक अजनबी नज़दीक हमारे, वो ख़ामोश हो गए।।

एहसास ए दीवाना खामोशी से अपनी उन्हें कोई इक़रार हो गया।

ऐसा क्यों लगा कि उनको दिवाने से प्यार हो गया।।

कोई कांटा आकर के सीधा धड़कते दिल पर हमेशा पहली मुलाक़ात में क्यों चुभ जाता है।

होना था इक़रार ए मोहब्ब्त उनसे और दीवाना उनका जुदा उनसे हो जाता है।।

जाना है दर्द ए जुदाई को दिवाने ने दिल के करीब से जो बेहिंतिया।

मिलती है वीरान जिंदगी को जीवन कोई ओस बून्द नसीब से जो बेहिंतिया।।

झलक अधूरे अपने प्यार की ना जाने क्यों दे कर एक, हर बार किसी मोड़ पर हुस्न कहि खो जाता है।

क्या ऐसा तो नही ख़ौफ़ किसी साए का उन्हें लेकर दूर हमसे जुदा कर जाता है।।

तड़पता है दीवाना हालात उन पहली हसीन मुलाकातों से, मोहब्ब्त हुई थी हर बार महरबान, फिर क्यों है तन्हा आज भी दीवाना।

नादां है दीवाना आज भी क्यों हो जाता है परेशान, मोहब्ब्त की उन पहली अधूरी मुलाकातों का जान अंजाम ए दिवाने जो ये दीवाना।।

याद है हर एक मुलाकात दिवाने को आज भी…

हा याद है दिवाने को मुलाक़ात एक हुस्न से अपने शबाब पर थी जो उनसे पहली।

हा याद है दिवाने को मोहब्ब्त ख़ुद ही जब अपने अंजाम पर थी जो उनसे पहली।।

बदनसीबी छा जाते है वो बादल काले।

कर के जुदा उनसे एक पल में दूर कहि,

छोड़ आते है हमे वो बादल काले।।

कैसे क़ातिल हसीं उन हूरों से दिवाने की यू ही मुलाक़ात हुई।

पहली ही मुलाक़ात में उनसे मोहब्ब्त की कुछ तो बात हुई।।

जान कर हर बार उन हसीनाओं से दिवाने की जो नज़रे चार हुई।

चाल क़ातिलाना जो दिल के हाथों दिवाने से अपने वो लाचार हुई।।

ये मसला है हुस्न से हूर के उन हसीं मुलाकातों का जो पहली।

ये मसला है हुस्न और इश्क के उस इम्तेहां का जो एक पहेली।।

मसला ये हुस्न और इश्क का जो अभी शुरू ही हुआ था।

सितम ये धडकती धड़कनो पर कहर जो अभी शुरू ही हुआ था।।

हुस्न और इश्क की पहली है वो मुलाक़ात।

चल रहे है तीर ए मोहब्ब्त नज़रो से उनकी मदहोश,

दिल के जो आर पार।।

यक़ीन ए दीवाना, अंजाम ए मोहब्ब्त वो अंजाम अपना आज पा जाएगा।

महरबान है खुद जो मोहब्ब्त, दरिया ए मोहब्ब्त के पार दीवाना, किश्ती मोहब्ब्त की अपनी आज ले जाएगा।।

सितम ए मोहब्ब्त हर बार दिल पर फ़ांस सी कोई चुभ जाती है।

हो जाते है जुदा हर बार दिवाने, कोई अटकान सी बीच मे आ जाती है।।

करते हुए याद दीवाना नाम ए मोहब्ब्त नाम से उनके फिर उन्हें पुकारता है वो।

पर्दा है महीन सा शराफ़त जो एक उनकी, पार उसके आती नही फिर से जो वो।।

गुजर जाए जो घटा मोहब्ब्त से भरी जो, नही लौटती जिंदगी में दोबारा फिर से वो।

चिर दे चाहे दिल या बहादे आँसू फिर दीवाना, मिलती नही मुलाक़ात पहली उनसे फिर वो।।

चाहें कोई प्यार से दिवाने को फिर कभी ना देख पाया हो।

समझता उसे कोई फिर चाहें मोहब्ब्त का साया काला हो।।

हक़ीक़त ये जिंदगी रुक नही सकती किसी हसीना की अधूरी मुलाक़ात में उस अधूरे से प्यार में उसके एक इंतज़ार में।

सितम ये जिंदगी कट नही सकती बेमतलब किसी के इंतज़ार में जो उसकी मोहब्ब्त के उस अधूरे से एक इक़रार में।।

दर्द ए दिल जो दफ़न है धड़कते सीने में, ढूंढता है दीवाना नया फिर कोई मोहब्ब्त का अपने वो एक आसमां।

वीरान ये जिंदगी, तन्हा है एक दीवाने की जो, ढूंढ़ लेगी जल्द ही नया फिर कोई मोहब्ब्त का वो एक गुलिस्तां।।

रखना महफूज़ ख़ुशबू हर अधूरी मुलाकातों के अधूरे अरमानो की अब भी जो महकती।

यक़ीन रख दिखेगा जल्द ही कोई हसीन चाँद, लुटाएगा तुझ पर चाँदनी जो अपनी जान।।

ना हो मायूस ए दिल ए दिवाने, धड़कते दिल मे धड़कने है बहुत जिंदगी में धडकती जो बाकी।

ज़रा देख उठा कर नज़रे अपनी, बगिया मोहब्ब्त में है बहुत महकते गुलाब अब भी जो बाकी।।

ना हो हताश और उदास ए यार दिवाने, ज़माने में है अभी कई और मुकाम तेरे अब भी जो बाकी।

हक़ीक़त है अधूरा हर मुक़ाम बिन मोहब्ब्त के, हर मुकाम है बेमाना सा ए दिवाने, बिन मोहब्ब्त के ज़माने में है जितने अब भी जो बाकी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
19/09/2019 at 9:50 pm