भय मुक्त क्रोना से। / Bhay Mukt Crona Se / #FacebookLive #YouTubeVideo.

#FacebookLive Video

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=202197651083157&id=204032090116708?sfnsn=wiwspmo&extid=KQy2lbx9Ujqi0b7Q&d=n&vh=e

#YouTubeVideo

भय मुक्त क्रोना से। /Bhay Mukt Crona Se.
Advertisements

भय मुक्त क्रोना से। (विक्रांत राजलीवाल)

आओ करे पालन हम लॉक डाउन का, मात दे संक्रमण क्रोना को, पाए जीवन स्वास्थ्य हम अपना, पालन सावधानियों का हम करे।

धोएं हाथ बारम्बार हम अपने, स्वास्थ्य रहे, मस्त रहे, फहराए विजय पताका हम क्रोना पर, योग-ध्यान-प्राणायाम करें।।

स्टेटस क्रोना देख कर ना घबराना, दृढ़ संकल्प, स्वास्थ्य दिनचर्या से जीवन मे अपने आगे हमेशा बढ़ते जाना।

याद रहे देव भूमि भारत के है हम वासी, संस्कारी व्यक्तित्व, अनुशासित दिनचर्या से, मिलकर हमे क्रोना को हराना।।

जीत जाएंगे मार संक्रमण हम क्रोना, शंख-घण्टिया बजा-बजाकर, सात्विक वातावरण करें हम उतपन।

जोश-उमंग जीवन से अपने मिटने ना पाए, हरा क्रोना को हम स्वछता से आगे को बढ़ते जाए, नित्य दिन प्रतिदन।।

हौसला ना टूटने पाए, आस-पास, हम साथ साथ, करे सतर्क एक दूजे को, मिलकर संक्रमण से क्रोना के हमे लड़ना है।

लोकतंत्र के रक्षकों पर हो विशवास, जमखोरी-मारामारी, भय के वातावरण से हमे बचना है।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

26/3/2020 समय प्रातः 8:21 बजे।

🌹 शायरी। (विक्रांत राजलीवाल की कलम से।)

💔 ना जिन्हें दिन को है सकूँ साँसों में; ना रातों को है आराम।

हम है वो जो रहते है हर लम्हा लेकर धधकती धड़कनों में सुलगता एक  अंगार।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

🌹 टूटा गुलाब, बिखुड़ी जो पंखुड़ियां; हर जख्म महोब्बत के नासूर हो गए।
याद में एक सितमगर कि ए दोस्त; हम जीते जी ही जो फ़ना हो गए।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

💗
हम तुम्हें ना पा सकें और तुम हर बार हमारे मासूम एहसासों का कत्ल करते गए।

नही एतबार अब हमें ख़ुद के एहसासों पर शायद, फक्त यकीं एहसासों पर तुम्हारे हम जो करते गए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

🌹  दर्द ए दिल की अपने कोई दवा अभी तक जो मुझे मिली नही।

हर जख्म फट गए मेरे बेअसर हर मरहम को कर के खुद ही।।

टूट कर मासूम एहसास हर लम्हा मेरे जो मरते गए; हर लम्हा ही हम टूटे एहसासों से जो टूटते गए।

सितम ज़िंदगी के हंसते हुए हम सहते गए; हर सितम से जिंदगी के सबक कोई नया जो सीखते गए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

19 जनवरी रविवार। समय दोपहर 2:52 बजे

🌹 फूल, पते, ग़ुलाब की पंखुड़ियां सब के सब खिल कर मुरझा गए; सब मौसम, आ कर गुजर गए, एक तुम ना आए, आ आ कर अश्क़ आँखों मे हमारी सुख गए।

बादल, वर्षा, वो बहता पानी, याद किसी की दिला गया; धड़कती धड़कन, वो बहता झरना, नाम बंद जुबां पर किसी का जो याद आ गया।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

🌹 मोहब्ब्त करना हर एक हसीन गुलाब से, काटो को चूम कर सीने से लगाना।

प्रेम पुजारी की प्रेम प्रतिज्ञा, हर हसीना को दिल मे बसाना, नैन लड़ाना गाना गाना।।

हर तीर मोहब्ब्त के दिल चिर ना दे, परीक्षा प्रेमी के प्रेम की, धड़कने तुम्हारी ना रोक दे।

दर्द जिंदगी के देख कर तुम मुड़ ना जाना, खड़ा है राह में प्रेम पुजारी हमे देख कर पलट ना जाना।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
28 जनवरी दोपहर 2:35 बजे on my writing blog site.

Book My Poetry show.

🎻 एक दर्द। (दर्दभरी नज़म) *पुनः प्रकाशित*

नही आती है नींद दीवाने को क्यों आज-कल।

विक्रांत राजलीवाल।

भूल गया है रंगीन हर ख़्वाब वो क्यों आज-कल।।

हो गया है खुद से ही बेगाना वो क्यों आज-कल।

रह गया है तन्हा भरे संसार में वो क्यों आज-कल।।

लेता है रुसवा बेदर्द रातो में नाम वो किसका आज-कल।

तड़पता है देख हाल ए दीवाना सा वो अपना आज-कल।।

ढूंढता है निसान ए महोबत, ए दर्द ए जुदाई इन काली श्याह रातो में वो किसके आज-कल।

पूछता है सवाल ए महोबत, मांगता है जवाब ए हक़ीक़त, आईने से टूटे वो किसके आज-कल।।

क्यों है इंतज़ार अब भी उसे, दर्द यह अवमस्या की रात,  ख्वाहिश है एक आखरी दीदार ए पूनम का वो एक चाँद।

क्यों है टूटती हर उम्मीद, अब भी उसे एक आरज़ू आखरी, यक़ीन है एक दर्द महोबत, अहसास ए धड़कन, उसकी हर एक बात।। विक्रांत राजलीवाल द्वरा लिखित।

Rachnakar Vikrant Rajliwal “Creation’s”

Source of publication
(Republish vikrantrajliwal.com)

👥 एहसास ए पत्थर। With YouTube Link Video.

आज कल हम पत्थरों में रहते है, उजड़ा जो गुलिस्तां हमारा तो अब हम पथरो में रहते है।

करते है मुलाकाते पथरो से अक्सर, खो गया जो जलसा हमारा तो अब हम मुलाकाते पथरो से करते है।।

उम्मीद है शायद ये पत्थर कभी तो धड़केंगे, अहसास ए महोबत के अहसासों से शायद वह भी कभी तो तड़पेंगे।

दिल जो अब पत्थर हो गए, अहसास न जाने कहा खो गए, ये ख़ामोशीया है सितम उनका, हर सितम से अपने कभी तो ये पत्थर पिंघलेंगे।।

खड़ा है अब भी राह ए उम्मीदी से दीवाना, तलाश ए दरार दिख जाएगी दरार जब कोई, वॉर ए महोबत से कर देगा चूर चूर हर अहसास ए पथर को ये दीवाना।

हर दिल है ये जो पत्थर, निशां ए बेबसी से जो जख्मी, जख्म ए दिल हर अहसासों पर मरहम अपने, लगा जाएगा जल्द ही कोई ये दीवाना।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

17/03/2018 at 07:34 am
(Republish)

पुनः प्रकाशित 11 फरवरी रात्रि 12:21 बजे।

YouTube Link is mentioned in below.

एहसास ए पत्थर।

🍂 दर्द ए जुदाई गाना। (with YouTube Live Performance video)

मेरा प्रथम गीत; दृश्य इस प्रकार से है कि एक प्रेमी युगल बिछुड़ रहा है या बुछुड़ जाते है और वह प्रेमी युगल एक दर्द भरी पुकार से तड़पते हुए करहा उठते है। (पुनः प्रकाशित)

रुक रुक रुक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

महोबत को तेरी भुला न सकेंगे।

न जिंदा रहे सकेंगे न हम मर सकेंगे।।

दर्द ए दिल तुझ से दुआ हम करेंगे।

आईने में दिल के तुझ को देखा करेंगे।।

रुक रुक रुक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

आ आ आ आ आ ए दिल-रुबा।

न जा जा जा जा जा तू है कहा।।

यादो को तेरी मिटा न सकेंगे।

न मिल हम सके तो हर लम्हा रोआ करेंगे।।

दर्द ए जुदाई दूर तुझ से तन्हा तड़पा करेंगे।

ज़ख्मो को दिल के हम कुरेदा करेंगे।।

रुक रुक रूक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

ज़ख्मो को दिल के सी न हम सकेंगे।

न दवा हम करेंगे न उनको भर सकेंगे।।

फिज़ाओ में सुनी, तन्हाइयो में अक्सर।

यादो में अपनी, दुआओ में अक्सर।।

तड़प ए दिल दिल कि गहराइयो में फिर भी, मिला हम करेंगे…ए प्रिया।

जागती आखो से अपने, अधूरे ख्वाबो में फिर भी, तुझ को पूजा करेंगे…ए प्रिया।

रुक रुक रुक रुक रुक ए हवा।

सुन सुन सुन सुन सुन तू सदा।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish at vikrantrajliwal.com)

YouTube Live Video link is mentioned in below.

एहसास। (ग़ज़ल)

हम लिखते है, हम गाते है, हम गीत खुशियों के गुनगुनाते है।

साथ पल दो पल का नही, ये एहसास ह्रदय से खनखनाते है।।

मौसमो की बारिश नही, ये अश्क़, यादों की एक निशानी है।

हर पल एहसासो को अपने संजोए, हर दर्द, हर दास्ताँ, मोहब्ब्त की एक कहानी है।।

आज फिर से तेरी याद आ गई सितमगर, गुजरे महखाने की गली से होकर जब हम।

गर गुनाह है तेरी याद में मह को पीना, तो ये गुनाह करते हुए मह को पीते जाएंगे अब हम।।

बोतल शराब की एक साथी रह गई बाकी, जो साथी थे हमारे वो साथ छोड़ गए सब के सब।

हर घुट से शराब की जिंदा होते गए हम, जिंदा थी जो सांसे हर घुट से शराब की उन्हें मारते गए हम।।

दर्द और दवा का असर, हमे मालूम नही, हर दवा को ज़हर और हर ज़हर को जिंदगी में शराब से घोलते गए हम।

आज वक़्त पूछता है पता, खुद हमसे हमारा, हम उसको बतलाए तो बतलाए क्या, दो घुट भी शराब की जो पीए नही अभी हम।।

ज़ख्म जिंदगी के हज़ार मिले, हर ज़ख्म एक निशान हक़ीक़त का लगा, हर निशान पर देकर एक निशान नया, हर ज़ख्म को ज़ख्म से अपने मिटाते गए हम।।।

फ़क़त हर ज़ख्म एहसासों का, आज भी ताज़ा है हमारा, हर एहसास करता है बयां, दर्द एहसासो का हमारा, हर दर्द से झलकता है एक एहसास अधूरा हमारा।

एहसास जो अधूरे रह गए, वक़्त की बिसात पर कहि जो खो गए, ढूंढता है आज भी उन एहसासों को, एहसासों में अपने कहि, एहसास अधूरा हमारा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
13/10/2019 at 3:31 pm

Published on vikrantrajliwal.com

(पुनः प्रकाशित। 7/02/2020 सांझ 4:37 बजे।)

एक लेखक, कवि, शायर, नाटककार, व्यंग्यकार, उपन्यासकार, कहानीकार, गीतकार, ग़ज़लकार एवं ब्लॉगर।

दर्द ए जिंदगी। (पुनः प्रकाशित)

जब खाई शिखस्त हमनें, अपनो के हाथों ही खाई, नही पाए पहचान जो हाथ वो खंजर उतारा दिल मे बेदर्दी से जो गया।

हो कर बेपरवाह ज़िन्दगी से, सलूख ज़िन्दगी के हम सीखते रहे, जान हर सलूख जिंदगी के, जान जिंदगी की निकलती रही।।

दर्द हर हक़ीक़त का करते रहे जान कर भी नज़रंदाज़ हम जिनकी, सितम ये के एतबार बेवफ़ाई पर उनकी हम जो करते रहे।

धूल थी चश्मे पर फ़रेब कि उनके हमारे और हम थे नादां इस कदर की बिन बात ही आँखों को अपनी जो मलते रहे।।

हर आह को टूटी सांसो से अपने दबाए, हर ख़ुशी से हो कर अंजान, बेरूखिया जमाने की हम जो झेलते रहे।

हर अंजाम बरबादियों का लगा कर सीने से अपने, बर्बाद खामोशियों से अक्सर हम जो होते रहे।।

हर दर्द ए ज़िन्दगी को जान कर अपना, अश्क़ बहाती है आँखे, अश्क़ अक्सर नम आँखों से अपने हम जो छुपाते रहे।

बहे गए अश्क़ सरेराह फ़िर भी कई, जिन अश्को को नम आँखों मे अपनी, हम कभी जो छुपा ना सके।।

टूटे दिल की उखड़ती सांसे और दर्द तड़पती धड़कनो का वो अपने, बंद जुबां से हर दर्द को खामोशी से अक्सर हम जो दबाते रहे।

हर दर्द ए ज़िंदगी हर दर्द ए दवा को हमारे बेअसर करते रहे, और हर दर्द से एक दास्ताँ ज़िन्दगी की अपनी हम जो लिखते रहे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
28/05/2019 at5:20 pm

(पुनः प्रकाशित)

विक्रांत राजलीवाल जी के कलम से।

💥 एक सेवा। // 💥 A Social Service.

🕊️
🙏 यदि आप गरीब बच्चों, नशे से पीड़ित बच्चों, बीमार बच्चों के साक्षरता, स्वास्थ्य एवं बहेतर जीवन से सम्बंधित समाज कार्य करते है तो आप कभी भी मेरा चेरिटेबल नज़म, ग़ज़म, काव्य एवं शायरी का कार्यक्रम बिल्कुल मुफ्त करवा सकते है। इसके लिए मैं आपको कोई भी राशि नही लूंगा अपितु यकीन मानिए आप के इस नेक कार्य में अपनी रचनात्मक रचनाओं की प्रस्तुति कर मुझे ह्रदय से खुशी होगी।

विक्रांत राजलीवाल।

🕊️
🙏 If you work for the society related to literacy, health and better life of poor children, drug addicts, sick children, then you can get my charitable najam, ghazam, poetry and shayari program absolutely free. For this I will not take any amount from you, but believe me, I will be happy from my heart by presenting my creative works in this noble work of yours.

Vikrant Rajliwal.

VIKRANTRAJLIWAL.COM

🌃 स्वप्न ड़ोर।// 🌃 Dream rope.

रात की कालिमा में खिल जाए निंद्रा ये तुम्हारी।

देखो स्वप्न सुहावने भूल कर हर परेशानी ये ज़िंदगानी।।

साथ खुशियां है ख़िलखिलाती हर मुस्कुराहट ये मासूम सी तुम्हारी।

उड़ चलो पार निल गगन के ड़ोर स्वप्न साथ है कल्पनाओं की तुम्हारी।।

इसी एक एहसास के साथ आप सभी मित्रजनों को पुनः 🌌शुभरात्रि।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
ब्लॉग साइट पर प्रकाशित समय 18/04/2019 at 8:20 pm

🌌 Good night friends,

Nindra is blooming in the Kalima of the night.

Do not forget to forget the dream, every trouble is alive ..

I am happy with all the smiling smile that you are innocent.

Let’s fly cross nil gagan’s dream dream is along with your fantasies ..

With this one realization, all the friends will be happy 🌌 Good Night friend’s.

Written by Vikrant Rajliwal
Published on 18/04/2016 at 8:20 pm